श्रद्धांजलि: पूरब की संस्कृति की खुशबू बिखेरकर गुज़र चलीं 'ठुमरी क्वीन' गिरिजा देवी

श्रद्धांजलि: पूरब की संस्कृति की खुशबू बिखेरकर गुज़र चलीं 'ठुमरी क्वीन' गिरिजा देवी

पद्मविभूषण 'ठुमरी क्वीन' गिरिजा देवी नहीं रहीं, मंगलवार रात उन्होंने कोलकाता में अंतिम सांस ली. एबीपी न्यूज की तरफ से एक महान कलाकार को श्रद्धांजलि

By: | Updated: 25 Oct 2017 10:08 AM
ठुमरी का नाम लीजिए तो सबसे पहला नाम जो ज़ेहन में आता वो गिरिजा देवी का था. सफेद चमकते बाल, मुंह में पान का बीड़ा और खनकती हुई सुरीली आवाज. बनारस घराने की पहचान को दुनियाभर में मज़बूत करने वाली अज़ीम शख्सियत, जिन्हें ‘क्वीन ऑफ ठुमरी’ कहा गया है. वही गिरिजा देवी मंगलवार रात नहीं रहीं. सुबह उन्होंने खराब तबियत की शिकायत की, अस्पलात ले जाया गया लेकिन रात होते होते वो उस यात्रा पर निकल गईं जहां से अब वो कभी नहीं लौटेंगी. गिरिजा देवी के संगीत के असर से कोई बच नहीं सकता था क्योंकि वो ऐसे घराने की परंपरा से आती थीं जहां चौमुखी गाना बजाना होता था. उनसे आप जो चाहे सुन लीजिए- ध्रुपद, धमार, खयाल, त्रिवट, सादरा, तराना, टप्पा जैसी मुश्किल शैलियां भी और ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती, होरी, झूला और सोहर जैसी पॉपुलर चीजें भी. गिरिजा देवी की शोहरत इसीलिए बहुत बड़ी थी क्योंकि उनके संगीत में पूरब की संस्कृति और सभ्यता की खुशबू है जिसके दायरे में आम सुननेवाले भी आ जाते हैं. गिरिजा देवी एक संगीतकार के तौर पर वैसी ही हैं जैसा बनारस घराने के ही पंडित छन्नूलान मिश्रा कहते हैं- गवैये को पंसारी की दुकान होना चाहिए कि जो चाहोगे मिलेगा.

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खास बात ये है कि ठुमरी का पर्याय बन चुकीं गिरिजा देवी अपने घर में पहली पीढ़ी की गायिका हैं. उनके पिता रामदेव राय जमींदार थे. गांव में रहते थे. उन्हें संगीत का ऐसा शौक था कि बनारस में बड़े-बड़े कलाकारों को सुनने आते थे और खुद गाना सीखते भी थे. अपने साथ वो बेटी गिरिजा को भी ले जाते थे. पिता ने महसूस किया कि बेटी को संगीत से लगाव है. उन्होंने गिरिजा को भी तालीम दिलाना शुरू किया, साथ ही बनारस में एक घर भी ले लिया ताकि संगीत सीखने में कोई अड़चन न रहे. 1929 में पैदा हुई गिरिजा देवी पांच साल की थीं जब उन्होने बाकायदा बनारस घराने के संगीत गुरुओं पंडित सरजू प्रसाद मिश्रा और पंडित श्रीचंद मिश्रा से सीखना शुरू किया. गिरिजा देवी कहती हैं- हमारा तो घराना किसानों का था, जो गुरु का घराना था वही हमारा घराना हो गया.

ये वो जमाना था जब लड़कियों का मंच पर जाकर गाना अच्छा नहीं समझा जाता था. लेकिन गिरिजा को किसका डर, उनके साथ तो खुद उनके पिता थे. पिता ने उन्हें लड़कों की तरह पाला. बेटी को संगीत ही नहीं घुड़सवारी, तैराकी और लाठी चलाना भी सिखाने की कोशिश की. पढ़ाई में गिरिजा का मन नहीं लगता था लेकिन पिता ने उनके लिए हिंदी, उर्दू और इंग्लिश के टीचर रखे थे. भक्ति और अध्यात्म की नगरी बनारस में तो संगीत सदियों से रचा बसा है. रेडियो भी नहीं था तबसे बनारस के मंदिरों में संगीत समारोह होते रहे हैं. उन दिनों पंडित ओमकार नाथ ठाकुर, फैय्याज खां, मुश्ताक अली खां, कृष्णा राव जैसे गायकों का बोलबाला था. संकटमोचन संगीत समारोह की तरह रात-रात भर मंदिरों में गाना-बजाना होता था. बनारस में रहते हुए गिरिजा देवी को बचपन में तमाम बड़े गायकों को सुनने का मौका मिला.

एक बार काशी के मनकामेश्वर मंदिर में उस्ताद फैयाज खां रात के साढ़े तीन बजे राग ललित का आलाप कर रहे थे. सात साल की गिरिजा देवी अपने पिता के साथ खां साहब को सुनने पहुंची थीं. गिरिजादेवी बताती थीं कि आलाप सुनकर उनकी आंखों से टप-टप आंसू गिरने लगे. फैय्याज खां साहब की नजर पड़ी तो उन्होने पूछा ये किसकी बेटी है? हाथ जोड़े पिता रामदेव राय सामने आए. फैय्याज खां ने कहा ये तो कोई बहुत बड़ी कलाकार जन्मी है तुम्हारे घर में, इस छोटी-सी उम्र में इसको सुरों की ऐसी चोट है तो आगे तो क्या करेगी.

खां साहब ने सही कहा था- गिरिजा देवी को मशहूर होने में वक्त नहीं लगा. 1949 में इलाहाबाद रेडियो से बुलावा आया. गिरिजा देवी बताती हैं कि स्टेशन डायरेक्टर ने 45 मिनट तक राग देसी का खयाल सुना, 15 मिनट ठुमरी और 5-7 मिनट टप्पा सुना, करीब डेढ़ घंटे तक ऑडिशन चला. उसके बाद पहले प्रोग्राम का लेटर मिला तो 90 रुपए मेहनताने और फर्स्ट क्लास में आने जाने के किराए के साथ. तब रेडियो में कलाकारों के ग्रेड नहीं होते थे, गिरिजा देवी को मेहनताने से पता चला पता चला कि उन्हें सर्वश्रेष्ठ कलाकारों की लिस्ट में रखा गया था क्योंकि 90 रुपए ही बिस्मिल्ला खां, सिद्धेश्वरी देवी, रसूलन बाई, कंठे महाराज जैसे सीनियर कलाकारों को भी मिलते थे.

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1946 में गिरिजा देवी की शादी एक बड़े बिजनेसमैन मधुसूदन जी से हो गई थी. संगीत का उन्हें भी बहुत शौक था. उन्होंने गिरिजा देवी को खूब प्रेरित किया. बस इतना वायदा लिया था कि गिरिजा नवाबों या राजाओं के दरबार में नहीं गाएंगी और गिरिजा देवी ने उनकी बात रखी भी. गिरिजा देवी बताती थीं कि पति को हिंदी, उर्दू और फारसी का अच्छा ज्ञान था. ठुमरी, दादरा में शब्दों के बरतने को लेकर उनकी पति के साथ चर्चाएं होती थीं. पति उन्हें प्यार से देवी कहकर बुलाते थे. गिरिजा देवी का पहला कांसर्ट 1951 जनवरी में बिहार के आरा में हुआ.

पंडित ओमकार नाथ ठाकुर, पंडित विनायक राव पटवर्धन, अहमद जान थिरकवा, पंडित अनोखे लाल, कंठे महाराज, मीरा सान्याल जैसे दिग्गज उसी मंच पर थे. जाहिर है गिरिजा देवी कम उम्र से ही बड़े कलाकारों में गिनी जाने लगी थीं. 1952 में इनके पति ने बनारस में एक संगीत समारोह कराया. उसमें भी पंडित रविशंकर, विलायत खां, अली अकबर खान, केसरबाई केरकर, पंडित ओमकार नाथ ठाकुर जैसे कलाकार आए थे. वहां गिरिजा देवी ने भी गाया. पंडित रविशंकर उस वक्त दिल्ली आकाशवाणी से जुड़े हुए थे. उन्होने गिरिजा देवी का गाना सुना तो दिल्ली में उनका प्रोग्राम रखवाया.

दिल्ली के तालकटोरा स्टेडियम में हुए इस प्रोग्राम में बिस्मिल्लाह खां, डीवी पलुस्कर और गिरिजा देवी तीनों को 20-20 मिनट मिले थे. गिरिजा देवी बताती थीं कि उन्हें जितना वक्त मिलता है उससे पहले ही गाना खत्म कर देती हैं क्योंकि उन्हें ये बिल्कुल पसंद नहीं कि कोई कहे ज्यादा वक्त ले लिया, इसलिए उस रोज भी एक टप्पा और एक ठुमरी गाकर 18 मिनट में ही उन्होंने अपनी प्रस्तुति को खत्म कर दिया. तभी एक आदमी दौड़ता हुआ आया. दरअसल श्रोताओं में बैठे तत्कालीन उप-राष्ट्रपति डॉ राधाकृष्णन ने संदेश भिजवाया था कि और गाइये. गिरिजा देवी ने ये ध्यान दिए बिना कि माइक ऑन है धीरे से पूछा - बीच में उठकर चले जाएंगे तो? इसपर खुद राधाकृष्णन जी ने उठकर इशारे से कहा कि नहीं जाऊंगा, आप गाइए.

1952 में ही पहली बार कलकत्ता में कॉन्सर्ट किया. तब से ही कलकत्ता से भी उनका गहरा नाता है. 1978 में कलकत्ता में आईटीसी की संगीत रिसर्च एकेडमी में उन्हें फेकल्टी के तौर पर बुलाया गया. इसके बाद से कलकत्ता गिरिजा देवी के लिए दूसरा घर बन गया. आज भी वो कलकत्ता की सैकड़ों छात्राओं को संगीत सिखाती थीं और खुद शानदार बंगला भी बोलती थीं. हां लेकिन दिल से वो खुद को बनारसी ही मानती थीं.

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गिरिजा देवी को संगीत जगत में लोग प्यार से अप्पा कहते थे. वो बताती थीं कि उन्हें बचपन से गुड़ियों का बहुत शौक था. बचपन में गुड़ियों की शादी करातीं, उन्हें विवाह के गीत और सोहर सुनातीं. बनारस और कलकत्ते के उनके घर में गुड़ियों का बड़ा ‘कलेक्शन’ है. कुछ बरस पहले तक जन्मदिन पर कई करीबी लोग उन्हें गुड़िया ही भेंट करते थे. गिरिजा देवी बताती हैं कि उनकी बड़ी बहन का बेटा हुआ तो वो बड़ा गोल-मटोल गुड्डे जैसा प्यारा था. उसने बोलना शुरू किया तो मौसी को उसने ‘अप्पा’ कहना शुरू किया. धीरे-धीरे सब उन्हें अप्पा ही कहने लगे. वही अप्पा आज हमारे बीच नहीं रहीं.

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