UPSC विवाद : रविवार को सरकार करेगी सी-सैट पर फैसला!

By: | Last Updated: Friday, 1 August 2014 4:58 PM

नई दिल्ली : UPSC परीक्षा से सी-सैट को हटाने की मांग को लेकर आंदोलनकारी छात्रों से मिले केंद्रीय मंत्री जीतेंद्र सिंह और बीजेपी नेता जे पी नड्डा. सूत्रों के मुताबिक सरकार रविवार को करेगी सी-सैट पर फैसला. इस बीच संसद में यूपीएससी के मुद्दे पर फिर हंगामा हुआ .

 

यूपीएससी के मुद्दे पर संसद के दोनों सदनों में हंगामा हुआ . लोकसभा में तो आरजेडी सांसद पप्पू यादव ने पेपर फाड़कर स्पीकर की तरफ फेंक दिया. विपक्षी सांसद सरकार को वर्मा कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर घेरने की कोशिश कर रहे हैं. खबर है कि सिलेबस की समीक्षा के लिए बनी वर्मा कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में सीसैट को नहीं हटाने की सिफारिश की है.

 

वहीं विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस मुद्दे पर वादाखिलाफी कर रही है . इस बीच वर्मा कमेटी की रिपोर्ट की खबर मिलते ही सीसैट का विरोध कर रहे छात्रों ने अपना आंदोलन और तेज करने का एलान कर दिया .

 

आपको बता दें कि एस के खन्ना कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सिविल सेवा का पैटर्न 2011 से बदला गया. इसके तहत प्रारंभिक परीक्षा में सीसैट यानी सिविल सर्विसेज एप्टिट्यूड टेस्ट नाम का एक नया पेपर जोड़ दिया गया. 200 नंबर के नए सीसैट पेपर से अंग्रेजी और एप्टिट्यूड का टेस्ट लिया जाने लगा. सीसैट के पेपर में ढाई-ढाई नंबर के कुल 80 सवाल होते हैं जिसमें से 8 सवाल अंग्रेजी कॉम्प्रिहेंशन के होते हैं जबकि 32 सवालों के जरिए रीजनिंग, अंकगणित और फैसले लेने की क्षमता आंकी जाती है.

 

आंदोलन कर रहे छात्रों का कहना है कि सी सैट के 40 सवाल अंग्रेजी में होते हैं और उनका हिंदी अनुवाद समझने लायक नहीं होता. ऐसे में अंग्रेजी माध्यम वालों को तो नंबर मिल जाते हैं लेकिन उन्हें नुकसान होता है.

 

 

अगर साल 2011 से पहले की सिविल सर्विसेज परीक्षा नतीजों पर नजर डालें तो साल 2008 में चुने जाने वाले छात्रों में आर्ट्स के 30 फीसदी थे और इंजीनियरिंग से आने वाले भी 30 फीसदी थे.

 

साल 2009 में आर्ट्स के 33 फीसदी छात्र चुने गए जबकि इंजीनियरिंग के 40 फीसदी लेकिन साल 2011 में सीसैट लागू होने आर्ट्स के सिर्फ 15 फीसदी छात्र चुने गए थे जबकि इंजीनियरिंग पढ़कर आए छात्रों की तादाद 50 फीसदी यानी तीन गुना ज्यादा थी.

 

 

सीसैट का विरोध करनेवाले छात्र इन आंकड़ों को सामने रखकर दावा करते हैं कि एप्टीट्यूड टेस्ट का पेपर ऐसा सेट किया जाता है कि इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के छात्र उसे आसानी से सॉल्व कर लते हैं लेकिन आर्ट्स के छात्र पिछड़ जाते हैं . अब यहां पर सवाल उठता है कि क्या छात्रों को ये तय करने का हक मिलना चाहिए कि वो किस तरह की परीक्षा देंगे ?

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