नीतीश कुमार की गलतियां और क्यों अलग थलग हुए नीतीश

By: | Last Updated: Saturday, 13 December 2014 10:57 AM
The mistakes of Nitish Kumar and why he is the odd man out

मुझ जैसे व्यक्ति को चित्रों से ज्यादा शब्द प्रभावित करते हैं. लेकिन मेरा दिल उस वक्त डूब गया जब मैंने जनता परिवार बनाने के लिए हुई मीटिंग की तस्वीर देखी. तस्वीर में समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह, राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद, जनता दल (सेक्यूलर) के एच डी देवेगौड़ा, आईएनएलडी के अभय चौटाला और जनता दल (यूनियाइटेड) के नीतीश कुमार मौजूद थे. 

 

इन पांच नेताओं में जो आखिरी नेता हैं वे इन सबसे अलग हैं. नीतीश कुमार चौटाला, यादव और गौड़ा इन तीनों से तीन तरह से अलग है. पहला, बांकियों की तरह उनके पिता, पत्नी, बेटा या भाई राजनीति में नहीं हैं. दूसरा, उनपर भ्रष्टाचार के आरोप भी नहीं हैं. तीसरा, इन पांचों में वे अकेले हैं जिन्होंने वास्तविकता में अपने राज्य के शासन और विकास को गंभीरता से लिया है.

 

नीतीश कुमार जब राज्य के मुख्यमंत्री बने तो बिहार के शासन-प्रशासन का हाल देश में सबसे बुरा था. कानून व्यवस्था पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी. हत्या और अपहरण के मामले आम थे. राज्य की राजधानी पटना की सड़कों पर अंधेरा होने के बाद चलना मु्श्किल था. कई जिलों में दिन के उजाले में भी गड़ी चलाना खतरे से बाहर नहीं था. लालू के 15 साल के राज ने राज्य की अर्थव्यवस्था से लेकर नौकरशाही तक को बर्बाद कर दिया था. इस दौरान फलने-फूलने वालों में आरजेडी के विधायक, मंत्री, उनके करीबी (कई बार करीबियों के करीबी) रिश्तेदार शामिल थे.

 

लालू की तुलना में नीतीश कुमार के खिलाफ दुराचार के आरोप नहीं हैं. उनकी छवी एक मेहनती नेता की रही है और उन्होंने अटल बिहारी वाजपयी नीत एनडीए सरकार में एक बहुत कुशल रेल मंत्री होने का प्रमाण दिया (उन्होंने ने ही रेलवे की बुकिंग में तत्काल की सेवा शुरु की थी). उनकी पार्टी जेडीयू ने बीजेपी के साथ गठबंधन करके इस वादे पर चुनाव जीता था कि वो राज्य से गुंडा राज समाप्त करके शांती, स्थिरता और विकास का काम करेंगे.

 

2005 में एनडीए ने बिहार में सरकार बनाई. जेडीयू के नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और बीजेपी के सुशील मोदी उप-मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री बने. दोनों जेपी (जयप्रकाश) आंदोलन के समय भी साथ थे. बिहार की स्थिति सुधरने लगी. सबसे ज्यादा बदलाव कानून व्यवस्था में देखने को मिला. राज्य की राजधानी पटना में अब औरतों के लिए भी अकेले चलना सुरक्षित हो गया, साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में भी किसी समय आना जाना सुरक्षित हो गया.

 

नीतीश सरकार में अगला सुधार का क्षेत्र था शिक्षा. हाई स्कूल की छात्राओं को साइकल बांटने से स्कूलों में उपस्थिति में बढ़त दर्ज की गई. इस काम के लिए सबसे बेहतरीन नौकरशाहों को चुना गया ताकि शिक्षा के क्षेत्र में सुधार किया जा सके. एक बहुत ही अच्छे एनजीओ प्रथम के साथ मिलकर काम कर रही सरकार ने पढ़ाए जाने के तरीके और सिखने के तरीके का निरीक्षण करना शुरु कर दिया.

 

सरकार ने मूलभूत सुविधाएँ को भी ठीक करने पर ध्यान केंद्रित किया. नई सड़कें बनाई गईं; बड़ी नदियों से बंटे जिलों और तालुकाओं को जोड़ने के लिए पुलों का भी निर्माण किया गया. इस दौरान सामाजिक स्थिति भी सुधरने लगी थी. जाती और धर्म से जुड़े संघर्ष खत्म तो नहीं हुए पर धीर-धीरे इनके आंकड़े कम जरूर होने लगे. मुस्लिम, दलित और महिलाओं जैसे अति-संवेदनशील समूह बीते समय में कभी इतना सुरक्षित महसूस नहीं करते थे जितना इनके के राज में करने लगे.

 

नीतीश कुमार और सुशील मोदी दोनों ने पूरे राज्य का सम्मान जीत लिया. दोनों को राज्य का विश्वास भी मिला जिसका फल 2010 विधानसभा चुानावों में देखने को मिली, गठबंधन को भारी बहुमत मिला. कई बिहारी जो राज्य के बुरे दौर में राज्य छोड़कर भाग गए थे, वापस लौटने लगे. ऐसी उम्मीद थी कि जब वो लौटेंगे तो राज्य के औधोगिक विकास के लिए ट्रेन में भरकर निवेश लाएंगे, यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां राज्य अब भी पिछड़ा है.

 

अगर जेडीयू-बीजेपी गठबंधन अभी भी साथ होती तो इसे तीसरी बार सरकार बनाने में कोई दिक्कत नहीं होती. 2013 में राज्य की नई राजनीतिक परिस्थितियां धीरे-धीरे साफ होने लगी. इसका कारण देश के पश्चिम भाग में बसे एक राज्य का एक नेता था. बिहारी मोदी (सुशील) के साथ नीतीश कुमार ने बड़ी सरलता के साथ काम किया; लेकिन गुजराती मोदी (नरेंद्र) के लिए उनकी नापंसद जगजाहिर है. इस बात को साबित करती एक तस्वीर भी मौजूद है, 2009 आम चुनावों के दौरान नीतीश कुमार को मोदी के साथ खड़ा होने और हाथ मिलाकर हवा में लहराने के लिए मजबूर किया गया था, इससे होने वाला दर्द और परेशानी उनकी चेहरे पर (तस्वीर में) साफ जाहिर है.

 

नापसंदगी के पीछे निजी और राजनैतिक मसले थे. नीतीश को लगता है कि नरेंद्र मोदी जिद्दी और दबदबा बनाने वाले व्यक्ति हैं; जैसा कि मोदी ने बिहार में आई बाढ़ के दौरान बिना मांगे पांच करोड़ देकर साबित किया था (जिसे नीतीश ने तुरंत लौटा दिया था). उनकी चिंता यह भी थी कि जेडीयू को बड़ी संख्या में वोट देने वाले मुस्लमनों की नजर में, 2002 गुजरात दंगों ने मोदी को संदिग्ध बना दिया है.

 

2013 के बाद से नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी में बहुत प्रभावशाली नेता बन गए. मार्च महिने में उन्हें अपनी पार्टी के केंद्रिय संसदीय समिति में शामिल किया गया. जून महिने में वे आम चुनाव प्रचार समिति के प्रमुख चुने गए. इसी दौरान नीतीश ने इस बात का एलान किया कि जेडीयू, बीजेपी से गंठबंधन तोड़कर एनडीए से अलग हो रहा है. बीजेपी को इसे बहुत फर्क नहीं पड़ा; सितंबर में नरेंद्र मोदी को आधिकारिक तौर पर बीजेपी के पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर चुन लिया गया.

 

नीतीश कुमार के एनडीए से अलग होने के इस फैसले का आधार इन दो कारणों को माना गया: बीते आठ सालों में उन्होंने सीएम के तौर पर अपनी और पार्टी की पकड़ राज्य में मजबूत कर ली थी और नीतीश को यह डर भी था कि मोदी के साथ मिलकर लड़ने से राज्य का मुस्लिम वोट खिसक कर उनके प्रतिद्वंदी लालू की पार्टी आरजेडी के पास चले जाएंगे. 2014 के आम चुनावों ने इन सभावनाओं को गलत साबित कर दिया. जेडीयू को चुनावों में सिर्फ दो सीटें मिली, वहीं बीजेपी ने 22 सीटें जीतीं (इसमें बीजेपी की गंठबंधन सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी की छह सीटें शामिल हैं).

 

लोकसभा के नतीजे आने के एक दिन बाद, 17 मई को नीतीश ने हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए (मुख्यमंत्री पद से) इस्तीफ दे दिया. उनकी जगह पर उनकी ही पार्टी के एक नेता जीतन राम मांझी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया गया. छह महीनों तक नीतीश शांत रहे, पर पिछले दिनों वे लालू, मुलायम के साथ नजर आए. उनकी योजन मोदी के खिलाफ एक गैर कांग्रेसी समूह ‘यूनाइटेड फ्रंट’ बनाने की है.

 

बीती बातों की जांच करने पर नीतीश का बीजेपी से अलग होने का निर्णय राजनीतिक भूल लगती है. लेकिन बिना भविष्य देखे कोई भी बता सकता है कि समाजवादी पार्टी, आरजेडी, जेडी (एस) और आईएनएलडी के साथ गंठबंधन करना उनके लिए राजनीतिक भूल के साथ-साथ नैतिक भूल भी है. अभी तक जिस नीतीश कुमार को ईमानदारी और सकारात्मक मुद्दों को आगे बढ़ाने के लिए जाना जाता था लेकिन अब उनकी छवि को ऐसे लोगों के साथ जाने से धक्का लगेगा. इन लोगों को राजनीति में परिवारवाद बढ़ाने, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार करने, राज्य के विकास के लिए बहुत गंभीर नहीं होने जैसी बातों के लिए जाना जाता है. यह सवाल की नैतिकता से जुड़ा पक्ष है; राजनैतिक पक्ष यह बताता है कि युवा वोटरों के लिए पहचान की राजनीति से ज्यादा अहम विकास की राजनीति है. ऐसी राजनीति से मुलायम और लालू फिर से अपने राज्य में पहले से अच्छी स्थिति में आ जाएंगे.

 

यह भी सच है कि (आम चुनावों में) उनकी पार्टी का पूरी तरह से सफाया हो जाने के कारण उनके पास बहुत कम विकल्प बचे हैं. कांग्रेस के साथ जाना उनके लिए कोई विकल्प नहीं है क्योंकि उन्होंने आजीवन इस पार्टी के विरोध की राजनीति की है. आम आदमी पार्टी अभी बिल्कुल नई है और एक वरिष्ठ के नाते उन्हें केजरीवाल के नीचे काम करने में उतनी ही असहजता होगी जितनी राहुल गांधी के नीचे काम करने में होगी. इन वजहों से उनके पक्षधरों का मानना हो सकता है कि यादवों के साथ जाने के अलावा उनके पास कोई विकल्प नहीं था. पर एक विकल्प था; पूरी तरह से पार्टी-पॉलिटिक्स का त्याग करके अपने लोगों के भले लिए काम करना. जिन जयप्रकाश नारायण को नीतीश अपना गुरु बताते रहे हैं उन्होंने यही रास्ता अपनाया था.

 

लोगों को नीतीश और बिहार के लोगों के लिए दुख होता है. यह देखना बहुत मुश्किल है कि कैसे 2005-14 तक एनडीए सरकार द्वारा बनाई गई साख वापस अपनी स्थिति में पहुंच गई. जिस मेल और जुगलबंदी के साथ नीतीश कुमार और सुशील मोदी ने काम किया था उसे दोहरा पाना संभव नहीं है. अगर आने वाले बिहार विधानसभा चुनावों में एनडीए जीतती है तो सुशील मोदी पार्टी के साम्प्रदायिक तत्वों से पार नहीं पा पाएंगे. अगर जनता परिवार की जीत होती है तो नीतीश को लालू और उनके भाई भतीजों को शांत करने के लिए उतनी ही मेहनत करनी होगी जितनी मेहनत सरकार चलाने में लगेगी.

 

आठ सालों तक जेडीयू और बीजेपी, नीतीश कुमार और सुशील मोदी ने साथ मिलकर रचनात्मक काम किया. गंठबंधन टूटे अभी हफ्ता नहीं बीता था कि साथ काम करने वाले दो बहुत ही अच्छे दोस्त एक दूसरे के लिए बुरा-भला कहने लगे. डेढ़ साल बीतने के बाद इसका असर राज्य के प्रशासनिक व्यवस्था पर साफ नजर आ रहा है. एक जानी मानी शिक्षाविद, जो पटना में ही पली-बढ़ी और पिछले कई सालों से राज्य के जिलों में काम कर रही हैं ने पिछले दिनों मुझे लिखा: “जो बिहार में हो रहा है वो बहुत ही बुरा है. बड़ा अजीब लगता है कि कैसे अच्छी स्थिति इतनी तेजी से बुरी हो सकती है.”  अभी तो ऐसा ही रहने वाला है, जबतक, चीजें बुरी से बदतर ना हो जाएं.

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