नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध रेप माना जाएगा, सुप्रीम कोर्ट का आदेश

नाबालिग पत्नी के साथ यौन संबंध रेप माना जाएगा, सुप्रीम कोर्ट का आदेश

ये याचिका 'इंडिपेंडेंट थॉट' नाम की संस्था ने दायर की है. कोर्ट ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए 6 सितंबर को फैसला सुरक्षित रखा था.

By: | Updated: 11 Oct 2017 02:55 PM

नई दिल्ली: अब नाबालिग पत्नी के साथ पति का यौन संबंध रेप माना जाएगा. ये फैसला सुप्रीम कोर्ट ने दिया है. इस फैसले के बाद अब 15 से 18 साल की पत्नी के साथ पति का यौन संबंध बनाना अपराध हो गया है.


आज के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने रेप की परिभाषा तय करने वाली आईपीसी की धारा 375 में बदलाव किया है. इस धारा में 15 साल से ज़्यादा की विवाहित महिला के साथ उसके पति के यौन संबंध को बलात्कार नहीं माना गया था. जस्टिस मदन बी लोकुर और दीपक गुप्ता की बेंच ने इस अपवाद को हटा दिया है.


ये फैसला एनजीओ इंडिपेंडेंट थॉट की याचिका पर आया है. याचिका में कहा गया था कि कानूनन यौन संबंध के लिए सहमति की उम्र 18 है. इस वजह से 18 से कम की लड़की के साथ उसकी मर्जी से बने संबंध को भी बलात्कार ही माना जाता है. लेकिन अगर नाबालिग लड़की विवाहित हो तो उसके लिए कानून बदल जाता है. लड़की की उम्र 15 साल से ज़्यादा हो तो उसके साथ पति का संबंध बनाना बलात्कार नहीं माना जाता.


याचिकाकर्ता ने ये भी कहा था कि बच्चों के यौन शोषण के खिलाफ बने पॉक्सो कानून में शादी की वजह से छूट का कोई प्रावधान नहीं किया गया है. इसके बावजूद IPC की धारा 375 यानी बलात्कार की परिभाषा में शादी को अपवाद माने जाने के चलते शिकायत कर पाना मुश्किल है.


सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता की बात को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार की दलीलों को ख़ारिज कर दिया. केंद्र ने याचिका का विरोध करते हुए कहा था कि भारत की सामाजिक परिस्थितियों को देखते हुए ही कानून बनाया गया है. बाल विवाह अब काफी कम हो गए हैं. फिर भी समाज के कुछ हिस्सों में बाल विवाह का चलन है. इसलिए, संसद ने काफी सोच विचार कर 15 से 18 साल की पत्नी के साथ यौन संबंध को अपराध के दायरे से बाहर रखा है.


इसके जवाब में याचिकाकर्ता का कहना था कि उसका मकसद पारिवारिक ढांचे को नुकसान पहुंचाना नहीं है. लेकिन नाबालिग लड़की को अपने साथ बलात्कार की शिकायत का मौका मिलना ही चाहिए.


कोर्ट ने माना है कि अगर बाल विवाह गैरकानूनी है तो नाबालिग पत्नी के साथ संबंध की मंजूरी का कोई औचित्य नहीं है. कोर्ट ने सभी राज्य सरकारों को निर्देश दिया है कि वो बाल विवाह को रोकने के लिए सख्त कदम उठाएं.

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