स्पेशल: मिलिए उन शिक्षकों से जिनका काम अभावों में भी बेमिसाल है

By: | Last Updated: Thursday, 3 September 2015 3:27 PM

नई दिल्ली : 5 सितंबर को शिक्षक दिवस है. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 4 सितंबर को बच्चों से मिलेंगे और जानेंगे पढ़ाई का हाल. एबीपी न्यूज देश के कई राज्यों में ऐसे शिक्षकों के पास पहुंचा जो विपरीत हालात के बाद भी बच्चों को पढ़ाने पूरे जी जान से जुटे हैं.

 

आइए आपको मिलाते हैं जम्मू के एक ऐसे टीचर से जो अखबार बेचकर न सिर्फ अपना परिवार चला रहे हैं बल्कि स्कूल के बच्चों को मिड डे मील भी देते हैं.

 

शिक्षक: जोगिन्दर कुमार

 

जम्मू के तालाब तिल्लो इलाके में सुबह-सुबह साइकिल पर सवार होकर अखबार बांटने के लिए निकल जाते हैं जोगिन्दर कुमार. इन्हें देख कर तो आप यही कहेंगे कि ये कोई अखबारवाला है, पर जोगिंदर एक शिक्षक हैं. अपने परिवार और स्कूल के बच्चों की मिड डे मिल की खातिर ये सुबह-सुबह अखबार बेचते हैं.

 

जोगिंदर अखबार बांटने का काम तब से कर रहे हैं जब वो जम्मू कश्मीर शिक्षा विभाग में बतौर रहबरे तालीम शिक्षक लगे थे. तब उनका वेतन तीन हज़ार रुपये था. कम पैसे से परिवार का गुजारा मुश्किल था इसलिए अखबार बांटना शुरू किया. बाद में नौकरी तो स्थायी हो गई पर समय पर कभी सैलरी नहीं मिली. जोगिन्दर स्वेच्छा से अपने परिवार और स्कूल के बच्चों की मिड डे मील के लिए अलग से काम करते हैं.

 

जोगिंदर को स्कूल के बच्चों के खाने के बारे में भी चिंता करनी पड़ती है. जोगिंदर का कहना है कि स्कूली बच्चों के खाने के लिए सरकार सिर्फ चावल देती है. मिड डे मील के लिए सब्जी और खाना बनाने वाले रसोइया के लिए पैसे की व्यवस्था जोगिंदर खुद करते हैं. मीड डे मिल के लिए जोगिंदर बैंक से कर्ज तक ले चुके हैं.

 

बच्चों की पढ़ाई कभी न रुके इसकी खातिर जोगिन्दर कुछ भी करने को तैयार हैं. यही वजह है कि न सिर्फ स्कूल के बच्चे बल्कि बच्चों के माता-पिता इन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं.

 

बुलंदशहर:  फ़िरोज़ खान

 

देश भर के सरकारी स्कूलों में बदहाली की तस्वीर किसी से छिपी नहीं है. मूलभूत सुविधाओं की कमियों के बीच भी कुछ शिक्षक अपने छात्रों को अच्छी से अच्छी शिक्षा देने का भरसक प्रयास कर रहे हैं. इन्ही शिक्षकों में एक हैं यूपी के बुलंदशहर के फ़िरोज़ खान.

 

प्रोजेक्टर और लैपटॉप की मदद से पढ़ाई कर रहे ये बच्चे किसी कॉन्वेंट स्कूल के नहीं हैं…..किसी अच्छे प्राइवेट स्कूल की तरह ये पढ़ाई हो रही है बुलंदशहर के गुलावटि कस्बे के सरकारी स्कूल में……. इस स्कूल को खास बनाया है यहां के शिक्षक फिरोज खान ने….. फ़िरोज़ यूपी के लाखों प्राइमरी शिक्षकों की तरह ही प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक हैं लेकिन उनकी कोशिश उन्हें सबसे अलग बनाती है. चिढावक गांव के इस स्कूल में न इमारत है न बैठने के लिए बेंच….और न ही लाइट की व्यवस्था….इसके बाद भी फिरोज आधुनिक तरीके से बच्चों को पढ़ाने में जुटे हैं.

 

बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए फ़िरोज़ ने किसी सरकारी मदद का इंतजार नहीं किया. फिरोज अपने पैसे से प्रोजेक्टर और लैपटॉप खरीद कर पॉवर पॉइंट प्रेजेंटेशन के ज़रिए बच्चों को पढ़ाते हैं.

 

28 साल के फिरोज़ खान को उनकी पिता की मौत के बाद सरकारी स्कूल में टीचर की नौकरी मिली थी. दिल्ली जैसे शहर को छोड़ कर फिरोज़ बुलंदशहर के एक छोटे से गाँव में पढ़ाने आ गए. फ़िरोज़ को बिल गेट्स की माइक्रोसॉफ्ट से 10 दिन की पढ़ाने की ट्रेनिंग मिली. इतना ही नहीं, उन्हें साल 2012 में माइक्रोसॉफ्ट की तरफ से इनोवेटिव टीचर लीडरशिप अवार्ड भी मिल चुका है. फिरोज जैसे काबिल शिक्षक की पढ़ाई से यहां के बच्चे काफी खुश हैं.

 

सरकारी स्कूलों की बदहाली को बच्चों की शिक्षा में बाधा न बनने देते हुए फिरोज़ खान ने स्मार्ट क्लास की मदद से बदलाव लाने की कोशिश की है. फ़िरोज़ कई लोगों के लिए मिसाल बन चुके हैं.

 

लखनऊ: अनीता पाल

 

एक महिला जिसकी पढ़ाई लिखाई शहर में हुई और उसकी शादी गांव में हुई. गांव आने के साथ ही उस महिला ने लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला. जिस इलाके में लड़कियों के लिए एक भी स्कूल नहीं था आज वहां की लड़कियां बड़ी-बड़ी नौकरियां कर रही हैं. मिलिए अनीता पाल से.

 

यूपी में बेसिक शिक्षा में कोई ऐसा सिलेबस नहीं है, जिसमें बच्चों को उनकी रुचि के हिसाब से सिखाया जाए. लेकिन लखनऊ की रिद्धि और राहुल गरीब बच्चों को स्कूल में ही स्किल डेवलपमेंट का पाठ पढा रहे हैं.

 

लखनऊ के इस स्कूल में गरीब परिवार के बच्चों को जिंदगी जीने का पाठ पढ़ाया नहीं सिखाया जा रहा है…..यहां बच्चों को उनके शौक के मुताबिक पढ़ाया जा रहा है….इस घर की खुली छत पर लगी इस क्लास में हर उन सवालों का जवाब मिलता है जो इन बच्चों के मन में कैद रहते हैं……. मामूली परिवार से आने वाले इन बच्चों को जिंदगी जीने की कला सिखा रहे हैं रिद्धि पाठक और उनके पति राहुल पाठक. रिद्धि दिल्ली में एक बड़ी कंपनी में काम करती थीं जबकि उनके पति एक टेलीकॉम कंपनी में अधिकारी थे……….  समाज के लिए कुछ करने का जज्बा लेकर दोनों ने सालाना पचास लाख की नौकरी छोड़ दी.

 

रिद्धि और राहुल पाठक दोनों अपने घर पर निचले तबके के उन बच्चों को पढने का मौका मुहैय्या कराते हैं, जिन परिवारों के बस में बच्चों को पढ़ा पाना मुश्किल है. सिर्फ किताबी ज्ञान ही यहां नहीं दिया जाता बल्कि बच्चों को पेंटिंग , ड्राफ्टिंग , गार्डनिंग सब कुछ बताया जाता है ताकि बच्चों को बड़े होकर रोजगार मिलने में आसानी हो.

 

ऋद्धि बताती हैं कि नौकरी में उनका मन कभी नहीं लगा. शुरू से ही वो बच्चों को पढ़ाना चाहती थीं , जब नौकरी छोड़ी तो घर वाले मायूस भी हुए लेकिन बाद में सबका इन्हें सहयोग मिलने लगा. इन्हें इस काम में इनके कई कार्पोरेट दोस्तों ने भी मदद की है.  हालांकि शुरुआत इन्होंने अपनी जमा पूंजी से की. राहुल और ऋद्धि ने एक संस्था स्वतंत्र तालीम के नाम से बनायीं है.  

 

ऋद्धि और राहुल ने दिल्ली से दूर लखनऊ इसलिए चुना क्योंकि उन्हें लगा कि यूपी में बच्चों के विकास के लिए कोई इस तरह के कदम नहीं उठाये गए हैं जिससे बच्चों का स्किल डेवलपमेंट हो सके.

 

छत्तीसगढ़ के जशपुर : आई मिंज

 

स्टोरी-बच्चों के भविष्य की खातिर सरकारी नौकरी छोड़ चंदे के पैसे से चला रहे हैं स्कूल. छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के गोलीडीह गाँव के स्कूल को संवारने में आई. मिंज ने न केवल अपनी सरकारी नौकरी छोड़ी बल्कि अपनी पूरी जिंदगी ही स्कूल के नाम कर दी.

 

छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के गोलीडीह में पहली से पांचवी तक  चलने वाला ये बेहद खास स्कूल है….क्योंकि इस स्कूल को चलाते हैं एक बेहद खास शिक्षक-  आई मिंज…. मिंज सर करीब 90 साल पुरानी एक परंपरा को यहां आगे बढ़ा रहे हैं…… ये स्कूल 1923 से  गांव वालों के चंदे से चलाया जा रहा है. इस स्कूल की नींव गांव के पूर्वजों ने इसलिए रखी क्योंकि गांव के बच्चों को नदी पार कर के दूसरे गांव में पढ़ने  के लिए जाना पड़ता था.

 

आई मिंज ने शुरूआती पढ़ाई इसी स्कूल से की और 1968 में  मैट्रिक पास  किया. पूर्वजों ने आई मिंज को इस स्कूल को चलाने का प्रस्ताव दिया. आई मिंज ने इस जिम्मेदारी को स्वीकार किया. गांव वालों के चंदे से ही इन्हें शिक्षक की  ट्रेनिंग दिलवाई गई. ट्रेनिंग के बाद  उनकी सरकारी नौकरी लग गई लेकिन उन्होंने सरकारी नौकरी को ठुकराते हुए इसी स्कूल को चलाना ज्यादा बेहतर समझा.

 

पूर्वजों द्वारा संचालित इस स्कूल को सही मुक़ाम उस वक़्त मिला जब गोलीडीह में रहने वाले 67 साल के आई मिंज ने यह जिद ठान ली की वो किसी भी परिस्थिति में स्कूल का संचालन करेंगे.

 

इस स्कूल से पढ कर कई लोग ऊंचे पद तक पहुंचे. दिलचस्प है कि इसी स्कूल से पढ़े आई मिंज के भाई जे मिंज  आईएएस अफसर बने और छत्तीसगढ़ के शिक्षा सचिव हुए.

 

ये स्कूल गांव वालों की सहायता से चल रहा है. गांव वाले हर हफ्ते एक जगह पर कोई चावल तो कोई अपने सामर्थ्य के अनुशार पैसा इकठ्ठा करता हैं. फिर उसे बेचकर जो पैसा मिलता है उसी से शिक्षकों का वेतन और स्कूल का सामान खरीदा जाता है.

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Web Title: teacher day special: case study of dedicated teachers
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