व्यक्ति विशेष: ‘वन मैन आर्मी’ या विवादों के ‘स्वामी’

vyakti vishesh one man army or chief of controversy

सुब्रमण्यम स्वामी  भारतीय राजनीति का एक बेहद दिलचस्प किरदार हैं. कोई इन्हें विवादों का स्वामी कहता है तो किसी की नजर में ये एक ऐसा वन मैन आर्मी है, जो अपने विरोधियों को अपने दम पर अकेले परास्त करने की ताकत रखता है. वो अमेरिका से अर्थशास्त्र में पीएचडी हैं लेकिन वकालत की पढ़ाई किए बिना ही वो देश के बड़े-बड़े केस की वकालत कर चुके हैं.

कूटनीति और राजनीति तो उनके रगों में इतनी तेजी से दौड़ती है कि वे कब क्या करेंगे, ये बात उनका करीबी से करीबी व्यक्ति भी नहीं बता सकता. स्वामी के शिकार भारतीय राजनीति की दिग्गज से दिग्गज शख्सियतें होती रही हैं. वो हमेशा से आरएसएस से जुड़े रहे हैं लेकिन एक लंबे समय तक वो समाजवादी नेता चंद्रशेखर को अपना लीडर मानते रहे. वो शुरू से हिन्दुत्व की वकालत करते रहे हैं.

एक बार जब वह अटल बिहारी वाजपेयी के पीछे पड़े तो सोनिया गांधी और जयललिता का साथ लेकर वाजपेयी की सरकार को ही गिरा दिया. पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को वो अपना अच्छा दोस्त बताते रहे हैं, लेकिन उनकी पत्नी और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी उनके सबसे बड़े राजनीतिक दुश्मन हैं. मनमोहन सिंह को अपना करीबी दोस्त कहते हैं लेकिन उनकी सरकार को 2जी जैसे घोटालों के मुद्दे पर कभी चैन से रहने नहीं दिया.

सुब्रमण्यम स्वामी इन दिनों सोनिया गांधी के खिलाफ और भी आक्रामक हो गए हैं और इसकी वजह आगूस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर घूस कांड बना है. स्वामी को राज्यसभा में आये अभी कुछ ही दिन हुए हैं, लेकिन उन्होंने सदन के अंदर अपनी मौजूदगी से कांग्रेस को बेचैन, हैरान और परेशान कर दिया है. राज्यसभा में स्वामी की एंट्री ने कांग्रेस की नींद उड़ा दी है.

लोकसभा में बीजेपी के पास पूर्ण बहुमत है लेकिन राज्यसभा में कांग्रेस की अगुवाई वाला विपक्ष बीजेपी पर भारी पड़ता रहा है लेकिन अब सुब्रमण्यम स्वामी ने बाजी पलट दी है. हेलिकॉप्टर घोटाले में स्वामी के बिछाए चक्रव्यूह ने बीजेपी को राज्यसभा में नई सांसें दे दीं हैं. सुब्रमण्यम स्वामी का निशाना सिर्फ एक ही शख्स पर है और वो हैं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी.

2 जी घोटाला, कोयला घोटाला, नेशनल हेरल्ड घोटाला. सुब्रमण्यम स्वामी यूं तो मनमोहन सिंह सरकार के समय से कांग्रेस की जड़ें खोद रहे हैं, लेकिन कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद भी वो चैन से नहीं बैठे हैं. स्वामी ने आगूस्ता हेलिकॉप्टर घूसकांड को लेकर सीधे सोनिया गांधी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. दिल्ली की राजनीति में कहावत है कि अगर स्वामी किसी के पीछे पड़ जाएं तो उसे आखिर तक नहीं छोड़ते फिलहाल वो कांग्रेस और गांधी परिवार के पीछे हैं.

स्वामी राजीव गांधी को अपना सच्चा दोस्त कहते हैं तो सोनिया को अपना सबसे बड़ा राजनीतिक दुश्मन बताते हैं. आगूस्ता हेलिकॉप्टर घूसकांड में जिस सोनिया गांधी को जेल भिजवाने के पीछे पड़े हैं, कभी इसी सोनिया गांधी के साथ मिलकर उन्होंने वाजपेयी सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था. स्वामी ने संसद में कांग्रेस का सारा सियासी समीकरण बिगाड़ कर रख दिया है.

पिछले दिनों इटली की हाईकोर्ट ने एक फैसला सुनाया जिसके बाद भारत की राजनीति में तूफान आ गया. मामला आगुस्ता हेलिकॉप्टर सौदे का था. मनमोहन सरकार ने आगूस्ता से 3600 करोड़ रुपये में 12 वीवीआईपी हेलिकॉप्टर खरीदने का सौदा किया था. इटली की हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल को एक फैसला सुनाया. जिसमें कहा गया था कि हेलिकॉप्टर खरीद में भारतीय अधिकारियों और राजनीतिज्ञों को घूस दी गई.

कोर्ट में जो दस्तावेज पेश किए गए उनमें उन लोगों के नाम पाए गए, जो डील के लिए हुई रिश्वतबाजी में शामिल थे. इन्हीं शामिल लोगों में से एक नाम ‘सिग्नोरा गांधी का भी है. कहा जा रहा है कि ‘सिग्नोरा गांधी कोई और नहीं कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं. इसके अलावा दस्तावेज में एपी नाम का जिक्र है. इस एपी को सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल के नाम से जोड़ के देखा जा रहा है. इस मुद्दे पर जब राज्यसभा में बहस हुई तो कांग्रेस और बीजेपी ने अपने अपने तर्क देकर एक दूसरे पर आरोप लगाए. लेकिन जब सुब्रमण्यम स्वामी बोले तो खूब हंगामा हुआ.

स्वामी ने कहा कि हेलिकॉप्टर सौदे में कई ऐसे कारनामे हुए हैं जो अपराध की श्रेणी में आते हैं. इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए. स्वामी जब बोल रहे थे तो कांग्रेस ने हंगामा कर दिया. स्वामी के भाषण के बाद कांग्रेस के आनंद शर्मा ने तो सुब्रमण्यम स्वामी को विकृत मानसिकता का व्यक्ति तक कह डाला. आनंद शर्मा ने बीजेपी से कहा कि ये व्यक्ति आपको महंगा पड़ेगा.

जिस आगूस्ता हेलिकॉप्टर घोटाले पर राज्यसभा में चर्चा हुई, वो सौदा साल 2010 में हुआ था. 36 सौ करोड़ में 12 हेलिकॉप्टर खरीदे जाने थे. आरोप है कि इस सौदे में ढाई सौ करोड़ से ज्यादा की घूस ली गई. घूस देने के आरोप में इटली की कंपनी के अधिकारियों को वहां की कोर्ट सजा दे चुकी है. लेकिन भारत में किसे घूस मिली इसका अब तक कुछ पता नहीं चल पाया है.

इटली की कोर्ट के फैसले के बाद कांग्रेस बचाव की मुद्रा में आई गई. सुब्रमण्यम स्वामी आज बीजेपी के सबसे बड़े संकट मोचक बन कर उभरे हैं. लेकिन ये सब अचानक हुआ. आखिर स्वामी बीजेपी के संकट मोचक कैसे बन गए.

नरेंद्र मोदी की पीएम उम्मीदवारी के जबरदस्त समर्थक रहे स्वामी पिछले दो साल से बीजेपी में अलग-थलग माने जा रहे थे. वित्त मंत्री ना बन पाने का दर्द रह रह कर उभर आता था. सुब्रमण्यम स्वामी बीजेपी से इतने नाराज थे कि उन्होंने ये तक कह डाला था कि अमित शाह को हिंदी में चिट्ठी लिखूंगा तो वो सवाल का जवाब देंगे.

इतना ही नहीं जिस नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए स्वामी ने चुनाव प्रचार के दौरान लोगों को अपने हाथों से चाय पिलाई, उन्हीं मोदी के खिलाफ पीएम बनने के बाद काले धन के मुद्दे पर सवाल करने लगे. मीडिया में ऐसी रिपोर्ट भी आई जिसमें उन्होंने खुद को मंत्री नहीं बनाए जाने की वजह वित्त मंत्री अरुण जेटली को जिम्मेदार ठहराया. लेकिन इसी बीच अचानक राज्यसभा के लिए स्वामी को बुलावा आ गया. उन्हें राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत सदस्यों के कोटे से राज्यसभा में एंट्री मिली है. 17 साल बाद सुब्रमण्यम स्वामी की संसद में वापसी हुई है. जाहिर है अब सारे गिले शिकवे दूर हो चुके हैं.

दो साल तक स्वामी बीजेपी को मुश्किल में डालने वाले बयान ज्यादा देते रहे. आर्थिक नीतियों से लेकर राम मंदिर के मुद्दे तक स्वामी बोले. पाकिस्तान से लेकर जेएनयू के मसले पर बोले. लेकिन अब अब दो साल बाद ही सही स्वामी को राज्यसभा में लाया गया और अब वो कांग्रेस के खिलाफ आग उगल रहे हैं.

स्वामी गांधी परिवार के पुराने विरोधी हैं. वे सोनिया गांधी के इतावली मूल को लेकर हमेशा हमला करते रहे हैं और उन्हें भ्रष्टाचार की जननी कहते हैं. हालांकि उन्होंने कभी भी सोनिया के पति स्व. राजीव गांधी पर हमला नहीं किया है. वे हमेशा खुद को राजीव का मित्र होने का दावा करते आए हैं. वे हमेशा से यह मानते आए हैं कि बोफोर्स की दलाली का पैसा राजीव गांधी को नहीं बल्कि इटली में रहने वाले सोनिया के परिवार को मिला. 1980 के दशक में बोफोर्स तोप की खरीददारी हुई थी. उस समय राजीव गांधी की सरकार थी. बोफोर्स तोप खरीदने में 64 करोड़ की दलाली का आरोप लगा. जिन लोगों पर आरोप लगा उनमें एक ओत्तवियो क्वात्रोकी भी था. क्वात्रोकी इटली का रहने वाला था जहां सोनिया गांधी का जन्म हुआ था. आरोप है कि क्वात्रोकी गांधी परिवार का करीबी था और इसी का उसने नाजायज फायदा उठाया था.

डॉ. स्वामी अक्सर उन्हीं लोगों के खिलाफ गोला-बारूद इकट्ठा करते पाए जाते हैं जिनके साथ उन्होंने कभी अलग-अलग सरकारों पर तोपें दागी थीं. 1999 की उस टी पार्टी को कोई भूल नहीं सकता जो सोनिया गांधी और तमिलनाडु की जगत अम्मा कही जाने वाली जयललिता के बीच हुई थी. सुब्रमण्यम स्वामी इसके सूत्रधार थे.

1999 का साल था. जिस हिन्दुत्व के फलसफे पर स्वामी चलने की बात करते हैं उसी दर्शन पर यकीन करने वाली भारतीय जनता पार्टी की केंद्र में सरकार थी. सरकार के मुखिया थे अटल बिहारी वाजपेयी. इस सरकार को सत्ता में आए महज 13 महीने ही हुए थे. वाजपेयी की अगुवाई में एनडीए में जो पार्टियां शामिल थीं उनमें एक अहम पार्टी जयललिता की एआईएडीएमके भी थी.

सुब्रमण्यम स्वामी वाजपेयी सरकार में वित्त मंत्री बनना चाहते थे पर कहते हैं वाजपेयी इसके लिए तैयार नहीं थे. फिर क्या था. सुब्रमण्यम स्वामी ने वाजपेयी सरकार को गिराने की ही ठान ली. स्वामी ने जयललिता को इसके लिए मना भी लिया और सोनिया गांधी के साथ मिलकर वाजपेयी सरकार को ध्वस्त कर दिया.

वाजपेयी के साथ स्वामी के विरोध के तार 1977 तक जाते हैं. आपातकाल खत्म हुआ था और मोरारजी देसाई के नेतृत्व में जनता पार्टी की सरकार बनी थी. कहा जाता है कि प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई स्वामी को वित्त (राज्य) मंत्री बनाना चाहते थे. लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी ने इस प्रस्ताव को वीटो कर दिया था.

1980 में भारतीय जनता पार्टी का गठन हुआ. कहा जाता है कि वाजपेयी इस बात पर अड़ गए कि स्वामी को इस नई पार्टी में शामिल नहीं किया जाए. स्वामी ने अपने अंदाज में वाजपेयी पर हमला किया. उन्होंने वाजपेयी के निजी जीवन पर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि वे इंदिरा गांधी के साथ मिले हुए हैं. आखिर वाजपेयी स्वामी के इतने खिलाफ क्यों थे?

सुब्रमण्यम स्वामी ने बाद में इसका खुलासा किया था कि वाजपेयी उदारवादी सोच के समर्थक थे जबकि स्वामी कट्टरवादी विचार धारा में विश्वास रखते थे. स्वामी का कहना था कि वाजपेयी पार्टी के सिद्धातों से अलग जा रहे थे.

1999 में सोनिया और जयललिता के साथ मिलकर स्वामी ने वाजपेयी सरकार को भले ही गिरा दिया, लेकिन सोनिया के साथ स्वामी की ये जुगलबंदी ज्यादा दिनों तक नहीं चली. स्वामी का कहना था कि वाजपेयी सरकार गिराने के समय सोनिया के साथ ये तय हुआ था कि स्वामी के नेतृत्व में एक गैर बीजेपी और गैर कांग्रेसी सरकार बनेगी लेकिन वाजपेयी सरकार गिरने के बाद सोनिया गांधी खुद अपनी सरकार बनाने की कोशिशों में लग गईं. स्वामी उसके बाद से सोनिया के खिलाफ हो गए.

2004 में दिल्ली में मनमोहन सिंह की सरकार बनी. स्वामी ने उसके खिलाफ आवाज बुलंद करना शुरू कर दिया. स्वामी खुद को डॉ मनमोहन सिंह का दोस्त बताते लेकिन सोनिया पर हमला करने का कोई बहाना नहीं छोड़ते. 2008 में स्वामी ने देश के सबसे बड़े घोटाले 2जी का पर्दाफाश करने में बड़ी भूमिका निभाई. 2 जी स्पेक्ट्रम आवंटन में बड़े पैमाने पर धांधली हुई थी. स्वामी ने एक लाख 76 हजार करोड़ के इस घोटाले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचाया. आखिरकार सर्वोच्च अदालत ने 11 कंपनियों के 122 लाइसेंस रद्द कर दिये. तत्कालीन संचार मंत्री ए. राजा को जेल तक जाना पड़ा. मनमोहन सिंह सरकार की काफी बदनामी हुई. इसका श्रेय सुब्रमण्यम स्वामी को मिला.

1970 के दशक में पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोध संस्थान के कर्ता-धर्ता रहे नानाजी देशमुख ने कभी यह नहीं सोचा होगा कि हार्वर्ड विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट करके लौटे जिस स्वामी को वे अटल बिहारी वाजपेयी के विकल्प के रूप में जनसंघ में ला रहे हैं उनका ये शोध आगे चलकर भारतीय राजनीति में अलग-अलग नामों से पुकारा जाएगा. कोई उन्हें राजनारायण के बाद सबसे बड़ा जोकर कहता है, तो कोई राजनीति का बॉक्सर टायसन. किसी की नजर में वो वन-मैन बैंड हैं पर एक बात हर कोई उनके बारे में कहता है कि डॉ. स्वामी सिर्फ अपने स्वामी हैं.

डॉ. स्वामी के पिता सीताराम सुब्रमण्यम एक जाने-माने गणितज्ञ थे. एक समय स्वामी के पिता देश के प्रतिष्ठित इंडियन स्टैस्टिकल इंस्टीट्यू्ट आएसआई के डायरेक्टर भी थे. पिता की तरह ही स्वामी भी गणितज्ञ बनना चाहते थे. उन्होंने दिल्ली के हिन्दू कॉलेज से गणित में स्नातक की डिग्री ली. इसके बाद से वे इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट कोलकाता पढने गए. स्वामी की जिंदगी में विरोध का पहला स्वर कोलकाता में जागा. उस वक्त भारतीय सांख्यिकी इंस्टीट्यूट कोलकाता के डायरेक्टर पीसी महालानोबिस थे. महालनोबिस ने ही भारत में योजना आयोग की परिकल्पना की थी. कहा जाता है कि महालनोबीस सुब्रमण्यम स्वामी के पिता के प्रतिद्वदी थे. इस कारण से उन्होंने स्वामी को खराब ग्रेड देना शुरू कर दिया. लेकिन स्वामी ने 1963 में एक शोध पत्र लिखकर बताया कि महालानोबिस के स्टैटिस्टिक्स के कैलकुलेशन का तरीका मौलिक नहीं है, बल्कि यह पुराने तरीके पर ही आधारित है. कैंपस में अचानक स्वामी सबकी नजरों में आ गए.

आगे की पढ़ाई के लिए स्वामी अमेरिका गए. महज 24 साल की उम्र में उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री हासिल कर ली. स्वामी जब 27 साल के थे तब उन्होंने हार्वड में गणित पढ़ाना शुरू कर दिया था. 1968 में जाने माने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने स्वामी को दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनामिक्स में पढ़ाने का आमंत्रण दिया. लेकिन रीडर की पोस्ट मिलने की वजह से उन्होंने पढाने से मना कर दिया और आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए.

भारत में वो दौर था जब देश में लाइसेंस और परमिट राज था. कितने कार और स्कूटर बनेंगे. कितने कल कारखाना लगेंगे ये सारे फैसले सरकार लेती थी. सुब्रमण्यम स्वामी मुक्त अर्थव्यवस्था के हिमायती थे. उनका मानना था कि अर्थव्यवस्था में निजी कंपनियों की भागीदारी होनी चाहिए. सामान बनाना और बेचना सरकार का काम नहीं है. स्वामी ने सुझाव दिया कि भारत को पंचवर्षीय योजनाओं से दूर रहना चाहिए और विदेशी सहायता पर निर्भर नहीं रहना चाहिए.

उन्होंने तब दावा किया था कि 10% विकास दर हासिल किया जा सकता है. तबकी प्रधानमंत्री ने स्वामी पर निशाना साधा. भारत के सबसे शक्तिशाली प्रधानमंत्रियों में से एक, इंदिरा गांधी ने 1970 बजट के बहस के दौरान स्वामी को अवास्तविक विचारों वाला सांता क्लॉस करार दिया. उनका मतलब था कि जिस तरह सांता क्लास हर बच्चे को ख्वाबों में आकर खुश करते हैं उसी तरह स्वामी झूठा सपना दिखा रहे हैं.

शायद ये पहली बार था कि इंदिरा जैसी शख्सियत ने स्वामी का मजाक उड़ाया हो. कहते हैं इंदिरा गांधी की नाराजगी के चलते स्वामी को आईआईटी दिल्ली की नौकरी से हाथ धोना पड़ा. जिद्दी स्वभाव के स्वामी इस फैसले के खिलाफ अदालत गए. 1991 में अदालत का फैसला स्वामी के पक्ष में आया. वे एक दिन के लिए आईआईटी गए और इसके बाद अपना इस्तीफा दे दिया.

1974 का साल था. भारतीय जनता पार्टी तब जनसंघ कहलाती थी. उस जमाने में जनसंघ के बड़े नेता नानाजी देशमुख हुआ करते थे. 1974 में स्वामी को जनसंघ की तरफ से राज्यसभा में भेजा गया. डॉ स्वामी के नौकरशाहों के बीच काफी संपर्क थे. इसलिए कहा जाता है कि उन्हें पहले ही आपातकाल के विषय में पता चल गया था. 25 जून 1975 के दिन डॉ स्वामी जयप्रकाश नारायण के साथ रात का भोजन कर रहे थे. तभी उन्होंने जेपी को कहा की कुछ बड़ा आने वाला है तो जेपी ने उनकी बात पर यकीन नहीं किया.  उन्होंने कहा की इंदिरा गांधी ऐसी मूर्खता नहीं करेंगी. दूसरे दिन सुबह 4.30 बजे उन्हें एक गुमनाम कॉल आया जिसमे उन्हें पुलिस ने अप्रत्यक्ष रूप से बताया की वो डॉ स्वामी को गिरफ्तार करने वाले है. इसके बाद डॉ स्वामी 6 महीने के लिए भूमिगत हो गए.

उस समय जयप्रकाश नारायण ने डॉ स्वामी को सूचना भेजी की तुम अमेरिका जाओ. क्योंकि उन्होंने डॉ स्वामी को हार्वर्ड में देखा था. जेपी ने कहा की अमेरिका में जाकर भारत के आपातकाल के बारे में लोगों को जागरूक करो.

डॉ स्वामी ने आपातकाल के समय सोचा की लोगो में इमरजेंसी के खिलाफ हिम्मत जगाने के लिए वो एक दिन के लिए संसद में घुसेंगे और 2 मिनट का भाषण देकर फिर से भूमिगत हो जाएंगे. ऐसा करके वो ये साबित करना चाहते थे कि पूरा देश इंदिरा गांधी के नियंत्रण में नहीं है. स्वामी ने सिख पगड़ी बांधी और अपना हुलिया बदल लिया. उस समय डॉ स्वामी के नाम से वारंट जारी हो चुका था. ये तारीख थी 10 अगस्त 1976.

स्वामी सिख वेष में बिना किसी रोकटोक के संसद में घुस गए. उपस्थिति रजिस्टर पर दस्तख़त किए. तभी कम्युनिस्ट सांसद इंद्रजीत गुप्त उनसे टकरा गए. उन्होंने पूछा तुम यहां क्या कर रहे हो? स्वामी ज़ोर से हंसे और उनका हाथ पकड़े हुए राज्यसभा में घुसे. इससे पहले सुब्रमण्यम स्वामी की पत्नी रौक्शना ने आस्ट्रेलिया ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन के संवाददाता को पहले से बता दिया था कि वो संसद में एक दिलचस्प घटना देखने के लिए मौजूद रहें.

स्वामी की टाइमिंग जबरदस्त थी. उस समय राज्यसभा में उन सांसदों के शोक प्रस्ताव पढ़े जा रहे थे जिनका हाल ही में निधन हुआ था. जैसे ही सभापति बासप्पा दानप्पा जत्ती ने अंतिम शोक प्रस्ताव पढ़ा, स्वामी तपाक से उठ खड़े हुए.

उन्होंने चिल्लाकर कहा, “प्वाएंट ऑफ़ ऑर्डर सर… आपने दिवंगत लोगों में भारत के जनतंत्र को शामिल नहीं किया है..” पूरे कक्ष में सन्नाटा छा गया… गृहराज्य मंत्री घबरा कर मेज के नीचे छिपने की कोशिश करने लगे. उन्हें डर था कि स्वामी के हाथ में बम तो नहीं है. हैरान सभापति बीडी जत्ती ने स्वामी को गिरफ्तार करने का आदेश देने की बजाए सांसदों को दिवंगत सांसदों के सम्मान में खड़े होकर दो मिनट का मौन रखने के लिए कहा.

इस अफरातफरी का फ़ायदा उठाते हुए स्वामी चिल्लाए कि वो वॉक आउट कर रहे हैं. वो तेज कदमों से संसद भवन के बाहर आए और पुलिस को चकमा देते हुए नेपाल के रास्ते वापस अमेरिका चले गए. इस घटना से लोगों को एक नया बल मिला और वे आपातकाल के समय एक नायक बन गए.

डा. सुब्रह्मण्यम स्वामी विदेश नीति, आन्तरिक सुरक्षा, आतंकवाद, आर्थिक नीति, भ्रष्टाचार और व्यवस्था परिवर्तन पर बेबाक राय रखते हैं. वे चीन के साथ भारत के अच्छे संबन्धों के हमेशा से हिमायती रहे हैं. इसके लिए उन्होंने चीनी भाषा सीखी. भारत और चीन के बीच संबंध काफी खराब थे. कैलाश मानसरोवर तीर्थ यात्रा सालों से बंद थी. स्वामी चीन की यात्रा पर गए थे. चीन के राष्ट्राध्यक्ष से पहली ही मुलाकात में उन्होंने तीर्थ यात्रा बहाल करने को कहा. डा. स्वामी की बातचीत से प्रभावित होकर डेंग श्याओपिंग ने फौरन सहमति दे दी. 1981 में कैलाश-मानसरोवर की यात्रा फिर से शुरू हुई और स्वामी ने तीर्थयात्रियों के पहले जत्थे का नेतृत्व भी किया.

1990 और 1991 के दौरान स्वामी योजना आयोग के सदस्य और भारत और वाणिज्य मंत्री रहे. इस अवधि के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल के दौरान भारत में आर्थिक सुधारों के लिए खाका बनाया. जो बाद में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव के नेतृत्व में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह द्वारा 1991 लागू किया गया. डॉ स्वामी ने अपनी किताब में बताया है कि मनमोहन सिंह ने इस बात को स्वीकार भी किया है.

सुब्रमण्यम स्वामी खुद को कांग्रेस की वंशवादी राजनीति यानी नेहरू, गांधी परिवार को खत्म करने वाला और न्याय के लिए लड़ने वाला योद्धा कहलाना पसंद करते हैं. कहते हैं सुब्रमण्यम स्वामी एक ऐसी शख्सियत हैं, जो हर बार अपने विरोधियों को गलत साबित करते हुए काल्पनिक पक्षी फीनिक्स की तरह राख से उठ खड़े होते हैं. उनके विरोधियों को लगता है कि वह खत्म हो चुके हैं, लेकिन तब तक वह एक बार फिर आकार ले चुके होते हैं. पर इस बार तो स्वामी पहले से ही एक बड़ा आकार लेकर हाजिर हुए हैं. ये देखना दिलचस्प होगा कि स्वामी अब कौन सा आकार लेते हैं.

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