टीपू सुल्तान की जयंती मनाने के कदम पर छिड़ा विवाद

By: | Last Updated: Thursday, 25 December 2014 1:31 PM
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बेंगलूरु: अठारहवीं सदी के महान शासक टीपू सुल्तान की जयंती मनाने के कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के कदम से राज्य में विवाद छिड़ गया है. बीजेपी ने आरोप लगाया है कि यह सत्तारूढ़ पार्टी की अपने वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश है.

 

मुख्यमंत्री सिद्धरमैया ने 22 दिसंबर को घोषणा की थी कि सरकार ने ‘टीपू जयंती’ मनाने का फैसला किया है और तारीख के बारे में जल्द ही फैसला कर लिया जाएगा.

 

उन्होंने इतिहासकार प्रो. बी शेक अली की पुस्तक ‘टीपू सुल्तान: ए क्रूसेडर फॉर चेंज’ के विमोचन के मौके पर कहा था, ‘‘टीपू जयंती मनाने के लिए विभिन्न हलकों से काफी दबाव है. हमने इस पर विचार करने का फैसला किया है और हम जल्द ही तारीख की घोषणा करेंगे.’’ लेकिन यह सब बीजेपी को नागवार गुजरा है और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने दावा किया है कि टीपू एक क्रूर शासक थे जिन्होंने कर्नाटक के कोडागु और दक्षिण कन्नड़ जिलों में तथा पड़ोसी केरल में जबरन धर्मांतरण कराया था.

 

बीजेपी नेता सुरेश कुमार ने कहा कि टीपू को ऐसा व्यक्ति नहीं माना जा सकता जिनकी जयंती सरकार को मनानी चाहिए. उन्होंने दावा किया कि मैसूर के शासक रहे टीपू ने कोडवा (कोडागु जिले के निवासियों) के खिलाफ बर्बरता बरती थी.

 

उन्होंने दावा किया, ‘‘हमारा ( बीजेपी का) टीपू सुल्तान के प्रशासन के बारे में अपना विचार है. खासतौर पर तब, जब आप कुर्ग (कोडागु) और अन्य स्थानों पर जाते हैं, जहां लोगों को कुर्गवासियों के खिलाफ बरती गई बर्बरता अब भी याद है, जिन्होंने उनके फतवे को मानने से इनकार कर दिया था. इसलिए टीपू को ऐसा व्यक्ति नहीं माना जा सकता, जिनकी जयंती राज्य सरकार मनाए.’’

 

गौरतलब है कि टीपू मैसूर राज्य के शासक थे. उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कट्टर शत्रु माना जाता था. मई 1799 में ब्रिटिश सैनिकों से श्रीरंगपटनम के अपने किले को बचाते हुए वह मारे गए थे. इस बात का जिक्र किए जाने पर कि कांग्रेस टीपू को धर्मनिरपेक्ष मानती है, कुमार ने कहा कि पार्टी की धर्मनिरपेक्षता पर खुद की परिभाषा है जो सारी दुनिया में स्वीकार्य नहीं है. उन्होंने कहा कि कांग्रेस को लगता है कि टीपू सुल्तान का नाम आगे बढ़ाकर उसका वोट बैंक मजबूत होगा. संसदीय चुनाव के बाद हार पर हार मिलने के बाद भी यह उसी कदम पर चल रही है. मैं कांग्रेस का भला होने की कामना करता हूं.

 

राज्य विधान परिषद के अध्यक्ष एवं बीजेपी के वरिष्ठ नेता डीएच शंकरमूर्ति ने बताया कि सरकार के पास टीपू की जयंती मनाने का पूरा अधिकार है लेकिन मैसूर के यह शासक कन्नड़ विरोधी थे.

 

उन्होंने कहा, ‘‘मैसूर पर टीपू के शासन से पहले कन्नड़ आधिकारिक भाषा थी. उन्होंने इसकी जगह फारसी कर दी, जो एक विदेशी भाषा थी.’’ टीपू द्वारा मंदिरों की सहायता करने और उनके निर्माण के लिए धन देने संबंधी सिद्धरमैया की टिप्पणी का विरोध करते हुए शंकरमूर्ति ने कहा कि मंदिरों को ढहाने के उनके कार्य कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता.

 

उन्होंने दलील दी, ‘‘धन देकर टीपू द्वारा मंदिरों का निर्माण कराने के कुछ ही उदाहरण होंगे लेकिन यह भी सच है कि उन्होंने मंदिर ध्वस्त किए. इस पर एक बहस होनी चाहिए कि टीपू ने क्यों कुछ मंदिरों की सहायता की और कुछ मंदिरों को क्यों गिराया.’’

 

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