बजट पर विजय विद्रोही की त्वरित टिप्पणी... अब की बार महंगाई की मार

vijay vidrohi blog on budget 2016

मोदी सरकार ने अपने बजट के बाद को सूट बूट की सरकार का चोला बदल कर धोती गमछे वाला चोला पहन लिया लेकिन पेंट शर्ट के शहरी बाबू को मझधार में ही छोड़ दिया . इस शहरी बाबू जिसे हम मध्यम वर्ग कहते हैं, जिसकी आबादी 25 करोड़ से ज्यादा है, जिसकी बीजेपी को सत्ता में लाने में निर्णायक भूमिका रही है, जिसकी ताकत के बल पर नरेन्द्र मोदी मुख्यमंत्री से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे हैं, जिस वर्ग में से एक बड़ा वर्ग उग्र हिंदुत्व का नारा बुलंद करते हुए मोदी सरकार के पक्ष में सोशल मीडिया पर हमेशा जयकारा लगाता रहा है, जो मोदी को एक हजार साल बाद देश का हिंदू राजा कहने से नहीं हिचकता.

यह मध्यम वर्ग वित्त मंत्री अरुण जेटली के बजट से खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है . उसे लगता है कि उसकी जेब में एक भी पैसा डाले बिना दूसरी जेब से पैसा निकालने की तैयारी मोदी सरकार ने कर ली है. मध्यम वर्ग को अब जो सेस या उपकर चुकाना होगा वह किसानों के भले के लिए काम आएगा. कायदे से तो इसका स्वागत ही होना चाहिए लेकिन मध्यम वर्ग शंकित है. उसे लगता है कि किसानों में भी जो अमीर किसान हैं उनपर जेटली टैक्स लगाने की हिम्मत क्यों नहीं जुटाते . क्यों अमीर किसान गरीब किसान का बोझ उठाने को तैयार नहीं होते. अब इस पर भी क्या यकीन कि वास्तव में सेस का फायदा गरीब किसान तक पहुंचेगा या फिर सरकार सिर्फ अपनी अडानी अंबानी की सरकार की बनती छवि से उबरने में ही लगी है.

यह कुछ ऐसा ही है जब यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में हुआ था. पहले कार्यकाल में तो अर्थव्यवस्था बहुत अच्छा कर रही थी. विकास दर नौ फीसद के आसपास बनी हुई थी, बाजार में नौकरियां थी, रौनक थी, मध्यम वर्ग मकान खरीद रहा था, कार बदल रहा था, घूमने फिरने जा रहा था. उस समय यूपीए ने गरीबों के लिए मनरेगा योजना शुरु की तो किसी मध्यम वर्ग को एतराज नहीं हुआ. मनरेगा में ग्रामीण इलाकों में हर जरुरतमंद को साल में सौ दिन का रोजगार और रोज के सौ रुपये देने की संविधान के तहत व्यवस्था कर दी गयी थी. लेकिन यूपीए के दूसरे कार्यकाल में विकास दर गिरने लगी, महंगाई बढ़ने लगी, मध्यम वर्ग को ईएमआई का बोझ सताने लगा. ऐसे समय में यूपीए सरकार खादय सुरक्षा योजना लेकर आई . इसपर सवा लाख करोड़ रुपए सालाना खर्च होने थे. बीपीएल परिवारों का चयन होना था जिन्हे प्रति व्यक्ति प्रति माह पांच किलों चावल तीन रुपए और पांच किलो गेहूं तो रुपये की दर पर दिया जाना था. सबका पेट भरे, कोई भी भूखा नहीं रहे. इसका तो स्वागत होना चाहिए था. लेकिन मध्यम वर्ग नाराज हो गया. उसे लगा कि हमसे सरकार टैक्स कमाती है और गरीबों का पेट भर रही है जबकि खुद हमारे लिए अपने परिवार का पेट काटना मुश्किल हो रहा है. नतीजा यह रहा कि मध्यम वर्ग मोदी की तरफ चला गया, उधर सबको भोजन योजना मनमोहन सिंह सरकार पूरी तैयारी के साथ शुरु नहीं कर पाई. न माया मिली न राम. न गरीब ने वोट दिया और न ही मध्यम वर्ग ने.

गरीब किसान को तब बीजेपी ने लागत मूल्य से पचास फीसद ज्यादा फसल का मूल्य देने की बात घोषणा पत्र में की. मध्यम वर्ग को महंगाई कम करने और नौकरियां देने का वायदा किया गया. अब मोदी सरकार के तीसरे बजट से किसान भी उम्मीद करे और मध्यम वर्ग भी उम्मीद करे तो इसमें किसी को ऐतराज क्यों होना चाहिए? दो साल बाद भी नौकरियां उस तरीके और उस रफ्तार से नहीं बढ़ी हैं जैसे सपने दिखाए गये थे. हैरत की बात है कि थोक मूल्य सूचकांक तो माइनस में है लेकिन खुदरा महंगाई दर साढ़े पांच फीसद हो गयी है. दालों के दाम जिस तेजी से बढ़े उससे भी रसोई घरों का बजट गड़बड़ाया है . उसपर सर्विस टैक्स में पिछले तीन महीनों में एक फीसद का इजाफा हुआ है. पहले यह 14 प्रतिशत था जिसपर 0.5 प्रतिशत स्वच्छता कर लगाया गया. और अब 0.5 फीसद का इजाफा कर दिया गया है. अब इसमें कृषि कल्याण सेस लगाया गया है . जाहिर है इससे सभी तरह की सेवा पर यह लागू होगा. मोबाइल का बिल हो या ब्यूटी पार्लर जाना हो या रेस्तरां में खाना हो या सिनेमा देखना हो या हवाई सफर हो. सभी चीजों के लिए ज्यादा पैसा देना होगा . एकाध सेवाओं को जरुर इस दायरे से बाहर रखा गया है लेकिन कमोबेश यह सभी तरह की सेवाओं पर लागू होगा. इसके आलावा रेडीमेड कपड़े, सोने और हीरे के गहने, सभी तरह की गाड़ियां, बीमा पालिसी लेना भी महंगा हो गया है.

वित्त मंत्री ने इशारा किया है कि जीएसटी लागू होने पर सेवा कर में इजाफा होना ही था. जीएसटी लागू होने पर सभी तरह के सेस अपने आप ही खत्म हो जाएंगे. लिहाजा सर्विस टैक्स में बढ़ोतरी को इसी रुप में लिया जाना चाहिए. लेकिन यहां दो बातें हैं. एक अगर सैसे लगाना ही था तो दूसरे किसी तरीके से क्या किसी तरह की रियायत नहीं दी जा सकती थी ताकि लोगों को लगता कि कुछ निकाला तो कुछ जेब में डाला भी गया है. दूसरी बात है कि जीएसटी अगले साल एक अप्रैल से पहले लागू हो पाएगा इसमें भी संदेह है. तो क्या एक साल पहले से सर्विस टैक्स बढ़ाना कितना जायज है. फिर इस बात की क्या गारंटी कि जीएसटी लागू होने पर सर्विस टैक्स 15 फीसद ही रहेगा. माना जा रहा है कि जीएसटी 18 फीसद ही रह सकता है ऐसे में क्या सर्विस टैक्स 15 से बढ़कर 18 फीसद हो जाएगा. अभी कहानी साफ नहीं है ऐसे में जीएसटी से इसे जोड़कर जनता के गुस्से को शांत करने के तर्क सही नहीं ठहरते हैं.

कृषि कल्याण सेस से सरकार को साल में पांच हजार करोड़ की आय होगी. सवाल उठता है कि जब किसानों के लिए सरकार 87 हजार करोड़ से ज्यादा का प्रावधान कर सकती है तो क्या महज पांच हजार करोड़ के लिए मध्यम वर्ग को खासतौर से नाराज करना जरुरी था जिसे वैसे ही किसी तरह की राहत आयकर में नहीं दी गयी है. इसी तरह की एक फीसद सेस छोटी पेट्रोल, एसपीजी, सीएनजी कारों पर लगाया गया है, ढाई फीसद सेस डीजल की कारों और एसयूपी पर चार फीसद सेस लगाया गया है. इस से सभी तरह की गाड़ियां महंगी हो जाएंगी. इससे सरकार को तीन हजार करोड़ रुपये की आय हो सकेगी. क्या इस कमाई से सरकार बच सकती थी. कुल मिलाकर तीन तरह के सेस से सरकार 18 हजार करोड़ की बचत करने वाली है . एक बड़े वोट बैंक की नाराजगी झेलने का जोखिम सरकार ने लिया है. साफ है कि सरकार की माली हालत ठीक नहीं है.

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