मुंबई ब्लास्ट के सबसे क्रूर किरदार टाइगर मेमन की कहानी

By: | Last Updated: Thursday, 30 July 2015 3:04 PM
tiger memon

नई दिल्ली: मुंबई बम धमाकों के 22 साल बाद पहली बार कोई फांसी हुई है. याकूब मेमन को उसके गुनाहों की सजा मिली लेकिन वो तो साजिश का एक किरदार था. साजिश की पूरी कहानी लिखने वाला तो अब तक फरार है. 1993 में सीरियल ब्लास्ट से देश को दहलाने के पीछे पूरा दिमाग याकूब के बड़े भाई टाइगर मेमन का था. आखिर कब हाथ आएगा असली गुनहगार टाइगर मेमन?

 

जब भी बात 12 मार्च 1993 के मुंबई बम धमाकों की होती है तीन चेहरे सामने आते हैं. याकूब मेमन, दाऊद ईब्राहिम और टाइगर मेमन के, लेकिन मुंबई पुलिस की तहकीकात में ये बात सामने आई है कि इन तीनों में सबसे अहम भूमिका जिसने निभाई है तो वो टाइगर मेमन. मुंबई में बम धमाके करने का ख्याल सबसे पहले टाइगर मेमन के दिमाग में ही आया और उस साजिश को अमली जामा पहनाने के लिये उसने दाऊद गिरोह से लेकर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और यहां तक की अपने परिवार तक का इस्तेमाल किया.

 

धमाकों की साजिश के सबसे तेज दिमाग और आक्रमक और क्रूर किरदार की कहानी

टाइगर मेमन का असली नाम है मुश्ताक अब्दुल रज्जाक मेमन. अपने मां-बाप और 5 छोटे भाईयों के साथ मुश्ताक दक्षिण मुंबई के मोहम्मद अली रोड पर कडिया बिल्डिंग में रहता था. पिता अब्दुल रज्जाक मेमन वेल्डिंग का काम करते थे और उनकी आय से घर का गुजारा मुश्किल से हो पाता था. इसलिये पास ही के इस्माइल बेग मोहम्मद स्कूल से दसवीं तक पढाई पूरी करने के बाद उसने रोजगार ढूंढने की सोची. पिता की जान पहचान से उसे भायखला इलाके में मेमन कॉपरेटिव बैंक में पिऊन की नौकरी मिल गई, लेकिन अपने गुस्सैल स्वभाव की वजह से वो ज्यादा दिनों तक इस नौकरी पर टिक नहीं सका.

 

एक बार बैंक के मैनेजर ने ऊंची आवाज में टाइगर को अपने मेहमान के लिये चाय लाने के लिये कहा. मैनेजर के हुक्म देने का तरीका टाइगर को अपमानजनक लगा और वो अपना आपा खो बैठा. उसने गु्स्से में आकर उस मैनेजर को इतने थप्पड मारे कि वो बेहोश हो गया. इतना होने के बावजूद बैंक ने उसे मौका दिया कि अगर वो माफी मांग लेता है तो उसे नौकरी से नहीं निकाला जायेगा, लेकिन टाइगर ने नौकरी छोड देने का फैसला किया.

 

बैंक की नौकरी चली गई और टाइगर बेरोजगार हो गया. पैसों की किल्लत की वजह से उसका परिवार भी अब मोहम्मदअली रोड का घर बेचकर माहिम के मच्छीमार नगर की झुग्गियों में रहने में आ गया. घर के पास ही सूफी संत मखदूम शाह बाबा की दरगाह थी जहां अक्सर दाऊद इब्राहिम गिरोह से जुडा स्मगलर मुस्तफा दोसा मत्था टेकने आया करता था. मुश्ताक भी खाली वक्त दरगाह के आसपास भटकते हुए बिताता था. एक दिन मुस्तफा की उससे जान पहचान हो गई और मुस्तफा ने उसको अपना ड्राइवर रख लिया. मुस्तफा के साथ काम करते हुए मुश्ताक ने उसकी आलीशान जिंदगी देखी, उसको महंगी कारों में सफर करते देखा, फाईव स्टार होटलों में खाते-पीते, क्लबों में अय्याशी करते देखा. टाइगर भी अब ऐसी जिंदगी जीना चाहता था, लेकिन उसके लिये जरूरी था अमीर बनना. मुश्ताक अब झटपट अमीर बनना चाहता था और इस तरह वो अमीर तब बन सकता था जब वो भी अपने मालिक मुस्तफा के जैसा धंदा करने लगे यानी कि सोने, चांदी की स्मगलिंग. ये मौका भी उसे जल्द ही मिल गया.

 

एक बार दुबई का कुख्यात स्मगलर याकूब भट्टी मुस्तफा दोसा से मिलने गुपचुप मुंबई आया था, लेकिन किसी तरह पुलिस को उसके आने की भनक लग गई. याकूब भट्टी को वापस एयरपोर्ट तक छोडने की जिम्मेदारी मुस्तफा ने मुश्ताक को दी. मुश्ताक जब याकूब को कार में लेकर मुंबई के वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर पहुंचा तो उसने देखा कि मुंबई पुलिस की वैन उसका पीछा कर रहीं है. याकूब के पसीने छूटने लगे, लेकिन मुश्ताक ने फुर्ती दिखाते हुए कार को हाईवे से सटी गलियों में डाल दिया और पुलिस की नजरों से ओझल हो गया. फ्लाईट छूटने से ठीक पहले उसने याकूब भट्टी को एयरपोर्ट पर पहुंचा दिया.

 

मुश्ताक की बहादुरी देखकर याकूब भट्टी काफी प्रभावित हुआ. उसे लगा कि मुश्ताक बड़े बड़े जोखिमभरे काम करने के काबिल है. इसलिये दुबई पहुंचने के बाद उसने मुशताक को बतौर कैरियर रख लिया यानी कि वो दुबई से स्मगलिंग करके सोने के बिस्किट भारत लाने लगा. मुस्तफा के साथ काम करते करते उसे इस धंदे की बारिकियां पहले ही समझ में आ गई थीं. याकूब भट्टी के जरिये उसकी दुबई में जान पहचान बढ़ी और वो पाकिस्तानी स्मगलरों के संपर्क में भी आया जिनमें तौफीक जालियावाला प्रमुख था. सालभर के भीतर ही टाइगर मेमन मुंबई का एक प्रमुख गोल्ड स्मगलर बन गया. मुंबई से सटे कोंकण के समुद्र किनारों पर उसने अपने लैंडिंग एजेंट्स का एक बडा नेटवर्क भी तैयार कर लिया जो उसके लिये समुद्र से आया हुआ माल उतारते थे. स्मगलिंग की दुनिया में मुश्ताक की हिम्मत को देखते हुए उसका नाम टाइगर पड गया.

 

दो नंबर की कमाई से टाइगर अब अमीर बन चुका था. उसने अपने छोटे भाई याकूब की पढाई का खर्चा उठाया और एक चार्टड अकाउंटेंट के तौर पर काम शुरू करने में उसकी मदद की. माहिम की जिस मच्छीमार झुग्गी में उसका परिवार रहता था, उसी के पास अल हुसैनी बिल्डिंग में अब पांचवीं और छठवीं मंजिल पर डुप्लैक्स फ्लैट खरीद लिया था. शबाना नाम की एक खूबसूरत लडकी से उसने शादी कर ली. टाइगर के मां बाप समेत बाकी भाई भी अब यहीं रहने के लिये आ गये.

 

टाइगर मेमन के परिवार और कारोबार में सबकुछ ठीक चल रहा था. पुलिस और कस्टम विभाग के कई अधिकारियों को उसने रिश्वत से खरीद रखा था जिससे उसके सोने चांदी की स्मग्लिंग का काम बिना किसी रूकावट हो रहा था. लेकिन इस बीच आ गई 6 दिसंबर 1992 के वो मनहूस तारीख. बाबरी मसजिद ढहाये जाने के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक हिंसा भडक उठी, लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर मुंबई में दिखाई दिया. देश की आर्थिक राजधानी मुंबई को नफरत की आग ने जकड लिया. इस आग की लपटें मेमन परिवार तक भी पहुंचीं. दंगाईयों ने माहिम में टाइगर मेमन की उस तिजारत इंटरनैशनल नाम की कंपनी का दफ्तर जला दिया जिसे उसने अपने भाई अयूब और याकूब की मदद से शुरू किया था.

 

टाइगर मेमन पहले से ही गैर मुस्लिमों से नफरत करता था. बाबरी मस्जिद की घटना ने उस नफरत को और बढ़ा दिया. ऐसे में जब उसका दफ्तर जला दिया गया तो टाइगर के दिल में इंतकाम की आग भड़क उठी. अपना दफ्तर जलाये जाने की कीमत वो समूची मुंबई से वसूलना चाहता था. वो पूरे शहर को जला डालना चाहता था.

 

अपने इंतकाम को अंजाम तक कैसे पहुंचाया जाये उसके लिये उसने जल्द ही दुबई में एक मीटिंग बुलाई. इस मीटिंग में पाकिस्तानी स्मगलर तौफीक जालियावाला, दाऊद इब्राहिम का भाई अनीस, मुस्तफा दोसा, आईएसआई से जुड़े लोग और कुछ अरब के रईस शामिल हुए. पहले सोचा गया कि बाबरी मस्जिद का बदला बाल ठाकरे और लालकृष्ण आडवाणी जैसे हिंदू नेताओं के हत्या करके लेना चाहिये, लेकिन टाइगर मेमन ने इसका विरोध किया. टाइगर मेमन ने सलाह दी कि मुस्लिमों ने सबसे ज्यादा मुंबई में ही भुगता है इसलिये मुंबई को ही तबाह किया जाना चाहिये. इसके लिये उसने मुंबई में सिलसिलेवार धमाके करने की ख्वाहिश जताई. टाइगर की सलाह उस मीटिंग में मौजूद सभी लोगों को पसंद आई. तय हुआ कि मिशन के लिये पैसों और हथियारों के इंतजाम आईएसआई के साथ मिलकर तौफीक जालियावाला करेगा, जबकि उसको अमल में लाने के लिये लोगों का इंतजाम टाइगर मेमन को करना होगा.

 

टाइगर मेमन के सामने अब 2 जिम्मेदारियां थीं. पहली जिम्मेदारी थी पाकिस्तान से भेजे जाने वाले बारूद आरडीएक्स और हथियारों को मुंबई तक पहुंचवाना और दूसरा साजिश पर अमल के लिये काबिल लोगों को जुटाना. टाइगर ने जल्द ही अपने लिये काम करने वाले मुस्लिम युवाओं को भड़काकर साजिश में शामिल होने के लिये तैयार कर लिया. आरडीएक्स और हथियार उतरवाने के लिये उसने अपने लैंडिंग एजेंट दाऊद फणसे उर्फ दाऊद टकले से संपर्क किया.

 

कोंकण के समुद्र तट के पास शेखाडी गांव में रहने वाला दाऊद फणसे सिर्फ सोने चांदी की स्मगलिंग का काम करता था, लेकिन बारूद और हथियार की स्मगलिंग के लिये वो तैयार न था. इस काम की खातिर उसे मनाने के लिये टाइगर मेमन ने 21 जनवरी 1993 को दुबई में दाऊद इब्राहिम के साथ उसकी मीटिंग करवाई. दाऊद इब्राहिम से मिलकर दाऊद फणसे साजिश में साथ देने को तैयार हो गया. 3 फरवरी और 7 फरवरी को पाकिस्तान से भेजी गई आरडीएक्स और हथियारों की खेप उसने मुंबई के पास दिघी और शेखाडी गांवों के पास समुद्र तट पर उतरवाई. इस काम के लिये उसने आसपास के गांवों से करीब 40 लोगों का इस्तेमाल किया. बम कैसे बनाने हैं, हथगोले कैसे फैंकने हैं और विस्फोटकों में टाईमर कैसे लगाने हैं टाइगर को अपने लोगों को इसकी ट्रेनिंग देनी थी. टाइगर मेमन ने उम्मीद की थी कि बम धमाकों के बाद मुंबई में फिर एक बार दंगे भड़क उठेंगे. ऐसे में उसकी ओर से मंगाई गई एके 47 राईफलों का इस्तेमाल किया जाना था. उन्हें चलाने की ट्रेनिंग भी युवकों को देनी थी. इसके लिये चंद लोगों को उसने पाकिस्तान भेजा और चंद लोगों को उसने कोंकण के सांधेरी गांव के पास खुद ही ट्रेनिंग दी. 12 मार्च की पहले वाली रात अल हुसैनी इमारत की पार्किंग में ही धमाकों के लिये इस्तेमाल होने वाले वाहनों में विस्फोटक फिट किये गये. इस काम के लिये

 

1 एंबेसेडर कार

 

2 मारूति वैन

 

3 मारूति 800 कार

 

1 कमांडर जीप

 

1 मोटरसाईकिल

 

4 स्कूटर

 

और 3 सूटकेसों में विस्फोटक भरे गये. इस्तेमाल किये गये तमाम वाहन टाइगर मेमने के परिजन और उसके लिये काम करने वाले लोगों के नाम पर थे.

 

धमाकों के पहले यानी 9 मार्च को टाइगर मेमन ने अपने भाई याकूब समेत परिवार के सभी सदस्यों को दुबई भेज दिया. वो खुद धमाकों से चंद घंटों पहले 12 मार्च की सुबह दुबई के लिये निकला.

 

दुबई में भारत सरकार के दबाव के मद्देनजर वो अपने परिवार के साथ आईएसआई की मदद से पाकिस्तान चला गया. आईएसआई ने उसका पाकिस्तानी पासपोर्ट बनवाया जिसका नंबर है AA 762402 और उसको नाम दिया अहमद जमाल. बताते हैं कि वहां टाइगर के पिता अब्दुल रज्जाक उससे इतने खफा हुए कि उन्होंने अपनी छड़ी से आईएसआई के अधिकारियों के सामने इतना पीटा कि वो छड़ी टूट गई.

 

टाइगर के भाई याकूब की सलाह पर परिवार के ज्यादातर सदस्य भारत लौट आये. लेकिन टाइगर मेमन उसकी पत्नी शबाना और भाई अयूब अब भी पाकिस्तान में ही हैं. बताया जाता है कि दाऊद इब्राहिम की मदद से टाइगर मेमन कराची के पास एक मांस निर्यात का कारोबार चला रहा है. 

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