टीचर्स डे स्पेशल: क्यों मनाया जाता है टीचर्स डे, क्या है इसका इतिहास?

By: | Last Updated: Friday, 5 September 2014 3:40 AM
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नई दिल्ली :किसी भी देश या समाज की दिशा उस देश की नई पीढ़ी तय करती है. और उस नई पीढी को संवारने का दारोमदार शिक्षकों पर होता है. कोई भी देश या समाज हर मामले में कितना उन्नत है ये सभी चीजें इस बात पर निर्भर करती हैं कि वहां के शिक्षक कैसे हैं.

 

यदि छोटे पौधे कि देखभाल करने वाला माली ही पौधों पर ध्यान न दें तो क्या यह उम्मीद कि जा सकती है कि वह एक विशाल और सुंदर पेड़ बन पायेगा. ठीक इसी तरह यदि शिक्षक अपने विद्यार्थियों को हर तरह से न संवारे तो यह सिर्फ कोरी कल्पना ही होगा कि वह समाज एक उन्नत समाज होगा.

 

शिक्षक दिवस का इतिहास-

भारत में आदि काल से ही शिक्षकों को मान-सम्मान मिलता रहा है. इसका ज़िक्र महाभारत, रामायण जैसे धर्मग्रंथों में भी है. गुरुकुल की व्यवस्था भारत में शिक्षा और शिक्षकों के आदर सम्मान की कहानी बयान करती है. 

 

भारत में जब विदेशी शासकों का दौर चला तब भी शिक्षा की पद्धति में कई सारे बदलाव जरूर आए, लकिन गुरुओं के मान-सम्मान में कहीं कोई कमी नहीं आई.

 

समय के बदलने के साथ ही परंपराएं बदली, भारत आज़ाद हुआ और फिर नए कॉन्सेप्ट ने जन्म लिया. और एक वक़्त आया जब भारत ने 5 सितंबर को शिक्षा दिवस मनाने की नई परंपरा की शुरुआत की.

 

देश में हर साल 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है. यह परंपरा 1962 से चली आ रही है. यहां पर शिक्षक दिवस भारत रत्न और देश के पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के सम्मान में मनाया जाता है.

 

भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के अनेक देशों में अलग-अलग तारीख़ में शिक्षक दिवस मनाया जाता है. चीन में शिक्षक दिवस भारत के ठीक 5 दिन बाद यानी 10 सितंबर को मनाया जाता है. 5 अक्टूबर को विश्व शिक्षक दिवस मनाया जाता है.

 

कौन हैं डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन?

 

5 सितंबर 1888 को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था. उनके जन्मदिवस को यादगार बनाने और सम्मान देने के लिए भारत सरकार ने इस दिन को शिक्षक दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया था.

 

अपने जन्मदिन पर शिक्षक दिवस मनाने के उपलक्ष्य में उन्होनें कहा था कि “इस दिन का इस्तेमाल सिर्फ मेरे सम्मान के लिए न किया जाए बल्कि सभी शिक्षकों को एकसमान सम्मान दिया जाना चाहिए.”

 

उनकी यह सोच बताती है कि शिक्षकों के लिए उनके मन में कितना सम्मान था. उनका यह भी कहना था कि शिक्षकों को देश का सबसे उत्कृष्ट दिमाग होना चाहिए.

 

डॉ. राधाकृष्णन एक विचारक, दार्शनिक, शिक्षाविद और समाजसेवी थे. डॉ. राधाकृष्णन को कई सारे विषयों पर एकसमान पकड़ था. वे मैसूर यूनिवर्सिटी, कलकत्ता यूनिवर्सिटी के साथ विश्व प्रसिद्ध ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ाया है.

 

वे 1931 से 1936 तक आंध्रा यूनिवर्सिटी के वायस चांसलर और मदन मोहन मालवीय के आग्रह पर 1939 से 1948 तक बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के भी वायस चांसलर रहे. मई 1952 में वे देश के पहले उपराष्ट्रपति बने और इस पद पर वे मई 1962 तक रहे.

 

1962 के मई महीने में ही उन्हें देश का दूसरा राष्ट्रपति बनाया गया और इस पद पर वह 1967 तक रहे. बिना किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़े वे ताउम्र देश निर्माण में लगे रहे.

 

वर्तमान में कैसे मनाया जा रहा है शिक्षक दिवस-

वर्तमान समय में छात्र अपने सबसे प्रिय शिक्षक को तरह-तरह के उपहार भेंट करते हैं, उनके सम्मान में तारीफ के दो शब्द और कविताएं भी लिखते हैं. छात्र अपना स्नेह व्यक्त करने के लिए विद्यालयों में कई तरह के कार्यक्रमों का भी आयोजन करते हैं.

 

छात्रों की यह कोशिश रहती है कि वर्तमान दौर में आदर और प्रेम अभिव्यक्त करने के जो भी माध्यम है उसके मार्फत वे शिक्षकों के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त कर सकें. इसके लिए विद्यार्थी अपने प्रिय गुरूजन के लिए फूलों के गुलदस्ते, ग्रिटींग कार्ड, चॉकलेट आदी लेकर जाते हैं.

 

टेक्नालाजी के इस दौर में छात्र ई-ग्रिटींग कार्ड, ई-ग्रिटींग, एसएमएस संदेश आदी भी भेजते हैं. इस दिन पुराने छात्र भी अपने पसंदीदा शिक्षक से मिलने जाते हैं और उनका आभार व्यक्त करते हैं. इस तरह से छात्रो द्वारा दिए गए प्रेम और सम्मान से शिक्षक भी भावुक हो जाते हैं.

 

शिक्षक दिवस पर क्या है विवाद-

मानव संसाधन मंत्रालय के तरफ से स्कूलों को निर्देश दिया गया है कि 5 सितंबर को 3 बजे से पौने पांच बजे तक प्रधानमंत्री का भाषण सुनना जरूरी है. हालांकि केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने विवाद से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हुए कहा है कि यह पूरी तरह से स्वैच्छिक है.

सवाल यह है कि यदि यह पूरी तरह से स्वैच्छिक है तो फिर क्यों स्कूलों को निर्देश दिया गया है कि प्रधानमंत्री का भाषण सुनने के लिए विद्यालय सभी तरह की व्यवस्था करें. आखिर क्यों शिक्षा अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे स्कूलों का दौरा करें और देखे कि निर्देश का पालन किया जा रहा है कि नहीं.

 

सवाल यह भी है कि जिस देश के हजारों स्कूलों में अभी तक बिजली और शौचलय तक की व्यवस्था नहीं है वहां टीवी आदी की व्यवस्था किस तरह कि जाएगी.

 

यदि व्यवस्था हो भी जाती है तो बाध्य कर के भाषण सुनवाना क्या लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात नहीं है. क्या अभी डॉ. राधाकृष्णन होते तो वो इस तरह से छात्रों को भाषण सुनने पर बाध्य होने देते.

 

एक विवाद यह भी है कि सरकार ने विज्ञापनों में शिक्षक दिवस की जगह गुरुत्सव शब्द का इस्तेमाल किया है जिसे लेकर काफी हो हल्ला मचा हुआ है. कई बड़े राजनीतिक दलों ने इसे जबरदस्ती थोपना कहा है.

 

उनके मुताबिक इस तरह नाम बदलकर हिन्दी को थोपना गलत है. एनडीए की सहयोगी दलों में भी गरुत्सव शब्द को लेकर अलग-अलग सुर है. सहयोगी दल एमडीएमके नेता वाइको ने केंद्र से कहा है कि टीचर्स डे को गुरूत्सव के रूप में मनाने का फैसला वापस लें.

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