व्यक्ति विशेष: ललितगेट के चक्रव्यूह में महारानी!

By: | Last Updated: Saturday, 27 June 2015 2:35 PM
vasundhara raje

नई दिल्ली: सैकड़ों साल गुजर गए. देश में अंग्रेज़ आए और चले भी गए लेकिन पूर्व रियासत धौलपुर के इस शाही महल का रूतबा और रुआब आज भी कायम है. यूं तो भारत की आजादी के बाद तमाम देसी रियासतें खत्म हो गई थी लेकिन धौलपुर रियासत के इस राजमहल की परंपराएं हमेशा बरकरार रहीं और इसीलिए महाराज उदयभानु सिंह के बाद एक दिन इस महल के महाराज हेमंत सिंह बने. लेकिन ये कहानी धौलपुर के महाराजा की नहीं बल्कि उनकी रानी की है. महारानी वसुंधरा राजे सिंधिया की.

 

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे देश की राजनीति में एक जाना माना चेहरा रहा है. उनके कई रुप भी दुनिया के सामने आते रहे हैं. कभी वो रैंप पर कैटवाक करती दिखाई दी हैं तो कभी मंदिरों में नजर आती है और कभी वो कैमरों के सामने लिपलॉक की वजह से विवादों में भी घिर जाती है. लेकिन पिछले कुछ सालों से वसुंधरा राजे ने राजस्थान की राजनीति को किसी जादूगर की तरह अपनी मुट्ठी में कैद कर रखा है. चुनावी बिसात पर अपराजेय रही वसुंधरा, राजस्थान की पहली ऐसी महिला मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पार्टी आलाकमान को भी हठयोग से छका कर रख दिया है. लेकिन आज उनका राजनीति सफर एक ऐसे मुश्किल मुकाम पर आ खड़ा हुआ है जहां उन्हें देना है सत्ता का सबसे बड़ा इम्तिहान.

 

वसुंधरा राजे पर आईपीएल के पूर्व प्रमुख ललित मोदी की मदद का आरोप लगा है और इसीलिए विरोधियों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. ललितगेट में फंसी वसुंधरा राजे दो तरफा शिकंजे में नजर आ रही हैं. एक तरफ वीजा संबंधी ललित मोदी के आवेदन पर कथित रुप से उनके दस्तख्त हैं तो वहीं उनके बेटे दुष्यंत सिंह पर ललित मोदी से फायदा लेने का इल्जाम भी हैं.

राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया इन दिनों चारों तरफ से निशाने पर हैं. वसुंधरा पर इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के पूर्व प्रमुख ललित मोदी के वीजा आवेदन में गुप्त रुप से मदद करने का आरोप लगा है. राजे पर आरोप है कि अगस्त 2011 में उन्होंने मोदी के वीजा संबंधी आवेदन का गवाह बनने पर सहमति जताई थी साथ ही ब्रिटिश अधिकारियों के सामने उन्होंने ये शर्त भी रखी थी कि भारत में इस बारे में किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए. लेकिन वसुंधरा के दस्तखत वाला गवाही का दस्तावेज सामने आने के बाद से उनके लिए मुश्किलें बढ़ गई हैं.

 

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बाद ललित मोदी को मदद करने के आरोप में घिरी वसुंधरा राजे के इस मामले को मीडिया में ललितगेट कहा जा रहा है. आखिर ये ललितगेट क्या बला है. इसकी गहराई में भी हम उतरेंगे आगे लेकिन उससे पहले ये जान लीजिए कि ये गेट शब्द आया कहा से हैं. दरअसल जब कभी राजनीति में कोई बड़ा घोटाला होता है तो दुनिया भर में उस घोटाले के नाम के सामने गेट जोड़ दिया जाता है. भारत में भी बहुत से घोटालों के साथ गेट शब्द जुड़ चुका है और इन दिनों सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और ललित मोदी के मामले में गेट शब्द का इस्तेमाल हो रहा है. अब आगे ये भी जान लीजिए की ये गेट शब्द आया कहां से है. दरअसल ‘गेट’ शब्द को अमरीका के कुख्यात वाटरगेट मामले से लिया जाता है.

 

जून 1972 में अमरीकी राष्ट्रपति पद के चुनाव के दौरान कुछ चोर वाटरगेट होटल के परिसर में बने डेमोक्रेटिक पार्टी की राष्ट्रीय कमेटी के दफ्तर में घुस गए थे. आरोप यह था कि तत्कालीन राष्ट्रपति और रिपब्लिकन उम्मीदवार रिचर्ड निक्सन ने घोटाले पर लीपापोती की कोशिश की थी. तब से ही राजनीतिक घोटालों पर लीपापोती के काम को ‘गेट’ शब्द से नवाजा जाता रहा है और आज सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और ललित मोदी के मामले को ललितगेट नाम दे दिया गया है. मौजूदा चर्चित ललितगेट में तीन किरदार अहम है. पहले आईपीए के पूर्व प्रमुख ललित मोदी, दूसरी विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और तीसरी वसुंधरा राजे सिंधिया. अब ललितगेट में इन तीनों किरदारों का कथित रोल भी समझिए. सबसे पहले बात ललित मोदी की. देश में प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी में ललित मोदी के खिलाफ 16 मामले चल रहे हैं. मैच फिक्सिंग में आरोपी ललित मोदी पर मनी लॉन्ड्रिंग केस में एक एफआईआर भी दर्ज हुई है. अंग्रेजी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ईडी ने आईपीएल के मीडिया राइट्स देने के 2009 के एक मामले में मोदी के खिलाफ जांच पूरी कर ली है. जांच में पाया गया है कि सिंगापुर की मल्टी स्क्रीन मीडिया सैटेलाइट (एमएसएम) कंपनी से वर्ल्ड स्पोर्ट्स ग्रुप (डब्ल्यूएसजी) को 425 करोड़ रुपए का भुगतान करने को कहा गया था. जबकि डब्ल्यूएसजी का बीसीसीआई से ऐसा कोई समझौता हुआ ही नहीं था. लिहाजा, इसमें फेमा यानी फॉरेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट का उल्लंघन हुआ है.

 

फेमा मामले में फंसे ललित मोदी साल 2010 में देश छोड़ कर ब्रिटेन चले गए थे जिसके बाद भारत सरकार ने उनका पासपोर्ट रद्द कर दिया था. इसीलिए ललित मोदी ने ब्रिटेन की इमिग्रेशन अदालत में अपील की कि उन्हें ब्रिटेन में रहने की इजाजत दी जाए और यही आकर ललितगेट मामले में दूसरे किरदार वसुंधरा राजे सिंधिया की एंट्री होती है.

 

कैसे सामने आया था ललितगेट?

ब्रिटेन के अखबार द संडे टाइम्स के मुताबिक, जुलाई 2014 में ललित मोदी ने अपनी पत्नी मीनल मोदी की पुर्तगाल में कैंसर सर्जरी से पहले विदेश मंत्री सुषमा स्वराज से संपर्क किया. ललित मोदी को चूंकि ब्रिटेन से बाहर जाने की इजाजत नहीं मिल रही थी. इसीलिए सुषमा ने ब्रिटेन स्थित भारतीय मूल के सांसद कीथ वाज से बात की और उन्हें बताया कि अगर मोदी को ट्रैवल डॉक्युमेंट्स दिए जाते हैं तो इससे भारत-ब्रिटेन के संबंधों पर असर नहीं पड़ेगा. इस तरह विदेश मंत्री सुषमा स्वराज पर ललित मोदी को अनुचित फायदा पहुंचाने का आरोप लगा है.

 

क्या है वसुंधरा राजे और ललित मोदी का मामला?

सुषमा स्वगराज पर ललित मोदी को ब्रिटेन से पुर्तगाल जाने में मदद करने का आरोप है तो वहीं वसुंधरा राजे पर उन्हें ब्रिटेन में रहने की अनुमति दिलाने की पैरवी करने के आरोप लगे हैं. वसुंधरा राजे सिंधिया पर आरोप है कि ललित मोदी के लिए गुप्त गवाह वसुंधरा ने ब्रिटेन की निचली इमीग्रेशन अदालत को दिए अपने बयान में ललित मोदी को इमिग्रेशन दिए जाने का समर्थन किया. निचली कोर्ट ने इसी आधार पर ललित मोदी को ब्रिटेन में ही रहने की इजाजत दी थी कि भारत में उनकी जान को खतरा है.

 

 

खबरों के मुताबिक ब्रिटेन के अपर ट्रिब्यूनल ने भी अपने फैसले में ललित मोदी के पक्ष में दी गई गवाहियों को ही आधार बनाया. ट्रिब्यूनल ने कहा- ‘ललित मोदी की जान को खतरा है. राजनीतिक पृष्ठभूमि के कारण भारत सरकार ने उनकी सुरक्षा का स्तर घटा दिया है. यह बात विश्वसनीय गवाहों से साबित होती है.’ बताया जाता है कि वसुंधरा राजे भी उन विश्वसनीय गवाहों में से एक थीं और इन गवाहों के बयान के चलते ही ब्रिटेन की अदालत ने भी ललित मोदी को वहां रुकने की इजाजत दी.

                

वसुंधरा ने मोदी के पक्ष में दिए बयान में क्या कहा था?

वसुंधरा राजे सिंधिया का जो बयान लीक हुआ है, वह उन्होंने अगस्त 2011 में दिया था. उन दिनों वो राजस्थान में विपक्ष की नेता थीं. बयान की शुरुआत में वसुंधरा ने लिखा ‘मैं यह बयान ललित मोदी की इमिग्रेशन एप्लिकेशन के समर्थन में दे रही हूं. लेकिन बयान इस कड़ी शर्त पर है कि मेरे इस सहयोग का पता भारतीय अधिकारियों को नहीं चलना चाहिए.’ बयान में वसुंधरा ने कहा – ‘भारतीय राजनीति में मेरे दखल और समझ के कारण मुझे इस बात में कोई शक नहीं है कि ललित जिस तरह के हमले का सामना कर रहे हैं, वह राजनीति से प्रेरित है. भारतीय राजनीति के अंदर मौजूद कुछ तत्व अपने प्रतिद्वंद्वियों के खिलाफ बदला लेकर अपना हित साधना चाहते हैं. देश में ललित के खिलाफ अभी जो कुछ चल रहा है, उसके पीछे यही मंशा है.’ वसुंधरा ने आगे लिखा कि – ‘2008 के चुनावी अभियान के दौरान ललित मेरे मुख्य समर्थकों में से एक रहे हैं. ललित की कामयाबी के कारण कांग्रेस के पुराने नेता और क्रिकेट में दखल रखने वाले पुराने लोगों को जलन हुई. अब तक वे ललित को भाजपा समर्थक और कांग्रेस विरोधी घोषित कर चुके हैं.’

 

ये पूरा मामला सामने आने के बाद वसुंधरा राजे ने भी ललित मोदी से पारिवारिक रिश्ते की बात तो कबूली थी लेकिन ऐसे किसी कागजात के होने से ही इनकार कर दिया था. लेकिन वसुंधरा के इस बयान के बाद ललितगेट में बड़ा धमाका तब हुआ जब ब्रिटिश कोर्ट में दाखिल जिस शपथ पत्र की फोटो काफी पर वसुंधरा राजे के दस्तखत न होना दिखा कर वसुंधरा राजे का बचाव करने की कोशिश की जा रही थी उस शपथ पत्र की मूल प्रति होने की बात कह कर खुद ललित मोदी ने ही वसुंधरा के इस पूरे बचाव को झूठा साबित कर दिया. दोस्त होने का दावा करने वाले ललित मोदी ने आखिर वसुंधरा राजे के साथ ऐसा क्यों किया.

 

ललितगेट के इस पूरे मामले के बीच अहम सवाल ये भी है कि कभी वसुंधरा के बेहद करीबी रहे ललित मोदी आखिर क्यों उनसे दुश्मनी निकालने पर उतारु हो गए? इस सवाल के जवाब के लिए हमें मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पिछले कार्यकाल में झांकना होगा.

 

ललित मोदी कभी हिमाचल प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन में पैर जमाने की कोशिश कर रहे थे लेकिन साल 2003 में जब वसुंधरा राजे पहली बार राजस्थान की मुख्यमंत्री बनीं थी तो ललित मोदी के भी क्रिकेट में अच्छे दिन आ गए थे. वसुंधरा के सत्ता में आते ही ललित मोदी ने राजस्थान की क्रिकेट राजनीति में कदम रखा और देखते ही देखते वो भारतीय क्रिकेट  राजनीति में छा गए थे.

 

ऐसा कहा जाता है कि 12 साल पहले ललित मोदी को वसुंधरा राजे ही राजस्थान में लेकर आईं थी. इसके पीछे एक वजह राज्य क्रिकेट एसोसिएशन पर कब्जा करना था तो दूसरी वजह कारोबार को आगे बढ़ाना भी था. साल 2003 में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने राजस्थान में अध्यादेश लाकर क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव का ऐलान करवाया और राजस्थान की क्रिकेट में  दखल रखने वाले किशोर रुंगटा, कमल मुरार्का और राज सिंह डूंगरपुर की तिकड़ी को बाहर का रास्ता दिखा दिया. इसी दौरान ललित मोदी अचानक विदेश से राजस्थान की जमीन पर अवतरित हुए थे और नागौर जिला क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बन गए. क्रिकेट की राजनीति में फिर कभी पीछे मुड़कर ना देखने वाले ललित मोदी ने भारतीय क्रिकेट को आईपीएल के चमकते मुकाम तक भी पहुंचा दिया.

 

कहा जाता है कि उन दिनों जयपुर के सवाई मानसिंह स्टेडियम के पड़ोस में बना पांच सितारा होटल रामबाग पैलेस ललित मोदी का स्थायी निवास बन गया था जहां से वो क्रिकेट की अपनी पूरी गतिविधियों को अंजाम दिया करते थे. बताया ये भी जाता है कि ललित मोदी उन दिनों राजस्थान सरकार के अफसरों पर अपना हुक्म भी चलाते थे.

 

वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी बताते हैं कि ललित मोदी को ये राजस्थान क्रिकेट में लेकर आईं तो उन्होंने क्रिकेट को ही बदल दिया और साथ साथ में देश का क्रिकेट बदल गया जिन क्रिकेट के खिलाड़ियों की हैसियत नहीं थी उनको बहुत आराम से बहुत कुछ मिला है साथ साथ आप राजस्थान में जो जगह जगह क्रिकेट का चांव देख रहे हैं खेल के प्रति जो रुझान बनने लगा युवाओं को वो इन्हीं के मित्र की वजह से बनने लगा ललित मोदी का कांट्रिब्यूशन को तो हम इंकार नहीं कर सकते वर्ना राजस्थान में राज सिंह और रुंगटार्ज के सिवाए कुछ नहीं था और क्रिकेट कुछ भी नहीं था उस तरीके से ये कांट्रिव्यूशन तो निश्चित रुप से नजर आता है.

 

ललिटगेट के कनेक्शन की इस कहानी में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का परिवार भी फंसता नजर आ रहा है. वसुंधरा के बेटे और बीजेपी के सांसद दुष्यंत सिंह की कंपनी पर संगीन आरोप लगे हैं, तो वहीं ललित मोदी से लाभ लेने वालों में उनकी बहू निहारिका राजे भी शामिल बताई जा रही हैं.

 

वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह की कंपनी नियंत हैरिटेज होटल पर ललित मोदी की कंपनी को शेयर बेच कर 11.23 करोड़ रुपए गैरकानूनी तरीके से लेने के आरोप हैं. आरोप ये भी है कि मोदी की फर्म आनंद हैरिटेज होटल्स प्राइवेट लिमिटेड को मॉरीशस की अज्ञात कंपनी विल्टन इन्वेस्टमेंट लिमिटेड से 21 करोड़ रुपए मिले थे. ललित मोदी ने इसमें से 11.23 करोड़ रुपए दुष्यंत की कंपनी नियंत हैरिटेज में निवेश कर उन्हें फायदा पहुंचाया. दस्तावेजों के मुताबिक जिस समय ललित मोदी की कंपनी आनंदा हैरिटेज की ओर से दुष्यंत सिंह की कंपनी के 10 रुपए के शेयर को 96 हजार रु. से भी ज्यादा में खरीदा गया था, तब ललित मोदी की कंपनी 89 लाख के घाटे में थी वहीं दुष्यंत की कंपनी के पास भी सिर्फ एक लाख रुपए की पूंजी थी.

 

ललित मोदी और वसुंधरा राजे के बीच पुराने पारिवारिक रिश्ते रहे हैं औऱ ये बात ललित मोदी और वसुंधरा राजे ने भी मानी है. लेकिन वसुंधरा राजे को दुबारा सत्ता में लाने वाले 2013 के विधान सभा चुनावों के आने तक ललित मोदी के उनके साथ रिश्ते बदल गए थे. 

 

दरअसल ललित मोदी के साथ रिश्तों को लेकर वसुंधरा लगातार आलोचना के घेरे में थी और शायद यही वजह थी कि वो ब्रिटिश अदालत में ललित मोदी की पैरवी भारतीय जांच अधिकारियों से छिपा कर करना चाहती थीं. लेकिन अब यही तथ्य अपने कानून दस्तावेजों के जरिये ललित मोदी ने जगजाहिर कराये है.

 

यहीं नहीं साल 2013 में राजस्थान विधानसभा चुनावों के पहले ललित मोदी ने सिलसिलेवार ट्वीट करके केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली, उनके करीबी भूपेंद्र यादव, वसुंधरा राजे और उनके विशेष अधिकारी धीरेंद्र खामथान पर हमले भी किए थे मोदी ने तब राजस्थान विधान सभा चुनावों के लिए टिकट बिक्री तक के आरोप लगाए थे.

 

ललित मोदी से संबंधों को लेकर भले ही वसुंधऱा राजे सिंधिया नए विवाद में घिर गई हैं लेकिन विवादों से उनका नाता बेहद पुराना रहा है.

 

वसुंधरा राजे की इस तस्वीर ने बडा विवाद खड़ा किया. दरअसल जोधपुर के एक पुजारी हेमंत बोहरा ने ना सिर्फ वसुंधरा को अन्नपूर्णा देवी के रुप में दिखाने वाला कैलेंडर छपवाया था बल्कि साल 2014 में जोधपुर जिले के बेरू गांव में उनका मंदिर बना कर उन्हें देवी के तौर पर भी स्थापित करने की कोशिश की थी. कैलेंडर विवाद में तब बीजेपी के वरिष्ठ नेता जसवंत सिंह की पत्नी शीतल ने इस कैलेंडर के खिलाफ जोधपुर के उदयमंदिर थाने में शिकायत भी दर्ज कराई थी और ये पूरा मामला अदालत तक भी जा पहुंचा था.

 

वसुंधरा राजे सिंधिया की तीसरी तस्वीर. ग्वालियर राजघराने से ताल्लुक रखने वाली वसुंधरा की अपने भाई दिवंगत कांग्रेस नेता माधव राव सिंधिया के साथ पारिवारिक वर्चस्व की लड़ाई भी विवादों में घिरी रही.

 

ग्वालियर रियासत के आखिरी महाराज जिवाजी राव सिंधिया की और उनकी पत्नी विजयराजे सिंधिया की पांच संताने हुईं जिनमें सबसे बड़ी पद्मवती राजे सिंधिया, ऊषा राजे सिंधिया, माधवराव सिंधिया, वसुंधराराजे सिंधिया और यशोदरा राजे सिंधिया हैं. वसुंधरा राजे की मां विजयाराजे सिंधिया बीजेपी की बड़ी नेता रह चुकी हैं और मध्यप्रदेश की राजनीति में उनका एक अहम मुकाम था इसीलिए मां के नक्शेकदम पर चलते हुए वसुंधरा राजे ने भी बीजेपी की राजनीति में कदम रख दिया था लेकिन वो मध्यप्रदेश की राजनीति में कभी अपने पैर जमा नहीं सकी.

 

ग्वालियर राजघराने के जानकार विद्रोही बताते हैं कि देखिए सिंधिया राज परिवार देश के एक प्रमुख राजपरिवारों में से था. इसलिए पूरे देश में पहले भी सिंधिया राज परिवार का दबदबा था और बाद में जब हमनें लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था स्वीकार की तब भी इन्होंने अपने नेतृत्व की क्षमता का परिचय दिया. जहां तक वसुंधरा राजे का सवाल है तो उनका ग्वालियर से उतना ही संबंध है क्योंकि सिंधिया राजपरिवार की हैं पुत्री रही हैं बाकि जहां तक उनकी बात है तो न उनका बचपन यहां बीता है और ना वो यहां पैदा हुई हैं और ना उनकी कर्मभूमि ग्वालियर रही है लेकिन क्योंकि यहां उनका पुस्तैनी घर परिवार है महल है तो वो आती जाती रही हैं.

 

साल 1953 में मुंबई में पैदा हुई वसुंधरा राजे सिंधिया ने मुंबई के ही सोफिया कॉलेज से इकोनामिक्स और पॉलिटिकल साइंस में डिग्री हासिल की है. साल 1972 में उनका विवाह धौलपुर रियासत के पूर्व महाराज हेमंत सिंह के साथ हो गया था और इस तरह ना सिर्फ उनका राजस्थान से कनेक्शन जुड़ा बल्कि वो धौलपुर की महारानी भी बनी थीं. वसुंधरा राजे सिंधिया के एक बेटे दुष्यत सिंह हुए लेकिन बेटे के पैदाइश के कुछ महीने बाद ही उनका पति से अलगाव हो गया था और फिर इसके आगे जिंदगी के सफर में वसुंधरा राजे ने पूरी तरह राजनीति की राह पकड़ ली थी. साल 1962 से राजनीति में सक्रिय रही वसुंधरा की मां विजयाराजे सिंधिया ही उन्हें 1982 में बीजेपी की राजनीति में लाई थीं और इसके दो साल बाद वसुंधरा ने मध्यप्रदेश के भिंड से लोकसभा चुनाव भी लड़ा.   

 

ग्वालियर राजघराने के जानकार विद्रोही बताते हैं कि असल में राजमाता के साथ वो बचपन से रहीं और बहुत कुछ उनकी राजनीतिक शैली राजमाता से ही ग्रहण की हुई हैं. 84 में एक विचित्र स्थिति ये थी कि विजयराजे सिंधिया रायबरेली से इंदिरा गांधी के खिलाफ चुनाव लड़ रही थीं और वसुंधरा जी भींड से चुनाव लड़ीं तो चुनाव में जो मां का मार्गदर्शन होना चाहिए था वो इनको नहीं मिला और वैसे भी चुनाव के मामले में प्रत्यक्ष रुप से इनको अनुभव नहीं था चुनाव लड़ना और लड़ाना ये दोनों अलग अलग बातें हो जाती हैं तीसरी बात ये हुई कि सन 1984 का माहौल कुछ अलग था जहां बड़े बड़े दिग्गज चुनाव हार गए थे. वहां वसुंधरा जी का भी चुनाव हार जाना कोई बड़ी बात नहीं थी.

 

वसुंधरा के राजनीतिक सफर की शुरुआत के साथ ही ग्वालियर राजघराने के अंदर पारिवारिक वर्चस्व की लड़ाई भी तेज हो गई थी. विजयाराजे सिंधिया की तीन बेटियों उषा राजे, वसुंधरा राजे, यशोधरा राजे और बेटे माधवराव सिंधिया के बीच वर्चस्व का विवाद जगजाहिर भी रहा है. मां विजयाराजे के नक्शेकदम पर चलते हुए वसुंधरा राजे जहां बीजेपी में शामिल हो गई थी वहीं उनके भाई माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस में अपनी पैठ बनाई और ये दोनों ही राजनीति में अहम पदों तक पहुंचने में कामयाब भी रहे.

 

ग्वालियर राजघराने के जानकार विद्रोही बताते हैं कि जहां तक ग्वालियर की बात है तो उस 84 के चुनाव लड़ने के बाद उनका ग्वालियर से कोई रिश्ता नहीं रहा. दरअसल जो लोकतांत्रिक व्यवस्था है जब हम जनता से वोट लेते हैं तो हमें कहीं न कहीं से अपना सरलीकरण करना चाहिए और जो लोग कर लेते है समान रुप से जैसे माधवराज जी ने लोकतांत्रिक सरलीकरण अपने अंदर किय़ा तभी आज भी जनता के बीच में दिलों पर राज करते हैं और काफी पापुलर और लोकप्रिय नेता रहें. चाहें वसुंधरा जी ने भी बहुत कुछ सीखा और राजस्थान में जाकर उनको जो राजनीतिक सफलता मिली और उनका राजनीतिक सफर 84 के बाद जो शुरु हुआ वो शायद मुख्यमंत्री अब एक बार नहीं दो दो बार प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी हैं.

 

साल 1984 में मध्यप्रदेश में अपना पहला लोकसभा चुनाव हारने के बाद वसुंधरा राजे सिंधिया ने अपनी राजनीतिक का रुख राजस्थान की तरफ मोड लिया था. वैसे भी वसुंधरा का राजस्थान से रिश्ता तब का है जब वो 1972 में धौलपुर राजघराने में ब्याही गईं थी और धौलपुर से ही उन्होंने पहली बार 1985 का विधानसभा चुनाव भी जीता था.

 

वसुंधरा राजे की मां विजयाराजे सिंधिया बीजेपी की कद्दावर नेता मानी जाती थीं और बीजेपी की राष्ट्रीय राजनीति में बड़ी हैसियत रखती थीं ये भी एक वजह थी कि उस दौर में वसुंधरा राजे का राजनीतिक करियर राजस्थान में कुचाले मारने लगा था.

 

1984 में 32 साल की उम्र में वसुंधरा राजे को बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बना दिया गया. अगले ही साल यानी साल 1985 में उन्हें राजस्थान बीजेपी युवा मोर्चे का उपाध्यक्ष बना दिया गया और दो साल से भी कम वक्त मे यानी साल 1987 में वो राजस्थान बीजेपी की उपाध्यक्ष भी बना दी गई थी. साल 1985 में वो धौलपुर से चुनाव जीतकर विधानसभा भी जा पहुंचीं थीं लेकिन यहां आकर उनका राजनीतिक ग्राफ थम सा गया था.

 

दरअसल 80 के दशक में भैरोंसिंह शेखावत और जसवंत सिंह, बीजेपी के ये दो बड़े नेता राजस्थान में पार्टी का चेहरा हुआ करते थे. राज्य की राजनीति इन्ही दोनों के इर्दगिर्द घूमा करती थी ऐसे में राज्य की राजनीति में अपने लिए एक अलग मुकाम बनाना वसुंधरा राजे के लिए आसान नहीं था.

 

लेकिन किस्मत शायद वसुंधरा राजे पर मेहरबान थी और इसीलिए साल 1998 में जब अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी तब लगातार तीन बार लोकसभा चुनाव जीतने वाली वसुंधरा राजे को केंद्र की राजनीति में जगह मिल गई थी.

 

वाजपेयी सरकार में वसुंधरा ने स्माल स्केल इंडस्ट्रीज और पेंशन और ट्रेनिंग जैसे मंत्रालयों में काम किया लेकिन 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार दोबारा चुनकर आई तब उन्हें कैबिनेट में स्वतंत्र प्रभार के साथ विदेश राज्य मंत्री बना दिया गया. इस दौरान वसुंधरा राजे भी केंद्र की राजनीति में पूरी तरह से रम चुकी थी लेकिन एक बार फिर उनकी किस्मत ने करवट बदल ली.

 

साल 2003 में राजस्थान विधानसभा के चुनाव होने थे. उस वक्त बीजेपी नेता जसवंत सिंह केंद्र की वाजपेयी सरकार में मंत्री थे और भैरों सिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बन चुके थे. राजस्थान में शेखावत की जगह लेने के लिए पार्टी में घमासान मचा हुआ था लेकिन तब बीजेपी के रणनीतिकार रहे प्रमोद महाजन और भैरोसिंह शेखावत ने वसुंधरा राजे पर अपना भरोसा जताया. और इस तरह राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे की वापसी हुई.

 

वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी बताते हैं कि 1985 से मैं इनसे वाकिफ हूं जब भैरोसिंह शेखावत की सदारत में इन्होंने भारत की राजनीति या राजस्थान की राजनीति में प्रवेश का मौका मिला था. और ये बड़ी सहज और सरल भाषा बोलने वाली मृदुल हुआ करती थीं लेकिन इनकी जो स्थिति है वो बाद में बदली है बाद में तब बदली है जब ये दिल्ली में विदेश मंत्री बनी और विदेश मंत्री बनने के बाद में वापस राजस्थान में आईं तो इसके बाद इनके तेवर बदले हुए थे और ये राजनीति को अलग तरीके से सोचने और समझने लगी थीं.

 

लेकिन जब राजस्थान की कमान हाथ में आई तो वसुंधरा राजे का वो हठयोग भी शुरु हो गया था जिसकी वजह से उनकी पार्टी बीजेपी को कई बार शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है. उस वक्त राज्य में खुद को पार्टी अध्यक्ष बनाने से लेकर टिकट बंटवारे तक बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व को वसुंधरा की हर शर्त माननी पडी थी और फिर इसके बाद ही वो पार्टी के लिए प्रचार करने राजस्थान में परिवर्तन यात्रा पर निकली थीं.

 

वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी बताते हैं कि इसी दौर में बीजेपी ने अपने आप को मास्क बेस पार्टी बनाने का एक प्रयास प्रारंभ किया है उस प्रयास के दौरान ही जब भैरोसिंह शेखावत उपराष्ट्रपति बन गए चीजें बदल गई सब कुछ इनका जो राजनीति में सदारत हासिल हुई तो प्रमोद महाजन इनके ऐसे गुरु रहे जिन्होंने समझाया कि कैसे राजस्थान की राजनीति में आप अपनी अहमियत और जगह बना सकती हैं ये जो 36 जातों का जो जुमला है ये महाजन साहब ने ही दिया था. जब पूरे चक्कर लगाने का काम शुरु किय़ा था. 2003 में क्योंकि महत्वपूर्ण साल वही है जब ये मुख्यमंत्री बनने के लिए सारा सिलसिला कर रही थीं.

 

साल 2003 के विधानसभा चुनाव में वसुंधरा राजे ने 36 जातियों का ट्रंप कार्ड खेला था वो अपने चुनाव प्रचार के दौरान राजपूतों से कहती थीं की बेटी को राज दो. जाटों से गुहार लगाती थी कि मुंह दिखाई में बहू को ताज दो और गुर्जरों से कहती थीं कि समधिन की चुनरी का मान रखो. 2003 के इस चुनाव में बीजेपी ने 110 सीटें जीतकर पहली बार अपने दम पर सत्ता हासिल की थी और इस शानदार जीत के साथ पहली बार राजघराने की कोई महारानी राज्य की रानी बनी थी.

 

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस पहले कार्यकाल में भी विवादों ने उनका पीछा कभी नहीं छोड़ा. इस दौरान राजस्थान में जातीय हिंसा ने ऐसा जोर पकड़ा की इसमें हुई गोलाबारी में कई लोग मारे गए. गुर्जर आरक्षण की मांग को लेकर राज्य में बार-बार आंदोलन हुए और इसके साथ ही साथ खुद मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर भी उनके अपने ही भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम भी लगाते रहे.

 

साल 2003 में पहली बार मुख्यमंत्री बनी वसुंधरा राजे का जादू जिस तेजी से चढ़ा था उतनी ही तेजी से उतरने भी लगा था लेकिन राजनीतिक चुनौतियों से बेपरवाह वसुंधरा कभी रैंप पर कैटवॉक करती नजर आई, तो कभी कैमरों के सामने लिपलॉक करती दिखाई पड़ीं. ये वसुंधरा राजे की शख्सियत का एक पहलू है कि वो सार्वजनिक तौर पर जितनी मॉर्डन और फैशनेबल नजर आती रही हैं वही धार्मिक तौर पर भी वो उतनी ही सक्रिय रही हैं. अक्सर मंदिरों और धार्मिक कामों में नजर आने वाली वसुंधरा राजे की मध्यप्रदेश के देवी मंदिर में भी अटूट श्रद्धा है. बताया जाता है कि दतिया जिले में इस पीताम्बरा देवी पीठ की वो अध्यक्ष भी हैं और जब कभी उन पर कोई राजनैतिक संकट आता है तब वो यहां पूजा और अनुष्ठान करने जरुर आती हैं.

 

पीताम्बरा पीठ के व्यवस्थापक महेश दुबे बताते हैं कि विशिष्ट लोग पूजा अर्चना के लिए आते है और उनकी पूजा अर्चना होती है हमारे अनुष्ठान में और अनुष्ठान के माध्यम से उनकी समस्याओं को निराकरण होता है और ऐसे भाव लोगों का है और ऐसी निष्ठा लोगों की बन गई है कि माईं की पूजा से और प्रार्थना से उनकी मनोकामना पूरी हो जाती है वर्तमान में श्रीमती वसुंधरा राजे हमारे इस ट्रस्ट की अध्यक्ष महोदया हैं. उनकी सम्पूर्ण आस्था है और वो हमेशा यहां आती है मीटिंग लेती हैं और हमलोगों को मार्गदर्शन देती हैं और मॉनिटरिंग भी करती है कि कौन सा काम हुआ या नहीं हुआ.

 

मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के यकीन से जुड़ी एक दिलचस्प कहानी और भी है दरअसल वो जयपुर में मुख्मंत्री निवास में रहने की बजाए बंगले में रहती हैं. वसुंधरा राधे ने साल 2003 का विधानसभा चुनाव इसी बंगले में रहते हुए जीता था और शायद इसीलिए अजयपाल सिंह के इस बंगले को वो अपने लिए लकी मानती रही हैं. 

 

वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी बताते हैं कि ये आधुनिक सांमत है सब मैं यूं कह सकता हूं जिसमें ये महारानी जैसा ग्लैमर बनाए रखना चाहती हैं और मॉडर्निटी को एडप्ट करके खास समुह के साथ में वैसे रखना चाहती हैं और जब गरीब के पास में जाती हैं तब दिखाती हैं कि मैं तुम्हारे लिए ही जी रही हूं और मर रही हूं. हकीकत ये कि वो तीनों से अलग एक विलासीपूर्णता जीवन जीने की आदी रहीं हैं जो ग्वालियर राजघराने से इनको हासिल हुआ और वही इनके मन में निश्चित रुप से स्थापित है वर्ना मेरा तो ऐसा ख्याल है कि अगर उतना गंभीरता से जितना ये कहकर आईं और जैसा इन्होनें संकल्प यात्रा में बोला था अगर वैसा किया होता तो राजस्थान में अबतक बड़ा बेहतर हो सकता है.

 

अपनी शर्तों पर राजनीति करने वाली मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे का अपने पहले कार्यकाल में आरएसएस से भी टकराव होता रहा है, दरअसल वसुंधरा के कमान संभालने से पहले राजस्थान में बीजेपी एक कैडरबेस पार्टी हुआ करती थी. बीजेपी की मदद के लिए अपने विभिन्न संगठनों के साथ आरएसएस भी यहां सक्रिय रहा है लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही वसुंधरा ने राज्य की राजनीति में धीरे – धीरे ऐसे नेताओं को मजबूत किया जो सिर्फ उनके लिए वफादार रहें.

 

वरिष्ठ पत्रकार ओम सैनी बताते हैं कि इन्होंने जो टैंशन क्रिएट किया और जो संघ दीक्षित नेता थे चाहे वो हरिकशन फापड़ा हो या फिर ललित किशोर चतुर्वेदी हों चाहे गुलाबचंद कटारिया हो इन सबके साथ में इनके टैंशन थें. एक इनक कांफ्लिक्ट स्टार्ट हुआ भैरोसिंह जी के देखते देखते लेकिन जब भैरोसिंह जी वापस लौटे राजस्थान उपराष्ट्रपति के पद से निवृत होकर तो एक टेंशन का क्रिएट हो गया इनके साथ में. मेरा ख्याल है कि पार्टी में सीधे सीधे एक तनाव देखने को मिला और उस तनाव में इन्होंने अपनी जगह बनाई और साथ साथ में जो लोग नए थे जो संघ दीक्षित नहीं थे वो सब इनके साथ में हो गए. तो इस तरह से राजस्थान की राजनीति में इन्होंने अपना दबदबा क्रिएट किया.

व्यक्ति विशेष: ललितगेट के चक्रव्यूह में महारानी! 

राजस्थान की राजनीति में करीब तीस साल से सक्रिय रही वसुंधरा राजे सिंधिया 2008 का विधानसभा चुनाव हार गई थीं. उन पर भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम भी लगे थे. उनकी कार्यशैली और आक्रामक राजनीति के चलते राज्य के कई नेताओं ने उनसे किनारा भी कर लिया था. ललित मोदी से रिश्तों को लेकर भी पार्टी के अंदर और बाहर उन्हें तीखी आलोचनाएं झेलनी पडी हैं बावजूद इसके उन्होंने ललित मोदी से अपने रिश्ते खत्म नहीं किए थे. लेकिन अब बदले हालात में ललित मोदी से उनके रिश्ते ने उन्हें राजनीति के एक ऐसे पड़ाव पर ला खड़ा किया है जहां उन्हें अपनी राजनीतिक करियर की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा देनी है. देखना ये है कि क्या वसुंधरा राजे को ललितगेट से बाहर निकाल पाएगा उनका हटयोग.

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