व्यक्ति विशेष: 'मिनी मॉस्को' के कन्हैया की असली कहानी?

व्यक्ति विशेष: 'मिनी मॉस्को' के कन्हैया की असली कहानी?

इन दिनों पूरे देश में कन्हैया चर्चा में है. जोश, जुनून और कुछ कर गुजरने के जज्बे से लबरेज होकर अपने भाषण से लोगों को लुभाने वाले जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार हैं. कन्हैया कुमार दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैद है. उन पर देशद्रोह का संगीन इल्जाम लगाया गया है. गृहमंत्री राजनाथ सिंह जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार को देश के लिए खतरा मान रहे हैं. तो दिल्ली के पुलिस कमिश्नर दावा कर रहे हैं कि उनके पास कन्हैया कुमार के खिलाफ पुख्ता सबूत है.

एक तरफ सरकार का पक्ष है तो वहीं कन्हैया पर विपक्ष उनके रक्षक की भूमिका में तलवार ताने नजर आ रहा है. पक्ष विपक्ष के इन दो किनारों के बीच तीसरा पक्ष वकीलों का भी है जिन्होंने कन्हैया की अदालत में पेशी के दौरान उन पर हमला बोल दिया. मानव अधिकार आयोग ने कहा है कि कन्हैया पर कोर्ट में हमला सुनियोजित था और पुलिस ने मानसिक दबाव डालकर कन्हैया से चिट्ठी लिखवाई थी इसीलिए कन्हैया का केस अब देश और दुनिया के लिए एक ऐसी अबूझ पहेली बन चुका है जिसके जवाब का हर किसी को बेसब्री से इतंजार है.

देशद्रोह के इल्जाम में गिरफ्तार जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर हमला हुआ. काले कोट पहने हुए लोगों ने पुलिस से घिरे कन्हैया को पीट दिया. दरअसल कन्हैया को जब बुधवार को पुलिस पेशी के लिए ले जा रही थी तो उस वक्त कोर्ट के अंदर से पत्थर भी फेंके गए. (पत्थऱ) इतना ही नहीं कोर्ट परिसर में भारत माता की जय के नारे लगाते और तिरंगा लिए वकील दूसरों वकीलों से भी भिड़ गए. खास बात ये है कि ये सब सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के बावजूद हुआ. क्योंकि बुधवार सुबह ही सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को पटियाला हाउस कोर्ट में सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त करने का निर्देश दिया था. जाहिर है जेएनयू विवाद को लेकर देश की राजनीति तवे की तरह गर्म है औऱ इस विवाद के केंद्र बिंदु बन चुके जेएनयू प्रेसीडेंट कन्हैया कुमार को लेकर भी राजनीतिक दलों के बीच घमासान तेज हो गया.

दअसअल इस पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब नौ फरवरी की रात का जेएनयू कैंपस का एक वीडियो सामने आया. इस वीडियो में देश विरोधी नारेबाजी सुनाई दे रही थी. देशद्रोह के आरोप में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी के बाद जेएनयू कैंपस का एक दूसरा वीडियो सामने आया. कन्हैया के समर्थकों ने दावा किया है कि इस वीडियो में ABVP के लोग देश विरोधी नारे लगा रहे हैं. आम आदमी पार्टी के नेता आशुतोष ने भी ऐसा ही एक वीडियो दिल्ली पुलिस को दिया है. जवाब में ABVP की तरफ से एक और वीडियो जारी किया गया है. अब तक चार वीडियो सामने आ चुके हैं. दिल्ली पुलिस के पास जेएनयू के कार्यक्रम का जो वीडियो है उसके आधार पर पुलिस दावा कर रही है कि जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया ने भी देश विरोधी नारे लगाए थे.

ABVP की तरफ से जारी किए गए जेएनयू के चौथे वीडियो में कन्हैया भी नजर आ रहे हैं इस वीडियो में भी देश विरोधी नारे लग रहे हैं हालांकि वीडियो में कन्हैया नारे नहीं लगा रहे हैं. गिरफ्तारी से पहले ABP न्यूज से बात करते हुए कन्हैया ने देश विरोधी नारे लगाने से इंकार किया था.

9 फरवरी को जेएनयू में क्या हुआ?
कन्हैया की गिरफ्तारी ने इस विवाद को नया मोड दे दिया है लेकिन इस विवाद की जड़ में वो कार्यक्रम हे जो नौ फरवरी को लेफ्ट स्टूडेंट ग्रुपों ने संसद हमले के दोषी अफजल गुरु और जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के को-फाउंडर मकबूल भट की याद में आयोजित किया था. जेएनयू यूनिवर्सिटी प्रशासन ने पहले तो इस कार्यक्रम के लिए इजाजत दे दी थी लेकिन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद यानी एबीवीपी के विरोध के चलते कार्यक्रम से ठीक पहले ये परमिशन रद्द कर दी गई था. लेकिन इसके बाद तनाव तब बढ़ाना शुरु हुआ जब इजाजत ना मिलने के बावजूद जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के साबरमती हॉस्टल के सामने नौ फरवरी को ये आयोजन हुआ. एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध किया. और आरोप है कि इस कार्यक्रम के दौरान देश विरोधी नारे लगे.

दरअसल जेएनयू के इस पूरे विवाद की जड़ में वो अफजल गुरु है जिसे 9 फरवरी 2013 को फांसी दी गई थी. अफजल गुरु जब जिंदा था तब भी उसके नाम पर राजनीतिक जंग छिड़ी थी और उसकी मौत के करीब दो साल बाद एक बार फिर उसके नाम पर राजनीतिक घमासान मचा है और इस घमासान के शिकंजे में फंस गया है कन्हैया कुमार. हांलाकि पुलिस देश विरोधी नारेबाजी के आरोप में खालिद और उसके चार साथियों की तलाश भी कर रही है.

खालिद के पिता की तरह कन्हैया के मां बाप भी अपने बेटे को लेकर परेशान है. दिल्ली से करीब हजार किलोमीटर दूर कैसे कन्हैया के बीहट गांव में उसकी गिरफ्तारी से तूफान मचा है?

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कन्हैया कुमार जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष हैं. मूल रुप से कन्हैया वामपंथी विचारधारा वाले छात्र संगठन एआईएसएफ यानी आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े रहे है और पिछले सात सालों से जेएनयू की छात्र राजनीति में सक्रिय है. कन्हैया कुमार को करीब से जानने वाले जेएनयू के दूसरे स्टूडेंट उन्हें एक जुझारु छात्र नेता बताते हैं.

कन्हैया कुमार JNU से पहले वो पटना विश्विद्यालय के छात्र रह चुके है और फिलहाल वो जेएनयू के इंटरनेशनल स्टडीज विभाग से अफ्रीकन स्टडीज में पीएचडी कर रहे हैं. कन्हैया का नाम पिछले साल तब सुर्ख़ियों में आया जब छात्र संघ चुनाव में उन्होंने आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन की तरफ से अध्यक्ष का चुनाव जीता था. उन्हें करीब 1000 वोट मिले और उन्होंने एक अन्य वामपंथी संगठन आईसा आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन के उम्मीदवार को बेहद नजदीकी मुकाबले में मात दी थी अहम बात ये रही कि 2015 में AISF ने केवल अध्यक्ष का चुनाव ही लड़ा और बल्कि इस संगठन का कोई सदस्य पहली बार JNU छात्र संघ का अध्यक्ष चुना गया.

जेएनयू अध्यक्ष कन्हैया कुमार अपनी भाषणों को लेकर भी चर्चा में रहे है. बताया जाता है कि अपनी भाषण कला की वजह से ही वो जेएनयू छात्र संघ का अध्यक्ष पद जीतने में कामयाब रहे थे.

कन्हैया जिस आल इंडिया स्टूडेंट फेडरेशन से जुड़े हैं वो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआई का छात्र संगठन हैं. लेकिन बताया जाता है कि कन्हैया ने अपनी ही पार्टी CPI के वरिष्ठ नेता अतुल अंजान के खिलाफ पिछले साल उस वक्त मोर्चा खोल दिया था जब उन्होंने विज्ञापनों की कथित अश्लीलता के मामले में सनी लियोनी पर टिप्पणी की थी. पिछले दिनों दिल्ली में यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन यानी यूजीसी के खिलाफ आंदोलन में भी उन्होंने हिस्सा लिया था और बिहार विधानसभा चुनाव में वामपंथी उम्मीदवारों के लिए भी उन्होंने प्रचार किया था. हैदराबाद विश्विद्यालय में रोहित वेमुला के लिए शुरू हुए आंदोलन में भी उन्होंने खुलकर हिस्सा लिया था.

9 फरवरी की रात का जेएनयू कैंपस का ये वही वीडियो है जिसके सामने आने के बाद से ही बवाल मचा हुआ है दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसके पास पुख्ता सबूत है कि कन्हैया कुमार ने देश विरोधी नारे लगाए. कन्हैया को देशद्रोह के इल्जाम में गिरफ्तार किया गया और बुधवार को उसे कोर्ट में पेश भी किया गया. अदालत ने कन्हैया को 2 मार्च तक जेल भेजने का आदेश सुनाया है और फिलहाल कन्हैया जेल में बंद है.

कन्हैया कुमार के ऐसे तेवरों और उनके तल्ख भाषणों ने ही उनके लिए जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के अध्यक्ष पद तक पहुंचने की राह आसान की है. हांलाकि कन्हैया कुमार ने इस मुकाम तक पहुंचने में कितना संघर्ष किया होगा इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वो एक बेहद ही गरीब परिवार से संबंध रखते हैं और बिहार के एक छोटे से गांव से उठकर राजधानी दिल्ली के इस जेएनयू कैंपस तक पहुंचे हैं.

भूख, गरीबी, गांव और पिछड़ापन ये शब्द कन्हैया के लिए महज शब्द भर नहीं है क्योंकि इन सभी अभावों के बीच से गुजरकर ही उन्होंने अपना सफर तय किया है. राजधानी दिल्ली के इस जेएनयू कैंपस से करीब 1 हजार किलोमीटर दूर बिहार के बेगुसराए जिले के रहने वाले है कन्हैया कुमार. बेगुसराए के मसलनपुर बीहट गांव में कन्हैया कुमार ने अपनी जिंदगी की शुरुआत की थी. गांव के स्कूल में उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई लिखाई की है. कन्हैया के बचपन की तस्वीरों से ही साफ है कि वो शुरु से ही एक मेहनती और प्रतिभाशाली छात्र रहे हैं.

बीहट गांव में कन्हैया का छोटा सा मकान है. इस घर में कन्हैया के पिता अपने दो भाइयों के साथ सयुंक्त परिवार में रहते हैं. घर को देख कर कन्हैया के परिवार के आर्थिक हालात का अंदाजा भी आप खुद भी आसानी से लगा सकते हैं. कन्हैया की मां मीणा देवी आंगनबाड़ी सेविका हैं जिन्हे हर महीने 3 हजार रुपये तन्ख्वाह मिलती हैं. कन्हैया का बड़ा भाई मणिकांत असम के बोगाई गांव में एक कारखाने में 6 हजार रुपये महीने की कमाई करता है. कन्हैया के पिता जयशंकर सिंह भी गिट्टी-बालू ढोने की मजदूरी करते थे और कभी कभी जीप की ड्राइवरी भी. लेकिन जयशंकर सिंह को साल 2009 में लकवा मार गया था और तब से वो अपने पैरो पर चल नहीं सकते हैं. भूमिहीन मजदूर जयशंकर सिंह ने गरीबी की वजह से हायर सेकेंडरी से आगे की पढ़ाई नहीं की इसीलिए मां बाप का सपना है कि बेटे पढ़ लिख जाए तो उनके भी दिन फिरे.

आज बीहट गांव के ईट मिट्टी के खपरैल वाले मकान को दुनिया गौर से देख रही है. इस मकान को कन्हैया के दादा मंगल सिंह ने 6 दशक पहले बनाया था. मंगल सिंह बीहट के पास इसी बरौनी खाद कारखाना में फोरमेन थे जो अब बंद पड़ी है. लेकिन यहां सबसे खास बात ये है कि इस घर की तरह कन्हैया को वामपंथी विचारधारा भी अपने दादा कॉमरेड मंगल सिंह से विरासत में ही मिली है. दरअसल मंगल सिंह वामपंथी विचारधारा को मानते थे और इस इलाके में वामपंथ की नींव रखने वाले कॉमरेड चन्द्रशेखर के बचपन के दोस्त भी थे. यही वजह है कि मंगल सिंह के बाद उनके बेटे जयशंकर सिंह भी कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने और अभी भी वो पार्टी के कार्ड होल्डर हैं. कन्हैया की मां मीणा देवी भी पार्टी की एक समर्पित कार्यकर्ता है. जाहिर है कि कन्हैया को वामपंथी विचारधारा विरासत में मिली और वो एक खानदानी कम्युनिस्ट है जो बिहार के उस बेगुसराय जिले से ताल्लुक रखते हैं जिसे वामपंथी विचारधारा के वर्चस्व और वामपंथियों का गढ़ होने की वजह से लेनिनग्राद कहा जाता है यही नहीं कन्हैया के गांव बीहट को मिनी मॉस्को भी कहा जाता है क्योंकि कन्हैया का घर उन कॉमरेड चन्द्रशेखर के घर के करीब ही है जिन्होंने बिहार के बेगुसराए जिले को वामपंथियों का गढ़ बना दिया था.

भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह जेएनयू के छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया को देश के लिए खतरा मान रहे हैं. कथित देशद्रोही कन्हैया का इतिहास और भूगोल जानने के लिए एबीपी न्यूज भी बिहार के बेगुसराए जिले में पहुंचा जिसे कुछ दिनों पहले तक लेनिनग्राद और उसका एक गांव बीहट मिनी मॉस्को कहलाता था. और ऐसा इसलिए क्योंकि ये गांव वामपंथी विचारधारा का गढ़ हुआ करता था. इस इलाके से यूं तो बहुत सारे वामपंथी नेता और कार्यकर्ता निकले हैं लेकिन उनमें सबसे खास और पहला नाम कामरेड चंद्रेशखर सिंह का है जिन्होंने बेगुसराए के पूरे इलाके में ना सिर्फ वामपंथी विचारधारा का प्रचार- प्रसार किया था बल्कि यहां भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का एक बेहद मजबूत संगठन भी खड़ा कर दिया था.

बिहार के पहले मुख्यमंत्री डॉ श्रीकृष्ण सिंह की कैबिनेट के सबसे विश्वस्त कैबिनेट मंत्री रामचरित्र सिंह के बेटे चंद्रशेखर सिंह ने अपने पिता से बगावत कर कम्युनिस्ट पार्टी का झंडा उठाया था. यही वजह है कि चंद्रशेखर को बिहार का लाल सितारा भी कहा गया. दरअसल चंद्रशेखर सिंह जब कॉलेज में पढ़ रहे थे तभी रुस्तम साटन नाम के वामपंथी और मार्क्सवादी कार्यकर्ता के संपर्क में आए और फिर इसके बाद वो वामपंथी विचारधारा के ही होकर रह गए. 1940 में अंग्रेज सरकार के खिलाफ भाषण देने के वजह से उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था. चंद्रशेखर ने बेगुसराए इलाके में किसानों और छात्रों के मुद्दों और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ जोरदार संघर्ष किया था. वो बाद में 1967 में वो पहली गैर कांग्रेसी सरकार में मंत्री भी बने. खास बात ये है कि कन्हैया के दादा मंगल सिंह भी चंद्रशेखर के साथ कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हुए थे.

स्थानीय कम्युनिस्ट नेता जय प्रकाश सिंह ने कहा कि कामरेड चंद्रशेखर न सिर्फ एक मंत्री थे बल्कि सर्वप्रथम बिहार राज्य के वो एआईएसएफ के प्रथम सचिव भी वो हुए थे. और उनका छात्रों के बीच भी काफी दबदबा था केवी सहाय के खिलाफ आंदोलन के समय उन्होंने छात्रों का नेतृत्व भी किया न सिर्फ उन्होंने छात्रों का नेतृत्व किया बल्कि पूरे बेगुसराय के चप्पे चप्पे पर काम्युनिस्ट पार्टी की सैकड़ों शाखाएं की स्थापना की और जिला नेतृत्व को उन्होंने मजबूत बनाया और पूरे क्षेत्र में संघर्ष करके उसको इस रुप में लाया कि तमाम लोग जो काम्युनिस्ट विचारधारा की और लोग इसको मिनी मॉस्को के नाम से जानने लगे और लोग कहने लगे कि वहां काम्युनिस्ट समर्थक ज्यादा हैं.

कम्यूनिस्ट नेता राम रतन सिंह पूरे इलाके के लोग कांग्रेस के खिलाफ खड़े हुए और कॉमरेड चंद्रशेखर और काम्युनिस्ट पार्टी यहां कि शक्ति छोटी थी लेकिन उसके वाबजूद भी उस गुस्से को कैश करने में एक हद तक सफल रहे हैं औऱ हम समझते हैं कि उस समय से ही काम्युनिस्ट पार्टी का फैलाव इस जिले में बड़े पैमाने पर हुआ. ये एक मूल कारण हैं जिसको कॉमरेड चंद्रशेखर आगे चलकर 1968 में इस विधानसभा का नेता हुए और विधायक चुने गए.

बेगुसराए को बिहार की औद्योगिक राजधानी भी कहा जाता है. बेगूसराय में इंडियन ऑयल की बरौनी रिफाइनरी और बिहार सरकार का बरौनी थर्मल पावर स्टेशन है. हांलाकि बरौनी का खाद कारखाना कई सालों से बंद है जिसे चालू करना पिछले कई चुनाव से यहां मुद्दा रहा है. बेगूसराय जिले में सात विधानसभा सीटें है. बेगूसराय, मटिहानी, तेघड़ा, बछवाड़ा, बलिया, चेरिया बरियारपुर और बखरी हैं. बेगूसराय में भूमिहार 35 फीसदी, मुस्लिम 20 फीसदी, ओबीसी और एससी 30 फीसदी और पंडित-राजपूत 16 फीसदी हैं. यह जिला एक जमाने में वामपंथियों के गढ़ के तौर पर मशहूर रहा है यहां की सभी विधानसभा और लोकसभा सीट से कम्युनिस्ट पार्टियां चुनाव जीतती रही है लेकिन बदले चुनावी समीकरणों के बीच वामपंथियों का ये गढ़ अब ढह सा गया है.

कम्युनिस्ट नेता रामनंदन सिंह बताते हैं कि अभी मौजूदा परिस्थिति में 1964 में पार्टी का डिविजन होने के बाद संगठन कमजोर हुआ बाद के दिनों में 1968 में नक्सलाइट अलग हो गया उसके बाद बहुत सारे टुकड़े हुए नतीजा ये हुआ कि संगठन कमजोर दिशा की ओर बढ़ा. लोग काम्युनिस्ट पार्टी का ही आधार इस जिला में या पूरे पैमाने में बिहार में था औऱ इसी से निकलकर सीपीएम हो माले हो या और भी तरह की जो पार्टियां हैं वो हुआ जिस वजह से युवकों में विद्यार्थी फ्रंट हो या किसान फ्रंट हो प्रत्येक पार्टी का अपना जनसंगठन होता है तमाम पार्टियों ने अपने अपने संगठनों को बनाना शुरु किया फलस्वरुप पार्टी उस दिशा में बंट गई कमजोर हुई जिस वजह से ये हाल हुआ.

बेगुसराए की बीहट नगर परिषद् की आबादी 70 हजार से ज्यादा है. जब बेगूसराय जिला के सभी विधानसभा क्षेत्रों पर कम्युनिस्ट पार्टी का लाल पताका लहराता था तो बेगूसराय को राष्ट्रीय मीडिया ने ‘लेनिनग्राद’ और बीहट को ‘मिनी मास्को’ की संज्ञा दी थी. जाहिर है बिहार के इस पिछड़े और छोटे से गांव में पले बढ़े कन्हैया कुमार के लिए जिंदगी की राह आसान नहीं थी लेकिन अभावों से जूझने के बावजूद कन्हैया ने अपना हौसला कभी नहीं खोया. और अपने हौसले के दम पर ही वो जेएनयू के छात्र संघ का अध्यक्ष बनने में भी कामयाब रहे. लेकिन JNU में अफजल गुरु के समर्थन में आयोजित कार्यक्रम के दौरान लगे राष्ट्र विरोधी नारों के मामले में वो जेल में बंद हैं.

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