व्यक्ति विशेषः जानें कौन हैं शनिदेव?

VYAKTI VISHESH SHANI DEV

वो न्याय के देवता हैं..वो न्यायाधीश हैं.. उन्हें अन्याय बर्दाश्त नहीं है..उन्होंने भगवान शिव को भी नहीं बख्शा..अन्याय करने वाला रावण भी उनसे नहीं बच सका..वो न्याय और अन्याय का फैसला करने वाले सबसे बड़े न्यायाधीश कहे जाते हैं..इंसान ही नहीं देवलोक में भी वो न्याय देते हैं.. .उनके दरबार में लगा है महिलाओं के साथ अन्याय का आरोप उनके चौखट पर न्याय की गुहार लगा रही हैं महिलाएं.

व्यक्ति विशेष में आज हम बताएंगे महाराष्ट्र के शनि शिंगणापुर मंदिर में आखिर 400 साल से चली आ रही परंपरा को ध्वस्त करने के लिए क्यों आंदोलन की राह पर हैं महिलाएं? शिंगणापुर में महिलाओं को पुरुषों की तरह शनि देव के चरणों में बैठ कर पूजा करने से रोकने के पीछे की क्या है कहानी?

आखिर शनि शिंगणापुर में ऐसा क्या है कि देश दुनिया से शनि भक्त खिंचे चले आते हैं? क्यों शनि देव के गुस्से से कांप उठते हैं लोग और क्यों शनि देव ने भगवान शंकर और रावण को भी नहीं बख्शा?

महाराष्ट्र के पुणे से करीब 100 किलोमीटर दूर अहमदनगर जिले का ये शिंगणापुर गांव जो अब विज्ञापन में भी दिखता है. इस गांव में शनि देव हैं लेकिन मंदिर नहीं है. गांव में घर है पर यहां दरवाजा नहीं है. शिंगनापुर गांव की कहानी काफी दिलचस्प है . ये एक ऐसा गांव है जिसकी मिसाल भारत ही नहीं पूरी दुनिया में कहीं भी देखने को नहीं मिलती है. माना जाता है इस गांव के राजा शनिदेव हैं, इसलिए यहां कभी चोरी नहीं होती. इस गांव के लोग अपने घर में ताला नहीं लगाते हैं, लेकिन उनके घर से कभी एक कील भी चोरी नहीं हुई. करीब तीन हजार की आबादी वाले शनि शिंगणापुर गांव में किसी भी घर में कुंडी और कड़ी लगाकर ताला नहीं लगाया जाता. इतना ही नहीं, घर में लोग आलमारी, सूटकेस भी नहीं रखते.

शिंगणापुर के लोग मानते हैं कि शनि की इस नगरी की रक्षा खुद शनिदेव का पाश करता है. कोई भी चोर गांव की सीमारेखा को जीवित पार नहीं कर सकता. यहां के लोगों ने बताया कि एक बार एक चोर यहां चोरी करने आया पर वो सामान चुरा कर गांव से बाहर निकल न सका क्योंकि उसके पांव अचानक खराब हो गए.

शिंगणापुर में शनि की इस प्रतिमा के स्थापित होने की कहानी भी कोई कम दिलचस्प नहीं है. कहा जाता है कि सदियों पहले शिंगणापुर में खूब वर्षा हुई थी. बारिश के कारण यहां बाढ़ जैसे हालात हो गए. लोगों को वर्षा प्रलय के समान लग रही थी. कहते हैं इसी बीच एक रात शनि महाराज एक गांववासी के सपने में आए. शनि महाराज ने कहा कि मैं पानस नाले में पत्थर के रूप में मौजूद हूं. सुबह में सभी लोग जब पानस नाले पर गए तो इस पत्थर को देखकर हैरान रह गये.

गांव वाले मिलकर उस पत्थर को उठाने लगे पर पत्थर हिला तक नहीं, सभी हारकर वापस लौट आए. शनि महाराज फिर उस रात उसी व्यक्ति के सपने में आये और बताया कि कोई मामा भांजा मिलकर उठाएं तो ही मैं उस स्थान से उठूंगा. शनि ने कहा कि मुझे उस बैलगाड़ी में बैठाकर लाना जिसमें लगे बैल भी मामा-भांजा बने हों.

अगले दिन उस व्यक्ति ने जब यह बात बताई तब एक मामा भांजे ने मिलकर पत्थर यानी विग्रह को उठाया. बैलगाड़ी पर बिठाकर शनि महाराज को गांव में लाया गया और उस स्थान पर स्थापित किया जहां आज ये शनि विग्रह यानी पत्थर मौजूद है. इस पत्थर की स्थापना के बाद गांव की तरक्की दिन दोगुनी और रात चौगुनी होने लगी.

शनिदेव को खुश करने के लिए यहां देश विदेश से हर रोज बड़ी तादाद में भक्त आते हैं और शनिदेव को तेल चढ़ाते हैं. तिल का तेल चढ़ाकर भक्त पत्थर की प्रतिमा की पूजा करते हैं. दर्शन करने के बाद श्रद्धालु यहां की दुकानों से घोड़े की नाल और काले कपड़ों से बनी शनि भगवान की गुड़िया जरूर खरीदते हैं. लोक मान्यता है कि घोड़े की नाल घर के बाहर लगाने से बुरी नजर से बचाव होता है और घर में सुख-समृद्धि आती है.
शिंगणापुर के शनि भगवान के काले रंग के इस विग्रह जिसे लोग मूर्ति समझकर पूजा करते हैं, इस पर घमासान मचा हुआ है. 5 फुट 9 इंच ऊंची और 1 फुट 6 इंच चौड़ी शनि की ये मूर्ति संगमरमर के एक चबूतरे पर धूप में ही विराजमान है. यहां शनिदेव आठों पहर इसी तरह….चाहे धूप, आंधी, तूफान या जाड़ा हो, सभी ऋतुओं में बिना छत्र धारण किए खड़े रहते हैं.

इस मूर्ति की पूजा की करीब चार सौ साल से एक परंपरा चली आ रही है जिसे हक की लड़ाई लड़ने वाली महिलाओं ने चुनौती दी है.

शनि देव की कुदृष्टि से बचने के लिए देश और दुनिया से हर रोज यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं. पुरुष बिना किसी रोकटोक के इस चबूतरे तक आ सकते हैं जिस पर शनिदेव विराजमान हैं….लेकिन इस मूर्ति तक आने की महिलाओं को इजाजत नहीं है. महिलाओं के साथ भेदभाव वाली इस परंपरा के खिलाफ महिलाओं ने मोर्चा खोल दिया है.
तारीख 26 जनवरी…… दिन मंगलवार. समूचा देश 67 वां गणतंत्र दिवस मना रहा था. देशवासी अपने उस पवित्र संविधान की वर्षगांठ मना रहे थे जो सभी भारतीयों को समानता का अधिकार देता है. स्त्री हो या पुरुष संविधान सभी को बराबरी का हक देता है. देश गणतंत्र दिवस के जश्न में डूबा था और महाराष्ट्र के अहमदनगर में सैकड़ों महिलाएं संविधान में मिले अपने बराबरी के अधिकार की आवाज बुलंद कर रही थीं.

सामाजिक संगठन रणरागिनी भूमाता ब्रिगेड की प्रमुख तृप्ति देसाई की अगुवाई में इन महिलाओं ने फैसला कर लिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए स्त्री-पुरुष में भेदभाव करने वाली परंपरा को वो आज तोड़ कर ही रहेंगी.

इन आंदोलनकारी महिलाओं का एक ही लक्ष्य था शिंगणापुर शनि मंदिर के चबूतरे पर पहुंचकर उस रूढिवादी परंपरा को ध्वस्त कर देना जो इन्हें 400 साल से मंदिर के भीतर आने की इजाजत नहीं दे रहा है. सुबह का समय था. बड़ी संख्या में महिलाएं शिंगणापुर जाने के लिए इकट्ठा हुईं. इन महिलाओं ने शिंगणापुर की यात्रा अभी शुरू भी नहीं की थी कि उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया गया. महिलाओं को गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस को इस बात का अंदेशा था कि अगर ये महिलाएं मंदिर तक पहुंच गईं तो इनका शिंगणापुर में उन लोगों से टकराव हो सकता है जो महिलाओं के मंदिर के भीतर आने के खिलाफ हैं.
आंदोलनकारी महिलाओं को मंदिर जाने से रोकने के बाद किस तरह समर्थक और विरोधियों के बीच छिड़ गई जुबानी जंग.
महिलाओं के शनि मंदिर में जाने का मामला शांत नहीं हुआ. शनिदेव मंदिर के चबूतरे पर चढ़ने से रोके जाने के एक दिन बाद रणरागिनी भूमाता ब्रिगेड की सदस्यों ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से मुलाकात की. उन्होंने मुख्यमंत्री को महिलाओं से इस भेदभाव को खत्म करने में उनका समर्थन मांगा.

भूमाता ब्रिगेड महिलाओं के अधिकार की लड़ाई कई सालों से लड़ रहा है. इस ब्रिगेड की अगुवाई तृप्ति देसाई कर रही हैं. तृप्ति ने मुख्यमंत्री से अपनी पत्नी के साथ शनिदेव के दर्शन करने को कहा जिससे महिलाओं की मांग को ताकत मिल सके. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने महिलाओं के मंदिर के भीतर जाने की मांग का खुलकर समर्थन किया.

महिलाओं की इस मांग के समर्थन को उस समय बड़ी ताकत मिली जब हिंदुओं की प्रतिष्ठित धार्मिक संस्था अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने साफ-साफ कहा कि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं को पूजा से रोकना गलत है. महंत नरेंद्र गिरी ने कहा कि सनातन हिन्दू धर्म में पुरुष और महिला दोनों को समान रूप से मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार है मिला हुआ है.

अखाड़ा परिषद के समर्थन से आंदोलनकारी महिलाओं के आंदोलन को नई ताकत मिली. उसी दौरान शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के एक बयान से खलबली मच गई.

हिन्दुओं के सबसे बड़े धर्मगुरु माने जाते हैं शंकराचार्य. हिन्दुओं के चार पीठों में से एक द्वारका पीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने ये कह कर एक नया विवाद खड़ा कर दिया कि शनि महाराज देवता नहीं एक क्रूर ग्रह हैं. शनि की पूजा उन्हें हटाने के लिए की जाती है न कि शनि को बुलाने के लिए. शंकराचार्य ने कहा कि ऐसे में महिलाओं को सोचना है कि मंदिर में जाकर वो अपना कौन सा भला करना चाहती हैं. जाहिर है शंकराचार्य ने महिलाओं के शनि मंदिर में जाने पर ही सवाल खड़ा कर दिया.
व्यक्ति विशेष में हम आपको आगे बताएंगे कि किस तरह शनि ने भगवान शिव और रावण को भी नहीं बख्शा लेकिन पहले देखते हैं कब और कैसे इस पूरे विवाद की शुरुआत हुई.

तारीख थी 28 नवंबर. दिन- शनिवार और साल था 2015- सीसीटीवी कैमरे में कैद एक तस्वीर को देखकर शिंगनापुर के लोग सन्न रह गए. दोपहर तीन बजे पुणे की एक महिला शनि मंदिर के चबूतरे पर पहुंच गई. उसने वहां तेल चढ़ाकर शनि महाराज के दर्शन किए. कहते हैं तेल चढ़ाने से शनि ग्रह से मुक्ति मिलती है. हालांकि जब तक सुरक्षा में तैनात सेवादारों को मामला समझ में आता, वो महिला वहां से निकल चुकी थी जबकि उस वक्त मंदिर में कई श्रद्धालु मौजूद थे. तस्वीरें सीसीटीवी में कैद हो गई जिसके बाद खूब हंगामा हुआ. महिला के शनि महाराज को तेल चढ़ाने पर पुजारियों ने मूर्ति को अपवित्र घोषि‍त कर दिया. मंदिर प्रशासन ने 6 सेवादारों को निलंबित कर दिया और उसके बाद मूर्ति का शुद्धि‍करण किया गया. मूर्ति को अपवित्र मानते हुए मंदिर प्रशासन ने दूध से प्रतिमा का अभिषेक किया. यही नहीं, पवित्रता के लिए पूरे मंदिर को धोया गया. ऐसा पहली बार हुआ जब किसी महिला ने शनि देव की प्रतिमा का स्पर्श किया हो. विवाद को बढ़ता देख पूजा करने वाली महिला ने प्रशासन से ये कहते हुए माफी मांग ली कि उसे परंपरा की जानकारी नहीं थी.विडंबना की बात ये है कि जिस दिन ये घटना घटी थी उस दिन महान समाज सुधारक और क्रांतिकारी महात्मा फुले की पुण्यतिथि थी. महात्मा फुले ने दलितों और स्त्रियों के लिए ताउम्र संघर्ष किया था.

शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं से होने वाले भेदभाव के खिलाफ करीब 15 साल पहले भी आंदोलन हुआ था. मंदिर की परंपरा के खिलाफ जानेमाने विचारक और सामाजिक कार्यकर्ता नरेंद्र दाभोलकर ने मशहूर कलाकार डॉ श्रीराम लागू, पुष्पा भावे, और किसान नेता एनडी पाटिल के साथ मिल कर यहां सत्याग्रह किया था, जिसमें सैकड़ों लोग शामिल हुए थे और उन्होंने गिरफ्तारियां दी थीं. सैकड़ों सत्याग्रहियों के जत्थे ने पंढरपुर से शनि शिंगनापुर पैदल मार्च किया था. उस समय इस मार्च का दक्षिणपंथी संगठनों ने जबर्दस्त विरोध किया था और इस परंपरा को चुनौती देने के लिए पहुंचे सत्याग्रहियों को मंदिर में घुसने नहीं दिया था.

सवाल उठता है कि जब पुरुष प्रतिमा के करीब जाकर शनि देव की पूजा कर सकता है फिर महिलाओं को ऐसा करने से क्यों रोका जाता है. आखिर वो कौन सी वजह है जिसके चलते यहां पुरुष और महिला के बीच भेदभाव किया जाता है? कहा जाता है कि शनिदेव बाल ब्रह्मचारी हैं, इसलिए महिलाएं दूर से ही उनके दर्शन कर सकती हैं. ये भी कहते हैं कि जो ब्रह्मचारी होते हैं वो महिलाओं से दूर रहते हैं. इसलिए महिलाओं से भी ब्रह्मचारी शनि की भावना का सम्मान करने की उम्मीद की जाती है.

मंदिरों में महिलाओं के जाने को लेकर सनातन धर्म में कहीं कोई मनाही नहीं है. धर्म के तमाम जानकारों का कहना है कि पुरुष की तरह महिलाएं भी मंदिर के भीतर पूजा पाठ कर सकती हैं.

इलाहाबाद के माघ मेले में कल्पवास कर रहे साधू- संतों ने भी महाराष्ट्र के शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी को गलत बताया है. हालांकि इन साधू संतों का मानना है कि अगर महिलाएं पूरे नियम संयम के साथ शनि मंदिर में जाएं तो भी उन्हें सिर्फ दर्शन ही करना चाहिए. मूर्ति को कतई नहीं छूना चाहिए.

कुरुक्षेत्र के नागेश्वर धाम के महंत स्वामी महेशाश्रम जी महाराज बताते हैं कि महिलाएं पीरियेड्स यानी मासिक धर्म ख़त्म होने पर किसी भी मंदिर में जाकर पूजा अर्चना कर सकती हैं लेकिन शनिदेव, पवन पुत्र हनुमान और कार्तिकेय की मूर्तियों को छूने की महिलाओं को मनाही है. अपवित्र होने की सूरत में ये देवगण नाराज होकर अहित कर सकते हैं.
अखिल भारतीय दंडी स्वामी संत समिति के अध्यक्ष स्वामी ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी का मानना है कि महिलाओं को खुद ही शनिदेव के मंदिर में जाने से बचना चाहिए. हालांकि वह पाबंदी लगाए जाने को गलत मानते हैं. उनका भी यही कहना है कि शनिदेव महिलाओं का अहित कर सकते हैं, इसलिए उन्हें पूरे नियम संयम के साथ ही मंदिरों में दाखिल होना चाहिए.
जिस शिंगनापुर गांव के शनि मंदिर में महिलाओं के जाने को लेकर हंगामा मचा है उस गांव के लोग सैकड़ों साल से चली आ रही परंपरा के साथ हैं. गांव के लोगों को लगता है कि शनि की वजह से इलाके में खुशहाली आई है और इसीलिए चोर यहां चोरी भी नहीं करते. ग्राम सभा ने बाकायता चबूतरे पर पूजा करने की कोशिश के लिए भूमाता ब्रिगेड और उसके कार्यकर्ताओं की निंदा करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया.
शनिदेव की महिमा को कौन नहीं जानता. कहते हैं अगर खुश हो जाएं तो रंक को राजा बना दें और नाखुश हो जाएं तो राजा भी पल भर में रंक हो जाता है. शनिदेवता के कोप का मारा कब अर्स से फर्श पर पहुंच जाए कहा नहीं जा सकता.
दिल्ली का चर्चित शनि धाम मंदिर. यहां शनि देव की दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा विराजमान है. हर रोज यहां बड़ी संख्या में लोग दर्शन के लिए आते हैं और ग्रह गोचर से मुक्ति की कामना करते हैं. एबीपी न्यूज संवाददाता विनीता यादव ने इस मंदिर में ये पता लगाने की कोशिश की कि महिला होने की वजह से कहीं कोई इन्हें मना तो नहीं करेगा. विनीता जब महरौली के शनि मंदिर में आईं तो किसी ने उन्हें अंदर आने से नहीं रोका.

मध्य प्रदेश के मुरैना के प्राचीन शनि मंदिर की गिनती सबसे पुराने मंदिर के रूप में होती है. ये मंदिर ग्वालियर से 18 किलोमीटर की दूरी पर है. मंदिर में लोग शनि की साढेसाती के अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए दान और पूजा पाठ के लिए आते हैं. ज्योतिश के मुताबिक शनि जब किसी के लग्न से बारहवीं राशि में प्रवेश करता है तो उस विशेष राशि से अगली दो राशि में गुजरते हुए अपना समय चक्र पूरा करता है. यह समय चक्र साढ़े सात वर्ष का होता हैं .ज्योतिषशास्त्र में इसे ही साढ़े साती के नाम से जाना जाता है. कहते हैं साढ़े साती का वक्त किसी भी इंसान को राजा से रंक बना देता है.

एमपी के ऐंती का ये शनिश्चरा मंदिर त्रेता युग के होने की वजह से पूरे भारत में प्रसिद्ध है. कहते हैं शनिदेव की ये असली प्रतिमा है. शनि से पीडि़त हजारों लोग समूचे भारत से ही नहीं विदेशों से शनि शान्ति और दर्शन के लिए यहां आते हैं. क्या यहां महिलाओं के अंदर आने पर यहां रोक तो नहीं है, इसकी पड़ताल से पहले आइए आपको यहां होने वाली पूजा की दिलचस्प पद्धति के बारे में बताते हैं. कहा जाता है ये मंदिर शनि पर्वत पर बना हुआ है. यहां पर एक खास परंपरा के चलते शनि देव को तेल अर्पित करने के बाद उनसे गले मिलने की प्रथा है.
यहां आने वाले भक्त बड़े प्रेम और उत्साह से शनि देव से गले मिलते हैं और अपने सभी दुख-दर्द उनसे सांझा करते हैं. शनि देव के दर्शन के बाद भक्त अपने घर को जाने से पहले अपने पहने हुए कपड़े, चप्पल, और जूते को मंदिर में ही छोड़ कर जाते हैं. भक्तों का मानना है की उनके ऐसा करने से पाप और दरिद्रता से छुटकारा मिलता है. इस मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर कोई रोक टोक नहीं है. आप देख सकते हैं महिलाएं यहां बिना किसी बाधा के आ रही हैं और पूजा अर्चना कर रही हैं.

कहते हैं शनि ने रावण को भी नहीं छोड़ा. शनि को बहुत धीरे चलने वाला ग्रह माना जाता है. इसीलिए शनि एक राशि में करीब ढाई साल रहता है. धीरे-धीरे यानी श्नै: श्नै: चलने की वजह से शनि को श्नैश्चर भी कहा जाता है. शनिदेव धीरे क्यों चलते हैं इसका राज रावण और शनिदेव से जुड़ी एक कहानी में छिपा है.

कहा जाता है कि जब मेघनाद का जन्म होने वाला था तब रावण चाहता था कि उसका बेटा अजेय हो, जिसे कोई भी देवी-देवता हरा न सके. रावण प्रकाण्ड पंडित और ज्योतिष का जानकार भी था, इसी वजह से उसने मेघनाद के जन्म के समय सभी नौ ग्रहों और नक्षत्रों को ऐसी स्थिति में बने रहने का आदेश दिया, जिससे उसके पुत्र में वो सभी गुण आ जाए, जो वह चाहता था. उस समय पूरी सृष्टि में रावण का प्रभाव इतना ज्यादा था कि सभी ग्रह-नक्षत्र, देवी-देवता उससे डरते थे. इसी वजह से मेघनाद के जन्म के समय सभी ग्रह वैसी ही राशियों में स्थित हो गए, जैसा रावण चाहता था. रावण ये बात जानता था कि शनि देव न्यायाधीश हैं और आयु के देवता हैं. शनि इतनी आसानी से रावण की बात नहीं मानेंगे. इसीलिए शनि को भी जबरदस्ती रावण ने ऐसी स्थिति में रखा, जिससे मेघनाद की आयु बढ़ जाए.

कहते हैं मेघनाद के जन्म के समय शनि ने नजरें तिरछी कर ली. तिरछी नजरों के कारण ही मेघनाद की उम्र घट गई. जब रावण को ये बात मालूम हुई तो वो शनि पर आग बबूला हो उठा. क्रोध में रावण ने शनिदेव के पैरों पर गदा से प्रहार कर दिया. इसी प्रहार की वजह से शनिदेव का पांव खराब हो गया जिसके चलते शनि धीरे-धीरे चलने को मजबूर हैं. शनि की तिरछी नजरों के कारण ही मेघनाद की मृत्यु लक्ष्मण के हाथों कम उम्र में हुई. यही वजह है कि लंबी उम्र के लिए न सिर्फ पुरुष बल्कि महिलाएं भी शनि की पूजा करती हैं.

शनि देव को न्याय देवता कहा जाता है. कहते हैं वो जान बूझ कर किसी के साथ अन्याय नहीं करते हैं. शास्त्रों के मुताबिक भगवान शंकर शनि देव के गुरु हैं. शास्त्रों ने इन्हें क्रूर ग्रह की संज्ञा दी है. ऐसी मान्यता है कि शनि देव मनुष्य को उसके पाप और बुरे कर्मों का दण्ड प्रदान करते हैं.

कहते हैं पिता सूर्य के कहने पर भगवान शंकर ने शनि की उदंडता दूर करने के लिए उन्हें समझाने की कोशिश की पर शनि नहीं माने. उनकी मनमानी पर भगवान शंकर ने शनि को दंडित किया.

इक्कीसवीं सदी में महिलाओं को मंदिर के गर्भगृह तक जाने से रोकने में शनि शिंगनापुर अकेला नहीं है. ऐसे कई मंदिर अकेले महाराष्ट्र में आज भी मौजूद हैं. वैसे धार्मिक मान्यताओं के नाम पर स्त्रियों को पवित्र स्थान से दूर रखने में सभी धर्म एक जैसे हैं. मुंबई की हाजी अली दरगाह की मजार में महिलाओं को आज प्रवेश नहीं मिलता है. देश धार्मिक नियमों से नहीं संविधान से चलता है. संविधान की धारा 25 हर भारतीय को अपनी आस्था के मुताबिक घूमने और उसका प्रचार करने का अधिकार देती है. सभी भारतीयों से संविधान के मुताबिक चलने की उम्मीद की जाती है.

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