'विजय फैक्टर': ये तेरा मांझी, ये मेरा मांझी?

By: | Last Updated: Monday, 14 September 2015 11:54 AM

बिहार चुनाव को लेकर एबीपी न्यूज़ के कार्यकारी संपादक विजय विद्रोही खबरों और विश्लेषण की एक नई सीरीज़ ‘विजय फैक्टर’ लेकर हाजिर हैं. अब आप हर रोज पढ़ें विजय विद्रोही के निराले अंदाज़, बेबाक राय और सटीक विश्लेषण की ये नई सीरीज़.

 

पोस्टरों को देखते देखते पटना शहर से बाहर पहुंचे और गया की सड़क पकड़ी. गया के पास मलकार गांव पहुंचे. जीतन राम मांझी के गांव. गांव में घुसते ही तीन मंजिला पशु चिकित्सालय दिखाई देता है जो करीब करीब बन चुका है. नया प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र भी बना है. सामने पुलिस थाना भी नये भवन में शिफ्ट हो गया है. स्कूल में भी कमरों का विस्तार हुआ है. गांव वाले बताते हैं कि सब कुछ मुख्यमंत्री बनने के बाद हुआ. नौ महीनों के अपने मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान जीतन राम मांझी ने यह सारे काम करवाए. ज्यादा लोग खुश दिखाई देते हैं. कुछ का कहना है कि इतने साल मंत्री रहे तब एक काम नहीं करवाया. तीन मंजिल घर है मांझी का जहां कोई नहीं मिला.

 

घर के ही अहाते में ग्रामीण बैंक का दफ्तर भी है. यहां के मैनेजर बताते हैं कि दफ्तर जल्द ही अपने भवन में जाने वाला है जिसके लिए जमीन मांझी ने ही दिलवाई है. मांझी के घऱ कोई नहीं मिला और बाहर की दीवार की आड़ में बैठे मांझी की ही मुसहर जाति के एक शख्स का कहना था कि मुसहर तो चुनाव से ठीक पहले शराब पिएगा ( जाहिर है कि वह मुफ्त की होगी ) और फिर न जाने किसको वोट दे आएगा? आसपास के लोग हंसने लगते हैं लेकिन कोई कुछ बोलता नहीं. सभी का कहना है कि मांझी ने काम किया है तो वोट का हक तो बनता ही है. गांव के लोगों को मोटे तौर पर पता है कि मांझी ने नई पार्टी बना ली है. नाम है हम . हम का पूरा नाम नहीं पता बाते . हिंदुस्तान अवाम मोर्चा . सबको यह भी पता है कि बीजेपी के साथ मिलकर चुनाव लड़ रहे हैं और ऐसा करना मांझी से ज्यादा बीजेपी की मजबूरी हो गयी है. बीजेपी को ही इससे फायदा होगा.

 

वैसे हकीकत तो यही है कि महादलितों में मुसहरों को नीतीश ने ही शामिल करवाया था और सरकारी सुविधाएं दिलवाई थी लेकिन लोग नीतीश से नाराज है. उनका कहना है कि मांझी को मुख्यमंत्री बनवाना ही नहीं चाहिए था और बना दिया तो हटाना नहीं चाहिए था. एक दो दबी जबान से बोलते हैं कि मांझी तो अगड़ों के लिए काम करते रहे हैं, उन्होंने मुसहरों के लिए कुछ खास नहीं किया इसलिए पूरा मुसहर ( लगभग 4 प्रतिशत ) उनके साथ नहीं जाएगा. गांव में अगड़ी जाति के लोग मांझी के नये प्रशंसक हैं. सबको लगता है कि मांझी का काम बोलेगा. शायद यही वजह है कि नीतीश कुमार एक अन्य मांझी यानि माउंटेन मैन को सामने रख रहे हैं. जीतन के गांव से पांच सात किलोमीटर दूर ही दशरथ राम मांझी का गांव है जिन्होंने 22 साल पहाड़ तोड़कर रास्ता बनाया था. चुनावों से ठीक पहले उनपर फिल्म भी आई है जिसे बिहार में टैक्स फ्री किया गया है. नीतीश कुमार याद दिलाना नहीं भूलते कि कैसे उन्होंने एक दशरथ राम को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाया था. स्थानीय पत्रकार अब्दुल कादिर कहते हैं कि यह तेरा मांझी, यह मेरा मांझी जैसा मामला हो गया है.

 

दिलचस्प बात है कि बिहार में अब सब महादलित हो गये हैं. पिछली बार नीतीश कुमार ने सोशल इंजिनियरिंग करते हुए दलितों में से पासवान को छोड़कर सब को महादलित बना दिया था. जीतन राम मांझी ने अपने मुख्यमंत्रीकाल में पासवानों को भी इसके साथ जोड़ दिया. अब बिहार में कोई दलित नहीं बचा है. सभी महादलित हो गये हैं. मुसहर के आलावा पासवान और रविदास मुख्य हैं. रविदास मायावती के समर्थक माने जाते हैं. जहां बीएसपी का उम्मीदवार होगा वहां रविदास का वोट हाथी को मिलेगा. नहीं तो यह वोट उम्मीदवार के हिसाब से बंटता है. यहां नीतीश कुमार उम्मीद कर रहे हैं कि उसके हिस्से में रविदासी आ सकता है और मुसहर वोट की भरपाई हो सकती है.

 

श्रीकांत वर्मा की मगध पर लिखी कविताओं में से एक का अंश ……

मगध में शोर है कि मगध में शासक नहीं रहे .

जो थे इस लायक नहीं रहे कि उन्हे हम मगध का शासक कह सकें.

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Web Title: Vijay Factor: Bihar election reporting and analysis series by Vijay Vidrohi
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