व्यक्ति विशेष : 'आप'  का क्या होगा जनाबे आली?

By: | Last Updated: Saturday, 7 February 2015 5:25 PM

नई दिल्ली: बॉलीवुड की दुनिया का ये भी अजब खेल है जो एक आम आदमी का किरदार निभाने वाले फिल्मी सितारे को बेहद खास बना देती है. लेकिन यही खेल जब राजनीति के मैदान में खेला जाता है तो तस्वीर अलग होती है. चुनाव में एक आम आदमी अपने वोट से किसी को सत्ता का ताज दिलाता है. तो किसी के लिए वह भाग्य विधाता बन जाता है. नए ध्रुव, नए प्रयोग औऱ नए जोश के बीच दिल्ली के चुनाव में भी आम आदमी का वोट सत्ता का एक नया समीकरण बुनता नजर आ रहा है क्योंकि दिल्ली के इस चुनावी दंगल में जिस पार्टी का चेहरा सबसे मजबूती के साथ उभरता नजर आ रहा है उसका नाम है आप. दिल्ली में यूं तो चुनावी मुकाबला अरविंद केजरीवाल बनाम किरण बेदी के बीच है लेकिन इस चुनावी जंग में बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं.

व्यक्ति विशेष: अरविंद केजरीवाल 

दिल्ली में चुनाव प्रचार के दौरान मोदी ने लगातार केजरीवाल को ही अपने निशाने पर लिया है. उनकी पार्टी बीजेपी भी अपने पूरे दल बल के साथ केजरीवाल पर लगातार वार करती रही है लेकिन तमाम सर्वे साफ इशारा कर रहे हैं कि दिल्ली के चुनाव में एक बार फिर आम आदमी पार्टी बनने जा रही है बीजेपी के गले की फांस. दिल्ली विधानसभा चुनाव में हुए रिकॉर्ड मतदान के बाद अब सबकी निगाहें चुनाव के नतीजों पर टिकी हैं क्योंकि दिल्ली की सत्ता का ये खेल उन 16 लाख नए मतदाताओं ने और ज्यादा उलझा दिया है जिनको लेकर ये कयास है कि ये वोट आम आदमी पार्टी के खाते में गिरे हैं और यही वजह है कि एक्जिट पोल के आकड़े भी आप की कामयाबी का सायरन बजा रहे हैं.

 

दिल्ली के चुनावी दंगल में किसका होगा मंगल और किसके हाथ में आएगा कमंडल. ये बात तो अभी मतपेटियों में कैद है लेकिन एक्जिट पोल के आकड़ों पर अगर यकीन करे तो तीखे तेवरों और बुलंद इरादों से लैस होकर चुनावी जंग में कूदने वाली आम आदमी पार्टी बन चुकी है दिल्ली की राजनीति का किंग. 

 

पॉलिटिक्स के मैदान में इलेक्ट्रीशियन का रोल निभा कर केजरीवाल ने साल 2013 में दिल्ली की कांग्रेस सरकार को 440 वहल्ट के खूब झटके दिए थे और अब दिल्ली चुनावहं में बीजेपी को भी लगता नजर आ रहा है केजरीवाल का करंट.

 

साल भर पहले केजरीवाल जब मुख्यमंत्री बने थे तब उनके तौर तरीकों और फिर मुख्यमंत्री पद से उनके इस्तीफे को लेकर तमाम तरह के सवाल खड़े हुए थे. दिल्ली के मौजूदा चुनाव में भी पार्टी चंदे के मुद्दे पर बीजेपी लगातार केजरीवाल को घेरने की कोशिश करती रही लेकिन नए टाइप के नेता केजरीवाल की राजनीति के पावर प्ले ने उनकी आम आदमी पार्टी को दिल्ली की चुनावी राजनीति में आज बेहद खास बना दिया है.

 

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर बता रहे हैं कि इसमें दो राय नहीं है कि केजरीवाल जो है वह बहुत ही समझदार कैलकुलेटिंग स्किमिंग पॉलिटिशिएन हैं. मैं तो ये मानता हूं कि जो महारथी हैं उनसे भी ज्यादा केजरीवाल सूझबूझ रखते हैं और वही हथकंडे वह लोग करते थे केजरीवला करने के काबिल है और इसलिए उन्होंने किए हैं इस चुनाव में. केजरीवाल तो ऐसे हैं बनियों की महफिल में जाएंगे वहां कहेंगे टैक्स कम कर दूंगा और मैं बनिया हूं बाद में और आधे घंटे झुग्गियों में जाएंगे तो कहेंगे कि मैं कीमतें कम करूंगा मैं देखूंगा कि कोई ट्रेडर कीमत न बढ़ाएगा केजरीवाल मझे हुए नेता कि तरह है अच्छे एक्टर है और राजनीति में ऐसे एक्टर को कामयाबी भी मिल जाती हैं.

 

दिल्ली में मतदान के बाद एक्जिट पोल के आकड़े भी अरविंद केजरीवाल की कामयाबी की प्रबल संभावनाएं बयान कर रहे हैं अलग – अलग न्यूज चैनल के एग्जिट पोल में बीजेपी को पिछले चुनाव के मुकाबले में नुकसान होता नजर आ रहा है तो वही एक्जिट पोल के मुताबिक अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरती दिखाई पड़ रही है.  

 

एबीपी न्यूज नीलसन के एग्जिट पोल में दिल्ली में कांग्रेस को सिर्फ 01 सीटें मिलने का अनुमान है जबकि बीजेपी को 26 सीटें और आम आदमी पार्टी को 43 सीटें मिलती दिख रही है. दूसरे एग्जिट पोल में भी आम आदमी पार्टी का यही हाल है न्यूज चैनल आजतक के एग्जिट पोल में कांग्रेस को 3 से 5 सीटें मिल रही हैं जबकि बीजेपी को 19-27 और आम आदमी पार्टी को 38 से 46 सीटें मिलने का अनुमान है.

 

इंडिया टीवी के एग्जिट पोल में कांग्रेस को 0 से 02 सीटें, बीजेपी को 25 से 33 और आम आदमी पार्टी को 35 से 43 सीटें मिलने का अनुमान है.

 

न्यूज नेशन के एग्जिट पोल में कांग्रेस को 1 से 3 सीटें मिल रही हैं जबकि बीजेपी को 25 से 29 और आप को 39 से 43 सीटें मिलने का अनुमान है.

 

इंडिया न्यूज के पोल में कांग्रेस को 0 से 2  सीटें मिल रही है जबकि बीजेपी को 17 और आम आदमी पार्टी को 53  सीटें मिलने का अनुमान है.

 

न्यूज 24 औऱ चाणक्य के एक्जिट पोल के मुताबिक बीजेपी को 22 और आम आदमी पार्टी को 48 सीटें मिलने का अनुमान जताया गया है.

 

दिल्ली विधानसभा चुनाव में यूं तो मुकाबला किरण बेदी और केजरीवाल के बीच में है लेकिन इस चुनाव में भी बीजेपी का सबसे बड़ा चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे. मोदी ने दिल्ली में चार चुनावी रैलियां की और केजरीवाल की सबसे बड़ी ताकत उनकी ईमानदारी पर ही सवाल खड़ा करने की कोशिश की. चुनावी सभाओं में मोदी लगातार केजरीवाल को अपने निशाने पर लेते रहे और यही वजह है कि बनारस के लोकसभा चुनाव के बाद ये दूसरा मौका है जब दिल्ली का ये चुनाव भी एक तरह से मोदी बनाम केजरीवाल बन गया है.

 

साल 2013 में जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए थे उस वक्त नरेंद्र मोदी बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं बने थे लेकिन इस बार मोदी की लहर पर सवार होकर ही बीजेपी दिल्ली का किला जीतने निकली थी. बावजूद इसके बीजेपी ना सिर्फ चुनावी तैयारी और प्रचार अभियान में आम आदमी पार्टी से पिछड़ गई बल्कि अपना मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने में भी उसने देर कर दी और यही बातें बीजेपी की चुनावी संभावनाओं के लिए घातक साबित हो रही हैं.

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे बता रहे हैं कि बीजेपी अपनी रणनीति अंतिम तक तय नहीं कर पाई कि उसे चुनाव मुख्यमंत्री पद का उम्मीद्वार उतारना है कि नहीं उतारना है कांग्रेस तो मान लीजिए पीटी हुई पार्टी थी उसको समझ नहीं आ रहा था कि वापसी कैसे करें. उसका केंद्रीय नेतृत्व भी बहुत असक्षम साबित हो रहा था लेकिन बीजेपी के स्थानिय नेतृत्व में जो बुरी हालत थी उसमें दरअसल बीजेपी तो बैकफुट पर कर दिया. केजरीवाल को समय मिला उन्होंने अपने 49 दिन की सरकार के बाद दिए इस्तीफे के लिए जमकर माफी मांगी और बार-बार माफी मांगी और अब ऐसा लगता है कि उनके जनाधार में उन्हें माफ भी कर दिया.

 

दिल्ली के चुनाव में बीजेपी ने अपना पूरा जोर केजरीवाल को बैकफुट पर धकेलने में लगा दिया था. बीजेपी जहां केजरीवाल को धोखेबाज और भगोड़ा करार दे रही थी वहीं केजरीवाल आम आदमी के समर्थन की अपनी रणनीति से बीजेपी के चुनावी चक्रव्यूह को भेदते नजर आ रहे थे. अब आगे आपको बताते है कि कैसे बीजेपी को दिल्ली के इस चुनाव में केजरीवाल ने कूदने के लिए मजबूर कर दिया था.

 

ऐसा भारतीय राजनीति में बहुत कम हुआ है. एक आंदोलन से शुरु हुआ सफर सत्ता तक पहुंचा तो वहां भी आंदोलन की ही रणनीति अपनाई थी. केजरीवाल जब दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने जनता को ही थानेदार बना दिया. कहा जो रिश्वत मांगे उसके बारे में हमें बताओं. हम बताएंगे कि स्टिंग कैसे करना है.

 

दिल्ली में डेनमार्क की महिला के साथ रेप हुआ. केजरीवाल मंत्रीमंडल के दो मंत्रियों के साथ पुलिस ने कथित रुप से बदसलूकी की तो मुख्यमंत्री केजरीवाल धरने पर बैठ गये. जनता को इंकलाब के लिए हुंकार लगाने लगे. पुलिस से वर्दी उतार धरने में शामिल होने की अपील करने लगे. ऐसा संसदीय राजनीति में पहले ना देखा ना सुना गया था. हांलाकि केजरीवाल का मुख्यमंत्री के तौर पर ये सफर महज 49 दिनों तक चला और इसी के बाद से बीजेपी और कांग्रेस जैसे विपक्षी दल केजरीवाल पर अऱाजक, नौसिखिया और भगोड़ा होने का आरोप लगाते रहे हैं. दिल्ली के मौजूदा चुनाव में भी बीजेपी ने इन मुद्दों को खूब उछाला है.

 

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे ने बताया कि केजरीवाल की जो 49 दिन की सरकार थी बीजेपी उसे गाली देती रही ये सोच कर कि शायद 49 दिन की सरकार एक बहुत ही घटिया सरकार थी. ऐसी सरकार थी जिसने जनता को नाराज कर दिया और मैं समझता हूं कि भाजपा की ये बहुत बड़ी गलती थी. 49 दिन की सरकार वैसी नहीं थी जैसा कांग्रेस और बीजेपी चलाना चाहते थे. वे एक अलग तरह का गवर्नेंस का मॉडल था क्या था इसका अध्यन होना अभी शेष है . लेकिन 49 दिनों के अंदर उन्होंने एक खास तरह की सरकार चलाई और आज हम देखते है कि केजरीवाल की पूरी चुनावी कैंपेन उन्हीं 49 दिन की सरकार की उपल्बधियों में खड़ी हुई है और बीजेपी उस 49 दिन की सरकार को मानती रही है कि जैसे ही हम मोदी के 8 महीने रखेगें वैसे ही हमारी गोटी लाल हो जाएगी लेकिन दरअसल ऐसा नहीं हुआ वह 49 दिन भाजपा के दिल्ली के संदर्भ में उन 8 महीनों पर भारी बैठ रहे हैं. 

 

46 साल के केजरीवाल ने दिसंबर 2013 में पहली बार असरदार ढंग से अपनी राजनीतिक पारी शुरु की थी. लेकिन तब से लेकर अब तक उनके लिए समय बड़ा उतार – चढ़ाव भरा रहा है. दिल्ली के पिछले चुनाव में आम आदमी पार्टी को 70 में से 28 सीटें मिली थीं. इस जीत ने केजरीवाल को दिल्ली का मुख्यमंत्री भी बनाया लेकिन 49 दिनों की सरकार के बाद केजरीवाल ने भ्रष्टाचार विरोधी विधेयक के मसले पर जब अचानक पद से इस्तीफा दिया तो मोदी के नेतृत्व में तेजी से उभरती बीजेपी औऱ कांग्रेस ने उन्हें भगोड़ा कह कर उनका मजाक उडाया. और यही से केजरीवाल के लिए एक मुश्किलों भरे सफर की भी शुरुआत हुई थी. 

 

अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद सवाल ये था हैं कि आखिर केजरीवाल और उनकी पार्टी ने ऐसा किया क्यों. दरअअसल जनलोकपाल की आड़ लेकर आम आदमी पार्टी ने 49 दिनों की सत्ता इसलिए छोड़ी ताकि 2014 के लोकसभा चुनावहं में पूरे दम – खम के साथ उतरा जा सके. मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद केजरीवाल ने बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को सीधे अपने निशाने पर लिया और वह जा पहुंचे, गुजरात.

 

अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के रथ को रोका था. कांग्रेस को लग रहा है कि लोकसभा चुनावहं में भी केजरीवाल का झाड़ू मोदी के प्रधानमंत्री बनने के मंसूबों पर ही फिरेगा. नवंबर दिसंबर 2013 में दिल्ली के अलावा राजस्थान , मध्यप्रदेश और छत्तीसग़ढ़ में भी विधानसभा चुनाव हुए थे. इन चारों राज्यों में बीजेपी के पीएम पद के दावेदार मोदी ने जमकर प्रचार किया था. तीन राज्यों में जहां बीजेपी का कांग्रेस से सीधा मुकाबला था वहां बीजेपी की जीत हुई. लेकिन दिल्ली में बीजेपी बहुमत से चार सीट कम पर ही अटक गयी. साफ था कि अगर दिल्ली में आप नहीं होती तो मोदी की बीजेपी को दो तिहाई बहुमत मिलता. इसके बाद से ही खुद बीजेपी के नेता डरे हुय़े थे और कह रहे हैं कि कांग्रेस आप को शह दे रही है ताकि मोदी के रथ को लोकसभा चुनाव में भी दिल्ली फतह करने से रोका जाए. 

 

2014 के लोकसभा चुनाव से पहले देश की करीब सवा दो सौ शहरी और अर्ध शहरी सीटों के बारे में कहा जा रहा था कि इनमें से केजरीवाल जितनी सीटें जीतेंगे वह बीजेपी के हिस्से जाने वाली सीटें ही होंगी. पार्टी के वरिष्ठ सहयोगियों की सलाह पर केजरीवाल ने भी लोकसभा चुनाव में बीजेपी और मोदी की बढ़ती लोकप्रियता को हल्के में लिया और पूरे देश में आम आदमी पार्टी के चार सौ उम्मीदवार खड़े कर दिए थे. तब केजरीवाल ने दावा किया था कि उनकी पार्टी कम से कम सौ सीटें जीतेगी. नरेंद्र मोदी ने जब बनारस से चुनाव लड़ने का ऐलान किया तो केजरीवाल भी उनके खिलाफ चुनाव मैदान में कूद पड़े थे.

 

बनारस की इस जंग में केजरीवाल के लिए नतीजा निराशाजनक रहा. केजरीवाल, मोदी के हाथों तीन लाख से ज्यादा वहट से हारे. उनकी आम आदमी पार्टी को भी सिर्फ चार सीटों पर जीत मिली औऱ उसके 96 फीसदी उम्मीदवार अपनी जमानत भी नहीं बचा सके. केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे के बाद आम आदमी पार्टी को बड़ा झटका लगा था लेकिन लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद तो पार्टी ही बिखरने लगी थी. आप के विधायक बिन्नी को निकाला जा चुका था. अलग-अलग नेताओं के बयानों से पार्टी की मुश्किले बढ़ रही थीं. केजरीवाल का भी पार्टी पर नियंत्रण मुश्किल होता जा रहा था. दरअसल केजरीवाल ने इतने सारे मोर्चो पर एक साथ लड़ाई छेड़ दी थी कि अब हर मोर्चे पर लड़ना भी मुश्किल था और उसे समेटना भी. इस बीच केजरीवाल ने एक बार फिर कांग्रेस की मदद से दिल्ली में अपनी सरकार बनाने की नाकाम कोशिश की. केजरीवाल सरकार गठन को लेकर बार बार लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग से मिलते भी रहे लेकिन उनकी सारी कोशिशें नाकाम साबित हुई.   

 

केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद दिल्ली के राजनीतिक हालात भी बदल चुके थे. गेंद अब बीजेपी के पाले में थी. दिल्ली में दोबारा चुनाव करवाए जाएं या फिर बीजेपी जोड़–तोड़ से अपनी सरकार बना लें. इन्ही दो विकल्पों के बीच वक्त तेजी से गुजरता चला जा रहा था. बीजेपी संगठन और केंद्र में बीजेपी की सरकार के बीच इस मुद्दे पर लंबी जद्दोजहद भी चली लेकिन केजरीवाल की सक्रियता और विरोधी दलों के दबाव के चलते बीजेपी को दिल्ली में दोबारा चुनाव करवाने के लिए मजबूर होना पड़ा. 

 

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे बता रहे हैं कि ये हकीकत है कि बीजेपी ने पूरी कोशिश की लोकसभा चुनाव के बाद किसी तरह जोड़तोड़ के सरकार बना लेगी और दिल्ली के ऊपर हुकुमत करें और नया चुनाव न कराना पड़े लेकिन आप शुरू से ही उसके पीछे पड़ी रही बार-बार और लगातार ये कहती रही कि ये तो तोड़फोड़ करना चाहते हैं और सार्वजनिक बयान देती रही एक तरह की रणनीतिक जद्दोजेहद थी. इसमें आप की कोशिश ये थी कि तोड़फोड़ न कर पाए. बीजेपी की कोशिश थी कि हम कर लें और उसमें मुझे ताज्जुब होता है कि बीजेपी जैसे शक्तिशाली पार्टी तोड़फोड़ नहीं कर पाई और एक तरह से देखा जाए तो आप की रणनीतिक जीत हुई उसने बीजेपी को सरकार नहीं बनाने दी और बीजेपी चुनाव कराने के लिए मजबूर हुई.

 

अरविंद केजरीवाल ने फरवरी 2013 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था. इसके बाद लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद उनकी साख भी तेजी से गिरती चली गई थी हांलाकि आम चुनाव में हार के बावजूद केजरीवाल की पार्टी का दिल्ली में वोट प्रतिशत दिसंबर 2013 के 31 फीसदी से बढकर 34 फीसदी हो गया था. नवंबर 2014 में जब दिल्ली में सरकार बनाने के सारे रास्ते बंद हो गए तो उसके बाद चुनाव का ऐलान हुआ.

 

दिल्ली की सत्ता छोड़ने के नौ महीने बाद अपने कार्यकर्ताओं और समाज-सेवियों की बदौलत केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी एक बार फिर दिल्ली में चुनावी जंग के लिए वापस लौटी थी लेकिन इस बार आप का मुकाबला कांग्रेस और बीजेपी की बजाए सीधा बीजेपी से ही था. 

 

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे बता रहे हैं कि अक्टूबर में जब ये सर्वे आने शुरू हुए थे तो उस वक्त भाजपा को आम आदमी पार्टी पर 17 प्रतिशत की लीड थी सैफोलाजी के इतिहास में आज तक किसी भी राजनीतिक पार्टी ने इतनी बड़ी लीड कवर नहीं की थी जब लीड 10फीसदी से ज्यादा होता है तो उसका मतलब ये होता है जिसकी लीड है वह आसानी से चुनाव जीत सकता है. लेकिन आप ने न सिर्फ 17 की लीड़ कवर की बल्कि आज वह बीजेपी से करारी टक्कर ले रही है और कभी कभी ये भी लगता है कि उससे बित्ता भर आगे है. ये क्यों कर पाए वह ये भाजपा की गलतियों की भुमिका तो है तो आप की खूबी ये है उनके कार्यकर्ताओं ने उनके स्वंयसेवकों ने दिल्ली की जमीन खोद दी अगर एक इलाके में 100 चुनाव प्रचारक सकिय होते थे तो उसमें से 10 या 11 कांग्रेस के होते थे 20-25 बीजेपी के होते और बाकि सब आम आदमी पार्टी के होते थे . एक एक दरवाजे पर उन्होंने 3-4 बार दस्तक दी.

 

दिल्ली में चुनाव के ऐलान के साथ ही अरविंद केजरीवाल ने अपना प्रचार अभियान छेड़ दिया था. आम आदमी पार्टी ने सकारात्मक चुनाव प्रचार पर अपना फोकस किया. जिसे केजरीवाल के समर्थक दिल्ली के विकास का एजेंडा कहते हैं. बिजली, पानी, गरीबों के लिए मकान, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई जैसे मुद्दों को केजरीवाल ने अपने चुनाव प्रचार का अहम हथियार बनाया. इस बीच मुख्यमंत्री का पद छोड़ने के लिए वह अपनी चुनावी सभाओं में जनता से बार – बार माफी मांगते भी नजर आए. आम आदमी पार्टी की रणनीति, मुद्दों और अरविंद केजरीवाल की आक्रामक प्रचार शैली से घबराई बीजेपी को केजरीवाल की टक्कर में उनकी सहयोगी किरण बेदी को मैदान में उतारना पड़ा. लेकिन जानकार मानते है कि बीजेपी ने अपना मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने में भी देर लगा दी.

 

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर बता रहे हैं कि बीजेपी ने तो कैंपेन चालू भी नहीं किया था उनके यहां तो इतना कन्फ्यूशन रहा कि मुख्यमंत्री कैंडीडेट रखें या नहीं रखें अगर रखा तो कितने आखिर में रखा. और वह लेकर आए तो किसको लेकर आए किरन बेदी को लेकर आए बीजेपी एक काडरबेस पार्टी है यहां पर कम से कम नेता जो है उसकी रीड चलती है उसकी प्रशंसा भी होती है उसकी आलोचना भी होता है  पर किरन बेदी में एक पैसे का एबिलिटी नहीं है. वह सारी उम्र डंडा चलाती रही अफसर रही वही उन्होंने दिखाया और राजनीति में चाहे आप जितने बड़े नेता हों चाहें छोटे नेता हों जनता को साथ लेकर चलने की क्षमता होनी चाहिए मेरा नहीं ख्याल कि किरन बेदी को इन्होंने बनाने के बाद कि उसने कई ज्यादा लोगों को लुभाया हो या अपने साथ चलाया हों. लोगों को नाराज ही किया है.

 

दिल्ली का ये चुनाव किरण बेदी बनाम केजरीवाल के नाम पर लड़ा गया है. चुनाव प्रचार के दौरान किरन और केजरीवाल ने एक दूसरे पर जमकर निशाना भी साधा है लेकिन केजरीवाल ने अपना पूरा जोर आम जनता के मुद्दों के आस – पास ही लगाया. उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में दिल्ली की उस साठ फीसदी जनता को टारगेट किया जो पंद्रह हजार रुपये से कम कमाती है. क्योंकि ये वह लोग है जो छोटे स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार से सबसे ज्यादा प्रभावित होते है. जबकि केजरीवाल की चुनावी रणनीति के उलट बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरे वक्त अरविंद केजरीवाल को ही अपने निशाने पर लिए रखा. 

 

वरिष्ठ पत्रकार अभय कुमार दुबे ने बताया कि मोदी ने दिल्ली के चुनाव में वही गलती की जो कि मोदी विरोधियों ने लोकसभा चुनाव में की ती उन्होंने आम आदमी पार्टी और केजरीवाल के खिलाफ बहुत नकारात्मक मुहिम चलाई और केजरीवाल के न जाने क्या क्या कहा और इतने अपशब्दों का इस्तेमाल किया गया जिसकी कोई सीमा नहीं थी. उसका असर ये हुआ कि केजरीवाल का अपना जनाधार मजबूत होकर उसके साथ जुड़ता चला गया. और कुछ जो फैंससीटर होते है जो बीच मैं बैठते हैं और देखते हैं इन बातों को और देखते है कि कौन क्या दे रहा है और उसके हिसाब से तय करते हैं उसमें से भी केजरीवाल को काफी हमदर्दी मिली.

वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र कपूर बताते हैं कि अगर चुनाव कुछ महीनें पहले होते तो या फिर लोकसभा चुनाव के बाद होते तो केजरीवाल कहीं नहीं थे पर पूरे देश से वर्कर बुलाकर केजरीवाल ने दिल्ली में झोंक दिया. केजरीवाल ऐसे चुनाव लड़े है जैसे कि सारी उम्र वह चुनाव ही लड़ते हों और वह नजर आ रहा कि आज वह कांटे की टक्कर हैं बीजेपी और केजरीवाल की कांग्रेस तो मैंने कहा हाशिए पर हैं.

 

दिल्ली के इस चुनावी दंगल में आरोप – प्रत्यारोप का एक लंबा दौर चला है. केजरीवाल से मुकाबले के लिए बीजेपी ने अपने केंद्रीय मंत्रियों, 120 सांसदों और दिग्गज नेताओं को दिल्ली के चुनावी मैदान में झोंक दिया था. आम आदमी पार्टी से बीजेपी ने हर दिन पांच गंभीर सवाल भी पूछे. पार्टी के चंदे को लेकर केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी पर संगीन इल्जाम भी लगाए गए. खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फ्रंट से चुनाव प्रचार में मोर्चा भी संभाला था. क्योंकि लोकसभा चुनाव के बाद ये पहला मौका है जब दिल्ली का चुनाव नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन कर सामने आया है.

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Web Title: vyakti vishesh
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