चौधराहट की मूंछों पर ताव देते रहे जाट

Vijay Factor

हरियाणा के करनाल जिले के सफराबाद माजरा गांव में रहते हैं रामचन्द्र . ढाई मंजिला बड़ा मकान है . घर में ग्यारह भैंसें हैं . ट्रैक्टर है . उपर से पूरी तरह खुशहाल संपन्न नजर आते हैं . रामचन्द्र के दादा अमरसिंह के पास 22 एकड़ जमीन हुआ करती थी . उनके चार बेटे हुए . उनमें रामचन्द्र के पिता भी शामिल थे . चारों बेटों में जमीन बंट गयी . एक एक हिस्से में साढ़े पांच एकड़ जमीन आई . अब चारों भाइयों के कुल आठ बेटे हैं . उनमें रामचन्द्र भी एक हैं . रामचन्द्र के हिस्से में करीब ढाई एकड़ जमीन आई है . रामचन्द्र बताते हैं कि वह साल में धान और गेहूं उगाते हैं . सारा खर्च निकाल कर प्रति एकड़ बीस हजार रुपये ही बचते हैं . यानि साल में करीब सवा लाख रुपये . उनके पास ही रहते हैं सुल्तान सिंह . इनके पास भी करीब तीन एकड़ जमीन है जो बटाई पर दी हुई है . तीन साल जो जमीन चालीस हजार रुपए प्रति एकड़ की दर पर बटाई में जाती थी उसके अब बीस हजार ही मिल पाते हैं . वह बताते हैं कि गेहूं पर उनका खर्च ही करीब 2200 रुपये क्विंटल आता है लेकिन सरकार से उन्हे 1400 रुपए ही मिलते हैं . अब प्रति टन 700 रुपये के घाटे को कब तक सहन कर सकते हैं . ऐसी ही दर्द फूसगढ़ गांव के संजीव कुमार लाठर का है . उनके दादा के पास दस एकड़ जमीन थी और संजीव के हिस्से दो एकड़ ही आई है . उनका कहना है कि खेती में बरकत नहीं रही , जोत लगातार घटती जा रही है और इतने पिछड़ गये हैं कि अब तो हमें अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल कर लिया जाना चाहिए .

   हरियाणा में जाटों के आंदोलन के ठंडा पड़ने के फौरन बाद अलग अलग गांवों में घूमते हुए और अलग अलग जातियों के लोगों से बात करते हुए यही महसूस हुआ कि जाटों के आरक्षण मांगने की मांग के पीछे गहरे कारण हैं . जाटों के सबसे बड़े नेता सर छोटू राम ने तो 1935 में ही जाटों को बेचारा जमींदार बताया था . उनका कहना था कि सिर्फ खेती के बल पर बहुत दिन तक काम नहीं चल सकता . उन्होंने तब जाटों से अपने बेटों को सेना में भेजने के कहा था . उस वक्त अगर सेना में जाना उस वक्त की मांग थी तो इस वक्त की मांग यही है कि जाट अपने बच्चों की पढ़ाई लिखाई की तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दे पाए . ऐसा संजीव भी स्वीकराते हैं और उनके चचेरे भाई रामकुमार भी . उनका कहना है कि पहले गांव में मिडिल स्कूल ही हुआ करता था . आगे की पढ़ाई के लिए नजदीक के किसी बड़े गांव या फिर दूर के  शहर जाना पड़ता था . अब जाटों के पास तो जमीन थी लिहाजा उन्हे लगा कि बच्चों की परवरिश जैसे तैसे हो ही जाएगी लेकिन गैर जाटों और दलितों ने अपने बच्चों को मजबूरी में ही आगे पढ़ाई के लिए नजदीक के गांव और फिर शहर भेजा . आरक्षित जाति को तो फीस माफी से लेकर वजीफे का फायदा मिला और गैर आरक्षित गैट जाट जातियों ने पेट काट कर बच्चों को पढाया क्योंकि उनके पास इसके आलावा कोई विकल्प नहीं था . यह बच्चे आगे बढ़ गये और जाट पीछे ही रह गये .

   फूसगढ़ के रघुवीरसिंह इस बात को मानते हैं कि उनसे बच्चों को पढ़ाने के मामले में चूक हो गयी . लेकिन वह जलन या चिढ़ से इनकार करते हैं . जाटों ने अंग्रेजी की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया जितना दिया जाना चाहिए था . इसी तरह साफ्टवेयर , मैनेजमेंट जैसे कोर्स की तरफ कम गये जहां नौकरी के सबसे ज्यादा मौके हैं . सफराबाद माजरा गांव के चरणसिंह का कहना था कि अब वह चाहते हैं कि बच्चों को ऊंची शिक्षा की तरफ भेजें लेकिन एक , दाखिला मुश्किल से मिलता है और दो , फीस होस्टल का खर्च उठाना भारी पड़ रहा है . उनका तो साफ कहना था कि दलित उनसे आगे निकल गये हैं . जाट यह भी कहते हैं कि औसत जाट के पास पांच एकड़ जमीन ही है . बड़े संपन्न जाट बीस फीसद से ज्यादा नहीं है और बाकी 80 फीसद जाटों की हालत दूसरों जैसी ही है .

यह बात जाटों को चुभती भी है और आरक्षण के लिए ललकारती भी है . आखिर लंबे समय तक जाट आर्थिक , सामाजिक और राजनीतिक रुप से एक बड़ी ताकत रहे हैं . हरियाणा की बात करें तो दस में से सात मुख्यमंत्री उनकी बिरादरी से हुए . जाटों के पास निर्णायक राजनीतिक वीटो पावर रहा है . गांव में दबदबा रहा है . लेकिन यह वर्ग अब इन तीनों ही मोर्चों पर खुद को हाशिए पर पा रहा है . यह हाल सिर्फ मार्शल कौम जाटों का नहीं है . राजस्थान में मार्शल कौम राजपूत , महाराष्ट्र में मार्शल कौम मराठों का भी यह हाल है . इनके आलावा गुजरात में प्रभावशाली पटेल या पाटीदार और आंन्ध्र प्रदेश में रसूखदार कापू भी इसी दौर से गुजर रहे हैं . यह सारी जातियां जमीन से जुड़ी रही हैं . जमीन के दम पर अपनी राजनीतिक , सामाजिक , आर्थिक प्रतिष्ठा और ताकत को दिखाती रही हैं . कभी कौन सोच सकता था कि महाराष्ट्र में कोई गैर मराठा मुख्यमंत्री हो सकता है . राजस्थान में राजपूतों का राजनीति में खासा दखल रहा है . कापू खुद को आन्ध्र प्रदेश में सबसे ताकतवर मानते रहे हैं और गुजरात में पटेल तो सत्ता जेब में रखने का दावा करते रहे हैं .

लेकिन बदले समय के अनुसार न तो यह जातियां बदली और न ही सरकार ने ही खेती को लाभदायक पेशा बनाने की तरफ जोर दिया . यह बात सही है कि आज खेती करना घाटे का सौदा है . यह बी सही है कि जोत घटने से किसान परेशान हैं . लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि आरक्षण दे दिया जाए . होना तो यह चाहिए था कि खेती को एक व्यवसाय की तरह बनाने की कोशिश होती . अनुबंध पर खेती को ज्यादा बढ़ावा दिया जाता . गुजरात सरकार ने अभी एक प्रयोग किया है . वहां सभी मंडियों को एक साथ जोड़कर आन लाइन कर दिया गया है . यानि किसान अब जिस किसी को ज्यादा दाम देखकर फसल बेच सकता है . लेकिन इस तरफ सरकार ने तो ध्यान नहीं दिया साथ ही किसान नेताओं ने  भी अपनी तरफ से कोई पहल नहीं की . यह नेता अपनी राजनीति चमकाने में ही लगे रहे . यह नेता अभी भी मान कर चल रहे हैं कि उनकी जाति का इतना असर है कि वह जब चाहें सत्ता को झुका सकते हैं . इसलिए आरक्षण डंके की चोट पर मांगा जा रहा है . हिंसा की जा रही है , गाड़ियां जलाई जा रही है , दुकानों को आग के हवाले किया जा रहा है , हरियाणा में तो कथित बलात्कार की बात भी सामने आ रही है . यह वर्ग आरक्षण तो चाहता है यानि कोटा तो चाहता है लेकिन कोटेवाला कहलवाना उसे पसंद नहीं .

( विजय फैक्टर में विस्तार से देख सकते हैं आप शनिवार शाम 0730 बजे और रविवार दोपहर 1230 बजे सिर्फ एबीपी न्यूज चैनल पर )

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Web Title: Vijay Factor
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