याकूब मेमन को माफी के लिए मिलेंगे पांच मिनट!

By: | Last Updated: Monday, 20 July 2015 12:57 PM

नई दिल्ली: 1993 में मुंबई बम धमाके के दोषी याकूब मेमन के पास अपनी फांसी के खिलाफ बस अब एक आखिरी मौका बचा है. कल सुप्रीम कोर्ट में याकूब की क्यूरेटिव पीटिशन पर सुनवाई होगी और पांच मिनट के भीतर याकूब की किस्मत का फैसला हो जाएगा. इन पांच मिनटों में या तो फांसी टल जाएगी या फिर 30 जुलाई को याकूब की फांसी पर आखिरी मुहर लग जाएगी.

 

दोपहर एक बजकर चालीस मिनट

 

ठीक इसी वक्त सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ जज चीफ जस्टिस एचएल दत्तू, जस्टिस टीएस ठाकुर और जस्टिस अनिल आर दवे याकूब मेमन की क्यूरेटिव पीटिशन पर आखिरी फैसला लेंगे.

 

दोपहर 1 बजकर 40 मिनट पर याकूब का नंबर आएगा और पांच मिनट से भी कम वक्त में ये फैसला हो जाएगा कि याचिका मंजूर हुई या फिर खारिज. अगर याकूब मेमन की क्यूरेटिव पीटिशन मंजूर होती है तो एक बार फिर याकूब की सजा पर सुनवाई शुरू होगी लेकिन अगर पीटिशन नामंजूर हुई तो 30 जुलाई को सुबह 7 बजे नागपुर सेंट्रल जेल में याकूब को फांसी दे दी जाएगी. अपनी फांसी की सजा के खिलाफ याकूब के पास बस ये एक आखिरी मौका है.

21 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू और क्यूरेटिव मिलाकर कुल पांच याचिकाओं पर सुनवाई होनी है. जिसमें तीसरा नंबर 53 साल के याकूब मेनन का होगा. लेकिन पांच याचिकाओं में सिर्फ याकूब का मामला जिंदगी और मौत से जुड़ा हुआ है.

 

क्या होती है क्यूरेटिव पीटिशन?

क्यूरेटिव पीटिशन याचिकाकर्ता को एक आखिरी मौका देती है अगर उसे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट से उसे इंसाफ नहीं मिला. ये मौका याचिकाकर्ता की लड़ाई का बेहद अहम हिस्सा होता है क्योंकि ये केस का आखिरी पड़ाव होता है. क्यूरेटिव पीटिशन तब ही दाखिल की जा सकती है जब सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया हो.

 

क्यूरेटिव पीटिशन की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के तीन वरिष्ठ जज करते हैं. और साथ ही वो बेंच भी जो रिव्यू पीटिशन खारिज कर चुकी हो लेकिन तब जब उसके पास समय हो. क्यूरेटिव पीटिशन की सुनवाई कोर्ट रूम में नहीं बल्कि चैंबर में होती है. जहां सिर्फ जज होते हैं.

 

9 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने मुंबई हमले के दोषी याकूब मेमन की मौत की सजा के खिलाफ रिव्यू पीटिशन खारिज कर दी थी. मई 2014 में राष्ट्रपति याकूब की दया याचिका खारिज कर चुके हैं.

 

22 साल बाद मुंबई बम धमाकों में याकूब मेमन की फांसी पहली फांसी होगी. मुंबई बम धमाकों में याकूब मेमन समेत 12 आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी. मुंबई हमले के दोषी याकूब मेमन को फांसी की सजा सुनाने वाले जज पीडी कोदे से एबीपी न्यूज संवाददाता जीतेंद्र दीक्षित ने बात की.

 

जज ने कहा कि मौत की सजा सुनाते वक्त मैं अपनी मानवीय भावनाओं से प्रभावित नहीं हुआ. जज किसी को मौत की सजा सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर सुनाता है. समाज कानून बनाता है, लेकिन ये भी सच है कि कानून समाज के लिये ही होता है. इसलिये अगर किसी को मौत की सजा दी जाती है तो वो समाज के लिये है. सजा व्यकित को नहीं दी जाती बल्कि उसके भीतर मौजूद आपराधित तत्व को दी जाती है. अगर न्यायव्यवस्था को ये विश्वास हो जाता है कि कोई शख्स समाज में रहने के लायक नहीं है तो उसे मौत की सजा दी जाती है.

 

याकूब अब्दुल रज्जाक मेमन मुबंई बम धमाकों के मास्टरमाइंड टाइगर मेमन का छोटा भाई है. याकूब मेमन परिवार का सबसे पढ़ा लिखा शख्स है जो पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट हुआ करता था. याकूब को फांसी की सजा सुनाने वाले जस्टिस पीडी कोदे ने भी याकूब की पढ़ाई को व्यवहार का जिक्र भी किया.

 

जज ने कहा कि याकूब मेमन एक पढा लिखा आरोपी था और उसी मुताबिक वो व्यवहार भी करता था, लेकिन उसके व्यवहार का उसकी सजा पर कोई फर्क नहीं पडा. हर आरोपी ने जो किया उसकी सजा उसे मिली. मेरे पास कोर्ट में काम करने के लिये सिर्फ 5 घंटे मिलते थे. इस वक्त में मैं अपना काम कब करता और आरोपियों के आचरण कब देखता.

 

मुंबई बम धमाकों की साजिश याकूब के भाई टाइगर और अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद ने मिलकर रची थी. याकूब को सजा धमाके में शामिल लोगों को हथियार पहुंचाने के गुनाह के लिए सजा मिली. धमाकों से एक दिन पहले मेमन परिवार देश से फरार हो गया था और पाकिस्तान में पनाह ली थी. साल 1994 में याकूब को मेमन को सीबीआई ने दिल्ली में गिरफ्तार किया था.

 

टाडा कोर्ट ने 27 जुलाई 2007 के दिन याकूब मेमन को आपराधिक साजिश का दोषी करार देते हुए मौत की सजा सुनाई थी. इसके बाद याकूब ने बॉम्बे हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन याकूब को कहीं से भी मौत की माफी नहीं मिली. 21 जुलाई को याकूब के पास एक आखिरी मौका है. वरना ठीक नौ दिन बाद 30 जुलाई को याकूब को फांसी दे दी जाएगी.

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Web Title: Supreme Court allots five minutes to Yakub Memon’s final appeal of his death sentence
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