कट्टरपंथियों को ये जरूर पढ़ना चाहिए!

By: | Last Updated: Wednesday, 20 January 2016 5:30 PM
Today is the death anniversary of Khan Abdul Ghaffar Khan

नई दिल्ली: पाकिस्तान में बाचा खान यूनिवर्सिटी पर हुए आतंकी हमले के लिए जो तारीख चुनी गई उसका रिश्ता भारत पाकिस्तान और अफिगानिस्तान से नाता रखने वाले उस शख्स से है जिसने शांति और भाईचारे का पैगाम देने में अपनी सारी जिंदगी बिता दी. हम और आप उन्हें सीमांत गांधी, बादशाह खान, खुदाई खिदमतगार जैसे ढेरों नामों से जानते हैं.

पाकिस्तान के पेशावर से पचास किलोमीटर दूर पठानी आबादी वाले चारसदा इलाके की जिस यूनिवर्सिटी पर हमला किया गया उसका नाम उसी बाचा खान के नाम पर रखा गया है जिसे भारत बादशाह खान कहता है और सारी दुनिया उसे फ्रंटियर गांधी. आतंक की तारीख यानी 20 जनवरी भी दरअसल उनकी बरसी की तारीख है. इसी मौके पर बाचा खान यूनिवर्सिटी में आयोजिक मुशायरे के दौरान किया गया हमला.

ये हैं बादशाह खान यानी अहिंसा का हथियार लेकर अंग्रेजों से लोहा लेने वाले आजादी के ऐसे इकलौते सिपाही जिन्हें दुनिया ने दूसरे गांधी के तौर पर जाना. उन्हें नाम दिया गया फ्रंटियर यानी सीमांत गांधी.

पेशावर के पख्तूख्वाह में साल 1890 में जन्मे अब्दुल गफ्फार खान ने आजादी की अहिंसा के साथ हक के लिए लड़ने की कसम देकर उन युवा पठानों की पूरी फौज खड़ी कर दी थी जिन्हें खुदाई खिदमतगार कहा जाता था – खुदाई खिदमतगार लाल रंग की वर्दी पहना करते थे.

रेड शर्ट या जिन्हें खुद बादशाह खान सुर्ख पोशाक कहते थे अहिंसा का प्रतीक बन गई थी. खुद अब्दुल गफ्फार खान ने पठानों की परंपरा के मुताबिक ही अंग्रेजी सेना में चंद दिनों तक नौकरी भी की थी लेकिन वो बेइज्जती बर्दाश्त नहीं कर पाए और जब सेना छोड़ी तो सेवा करने के लिए उन्होंने राजनीति की राह चुन ली.

अब्दुल गफ्फार खान ने अपने खुदाई खिदमतगारों की मदद के लिए उस दौर के मुस्लिम लीग के सर्वेसर्वा मोहम्मद अली जिन्नाह से मदद भी मांगी थी लेकिन उनके इंकार के बाद वो कांग्रेस से जुड़े और फिर कांग्रेस के ही होकर रह गए.

बंटवारे के बाद वो पाकिस्तान चले गए. पाकिस्तान में रहते हुए उन्होंने आजाद पख्तूनिस्तान का नारा बुलंद किया और इस बार उन्हें अपने ही मुल्क में कैद कर लिया गया.

आजादी के 22 साल बाद साल 1967 में आजादी का ये नायक जब पहली बार भारत लौटा तो उसके स्वागत के लिए देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद एयरपोर्ट जा पहुंची थीं. उस वक्त सारे देश ने एक बार फिर सुनी थी अपने इस बादशाह खान की आवाज.

अब्दुल गफ्फार खान को उस दौर की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नेहरू शांति पुरस्कार से सम्मानित किया था लेकिन ये काफी नहीं था. साल 1987 में वो तारीख भी आई जब 97 साल के बादशाह खान को भारत रत्न से सम्मानित किया गया.

गौरव भरा ये पल जल्द ही एक बुरे सपने में बदल गया. बादशाह खान को दिल का दौरा पड़ा. उन्हें कोमा की हालत में अपने घर भेजा गया लेकिन आखिरकार 20 जनवरी को अहिंसा के उस पुजारी ने इस दुनिया से विदा ले ली.

बादशाह खान के जनाजे में भी इतनी ताकत थी कि अफगानिस्तान में जंग में उलझे मुजाहिद और सोवियत सेना ने एक दिन के लिए जंग रोक दी थी ताकि उनके शरीर को सुपुर्दे खाक किया जा सके.

India News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: Today is the death anniversary of Khan Abdul Ghaffar Khan
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017