'न कमाई करने के लिए ज़मीन है न रोजगार का कोई साधन'

By: | Last Updated: Thursday, 14 May 2015 3:17 PM
Supreme Court

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अहम फैसले में दिल्ली से सटे नोएडा एक्सटेंशन में अधिग्रहीत जमीन को वापस लौटाने की किसानों की याचिका रद्द कर दी. साथ ही इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले को भी बरक़रार रखा है, जिसमे नोएडा और ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण को अधिग्रहीत जमीन के बदले में किसानों को बढ़ा हुआ मुआवजा और 10 प्रतिशत डेवलप्ड एरिया देने का आदेश दिया था.

 

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद हमने नोएडा एक्सटेंशन के कुछ किसानों से इस पर प्रतिक्रिया जानी. नोएडा एक्सटेंशन के रौजा और जलालपुर गाँव के किसान सुप्रीम कोर्ट के आज के फैसले के बाद काफी निराश हैं.

 

जैसे जैसे गाँव के लोगों को इस फैसले के बारे में जानकारी मिली, कई किसान गाँव के प्रधान के यहाँ इकट्ठा होने लगे. आसपास के 40 गाँव के किसानों की ‘ किसान संघर्ष समिति’ के मनवीर भाटी कहते हैं कि किसानों का न तो विकास से दिक्कत है न बनने वाली इन ऊंची इमारतों से.

नोएडा एक्सटेंशन में फ्लैट खरीदने वालों को मिली बड़ी रीहत 

2008 में सरकार ने हमारी जमीनें जबरदस्ती अधिग्रहीत कर ली, किसान मजबूर था और उसने मुआवजा ले लिया. लेकिन दिक्कत की सबसे बड़ी वजह जमीन के बदले मिलने वाले मुआवजे से है.

 

पहले किसान को 850 रूपये वर्ग मीटर के हिसाब से मुआवजा दिया गया, जब इस फैसले के खिलाफ किसान इलाहाबाद हाई कोर्ट गए तो प्रति वर्ग मीटर मुआवजा लगभग 65 फीसदी बढ़ा दिया गया यानि कि 1400 रुपये. लेकिन नॉएडा और ग्रेटर नॉएडा अथॉरिटी वही जमीन बिल्डरों को कई गुना ज्यादा दामों में बेचती है.

किसानों के विरोध की वजह भी यही है. वो चाहते हैं कि बिल्डर्स या ज़मीन खरीददार सीधे किसानों से ज़मीन लें, क्योंकि जो मुनाफा अथॉरिटी को मिल रहा है वो उन्हें मिले.

 

जलालपुर के ही एक किसान विनेश त्यागी बताते हैं कि जो पैसा उन्हें मुआवजे में मिला उससे उन्होंने घर बनवा लिया या बच्चों की शादी कर दी. ऐसे में ज़मीन जाने के बाद उनके पास न कमाई करने के लिए ज़मीन है न रोजगार का कोई और साधन.

 

नोएडा एक्सटेंशन में रियल एस्टेट के कई सारे प्रोजेक्ट बना रहे आम्रपाली समूह के बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर के सदस्य सुभाष कुमार चंद्रा में सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर ख़ुशी जताई है.

सुभाष कहते हैं कि नॉएडा एक्सटेंशन में लगभग 4-5 लाख फ्लैट बनकर तैयार हैं. जमीन बची कहाँ है? अब तो सिर्फ कंक्रीट के जंगल हैं. लाखों की संख्या में फ्लैट बिक चुके हैं. ऐसे में फ्लैट के खरीददारों की गाढ़ी कमाई इसमें लगी हुई है. ऐसे में किसानों की ज़मीन वापसी का मुद्दा अव्यवहारिक है.

 

जहाँ एक तरफ इस फैसले से फ्लैट के खरीददारों को बड़ी राहत मिली है. वहीँ सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद लगाये बैठे किसान अब आगे की रणनीति बना रहे हैं. किसानों की ये लड़ाई अब सड़क तक जा सकती है.

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