व्यक्ति विशेष: क्या है ओवैसी का गेम प्लान!

By: | Last Updated: Saturday, 15 November 2014 4:18 PM
VYAKTI VISHESH

नई दिल्ली: राजनीति के मैदान का ये खिलाड़ी टीवी के कैमरों पर कभी –कभार ही चमकता है लेकिन अपने तीखे भाषणों और विवादों को लेकर ये चेहरा अक्सर सुर्खियों में भी बना रहा है. सड़क से लेकर संसद तक राजनीति की लंबी पारी खेलने वाला ये शख्स आज देश में मुस्लिम राजनीति का नया चेहरा बन कर उभर रहा है.

 

असदुद्दीन ओवैसी  यूं तो हैदराबाद की राजनीति की पहचान रहे है लेकिन इन दिनों देश की राजनीति में भी उनके नाम की चर्चा है तो उसकी वजह है हाल ही में हुए महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव.

 

ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 2 सीटें जीतीं है और उनकी इस जीत ने शिवसेना और एनसीपी समेत कांग्रेस के खेमें में भी हलचल मचा दी है. महाराष्ट्र में एमआईएम की ये जीत भले ही छोटी है लेकिन ओवैसी और उनकी पार्टी के बुलंद होते इरादों से जहां क्षेत्रीय दल चौकन्ना हो गए है वहीं  कांग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियों  सावधान हो गई हैं क्योंकि महाराष्ट्र में जीत के बाद असदुद्दीन ओवैसी की नजरें अब दिल्ली विधानसभा चुनाव पर आ जमीं है. बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल तक औऱ उत्तर प्रदेश से लेकर कर्नाटक तक ओवैसी अपनी पार्टी एमआईएम को विस्तार देना चाहते हैं और इसीलिए अब विरोधी भी उन पर प्रहार कर रहे हैं .

 

व्यक्ति विशेष में आज हम आपको बताएंगे चुनावी बिसात पर कहां खड़े है असदुद्दीन ओवैसी के घोड़े और कहां टिकी है उनकी तलवार. साथ ही पड़ताल इस बात की भी करेंगे कि क्या है एमआईएम का भूगोल और उसका पूरा इतिहास.

 

असदउद्दीन ओवैसी के मुताबिक उनकी पार्टी एमआईएम की हिस्ट्री इंडिपेडेंट इंडिया से शुरु होती है पर जो पीछे हो चुका है उसके लिए मैं  जिम्मेदार नहीं हूं.

 

एमआईएम यानी ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलेमीन के अध्यक्ष असदउद्दीन ओवैसी अपनी पार्टी के इकलौते सांसद हैं. पिछले दस सालों से ओवैसी हैदराबाद से चुनाव जीत कर लोकसभा में पहुंचते रहे हैं. इससे पहले उनके पिता सलाउद्दीन ओवैसी भी हैदराबाद से लगातार छह बार सांसद रह चुके हैं यही वजह है कि  हैदराबाद की राजनीति में एमआईएम का दबदबा लंबे वक्त से कायम है लेकिन अब असदउद्दीन ओवैसी और उनकी पार्टी एमआईएम ने हैदराबाद से बाहर दूसरे राज्यों की राजनीति में भी अपने पैर फैला दिए है.

 

असदउद्दीन ओवैसी ने आगामी होने वाले चुनावों को लेकर कहा , ‘हम कोशिश करेंगे कि दिल्ली में हमारी पार्टी को स्टेबलिश करें. उत्तर प्रदेश में हम कई सालों से वहां काम कर रहे हैं. कई बार मुझे उत्तर प्रदेश जाने से रोक दिया गया. आजमगढ नहीं जा सकता हूं इलाहबाद नहीं जा सकता हूं. बताइये कि एक एमपी पार्लियामेंट में खड़े होकर तकरीर कर सकता है पर इलाहबाद आजमगढ़ नहीं जा सकता है इसलिए की मुलायम सिंह ये समझते हैं कि उनकी प्राइवेट प्राप्रटी है. पर इशांअल्लाह हम उत्तर प्रदेश में भी काम कर रहे है. और हमें उम्मीद है कि अवाम हमे पसंद करेगी. हमारी सरपरस्ती करेगी और इंशाअल्लाह हम अच्छा  परफार्म करेंगे. 

 

मुसलमानों के हितों की वकालत करने वाली ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलेमीन का हौसला इन दिनों बुलंदी पर है. दरअसल हाल के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एमआईएम ने दो सीटें जीती हैं और अब उसके निशाने पर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य आ गए है. पश्चिम बंगाल में 25 फीसदी मुसलमान है जो तृणमूल कांग्रेस के पाले में जाते रहे हैं और एमआईएम इन राज्यों में मुस्लिम वोट पर सेंध लगाना चाहती है. पश्चिम बंगाल के अलावा एमआईएम की नजर झारखंड और उसके बाद दिल्ली विधानसभा चुनाव पर भी टिकी हुई हैं.

 

ओवैसी की पार्टी पर मटियामहल के विधायक शोएब इकबाल ने बताया, महाराष्ट्र में दो सीट जीतने से पहले एमआईएम आंध्र प्रदेश की राजनीति तक ही समिटी हुई थी. इसी साल हुए तेलंगाना विधानसभा चुनाव में एमआईएम ने 7 सीटें हासिल की हैं इसके बाद उसे क्षेत्रीय दल का दर्जा भी हासिल हो चुका है लेकिन अब एमआईएम की रणनीति बदल चुकी है.

 

ओवैसी की पार्टी पर  शिवसेना नेता दिवाकर राउत का कहना है, ‘अगर औवेसी ऐसा कहते हैं कि हम 25 करोड़ है और 100 करोड़ हिंदु हैं हिंदु को खत्म करेने जैसी सोच होगी तो ये हमारे देश के लिए घातक होगी और फिर इस देश में भविष्य में दूसरा पाकिस्तान निर्माण करने की इनकी गुंजाइश है क्या ? इसका शोध लेना पड़ेगा.’

 

 

पर अपनी पार्टी के लिए ओवैसी के बोल इन बयानों से इतर हैं ओवैसी का कहना है कि, हमारा एजेंडा कमजोर की तबकात है. उन तमाम को साथ लेकर उन तमाम की एक सियासी लीडरशिप डेवलप की जाए और हम यहीं चाहते हैं कि पार्लियामानी जम्हूरियत में जो कमजोर तबकात हैं चाहे वो दलित हो मुस्लमान हो या ओबीसी हों. इन सबको मौका दिया गया है कि वो अपने वोट के जरिए अपने नुमाइंदों को कामयाब करें

 

 

बीजेपी नेता एकनाथ खड़से ने औवैसी की एमाआईएम पर आरोप लगाते हुए कहा, भावनाओं को भड़का कर जो वोट  लिए उसी के कारण दो सीट जीत कर आई है . अगर यही सीट दूसरी जगह से जहां माइनॉरटी कम है या नहीं है ऐसे क्षेत्र से चुनकर आते तो मैं ये मानता कि ये एक सर्वव्यापी संस्था  हैं और देश में एक नई पार्टी का उदय हुआ है . ये धार्मिक प्रकार की एक संकुचित पार्टी है जो आज पैदा हुई है जो उसी के समाज के ऊपर चल रही है, उसी के समाज की चिंता करती है या अपेक्षा करती है.

 

करीब 56 सालों के अपने राजनीतिक सफर में MIM मुसलमानों के हक की लड़ाई लड़ने का दावा करती रही है और इसी मुद्दे पर वो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में भी उतरी थी. औरंगाबाद सेंट्रल के अलावा मुंबई की भायखला सीट पर कब्जा जमाने वाली एमआईएम की ये जीत भले ही छोटी है लेकिन इसके मायने बड़े लगाए जा रहे हैं. जानकारों भी मानते हैं कि मुस्लिम वोटों के लिए छिड़ी इस जंग में एमआईएम आने वाले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और कथित धर्मनिरपेक्ष दलों का खेल बिगाड़ सकती है और इसीलिए एमआईएम पर बीजेपी के साथ साठ-गांठ के आरोप भी लग रहे है.

 

 वरिष्ठ पत्रकार  शेष नाराय़ण सिंह का माननता है कि ‘बीजेपी सपोर्ट कर रही है इसके बारे में मुकम्मल जानकारी नहीं लेकिन अगर जो ये परिस्थितियां है  उनसे लगता है कि ये अगर बीजेपी कर रही है जो उनके खिलाफ है उनको वो डिवाइड कर रही है तो वो राजनीति में जायज है. मुसलमानों के वोट बांट के और अपने खिलाफ खड़ी हुई जमातों को  अगर कमजोर कर रही है तो कर रही है कर सकती है.’

 

 

बीजेपी पर असदउद्दीन ओवैसी का कहना है ‘देखिए बीजेपी अगर मुझे इस्तेमाल कर रही है तो आप कोई प्रूफ तो बता दो ना भईया. भई 15 साल से आप लोग पावर में रहे महाराष्ट्र में मालेगांव का ब्लास्ट हुआ 2004 और 2006. एक फैसला ये नहीं कर सके दस साल हुकूमत किए दिल्ली में और पंद्रह साल यहां महाराष्ट्र में. कौन किया मालेगांव का ब्लास्ट. हिंदुओं ने किया या अभिनव भारत ने किया या मालेगांव के उन आठ नौ मुसलमान बच्चों ने किया. मेरा बीजेपी से मैं तो बीजेपी का सबसे बड़ा बिटर अपोनेंट हूं. और रहूंगा इंशाअल्लाह तआला जब तक जिंदा रहूंगा आरएसएस और बीजेपी का मैं सख्ती से मुखालफत करुंगा.’

 

 

दरअसल असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी MIM का अस्तित्व मुस्लिम वोटों पर ही टिका माना जाता है और यही वजह है कि हैदराबाद से बाहर दूसरे राज्यों की उन्हीं सीटों पर MIM अपने उम्मीदवार उतार रही है जहां मुसलमान मतदाताओं की संख्या ज्यादा है. लेकिन असदउद्दीन ओवैसी मुस्लिम वोट बैंक की इस राजनीति को ही सिरे से नकार रहे हैं. 

 

 

मुस्लिम वोट बैंक पर असदउद्दीन ओवैसी ने सफाई देते हुए कहा,’ मुसलमानों का वोट बैंक तो है ही नहीं भाई मैंने तो नरेंद्र मोदी को मुबारकबाद दिया पार्लियामेंट में आपने अच्छा किया जो मुस्लिम वोट बैंक के इस मिथ को आपने तोड़ दिया. मैं तो मुबारक बाद दिया अब फिर दे रहा हूं. कहां है मुस्लिम वोट बैंक. हम तो 1956 से कहते आ रहे हैं. एक मेजारिटी वोट बैंक है. मुस्लिम वोट बैंक तो था ही नहीं कभी. मेजारिटी वोट बैंक को जो मजबूत करता रहा वो सरकार बनाता रहा और हमको ये कह कर बहलाया गया कि अरे आपका मुस्लिम वोट बैंक है आपका फला है और हम लोग खुश होते रहे. और नतीजा क्या हुआ हम वहां से नीचे नीचे आकर यहां गिर गए. तो कोई मुस्लिम वोट बैंक नहीं है ये गलत बात है.

 

नेता बीजेपी एकनाथ खड़से के मुताबिक ,’आज तक मुसलमान समाज समाजवादी पार्टी और कांग्रेस पार्टी ये अपना समाज है अपने खूटे से बांधा हुआ समाज है ऐसे समझ कर चलती थी जब इनका वोटर बाहर खिसकता नजर आ रहा था तो किसके ऊपर आरोप करना था बीजेपी पर. एक बात है कि बीजेपी ने एमआईएम का साथ कभी नहीं दिया और ना ही कभी लिया. कभी उनका समर्थन भी नहीं किया और बाद में भी नहीं करेंगे तो कैसे कह सकते हैं ये समाजवादी. धीरे धीरे अगर ये मुसलमान समाज एमआईएम  की तरफ चला जाएगा तो जैसी कांग्रेस की हालत आज हो रही है जैसा् मोदी जी ने कहा है कि कांग्रेस मुक्त भारत और हिंदुस्तान के सारे प्रदेशों में ये दिख रहा है तो इनको ये डर है कि आज महाराष्ट्र में 30-40 विधायक उनके दिख रहे हैं  अगले 5 साल में 5-10 भी दिखते या नहीं दिखते.)

 

हैदराबाद की राजनीति में बरसों से चमक रही मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन की पहचान एक मुस्लिम राजनीतिक दल के तौर पर होती है यही वजह है कि इस पार्टी   की नीयत औऱ इसके मकसद को लेकर कई तरह की आशंकाओं के स्वर भी सुनाई पड़ते रहे हैं MIM को लेकर रही इन शंकाओं का जिक्र भी हम करेंगे आगे लेकिन उससे पहले देखिए MIM के जन्म और उसमें आए बदलाव की ये कहानी. 

 

मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन यानी एमआईएम की स्थापना आज से करीब 94 साल पहले इसी हैदराबाद शहर में की गई थी. शुरुवात में ये एक गैर राजनीतिक संगठन हुआ करता था और इस संगठन का मकसद मुसलमानों को एक प्लेटफॉर्म पर लाना था. लेकिन बदलते दौर और हालात के साथ -साथ एमआईएम का चेहरा और उसका मकसद भी बदलता चला गया और आज वो पूरी तरह एक राजनीतिक पार्टी बन चुकी है.

 

ये दास्तान उस दौर की है जब देश को आजाद होने में 20 साल बाकी थे. दक्षिण भारत की रियासत हैदराबाद पर निजाम उस्मान अली खान की हुकूमत थी. निजामशाही के उस दौर में नवाब महमूद नवाज खान किलेदार ने 1927 में मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन नाम के सांस्कृतिक संगठन की नींव रखी थी. 1938 में इस संगठन का पहला अध्यक्ष बहादुर यार जंग को बनाया गया था. एमआईएम के फाउंडर सदस्यों में हैदराबाद के एक राजनेता सैयद कासिम रजवी भी शामिल थे जो रजाकार नाम के हथियारबंद लड़ाकू संगठन के मुखिया भी थे और इसीलिए मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन संगठन को खड़ा करने में रजाकारों की भी अहम भूमिका मानी जाती रही है. रजाकार और मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन संगठन निजाम हैदराबाद के पैरोकार और उनके कट्टर समर्थकों में शुमार किए जाते थे और यही वजह है कि जब 1947 में देश आजाद हुआ तो हैदराबाद रियासत के भारत में विलय का कासिम रजवी और उसके पैरामिल्ट्री संगठन यानी रजाकारों ने जमकर विरोध भी किया था.

 

नवंबर 1947 में भारत के पहले गृहमंत्री सरदार पटेल और कासिम रजवी की दिल्ली में ये पहली और आखिरी मुलाकात थी. कासिम रजवी निजाम हैदराबाद का खासम-खास था और 1947 आते आते निजाम और उसकी सरकार पूरी तरह से रजवी की गिरफ्त में आ चुकी थी. 10 सिंतबर 1948 को सरदार पटेल ने हैदराबाद के नवाब को एक खत लिखा जिसमें उन्होने हैदराबाद को हिंदुस्तान में शामिल होने का आखिरी मौका दिया था.

लेकिन हैदराबाद के निजाम ने जब सरदार पटेल की अपील ठुकरा दी तो इसके जवाब में भारतीय सेना ने 13 सितंबर 1948 को हैदराबाद रियासत पर चारों तरफ से धावा बोल दिया और आखिरकार निजाम हैदराबाद को झुकना पड़ा.

 

हैदराबाद रियासत के भारत में विलय के बाद मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन संगठन भी कुछ सालों तक निष्क्रिय पड़ा रहा लेकिन साल 1958 में एक बार फिर एमआईएम एक नई सोच के साथ राजनीतिक के मैदान में कूद पड़ा.

 

सन 1958 में मजलिस इत्तेहादुल मुसलेमीन को हैदराबाद के ही मशहूर वकील मौलवी अब्दुल वहीद ओवैसी ने दोबारा सक्रिय किया था. साल 1959 में एमआईएम ने चुनावी राजनीति में अपना पहला कदम रखा और हैदराबाद म्यूनसपालिटी के उपचुनाव में वो दो सीटें जीतने में कामयाब भी रही थी. ये वो पहली जीत थी जिसके बाद एमआईएम और ओवैसी खानदान की राजनीति का सिलसिला हैदराबाद में फिर कभी थमा नहीं.  

 

 

 अपनी पार्टी के इतिहास को लेकर औवैसी का कहना है कि,’लोग एमआईएम की हिस्ट्री की बात करते है मगर मैं उनको बताना चाह रहा हूं कि हमारी हिस्ट्री इंडिपेडेंट इंडिया से शुरु होती है. जो पास्ट में हुआ मैं उसका जिम्मेदार नहीं हूं. हम तो हिंदोस्तान की आजादी पर फख्र करते हैं. और हमने अपनी पार्टी के संविधान को बदला और कहा कि हम इंडिया के संविधान को मानेंगे. और हम पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में हिस्सा लेंगे. पुरानी एमआईएम से हमारा कोई लेन देन नहीं है.  ये जो नई वाली एमआईएम है हम ना सिर्फ डेमोक्रेसी में बिलीव करते है बल्कि पार्टीसिपेट करते हैं. माझी में जो हुआ उससे हमें कोई मतलब नहीं है.’

 

महाराष्ट्र चुनाव में एमआईएम की जीत के बाद असदुद्दीन और उनकी पार्टी चर्चा में हैं लेकिन औवेसी और उनकी पार्टी अपने विवादों और भड़काउं भाषणों के चलते अक्सर सुर्खियां बटोरती रही है. साल 2012 में ओवेसी के छोटे भाई और पार्टी विधायक अकबरुद्दीन ओवौसी को आंध्र प्रदेश के आदिलाबाद जिले में भड़काऊं भाषण देने के लिए जेल भी जाना पड़ा है. अकबररुद्दीन का वो विवादित भाषण आज भी उनका और उनकी पार्टी मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन का पीछा नहीं छोड़ रहा है.

 

शिवसेना नेता दिवाकर राउत  का कहना है  ये जो स्पीच मैंने बताई अगर उसमें  ये औवैसी बंधु ऐसा  कहते होंगे कि हां हम तो पाकिस्तान जाएंगे नहीं लेकिन इस देश को पाकिस्तान में बदली करके हमारे लिए क्या रखेगें टूटा फूटा राम मंदिर रखेंगे, हम सब लेकर जाएगें, लालकिला, ताजमहल ये सब लेकर जाएंगे और टूटा फूटा राममंदिर छोड़ेंगें. ये जो उनका एक्शन देश के लिए हानिकारक है. 

 

 

 

मुकदमें कपर अकबरुद्दीन ओवैसी ने सफाई देते हुए कहा, ‘वरुण गांधी पर भी तो मुकदमा चला था और हम उम्मीद करते है कि जिस तरह कोर्ट ने वरुण गांधी के साथ इंसाफ किया था कोर्ट हमारे साथ भी इंसाफ करेगी. मगर एक बात बता दीजिए महाराष्ट्र में प्रवीण तोगड़िया के उपर और दूसरी पार्टी के बड़े नेता है उनके ऊपर कितने एफआईआऱ है उनके वारंट क्यों तामील नहीं होते ये दोहरा रवैया क्यों? अगर कानून है तो कानून सबके ऊपर इस्तेमाल कीजिए मगर वो सब पर इस्तेमाल नहीं होता.

 

असदुद्दीन ओवैसी का दावा है कि मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लेमीन सिर्फ मुसलमानों की पार्टी नहीं है बल्कि इसमें पिछडे और दलित वर्ग के लोग भी शामिल है. समाज के कमजोर और वंचित तबके को सत्ता में हिस्सेदार बनाने को वो अपनी पार्टी का सबसे अहम मकसद भी बताते है. लेकिन गुजरे जमाने में लोगों की भावनाओं को भड़काने के आरोप और मुसलमानों की खुल कर वकालत के चलते उनकी पार्टी की छवि एक मुस्लिम राजनीतिक दल के तौर पर बनी है और यही वजह है कि उनकी पार्टी की विचारधारा और उसकी नीयत को लेकर भी तमाम सवाल खड़े होते रहे हैं.   

 

 

ओवैसी ने आगे कहा, ‘हम तो कम्यूनल हैं ठीक है जो सेक्युलर पार्टी है उनको समझना चाहिए कि हम जब बीजेपी को अपोज करेंगे तो इसका ये मतलब नहीं है कि हम इनका साथ देंगे. इन सो कॉल्ड सेक्युलर पार्टियों का हम अपोज करेंगे ये मेरा डेमोक्रेटिक राइठ है मैं अपोज करुंगा. लेकिन ये कांग्रेस पार्टी या सेक्युलर पार्टियों के पास क्या कोई इटंलेक्चुअल नोटरी आफिस है

 

 क्या सेक्युरालिज्म का सर्टिफिकेट देने के लिए कि इन्ही के पास गए तो हम सेक्युलर हो गए कल तक नारायण राणे, राणे ने तो कहा था कि श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट पर अमल होगा तो मुंबई जलेगा. उनके दूसरे एमपी जो अभी इलेक्शन हार गए अभी लोकसभा तक वो शिवसेना में थे जैसे कांग्रेस से एनसीपी में आ गए सेक्युलर हो गए. मुझे इनके सेक्युलर सर्टिफिकेट की जरुरत नहीं है. हम अपना काम करेंगे अवाम हमको पसंद करेगी तो वोट डालेंगे मगर ये पेट्रोनाइजिंग एटीट्यूड. ये फ्यूडिलिस्टिक एटीट्यूड है वो गया जमाना.  ये नया हिंदुस्तान है.

 

 असदउद्दीन ओवैसी ने साल 2004 में पहली बार हैदराबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और वो यहां से लगातार तीन बार चुनाव जीत कर लोकसभा पहुंचते रहे हैं. इससे पहले उनके पिता सलाउद्दीन ओवैसी भी हैदराबाद से छह बार सांसद रह चुके हैं जाहिर है हैदराबाद और उसके आस- पास के इलाके में ओवैसी और उनकी पार्टी का दबदबा लंबे वक्त से कोई तोड़ नहीं सका है. 

 

 साल 1984 के बाद से हैदराबाद लोकसभा सीट पर एमआईएम का कब्जा है. हैदराबाद औऱ आस-पास के इलाके में आज भी ओवैसी बंधुओं की सियासी ताकत का कोई तोड़ नहीं ढूढा जा सका है तो इसके पीछे एक वजह यहां किए गए विकास के काम भी है.

 

मेडिकल और इंजीनियरिंग कॉलेज से लेकर सड़क, अस्पताल और मोहल्ले की नाली तक हर काम में ओवैसी बंधु अपना सीधा दखल रखते हैं. एमआईएम के इस दफ्तर के दरवाजे क्षेत्र के लोगों के लिए हमेशा खुले रहते है और इसीलिए पार्टी का काम जमीन पर नजर भी आता है लेकिन विकास की इस राजनीति के साथ साथ एमआईएम का एक दूसरा विवादित चेहरा भी लोगों के सामने आता रहा है जिसने हमेशा उसकी नीयत और उसके मकसद पर सवाल खड़े किए हैं और सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि मुसलमानों के हक की वकालत करने वाली एमआईएम का क्या देश के मुसलमान भी साथ देंगे.

 

 असदउद्दीन ओवैसी ने आगे बताया, ‘आप एमआई एम की राजनीति को पसंद नहीं करते हो ये आपका डेमोक्रेटिक राइट है. मगर क्या हम इस कामयाबी को पूरे साउथ एशिया में नहीं बता सकते. कि देखो पाकिस्तान में किस तरह से हिंदुओं से बर्ताव किया जा रहा है.

 

यहां पर हमारी पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी में एक माइनारिटी पार्टी है जो माइनारिटी के काज को आगे रखती है और रुलिंग पार्टी बीजेपी की बिटर अपोनेंट होने के बाद भी वो कामयाब होती है. ये हमारी डेमोक्रेसी की कामयाबी है. बजाए इसको बताने पूरे साउथ एशिया के पूरे के पूरे ऐसा बता रहे हैं कि आसमान गिर गया. अरे भईया मैं पार्लियामेंट्री डेमोक्रेसी को मजबूत कर रहा हूं इसको समझने की जरुरत है. तो जितने क्रिटिसाइज करने वाले हैं बडे बडे पत्रकार है. अखबारों में आर्टिकल लिखते मगर क्या कभी इनमें इतना दम है. कि नरेंद्र मोदी के बारे में लिख दे.

 

आरएसएस के बारे में आर्टिकल लिखे अपने अखबार में. कोई अखबार तो पहले छापेगा नहीं और इनमें दम भी नहीं हैलिखने के लिए. मगर क्योक् हम एक ईजी टारेगट है हम खामोश नहीं बैठेंगे. हम इनका जवाब देंगे हम जम्हूरी अंदाज में बताएंगे लोगों को’

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