सिर्फ 'पुतला दहन' से नहीं मरेगा रावण

By: | Last Updated: Friday, 3 October 2014 4:50 AM
Vijayadashmi

नई दिल्ली: दशहरा के बारे में हम सब में से कौन नहीं जानता है! बचपन से ही हम सब को यह बताया जाता है कि इसी दिन भगवान राम ने दुराचारी रावण का वध किया था. चूंकि वह दशमी का दिन था इसलिए इस दिन को विजयदशमी भी कहते हैं. इस त्यौहार को असत्य पर सत्य की विजय, बुराई पर अच्छाई की विजय, पाप पर पुण्य की विजय, आदि तमाम तरह की विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस त्यौहार पर लिखी गई कुछ लाइनों पर गौर करते हैं.

 

उसने दशहरे के मेले में रावण का मुखौटा खरीदा… राम के तीर-कमान खरीदे…और अच्छाई पर बुराई की विजय करा दी…राम फिर से विजयी हुए, रावण फिर से मारा गया… लेकिन इस बार रावण की नहीं एक मुखौटे की मौत हुई थी. किसी अनाम कवि की यह लाइनें आज के समाज की वास्तविकता को हूबहू बताता है. हम दशहरा के दिन कितने ही रावणों का दहन क्यों न कर लें लेकिन हकीकत यह है कि रावण तो कभी मरा ही नहीं था. बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक के रूप में मनाया जाने वाला यह त्यौहार अब जैसे सिर्फ औपचारिकता भर रह गई है.

 

भला कौन है जो राम के नक्शेकदम पर चलना चाहता है अब! राम तो बस मंदिरों में सिमट से गए हैं. भगवान राम को पूजने वाले राम के नाम पर कत्लेआम करने को तैयार है. क्या सिर्फ भगवान राम को मंदिर में बैठा देने से आ जायेगा सतयुग या खत्म हो जायेगा हम सबके ज़ेहन में बैठा रावण.

 

दरअसल रावण तो कभी मरा ही नहीं था और न ही रावण के पुतला दहन से रावण मर पायेगा. जब तक हमारा समाज तमाम तरह की असमानताओं से घिरा रहेगा तब तक रावण जिंदा रहेगा. जब तक आधी आबादी को हर तरह के अन्याय से छुटकारा नहीं मिलेगा तब तक रावण जिंदा रहेगा और हम सब की परछाईं बनकर राम को चुनौति देता रहेगा कि है दम है तो मुझे मार के दिखाओ.

ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहां भ्रष्टाचार अपनी जड़ें मजबूत न कर रहा हो. जहां दबे-कुचले लोगों का हक न खाया जा रहा हो. जब हर जगह इस तरह के लोग हैं फिर सिर्फ पुतला दहन से क्या होगा. आज हर व्यक्ति जैसे जटिलताओं का पुलिंदा हो. फिर रावण और अन्य लोगों में क्या अंतर बाकी रह गया है.

 

ताउम्र सत्य के रास्ते पर चलने की नसीहत देने वाले भगवान राम को मानने वाले न जाने अपनी स्वार्थसिद्धि के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाते रहते हैं. देखा जाए तो हमारा समाज कथनी और करनी में बिलकुल अलग है. हम आने वाली नस्लों को यह शिक्षा तो जरूर देते हैं कि इंसान को किसी तरह का भेदभाव नहीं करना चाहिए लेकिन शिक्षा देने वाला व्यक्ति ही तमाम तरह के भेदभाव करता है. हमारे पुरूषप्रधान समाज से तो बहुत अच्छा वह रावण था जिसने सीता को इतने दिनों तक लंका में रखने के बाद भी कभी बुरी नियत से नहीं देखा. लेकिन हमारा आज का समाज अमूमन हर पराई स्त्री को उपभोग की नजर से देखता है.

 

मेरा मानना है कि दशहरा सभी को मनाना चाहिए. सब को रावण दहन में हिस्सा लेना चाहिए. लेकिन इन सब में हमें बेहद ही गंभीरतापूर्वक यह भी सोचना है कि अपने भीतर बैठे रावण को समय के साथ-साथ कैसे कमजोर करना है? भगवान राम की कही बातों पर किस तरह चलना है? हम लाख भगवान राम की पूजा क्यों न कर लें लेकिन जब तक उनकी बातों का अनुसरण नहीं करेंगे हमारी आस्था दिन-प्रतिदिन खोखली होती जाएगी. सिर्फ सांकेतिक तौर पर पुतला दहन से काम अब नहीं चलेगा. ‘

 

‘राम राज्य’ में इंसान तो इंसान पशुओं को भी हर जगह समानता दी गई थी. कहा जाता है कि एक ही घाट पर शेर और हिरण साथ-साथ पानी पीते थे. लेकिन आज के समाज में विरोधाभास देखिये कि राम को मानने वाले लोग ही गरीबी-अमीरी, जात, धर्म, क्षेत्र, लिंग, भाषा आदि तमाम तरह की विसंगतियों में बंटे हुए हैं. जब तक इन बुराइयों पर हम विजय नहीं पा लेते तब तक व्यर्थ ही है पुतला जलाना.

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