व्यक्ति विशेष: राममंदिर की राम कहानी!

By: | Last Updated: Saturday, 5 December 2015 5:13 PM
Vyakti Vishesh: Ram Mandir and its history, geography, politics

अयोध्या- महज एक शहर नहीं है, ये हिंदुओं की आस्था का वो केंद्र है जहां सदियों से भगवान श्री राम के हरकारे गूंजते रहे हैं क्योंकि अयोध्या को भगवान राम की जन्मस्थली माना जाता है.

 

अयोध्या में सरयू नदीं के घाटों ने यूं तो समय के कई उतार – चढ़ाव देखे हैं, ये घाट उस राम मंदिर आंदोलन के भी गवाह रहे हैं जिसका जिक्र हर साल एक बार जरूर छिड़ता है. यू तो सैकड़ों सालों में सरयू नदी में पानी खूब बहा है लेकिन राम मंदिर निर्माण का वो मुद्दा जहां से शुरू हुआ था आज भी वहीं खड़ा है.

 

साल 1992 में बाबरी मस्जिद का ढ़ांचा गिरा दिया गया था. जिसके बाद से हर साल छह दिसंबर की तारीख आते ही अयोध्या में राम मंदिर का मुद्दा सुलगने लगता है और इस बार  राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत के बयान के बाद इस मुद्दे ने एक बार फिर आग पकड़ ली है.

 

यूं तो राम मंदिर निर्माण के मुद्दे को लेकर राजनीति होती रही है. चुनावों के दौरान भी ये एक बड़ा मुद्दा बनता रहा है लेकिन भागवत के ताजा बयान पर विरोधियों ने भी एक बार फिर तलवार खींच ली है और इसकी सबसे बड़ी वजह है केंद्र में बीजेपी की सरकार.

 

राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर जहां विरोधी सरकार को घेर रहे हैं वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस मुद्दे पर मौन हैं.

 

कब तक तिरपाल में रहेंगे राम

 

व्यक्ति विशेष में आज हम आपको बताएंगे आखिर कब तक तिरपाल में रहेंगे भगवान श्री राम. साथ ही आपको बताएंगे क्या है राममंदिर मुकदमे का पूरा भूगोल और इतिहास. और इसी के साथ पड़ताल इस बात की भी करेंगे कि राम मंदिर का मुद्दा फिर गरमाने से किसको हो सकता है राजनीतिक फायदा और किसको होगा नुकसान.

 

बीते दिनों आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा, “हमको भव्य मंदिर बनाना है हमारे सामने उदाहरण है. जीवन का उदाहरण है वीर मृत्यु का उदाहरण है. एक भव्य लक्ष्य मेरे सामने है उस लक्ष्य के लिए ये जीवन है. उद्देश्य का सतत स्मरण रखना, मंदिर बनाना है. “

 

पिछले साल इन्हीं दिनों अयोध्या में घना कोहरा छाया थाय मगर इस बरस धुंध छटने लगी है धुंध के उस पार से लोग और चेहरे साफ साफ दिखने लगे हैं वो चेहरे जो पिछसे साल तक मोदी सरकार को राम मंदिर के मुद्दे पर राहत देने के मूड़ में थे अब उन चेहरों उन तस्वीरों के सुर बदलने लगे हैं बात हम हो रही है आर एस एस प्रमुख मोहन भागवत की.

 

संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के मुद्दे पर बयान देकर अपने पुराने और सबसे अहम एजेंडे को एक बार फिर गरमा दिया है. भागवत का ये बयान 2 दिसंबर को उस वक्त सामने आया जब 1990 में रामंदिर आंदोलन में मारे गए कारसेवक कोठारी बंधुओं की श्रद्धांजलि सभा में हिस्सा लेने वो कोलकाता पहुंचे थे.

 

मोहन भागवत ने कहा, “हमें राम मंदिर बनाना है. कब कैसे अवतार आएगा आज कोई नही बता सकता है, लेकिन तब कैसे कितनी तैयारी रखनी पड़ेगी आपके सामने जीवन है ये करेंगे तो फिर भव्य राम मंदिर बनेगा. उतना लंबा समय नहीं लगेगा शायद हमारे जीते जी हमारी आंखों के सामने उस भव्य लक्ष्य को हमारा सारा सपना सच होगा. “

 

संघ की बात पत्थर की लकीर

 

बीजेपी हो या फिर विश्व हिन्दू परिषद. संघ प्रमुख मोहन भागवत सबके गुरू है. संघ और उससे जुड़े संगठनों में उनकी कही हर बात पत्थर की लकीर की तरह मानी जाती है. खास बात ये है कि केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद मंदिर मुद्दे पर मोहन भागवत का ये पहला बयान नहीं है लेकिन इस बार उनके इस बयान को अहमियत भरी नजर से देखा जा रहा है. इसीलिए भागवत के इस बयान के पीछे छुपे मायने भी तलाशेंगे हम आगे लेकिन उससे पहले जानिए कैसे राम मंदिर मुद्दे पर फिर मच गया है घमासान.

 

मुस्लिम धर्मगुरु खालिद रशीद फिरंगी महली का कहना है कि ये मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में है तो हम समझते हैं कि तो सबको रुकना चाहिए.  सुप्रीम कोर्ट का जो फैसला आए उसी पर सबको अमल करना चाहिए. मोहन भागवत साहब का ये बयान चिंता का विषय है.

 

शिवसेना नेता संजय राउत कहते हैं, “आरएसएस के जो संचालक है वो बार बार इस बात को उठाते रहते हैं कभी कभी ये लगता है कि सिर्फ कोरी राजनीति के लिए चाहे आरएसएस हो या फिर बीजेपी पार्टी हो राम मंदिर के मुद्दे को बार बार उठाते रहते हैं.”

 

बीजेपी सांसद विनय कटियार का कहना है, मैं उनके बयान का स्वागत करता हूं और उनका बयान पूरे हिंदू समाज के लिए महत्वपूर्ण है. और मैं समझता हूं कि जब हाईकोर्ट से साबित हो गया कि ये राम की जन्मभूमि है तो सुप्रिम कोर्ट में भी इसी प्रकार का होगा.

 

भागवत के बयान पर घमासान मचा है लेकिन सवाल ये है कि 15 दिनों के अंदर दो बार अयोध्या में राम मंदिर बनाने के पुराने मुद्दे को दोबारा जिंदा करने की कोशिश के पीछे मोहन भागवत की मंशा क्या है. भागवत ने अपना दूसरा बयान राम मंदिर आंदोलन के सबसे बड़ा चेहरा रहे विश्व हिंदू परिषद प्रमुख अशोक सिंघल के निधन के बाद दिया था.

 

मोहन भागवत ने कहा था, “मंदिर बनाने के लिए सबको संकल्प करना होगा. उस काम को नतीजे तक पहुंचाने के लिए हमें तप करना चाहिए. “

 

जाहिर है 15 दिनों के अंदर मोहन भागवत को राम मंदिर की दो बार याद आई. लेकिन साल भर पहले वो एक अलग ही मूड में थे. लखनऊ में संघ के राष्ट्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक में जब अयोध्या में मंदिर निर्माण का मुद्दा उठा था तब भागवत का कहना था कि नरेंद्र मोदी की सरकार पांच साल के लिए है और मंदिर से जरूरी कई और भी मुद्दे हैं.

 

बयान के पीछे की वजहें

 

दरअसल राम मंदिर का मुद्दा संघ के लिए हमेशा से अहम रहा है लेकिन भागवत के ताजा बयानों ने इस मुद्दे को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है तो इसके पीछे दो बड़ी वजहें है.

 

पहली बात ये कि भागवत उस राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख हैं जिसका राजनीतिक विंग कही जाने वाली बीजेपी के पास देश की सत्ता है. यही नहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक रह चुके हैं. ऐसे में आरएसएस के मुखिया की हैसियत से भागवत का बयान बेहद अहम हो जाता है.

 

दूसरी बात ये है कि देश में बीजेपी की सरकार के बनने के बाद पहली बार आरएसएस की ओर से राम मंदिर को लेकर बड़ा बयान आया है.

 

बदली हुई सत्ता और बदले हुए माहौल में मोहन भागवत के बयान को गंभीरता से तो लिया जा रहा है लेकिन उतने ही गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं.

 

बड़ा सवाल ये है कि मोहन भागवत ने अचानक राम मंदिर का राग क्यों छेड़ दिया है और अगर वो राम मंदिर को लेकर गंभीर हैं तो फिर मंदिर बनाने की तारीख क्यों नहीं बताते?

 

लेकिन इस सवाल का जवाब ना तो बीजेपी देना चाहती है और ना ही आरएसएस. अगले साल यानी साल 2016 में पश्चिम बंगाल और साल 2017 में उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में विरोधी दल मंदिर मुद्दे को संघ की चुनावी चाल बता रहे हैं और भागवत के बयान को राम मंदिर के बहाने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिश का हिस्सा.

 

कांग्रेस महासचिव दिग्वजिय सिंह ने कहा, “राम मंदिर से इनका कोई लेना देना नहीं है न धर्म से कुछ लेना देना है. ये केवल राम भूमि की भावना को फैलाकर राजनैतिक स्वार्थ पूरा कराना चाहते हैं. पहले कहा यूपी में सरकार बना दीजिए मंदिर बनवा देंगे फिर कहा देश में जबतक नहीं बनेगी तब तक नहीं बनेगा तो वो भी हो गया अटल जी के समय फिर कहा पूर्ण बहुमत होना चाहिए वो भी हो गया पर अब वो कहते हैं कि हमारे जीवनकाल में मंदिर बन जाएगा अब उनका जीवनकाल वो तय करेंगे कि ईश्वर तय करेगा.

 

मोहन भागवत के बयान से इतना तो साफ है कि जिस राम मंदिर आंदोलन को अब तक विश्वहिंदू परिषद और बजरंग दल जैसे संघ के संगठन चला रहे थे अब आरएसएस सीधे उसे अपने हाथ में लेना चाहता है जाहिर है इससे राम मंदिर आंदोलन के समीकरण बदलेंगे. लेकिन राम मंदिर आंदोलन आज जिस मुकाम पर खड़ा है वहां सबसे बड़े फैक्टर हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी.

 

मोदी पिछले लोकसभा के चुनावों के दौरान फैजाबाद में भी आए थे चुनाव प्रचार के लिए और मंच पर भगवान राम के साथ साथ प्रस्तावित राम मॉडल मंदिर का फोटो भी मंच पर सजा हुआ था. लेकिन पीएम बनने के साथ मोदी राम मंदिर के मुद्दे पर मौन पर चले गए थे. लेकिन अब राम मंदिर के आंदोलन से जुड़े हुए साधु संतो की बैचेनी बढ़ने लगी है. उनकरे सुर बदलने लगे हैं जो साधू संत पिछले साल तक ये कहते थे कि सरकार पांच साल की है अभी क्या जल्दबाजी है वही अब मोदी को कोई राहत देने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं.

 

सुरेशदास अयोध्या के दिगंबर अखाड़े के महंत हैं और उस राम जन्मभूमि न्यास के सदस्य भी हैं जो मंदिर आंदोलन को चलाता रहा है. सुरेश दास का कहना है कि केंद्र की बीजेपी सरकार को राम मंदिर निर्माण के लिए संसद में विधेयक लाना चाहिए या फिर सुप्रीम कोर्ट में हर दिन सुनवाई करवाकर जल्द से जल्द इस मामले को निपटाना चाहिए.

 

सुरेश दास आगे कहते हैं, “इन्होंने कहा था कि जब लोकसभा में बहुमत आएगी तब तो भारत की जनता ने उन्हें बहुमत दे दी अब इनको राम जन्म भूमि का निर्माण करना चाहिए. “

 

सुरेश दास का कहना है कि जब याकूब मेमन की फांसी के लिए सुप्रिम कोर्ट में 24 घंटे बहस हो सकती है तो राम जन्म भूमि के लिए सुप्रिम कोर्ट में स्पेशल बैंच बैठाकर क्यों नहीं बहस कराया जा रहा है फैसला कराया जा रहा है . ये सरकार चाहे तो करा सकती है.

 

महंत नृत्य गोपाल दास अब राम जन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष है. केंद्र में बीजेपी की सरकार बनने के बाद साल भर पहले तक उन्हें राम मंदिर निर्माण की कोई जल्दी नहीं थी तब वो कहते थे कि नरेंद्र मोदी की सरकार के पास बहुत काम है लेकिन अब नृत्य गोपाल दास भी मोदी सरकार को मंदिर मुद्दे पर और मोहलत देने के मूड में नजर नहीं आ रहे हैं.  

 

महंत नृत्य गोपाल दास का कहना है, “भाजपा का तो जन्म ही इसी के लिए हुआ है वो राम जन्म भूमि का काम नहीं करेगी तो और क्या करेगी. बाकि पार्टियां तो काम करती ही हैं तो भाजपा का जन्म तो उसी के लिए हुआ है.  राम मंदिर राम जन्म भूमि हिंदुत्तव और हिंदूत्व की अवधारणा तो इसलिए इनको मजबूर होकर चाहे कहें या न कहें राम मंदिर के निर्माण के लिए पहल करनी पड़ेगी और उनको करना ही है वो नहीं करेंगे तो और कौन करेगा.

 

आयोध्या में सरयू नदी के किनारे बने घाट ने राम जन्म भूमि आंदोलन से जुड़ी कई उतार चढ़ाव देखे न जाने कितने साधू संतों और नेताओं ने यहीं सरयू जलव लेकर भव्य राम मंदिर के निर्माण के कसमें भी खाए लेकिन राम जन्म भूमि का आंदोलन जहां खड़ा था आज भी वड़ी खड़ा है लेकिन हर साल 6 दिसबंर की तारीख आते ही इस मुद्दे को आलमीरा से झाड़ पोछकर निकाला जाता है और फिर इसे जनता के बीच लाया जाता है कुछ ऐसा ही इस बार भी हुआ जब 6 दिसबंर से पहले ही बजरंगी बाबू के नाम से मशहूर बीजेपी के सांसद विनय कटियार ने फिर से एक बार मुद्दा छेड़ा राम मंदिर का.

 

इसी साल अप्रैल में बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने भी राम मंदिर बनाने का बीड़ा उठाते हुए इस मुद्दे को गरमा दिया था. उन्होंने ट्विटर लिखा था कि  ‘माय मोटो फॉर 2016 राम मंदिर मूवमेंट’. राम मंदिर निर्माण में जो लोग हमारे साथ आने चाहते हैं, वो आ सकते हैं. जो हमारे साथ नहीं हैं, वो जा सकते हैं. जो हमारे विरोध में हैं, उनसे मुकाबला किया जाएगा.

 

सुब्रहमण्यम स्वामी यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने लगे हाथ बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को चिट्ठी लिख कर इस मुद्दे पर पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक बुलाने की मांग भी कर दी थी. लेकिन अमित शाह कह चुके है की पार्टी को जनादेश मंदिर के लिए नहीं मिला है. और मंदिर निर्माण से जुड़े विधेयक के लिए लोकसभा में तीन सौ सत्तर सांसद चाहिए. यही नहीं गृह मंत्री राजनाथ सिंह भी कह चुके है की विधेयक के लिए राज्यसभा में बहुमत नहीं है.

 

कैसे बीजेपी को मिला आंदोलन का फायदा

 

इसी राम मंदिर के मुद्दे पर सवार होकर बीजेपी ने पहली बार यूपी में सत्ता का स्वाद चखा और फिर देखते ही देखते दो सांसदों वाली बीजेपी पार्टी देश में एक बड़ी पार्टी बनकर उभरी और अब तो दिल्ली में बीजेपी कि अपनी बहुमत वाली सरकार भी है लेकिन फिर सवाल वही कि राम मंदिर का क्या होगा.

 

राममंदिर विवाद जितना पुराना है उतना ही उलझा हुआ भी है. इस विवाद की गहराई में भी हम उतरेंगे और आपको बताएंगे रामजन्मभूमि – बाबरी मस्जिद केस का पूरा हाल. लेकिन उससे पहले देखिए मंदिर निर्माण को लेकर राम जन्मभूमि न्यास ने क्या लगा रखी है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आस.

 

अयोध्या के मणिराम दास छावनी में जून के महीने में इसी साल राम जन्मभूमि न्यास की बैठक हुई थी. इस बैठक में तब अशोक सिंघल वासुदेवानंद सरस्वति  और न्यास के अध्यक्ष खुद मंहत गोपाल दास भी मौजूद थे. बैठक में आम सहमति से तय हुआ कि एक प्रतिनिधि मंडल साधु संतों का और विहिप नेताओं का प्रधानमंत्री से मिलेगा औऱ राम मंदिर के निर्माण को लेकर उन पर दबाव बनाया जाएगा. इस बात को कई महीनें हो गए लेकिन अब तक पीएम मोदी से मिलने का वक्त तक नहीं मिल पाया है.

 

राम मंदिर मुद्दा आग की तरह है और ये बात प्रधानमंत्री मोदी भी जानते हैं. लेकिन दूसरी तरफ संघ प्रमुख कहना है कि मंदिर वही बनवाएंगे हांलाकि उन्होंने अभी तक इसकी कोई तारीख नहीं बताई है और इसकी वजह पूरा देश जानता है कि राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद केस इस समय सुप्रीम कोर्ट में है और अदालत के फैसले के बिना विवादित जगह पर कोई बदलाव मुमकिन नहीं है.

 

राममंदिर मामले के एक वादी सुन्नी सेट्रल बोर्ड के जफरयाब जिलानी का कहना है कि अगर मोदी सरकार चाहे तो कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जल्द खत्म की जा सकती है. वहीं इस मामले में मुस्लिम समाज से सबसे पुराने पक्षकार हाशिम अंसारी राम मंदिर मुद्दे पर राजनीतिक करने का आरोप लगा रहे हैं.

 

हाशिम अंसारी कहते हैं, “अरे भाई कुछ करें तो पार्लियामेंट में करें, अदालत में करें, कुछ करें तो, लेकिन खाली राजनीति करोगो. कब तक करोगे राजनीति. अरे देश की तरफ देखो कहां क्या हो रहा है हम तो देश की तरफ देख रहें है हम बाबरी मस्जिद की तरफ नहीं देख रहें हैं. हम नहीं देखेंगे बाबरी मस्जिद की तरफ तुम्हारा वक्त है तुम्हारी ताकत है…वही मुंसिफ और वही गवाह.

 

सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के वकील जफरयाब जिलानी का कहना है, पार्लियामेंटेरिएन हैं औऱ बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि सप्रिम कोर्ट में जब तक मुकदमें का फैसला उनके हक में न हो तब तक वो वहां पर कुछ नहीं कर सकते हैं और आज की तारीख में या आगे साल भर की तारीखों में वहां पर कोई एक ईंट भी नहीं रख सकता है . ये वो जानते हैं अच्छी तरह से इसका कोई उनके वापस हल नहीं है क्योंकि वो सुप्रीम कोर्ट में फैसले का हल नहीं करवाना चाहते हैं हमनें तो बार बार कहा कि जिस तरह से अटल बिहारी ने यहां अप्लिकेशन देकर कोर्ट में और मुकदमे की डे टू डे हियरिंग करवाई. हम लोगों ने उसे अपोज्ड नहीं किया हम लोगो ने कहा ठीक है. हम आज भी चाहते हैं कि सेंट्रल गवर्नमेंट वहां एप्लिकेशन दे सुप्रिम कोर्ट में कि साहब इस मुकदमे की डे टू डे हियरिंग करवाई जाए और जल्दी फैसला कर दिया जाए. हम उसका अपोज्ड नहीं करेंगे.

 

राम मंदिर की कहानी

 

6 दिसंबर, 1992 ये वो तारीख है जिसने अयोध्या का इतिहास और भूगोल बदल दिया और साथ ही बदल गया यहां का सामाजिक ताना बाना. हर साल 6 दिसबंर के आस पास राम की नगरी आयोध्या थम सी जाती है. पूरे शहर में एक सन्नाटा सा पसर जाता है. हर घर के दरवाजे पर किसी अनहोनी के होने की आशंका दस्तक देने लगती है कि न जाने क्या हो जाए सब एक दूसरे से बस यही सवाल पूछते हैं कि इस वर्ष काश कुछ गड़बड़ न हो जाए.

 

राम मंदिर मुद्दे को लेकर आरोप–प्रत्यारोप का एक नया सिलसिला फिर चल पड़ा है. जाहिर है उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा चुनाव होने है और इसके ठीक दो साल बाद देश में लोकसभा के चुनाव होंगे. ऐसे में राम मंदिर का मुद्दा एक फिर राजनीतिक अखाड़े का सबसे बड़ा दांव बने तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं है. वैसे भी पिछले पच्चीस सालों से इस मुद्दे ने किसी राजनीतिक पार्टी की तकदीर संवारी तो किसी की बिगड़ी भी है. अब आगे देखिए राममंदिर मुद्दे की ये रामकहानी.

 

राम की नगरी अयोध्या. अयोध्या की ये जमीन किसकी है इस पर करीब साढे चार सौ साल से विवाद है. आखिर अयोध्या की ये विवादित ज़मीन किसकी है?

 

2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला आया. हाईकोर्ट ने ज़मीन को तीन हिस्सों में बांट दिया. दो तिहाई हिस्सा हिन्दू पक्ष को मिला और एक तिहाई सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को. हालांकि, कोई भी पक्ष इस फैसले से संतुष्ट नहीं हुआ, और ये मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है.

 

आखिर क्या है अयोध्या भूमि विवाद?

 

सन् 1526 में मुगल बादशाह बाबर ने दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी को जंग में हराकर दिल्ली की गद्दी पर अपना कब्जा जमा लिया था और इसी के बाद भारत में मुगलिया साम्राज्य फैलता चला गया था. बाबर की इसी मुहिम के तहत उसके ख़ास सिपहसालार मीर बाक़ी ने अवध के इलाके को अपने कब्ज़े में ले लिया था, जिसके बाद मीर बाक़ी ने 1528 में अयोध्या के रामकोट में एक मस्जिद का निर्माण करवाया जिसे मस्जिद-ए-जन्मस्थान और बाबरी मस्जिद के नाम से पुकारा गया.

 

बाबरी मस्जिद के निर्माण के बाद से ही आस-पास के हिन्दू उसे भगवान राम का जन्मस्थान बता कर उसे अपने कब्ज़े में लेने की कोशिश करते रहे और इसीलिए जहां मस्जिद के बाहरी हिस्से में हिन्दू पूजा-अर्चना करते रहे वही मस्जिद के अंदर मुसलामानों ने नमाज पढ़ना जारी रखा.

 

अंग्रेजों के दौर में भी हिन्दू पक्ष की तरफ से कई बार मस्जिद को अपने कब्ज़े में दिए जाने की गुहार लगायी गयी. लेकिन फैज़ाबाद के कमिश्नर ने इसे ये कहते हुए ठुकरा दिया कि भले ही मस्जिद की जगह पर पहले मंदिर रहा हो लेकिन अब सैंकड़ों साल के बाद इस स्थिति में बदलाव नहीं किया जा सकता. देश की आजादी के साथ ही अयोध्या भूमि विवाद ने नए मोड़ लेने शुरू किये.

 

अयोध्या मुद्दे ने पहली साल 1949 में आग पकड़ी थी. इसी साल दिसंबर महीने में एक दिन अचानक किसी ने मस्जिद के अंदर और मुख्य गुम्बद के नीचे रात के वक्त भगवान राम और सीता की मूर्तियां रख दी. इसके बाद जनवरी 1950 में गोपाल सिंह विशारद नाम के शख्स ने फैजाबाद की अदालत में पहला मुकदमा दाखिल करके इस जगह पर पूजा करने की इजाजत मांगी थी.

 

दिसंबर 1950 में दूसरा मुकदमा दाखिल हुआ और इस बार राम जन्मभूमि न्यास की तरफ से महंत परमहंस रामचंद्र दास ने भी कोर्ट से पूजा की करने की अनुमति मांगी.

 

दिसंबर 1959 में निर्मोही अखाड़े ने भी रामजन्मभूमि पर अपना दावा ठोक दिया. अखाड़े ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से वही अयोध्या में राम मंदिर की देखभाल करता रहा है और इस आधार पर अखाड़े ने विवादित जगह को अपने कब्जे में दिए जाने की कोर्ट से मांग की थी.

मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के 12 साल बाद दिसंबर 1961 में सुन्नी सेन्ट्रल वक़्फ बोर्ड ने फैज़ाबाद की कोर्ट में अर्ज़ी लगाई. बोर्ड ने मूर्तियों को हटाने और मस्जिद पर कब्ज़े की मांग की. अप्रैल 1964 में फैजाबाद कोर्ट ने सभी 4 अर्जियों पर एक साथ सुनवाई का फैसला लिया.

 

हालांकि मंदिर मुद्दे का ये पूरा मामला फैजाबाद कोर्ट में भी टलता रहा. इस बीच 1989 में इलाहबाद हाइकोर्ट के रिटायर्ड जज देवकी नंदन अग्रवाल ने रामलला विराजमान की तरफ से कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी. दरअसल जो लोग खुद मुकदमा दाखिल नहीं कर सकते उनके लिए कानून में दिए गए प्रावधान के मुताबिक अग्रवाल ने खुद को भगवान राम का प्रतिनिधि बताया और सारी जमीन रामलला को सौंपने की मांग की.

 

देवकी नंदन अग्रवाल की अर्ज़ी पर 1989 में इलाहबाद हाईकोर्ट ने अब तक दाखिल सभी 5 दावों पर खुद सुनवाई करने का फैसला किया और सुनवाई के लिए तीन जजों की विशेष बेंच का गठन भी किया गया.

 

2002 में हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई शुरू की. हाईकोर्ट ने हिन्दू पक्ष के दावे की पुष्टि के लिए विवादित जगह पर खुदाई कराने का फैसला लिया. खुदाई का जिम्मा आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया को सौंपा गया.

 

एएसआई की टीम ने यहां कई दिनों तक खुदाई की. इसके बाद उसने जो रिपोर्ट सौंपी उसमें बाबरी मस्जिद वाली जगह पर भव्य हिन्दू मंदिर होने की बात कही गई.

 

साल 2010 में हाई कोर्ट के तीन जजों की बेंच ने सभी दावों पर सुनवाई पूरी की. और आखिरकार 30 सितंबर 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की जस्टिस सुधीर अग्रवाल, एस यू खान और डी.वी. शर्मा की बेंच ने मंदिर मुद्दे पर अपना फैसला भी सुना दिया.

 

हाईकोर्ट के तीन जजों की बेंच ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया की तरफ से विवादित जमीन पर कराई गई खुदाई के नतीजों के आधार पर ये भी माना कि बाबरी मस्जिद से पहले वहां पर एक भव्य हिन्दू मंदिर था. रामलला के वर्षों से मुख्य गुम्बद के नीचे स्थापित होने और उस स्थान पर ही भगवान राम का जन्म होने की मान्यता को भी फैसले में तरजीह दी गई.

 

हालांकि कोर्ट ने ये भी माना कि इस ऐतिहासिक तथ्य की भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वहां साढ़े चार सौ सालों तक एक ऐसी इमारत थी जिसे मस्जिद के रूप में बनाया गया था. बाबरी मस्जिद के बनने के पहले वहां मौजूद मंदिर पर अपना हक बताने वाले निर्मोही अखाड़े के दावे को भी अदालत ने मान्यता दी.

 

तमाम तथ्यों और बातों को देखते हुए जजों की बेंच ने अयोध्या की विवादित 2.77 एकड़ जमीन को तीन बराबर हिस्सों में बांटने का आदेश दिया था बेंच ने ये तय किया कि जिस जगह पर रामलला की मूर्ति स्थापित है उसे रामलला विराजमान को दे दिया जाए. राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह निर्मोही अखाड़े को दिया जाए. और बचा हुआ एक तिहाई हिस्सा सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को दिया जाए.

 

हालांकि, हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सभी पक्षों के दावों में संतुलन बनाने की कोशिश की लेकिन कोई भी पक्ष इस आदेश से संतुष्ट नहीं हुआ.

 

हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद अयोध्या की विवादित जमीन पर दावा जताते हुए रामलला विराजमान की तरफ से हिन्दू महासभा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. दूसरी तरफ सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने भी हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. और इसके बाद कई और पक्षों की तरफ से भी सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गई है. इन सभी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 9 मई 2011 को हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी और अब ये पूरा मामला देश की सर्वोच्च अदालत में लंबित है. लेकिन अदालत से संघ प्रमुख मोहन भागवत के राम मंदिर मुद्दे पर दिए बयानों से एक बार फिर छिड़ गया है राजनीतिक संग्राम.

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Web Title: Vyakti Vishesh: Ram Mandir and its history, geography, politics
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