व्यक्ति विशेष: सुब्रत रॉय क्यों हो गए बे ‘सहारा’ !

By: | Last Updated: Sunday, 30 November 2014 4:38 AM
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नई दिल्ली: कहते हैं समय को हराना नामुमकिन होता है क्योंकि समय की सत्ता अजेय है. इंसान छोटा हो या फिर बड़ा आदमी रईस हो या फिर फकीर. जब वक्त का मिजाज बदलता है तो महलों में शानों शौकत से जिंदगी गुजारने वालों को भी जेल की काल कोठऱी तक पहुंचा देता है. दिल्ली का तिहाड़ जेल यूं तो कई बार सुर्खियों में रहा है लेकिन इन दिनों जो मशहूर शख्सियत यहां कैद है उसका नाम है सुब्रत रॉय.

 

करीब 120 कंपनियों और 1 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की मिल्कियत वाले सहारा ग्रुप के मालिक हैं सुब्रत रॉय. देश के मशहूर उद्योगपति सुब्रत रॉय पिछले करीब आठ महीने से तिहाड़ जेल में बंद है और उनकी इस कैद ने उनके सहारा इंडिया परिवार को मौजूदा हालात में बेसहारा सा बना दिया है. किलेनुमा सहारा हाउस आशियाना जितना आलीशान नजर आता है, उतने ही बुलंद और मजबूत इसके ये दरवाजे भी हैं लेकिन जब इस बुलंद दरवाजे पर कानून के मजबूत हाथों ने दस्तक दी थी तो पूरे सहारा साम्राज्य में खलबली मच गई थी.

 

लखनऊ में सहारा सिटी का ये इलाका सुब्रत रॉय का ड्रीम प्रोजेक्ट रहा है और यही पर उनका ये किलेनुमा आशियाना भी तामीर किया गया है. इस सहारा स्टेट में बड़े-बड़े नेता से लेकर खिलाड़ी और फिल्मी सितारे तक अपनी चमक बिखेर कर सुब्रत रॉय के दबदबे का अहसास भी कराते रहे हैं लेकिन बदले हालात ने सुब्रत रॉय को तिहाड़ जेल की इन ऊंची और मजबूत दीवारों के पीछे ढकेल दिया है.

 

व्यक्ति विशेष में आज हम आपको गोरखपुर के उस कमरे तक ले चलेंगे जहां से शुरु हुई थी कहानी सुब्रत रॉय की और पड़ताल इस बात की भी करेंगे कि क्यों अब तक जेल में कैद हैं सहारा समूह के मालिक सहारा श्री.

 

सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत रॉय का नाम देश के बड़े उद्योगपतियों में शुमार होता है लेकिन जिस कारोबार की दुनिया ने उन्हें जमीन से आसमान की बुलंदियों तक पहुंचाया उसी कारोबार की हेराफेरी में फंस कर वो पिछले आठ महीने से जेल में बंद हैं. सुब्रत राय की इस जेलयात्रा के बीच बीते शनिवार को सहारा समूह का संकट उस वक्त और गहरा गया जब दिल्ली में उसके दफ्तरों पर आयकर विभाग ने छापे मारे थे. दो दिनों तक चली इस छापेमारी के दौरान सहारा के दफ्तरों से 125 करोड़ रुपये से ज्यादा की नकदी और कई किलो सोना बरामद किया गया है.

 

सहारा इंडिया के ऑफिस से करोड़ों की नकदी बरामद होने के बाद आयकर विभाग अब इस बात की जांच भी कर रहा है कि इतनी बड़ी रकम कहीं हवाला के जरिए तो नहीं लाई गई है.

 

आयकर विभाग द्वारा नकदी जब्त किए जाने के सवाल पर सहारा के प्रवक्ता का कहना है कि “जो कुछ भी रकम है उसकी एक-एक पाई कंपनी की वैध रकम है. पिछले एक साल से हम अपनी संपत्तियों पर पूरी रोक झेल रहे हैं. हमारे सभी बैंक खाते 20 महीने से फ्रीज हैं. फ्रीज खातों की पूरी रकम सेबी को दे दी गई है. समूह ने आपात जरूरतों की पूर्ति के लिए नकद रकम विभिन्न जगहों पर रखी है.”

 

एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की मिल्कियत वाले सहारा समूह के मालिक सुब्रत राय के राजसी ठाठ-बाट के किस्से अक्सर सामने आते रहे हैं. सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय का दबदबा कुछ ऐसा है कि राजनेता जहां उनकी दहलीज तक खिंचे आते है वहीं खेल औऱ सिनेमा के सितारे उनकी महफिल की रौनक बढाते रहे हैं लेकिन बीस हजार करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले ने उन्हें पहुंचा दिया जेल.

 

दिल्ली की तिहाड़ जेल में सुब्रत रॉय करीब आठ महीनें से कैद हैं. इस बीच उनकी रिहाई को लेकर तमाम तरह की कोशिशें होती रही हैं. दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने सहारा समूह को निवेशकों के बीस हजार करोड़ रुपये लौटाने का आदेश दिया था लेकिन जब इस पर अमल नहीं हुआ तो कोर्ट के आदेश पर मार्च महीने में सुब्रत रॉय को गिरफ्तार कर लिया गया था और तब से वो जेल में ही बंद हैं.

 

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के मुताबिक, सहारा समूह को सुब्रत रॉय की जमानत के लिए दस हजार करोड़ रुपए भारतीय प्रतिभूति एंव विनिमय बोर्ड यानी सेबी के पास जमा कराने है लेकिन सहारा समूह ये पैसा जमा नहीं करा पाया है. असल सवाल ये है कि हजारों करोड़ रुपये के साम्राज्य वाला सहारा समूह अपने मालिक सुब्रत रॉय को जेल से रिहा कराने में अभी तक नाकाम क्यों रहा है. इस बात की पड़ताल भी हम करेंगे आगे लेकिन उससे पहले सुनिए कहानी सुब्रत रॉय की.

 

पूर्वी उत्तर प्रदेश का शहर गोरखपुर. और गोरखपुर में गुरु गोरखनाथ का मशहूर मंदिर. सदियों से ये मंदिर इस शहर की सबसे बड़ी पहचान रहा है. लेकिन इस शहर की एक पहचान और भी है, वह है गोरखपुर, सहारा ग्रुप को जन्म देने वाले शहर के तौर पर भी पहचाना जाता है.

 

सहारा ग्रुप की शुरुवात तो गोरखपुर में हुई थी लेकिन इस ग्रुप के फाउंडर सुब्रत रॉय का जन्म 1948 में बिहार के अररिया जिले में हुआ था लेकिन सुब्रत रॉय ने स्कूली शिक्षा कोलकाता के होली चाइल्ड स्कूल में हासिल की थी और फिर उसके बाद वो इजीनियरिंग की पढ़ाई करने उत्तर प्रदेश के शहर गोरखपुर आ गए थे. 

 

गोरखपुर के राजकीय पॉलीटेकनिक कॉलेज से सुब्रत राय ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है. सुब्रत के दोस्त और उनके बैडमिंटन कोच रह चुके हेमचंद्र श्रीवास्तव कॉलेज के दिनों को याद कर बताते है कि सुब्रत राय की खेलों में खास दिलचस्पी थी इसीलिए वो शहर के हर टूर्नामेंट में जरुर नजर आते थे.

सुब्रत राय के दोस्त हेमचंद्र श्रीवास्तव का कहना है, ” विद्यार्थी जीवन से मैं उन्हे जानता हूं..और जब मैं सर्वोदय कॉलेज में बैडमिंटन का कैप्टन था तब से मेरी उनसे काफी घनिष्ठता थी. हर खेल में जहां तक मैने देखा है उन्हे खेलते हुए चाहे टेनिस हो, बैडमिंटन हो, चाहे बॉलिबॉल हो,चाहे बास्केटबॉल हो हर खेल में वो रुचि लेते थे और काफी उत्साह के साथ खेलते थे और हमेशा सबके साथ मिलजुल कर रहते थे जहां तक खेल की बात है हम लोगो के टूर्नामेंट्स होते रहते थे. हर कॉलेज से लोग आते थे और एक दूसरे के साथ फ्रेंडली मैच खेलते थे. यह सन् 62-65 की बात है.”

 

गोरखपुर में सुब्रत राय का मकान

गोरखपुर के तुर्कमानपुर इलाके में बने मकान की शक्लो सूरत तो अब काफी हद तक बदल चुकी है लेकिन आज भी शहर में ये मकान सुब्रत रॉय के निवास के तौर पर पहचाना जाता है. 80 के दशक में इंद्रावती निवास के इसी कमरे में सुब्रत रॉय ने अपनी जिंदगी का एक लंबा वक्त गुजारा है. यही वजह है कि जब कभी वो गोरखपुर आते है तो इस घर में आना कभी नहीं भूलते हैं. तुर्कमानपुर इलाके के लोगों को आज भी सुब्रत रॉय की वो लेम्ब्रेटा स्कूटर याद है जिस पर बैठ कर उन्होनें अपने बिजनेस की शुरुवात की थी.

 

गोरखपुर सिविल कोर्ट में एडवोकेट शक्ति प्रकाश श्रीवास्तव का कहना है कि, ”सहारा श्री हमारे यहां 74 से 78 तक थे और 1 फरवरी  1978 को उन्होने कंपनी की शुरुआत हमारे घर से ही की थी. हमारा पूरा परिवार उनके साथ था. मैं तो उनकी गोद में खेला हुं. उनके पास एक लमरेटा स्कूटर हुआ करता था तो जब वो स्कूटर स्टार्ट नहीं होता था तो हम को बुला कर बोलते थे आओ बेटा धक्का लगाओ फिर हम नारवल और बंधे तक घूम कर आते थे.  फिर गाड़ी खड़ी हो जाती थी और आज हम BMW में भी उनके साथ बैठे हैं तो आज भी आश्चर्य़ लगता है कि जिसके साथ लमरेटा में बैठा हूं आज उनके साथ BMW  में बैठा हूं.”

 

गोरखपुर में गोलघर बाजार

 

गोरखपुर की इन्हीं सड़कों पर भटकते हुए सुब्रत रॉय ने जिंदगी में संघर्ष का अपना पहला सबक सीखा था. सुब्रत रॉय ने अपने करियर की शरुवात रोजमर्रा के छोटे- मोटे सामान बेचने से थी. गोरखपुर की मेयर रही अंजू चौधऱी बताती है कि शुरुआत में सुब्रत रॉय अपने लेम्ब्रेटा स्कूटर पर साबुन और दालमोठ जैसी छोटी-छोटी चीजें रख कर बेचा करते थे लेकिन उनकी जिंदगी में उस वक्त टर्निंग प्वाइंट आया जब उन्होंने 1978 में गोरखपुर में अपनी चिट फंड कंपनी की शुरुवात की थी और उस चिट फंड कंपनी का नाम था सहारा.     

 

सहारा ग्रुप चेयरमैन सुब्रत राय ने खुद बताया था कि, ये एक्टिविटी गोरखपुर में अचानक शुरू हुई  मैंने देखा कि बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्होंने कभी सेविंग्स के बारे में सोचा ही नहीं तो मैं उन लोगों को बोलता कि आप थोड़े-थोड़े पैसे सेव कीजिए और इसके बाद आप सेक्योर लोन भी ले सकते हैं इसके जरिए मैं उन लोगों के पास जाया करता था. छोटे-छोटे दुकानदारों के पास यहां तक कि पान वाले के पास भी जाता था. हम छोटे डिपॉजिट लेते थे जैसे 15-30 रुपए तक औऱ फिर अलग-अलग बेनेफिट्स के साथ उनके पास जाते थे. क्या आप पर्सनली जाते थे? यह पूछने पर सहारा ने कहा था, हां मैं खुद जाता था, मेरे पास एक स्कूटर था मैं घूमता रहता था. डिपॉजिट्स करवाता था.

 

गोरखपुर के गोलघर इलाके में मौजूद बिल्डिंग के एक कमरे से सुब्रत रॉय सहारा ने अपनी चिटफंड कंपनी की शुरुवात की थी. सुब्रत रॉय महीने भर अपने लेम्ब्रेटा स्कूटर पर शहर में घूम-घूम कर बीस-बीस रुपये जमा करते थे और फिर ऊपरी मंजिल पर बने अपने एक कमरे के आफिस में मंथली ड्रॉ निकाला करते थे. सहारा चिट फंड के ड्रॉ में चीफ गेस्ट रह चुके पी के लाहिडी को आज भी अच्छी तरह याद है कि उन दिनों सुब्रत रॉय किस तरह चिट फंड कंपनी को चलाया करते थे.

 

सुब्रत राय के दोस्त पी के लाहिड़ी बताते हैं, ”एक बार उन्होने ड्रा के लिए हमें एक चीफ गेस्ट के तौर पर बुलाया, तो बाटा की छत पर उनका ड्रा होता था, छोटा सा ऑफिस था बड़ी भीड़ थी..तो वो औऱ सुबोद नाथ दो ही आदमी थे सहारा चिट फंड के..सहारा चिट फंड बॉम्बे की कन्सर्न थी..जिसमे मिस्टर खुराना और जग्गी हुआ करते थे वो लोग इनको यहां ऑफिस का इन्चार्ज बनाए हुए थे..उन्होने कहा जगह की बड़ी कमी है तो हमने कहा हमारे पास आ जाइए..इसी बिल्डिंग में उनको एक बड़ा कमरा दे दिया गया और उन्होने सहारा का ऑफिस खोला.”

 

सुब्रत रॉय ने 1978 में पैराबैंकिंग के क्षेत्र में कदम रखा था. उस वक्त देश में मौजूद नॉन बैंकिंग की इकलौती और निर्विवाद कंपनी पियरलेस के तौर-तरीकों की नकल करके सहारा चिटफंड कंपनी ने जनता से पैसा उगाहना शुरु किया था. सहारा चिटफंड ने निवेशकों से तीन साल में पैसा दोगुना करने का दावा किया था. उसके इस वायदे ने काम भी किया और धीरे–धीरे कंपनी का कलेक्शन बढता चला गया. लेकिन सुब्रत रॉय के लिए चिटफंड कंपनी चलाने का ये काम इतना आसान भी नहीं था क्योंकि निवेशकों के पैसे डूबने का खतरा हमेशा बना रहता था.

 

पी के लाहिड़ी कहते हैं, ”एक दिन वो बहुत डिस्टर्ब थे जब सहारा इंडिया बना उस साल की बात है. पंजाब नेशनल बैंक में उनका अकाउंट था. ये खुराना और जग्गी अल्टरनेटिव मन्थस आते थे और जितना रुपया होता उसे ट्रांसफर करके मुंबई ले जाते और सारा इनवेस्टमेंट वहां करते और जब रीपेमेंट का टाइम आएगा और यह पैसा हमें नहीं मिला तो लोग हमारे लोग हमारे गुडविल पर पैसा जमा करते है तो हम कैसे देंगे फिर.”

 

पी के लाहिडी ये भी बताते है कि किस तरह सुब्रत रॉय ने उस वक्त इस खतरे को खत्म करने के लिए एक दूसरा खतरा और मोल ले लिया था. उन्होनें सहारा चिटफंड कंपनी से जुड़े मुंबई के लोगों पर इस बात के लिए दबाव डाला कि गोरखपुर में लोगों से जमा किए गए पैसे का निवेश मुंबई की बजाए गोरखपुर में ही किया जाना चाहिए.  

 

सुब्रत राय के दोस्त पी के लाहिड़ी का कहना हैं, ”पहले तो इन लोगो ने ना-ना की उसके बाद फिर ठाकुर अनुग्रह नारायण सिंह, जितेंद्र राय ये दोनों काफी अच्छे दोस्त  थे इन लोगो ने थोड़ा सा साम-दाम-दंड-भेद किया और ये लोग तैयार हो गए. उन्होंने कहा नॉर्थ इंडिया का काम आप कीजिए हम लोगो से मतलब नहीं है. हम लोग महाराष्ट्र पर ध्यान देंगे. यहां पर 2000 रुपये छोड़कर बाकी के 35000 पंजाब नेशनल बैंक में ट्रांसफर करवा चुके थे. तो फिर रातोरात यहां एग्रीमेंट बना. मिस्टर डी.ए. शुक्ला चार्टड अकाउंटेड थे. शाम को यह तय हुआ तो ये हुआ कि स्टाम्प पेपर चाहिए वो कहां से आएगा? तो मैं और सुब्रोतो दोनो इलाही बाग गए और वहां से स्टाम्प  खरीदकर लाए और मेरी ही टाइपराइटर पर एग्रीमेंट लिखा गया, टाइप हुआ. रात को दस्तखत हुआ और सुबह वापस कर दिया गया और वहीं अगले दिनSAHARA India बना और  SAHARA India  का बोर्ड लग गया. तब से सहारा इंडिया यही तक था फिर यहीं से उन्होंने CINEMA ROAD का OFFICE खोला फिर command office shift लखनऊ में किया.”

 

गोरखपुर के गोलघर इलाके में एक कमरे से सुब्रत राय ने सहारा चिटफंड की शुरुवात महज दो हजार रुपये से की थी. उनकी कंपनी में भी दो ही लोग थे जिनमें एक क्लर्क और एक चपरासी शामिल था लेकिन सुब्रत रॉय की जिंदगी में इस कठिन संघर्ष के साथ एक हसीन सपने की शुरुवात उस वक्त हुई जब सपना रॉय ने उनके दिल पर दस्तक दी थी.

 

ऑल इंडिया रेडियो में सिंगर रह चुकी सपना रॉय को आज भी वो दिन याद है जब शादी के बाद वो ससुराल आई थी तो उनके घर की छत से बारिश का पानी टपकता था. गरीबी और संघर्ष के उन दिनों को सुब्रत और सपना रॉय आज भी भूले नहीं है.

 

सुब्रत रॉय की पत्नी सपना रॉय ने बताया, ”शादी के बाद जब ये मुझे हमारे घर ले गए तो इन्होंने बड़े शान से कहा कि आओ मैं तुम्हें वो कमरा दिखाता हूं जहां हम रहने वाले हैं. मैं अंदर गई तो मैंने देखा कमरे की छत टिन की थी और उसमें भी कई जगह छेद थे और एक खटिया थी जब भी बारिश होती थी हम उस खटिया को इधर से उधर शिफ्ट करते थे.

 

जीवन के संघर्ष को करीब से देखने वाले सुब्रत रॉय सपने बेचने में शुरु से माहिर रहे हैं. गोरखपुर के शुरुवाती दिनों में छोटी कमाई वालों को उन्होंने बड़े- बड़े सपने दिखाए थे और यही छोटी-छोटी कमाई उनके पास जमा होती गई और वो कामयाबी के साथ सपने बेचते चले गए. दो हजार रुपये से शुरु हुई सहारा चिटफंड कंपनी आज लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के सहारा ग्रुप में तब्दील हो चुकी है लेकिन लोगों को आकर्षित करने का उसका तरीका और अंदाज आज भी बदला नहीं है क्योंकि शो बिजनेस के इस हुनर को सुब्रत रॉय ने गोरखपुर के दिनों में ही अच्छी तरह से साध लिया था.

 

गोरखपुर की पूर्व मेयरअंजू चौधरी का कहना है, ”ही इज ए वैरी गुड क्रिकेटर, वो क्रिकेट बहुत बढिया खेलते थे. हमने उनके क्रिकेट मैच भी देखे हैं और उस जमाने में भी गावस्कर को बुलाने में गोरखपुर में उनका बहुत बड़ा हाथ था. तो इस तरह का काम उनका शुरु से था क्योकि ऐसा नहीं है कि वो शो बिजनेस में बिलीव करते हैं आदमी जब एक लेवल पर पहुंच जाता है तो आपको एक समय के हिसाब से चलना पड़ता है. समय के साथ ही उन्होंने हर तबके के लोगों को साथ लेकर जैसा कि इनवेस्टमेंट स्कीम स्टार्ट किया. हाउसिंज स्कीम स्टार्ट किया. मेडिकल फाउंडेश स्टार्ट किए. स्कालरशिप के लिए ये जितना चीज उन्होने स्टार्ट किया वो एक चीज उनके दिमाग में थी कि सोसाइटी को कुछ देना है.”

 

सुब्रत रॉय की सहारा चिटफंड कंपनी की उड़ान के लिए जब गोरखपुर का आसमान छोटा पड़ गया तो सुब्रत रॉय ने अस्सी के दशक के आखिर में गोरखपुर को अलविदा कह दिया और 1990 में सहारा चिटफंड का कमांड ऑफिस लखनऊ शिफ्ट कर दिया गया था. सहारा चिटफंड कंपनी में पैसा आया तो सुब्रत रॉय ने इसे कंपनी के प्रचार-प्रसार में झोंक दिया. मुख्य शहरों में सहारा की विशाल इमारतें बनवाईं गईं. क्रिकेट से लेकर फिल्मी सितारों और राजनेताओं को रिझाने के लिए भव्य आयोजन करवाए गए. दरअसल इन सबके पीछे रणनीति ये थी कि सहारा की जितनी ज्यादा चर्चा होगी कंपनी निवेशकों से उतना ही ज्यादा पैसा जुटा सकेगी. 

 

वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्रा कहते हैं, ”वो परफेक्शन तक ले जाते है वो किसी चीज को हाइट तक ले जाना चाहते हैं. प्रजेनटेशन के मामले में बहुत सतर्क आदमी हैं. तो वो चाहते है कि किसी चीज को इस तरह प्रजेंट किया जाए जिसमें ग्लैमर का तड़का होगा तो लोगों का आकर्षण होगा, लोगों का आकर्षण होगा तो लोग आएंगे दूसरा उनका जो बिजनेस है वो बिजनेस आकर्षण का बिजनेस है. एक दौर में थोड़ी दिक्कत आई तो उससे अमिताभ बच्चन जुड़े. तमाम बड़े लोग जुड़े तो सब में आकर्षण हैं. अमर सिंह जुड़े तो ये जो आकर्षण थोड़ा थोड़ा था. उसको इन कैश करके उसको बिल्टअप करके उन्होने अपने साम्राज्य को खड़ा किया. और वो जानते है औऱ मानते है इस बात पर यकीन भी करते है. कि जब तक ग्लैमर नहीं होगा चीजों को परफेकशन तक नहीं ले जाएंगे तब तक लोगों का आकर्षण नहीं होगा और आकर्षण नहीं होगा तो उनके व्यापार में बढोतरी नही होगी उनका व्यापार आगे नहीं बढेगा.

 

बिजनेस की बारिकियों को समझने वाले सुब्रत रॉय शोहरत और ग्लैमर की ताकत को कारोबार की दुनिया में इस्तेमाल करने का हुनर भी बखूबी जानते हैं. यही वजह है कि उनको जल्द ही ये भी समझ आ गया कि कारोबार की दुनिया में कामयाबी हासिल करने के लिए राजनीति का साथ जरुरी है और इसीलिए पहले वो उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह के संपर्क में आए और फिर मुलायम सिंह यादव के शासनकाल में जब अमर सिंह उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास परिषद के अध्यक्ष बनाए गए तो इस परिषद में सुब्रत रॉय समेत उनके तमाम करीबी शामिल किए गए. लेकिन सुब्रत रॉय खुद राजनीति के दलदल से दूर रहने का दावा करते रहे हैं.

 

2006 में सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत रॉय ने कहा था, ”राजनीतिक संबंध मेरे किसी से नहीं है मेरे सब संबंध व्यक्तिगत संबंध हैं आज अगर हम समाजवादी पार्टी की बात कर रहे हैं, मुलायम सिंह की बात कर रहे हैं मैं उन्हें श्रद्धा करता हूं ऐसे ही तमाम और भी राजनीतिक बड़े बड़े वरिष्ठ गण हैं जिनसे हमारे बहुत अच्छे संबंध हैं उन्हें भी मैं श्रद्धा करता हूं, उन्हें भी मैं बहुत प्यार करता हूं सम्मान करता हूं तो इसलिए मैं ये कहना चाहुंगा कि जब मैं राजनीतिक संबंध मेरा किसी से नहीं है व्यवसायिक संबंध मेरा किसी से नहीं है सब व्यक्तिगत संबंध हैं.”

 

दो हजार रुपये से हजारों करोड़ रुपये के आर्थिक साम्राज्य का सफर तय करने वाले सुब्रत रॉय की ये कहानी कामयाबी की कहानी होती अगर सेबी के साथ सहारा समूह अपने सबसे बड़े झगड़े में उलझा ना होता. ब्रेक के बाद बताएंगे कैसे 20 हजार करोड़ के फेर में उलझकर तिहाड़ जेल पहुंच गए सहारा श्री.

 

बॉलीवुड के बादशाह शाहरुख खान उनकी महफिलों की रौनक बढाते हैं.  राजनीति के दिग्गज और क्रिकेट के महारथी उनकी महफिलों में मेहमान बन कर आते हैं. मुंबई में सहारा की एंम्बे वैली हो या लखनऊ का सहारा एस्टेट. सुब्रत रॉय की सितारों से जगमगाती ये महफिलें खासी मशहूर रही है. ये रसूख, ये दबदबा और ये शोहरत कम ही लोगों को नसीब होती है. क्रिकेट की दुनिया से लेकर फॉर्मूला वन के ट्रैक तक और बॉलीवुड से लेकर आम आदमी के घर तक सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय का एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का साम्राज्य फैला हुआ है. लंदन में ग्रॉस वेन्सर्स होटल हो या न्यूयार्क में लैंडमार्क प्लाजा होटल सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय की कामयाबी का ये कारवां देश की सरहदों के पार भी जा पहुंचा है. सहारा ग्रुप ने ई शाइन, यू गोल्डन, और क्यू शॉप जैसी कई नामी स्कीम्स चलाने के साथ ही रीयल स्टेट, स्पोर्ट्स, फिल्म इंडस्ट्री और मीडिया के कारोबार में भी अपनी मजबूत पकड़ बनाई है.

 

2006 में सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत रॉय ने कहा था, ”हम लोगों का  मेजर फाइनेंस का बिजनेस तो है ही , मैं केवल पैराबैंकिग की बात नहीं कर रहा हूं अब तो हम लोगों ने लाइफ इंशोरेंस का काम शुरू कर दिए हैं, म्यूचुअल फंड का काम शुरू किए हैं, हाउसिंग फाइनेंस का काम शुरू किए हैं मगर उसके साथ साथ एक बहुत बड़ा काम हम शुरू कर चुके हैं इंफ्रास्ट्रक्चर और हाउसिंग का , खासकर हाउसिंग की बात मैं कहना चाहुंगा कि 217 जगह पर हमलोग टाउनशिप ला रहे हैं हिंदुस्तान में और इतना बड़ा योजना मैं समझता हूं देश में तो छोड़ दीजिए शायद विदेशों में भी हुआ हो लोग कहते हैं शायद आज दुनिया की सबसे बड़ी योजना वही है जो हमारा सहारा सिटी होम्स के नाम से टाउनशिप आ रही हैं. आप इससे अंदाजा  लगा सकते हो कि इसकी प्रोजेक्ट वैल्यु जो है करीब  2 लाख 40 हजार करोड़ की है सहारा सिटी होम्स की . इस प्रकार की बड़ी बड़ी योजना हम लोगों ने शुरू कर दिया है.”

 

सहारा इंडिया परिवार या सहारा समूह एक व्यापारिक संगठन है. जिसकी कुल संपत्ति एक लाख करोड़ रूपये से ज्यादा की आंकी जाती है. लेकिन सिर्फ संपत्ति ही सहारा समूह की पहचान नहीं है. बल्कि खेल और ग्लैमर की दुनिया से उसके नाते के चलते भी उसे पहचाना जाता रहा है. 1 जनवरी 2014 से पहले करीब चार साल तक टीम इंडिया का स्पांसर सहारा समहू रहा है. सहारा आईपीएल के मैदान में भी अपनी पुणे वॉरियर्स टीम उतार चुका है यही नहीं विजय माल्या की फॉर्मूला वन टीम का 500 करोड़ रुपये में 42 फीसदी हिस्सा खऱीदकर सहारा उसे अपना नाम दे चुका है.

 

1978 में दो लोगों से शुरु हुआ सहारा ग्रुप आज दस लाख लोगों को रोजगार देने और 7 करोड़ लोगों को अपने साथ जोड़ने का दावा करता हैं. सहारा इंडिया रीयल एस्टेट, इंफ्रास्ट्रक्चर, मीडिया, होटल, वित्त, सूचना प्रौद्योगिकी और खुदरा व्यापार में उतरा हुआ है. लेकिन सहारा की असल पहचान पैराबैंकिंग यानी जमीनी स्तर पर पैसा जुटाने की ताकत के कारण होती है. इस ताकत का वो कैसे इस्तेमाल करता है इसको बताते हैं ये आंकड़े.

 

बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार के मुताबिक अप्रैल 2011 से सितम्बर 2012 के महीनों में सहारा इंडिया परिवार की संपत्ति 14286 करोड़ रुपये बढ़ गई. ये वो दौर है जब सहारा इंडिया परिवार सेबी के साथ 24000 करोड़ के झगड़ें में उलझा हुआ था. इन 17 महीनों में सहारा ग्रुप ने 60,091 करोड़ रूपये निवेशकों से इकट्ठा किए जबकि निवेशकों को लौटाए 45805 हजार करोड़ रुपये. इसकी सबसे बड़ी वजह थी पूरे देश में दस लाख एजेंट और कर्मचारियों की फौज जिसने 4618 सेंटरों के जरिए हर महीने औसतन साढे तीन हजार करोड रूपये की रकम इकट्ठा की.

 

सहारा ग्रुप की दूसरी सबसे बड़ी ताकत और पहचान है उसका लैंड बैंक. 2012 में विज्ञापन के जरिए सहारा ग्रुप ने दावा किया है कि उसके पास करीब 36631 एकड़ की जमीन हैं जिसकी कीमत करीब 36 हजार करोड़ रुपये बताई गई थी. सुब्रत रॉय दावा करते रहे हैं कि उनके इस आर्थिक साम्राज्य की नींव ईमानदारी है. और उन्होंने मेहनत के दम पर अपना ये अरबों रुपये का साम्राज्य खड़ा किया है. लेकिन सुब्रत रॉय को मिले इन तमाम सम्मानों के बावजूद कई तरह के आरोप भी उनका पीछा करते रहे हैं.  सुब्रत रॉय पर लंबे वक्त से काले धन के इस्तेमाल का आरोप भी लगता रहा है.

 

सुब्रत रॉय को 1986 में नोबल सिटीजन अवार्ड, 1994 में उद्यम श्री, 2001 में नेशनल सिटीजन अवार्ड,2002 में बिजनेस मैन ऑफ द इयर, 2004 में ग्लोबल लीडरशिप अवार्ड और 2007 में टीवी आईकन ऑफ द ईयर का अवार्ड मिला है.

 

2006 में सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत रॉय ने बताया था कि, ”पहला तो मेरे पास एक रुपया भी किसी का इस संस्था में नहीं है ये बात अलग है कि किसी ब्रांच में अगर 10-20-25 हजार रुपए जमा कराए हों तो मुझे नहीं मालूम. मेरे पास किसी का एक रुपया भी नहीं है चेक पेमेंट से भी नहीं है और कैश पेमेंट से भी नहीं है. जो आप कह रहे हैं अगर किसी व्यक्ति का नाम लें आप तो मैं ये बात कह सकूंगा कि ये बात क्यों गलत है कैसे गलत है, अब जैसे मैं ही आप को कह रहा हूं मैं सुना हूं हमारे यहां मुख्यमंत्री थे वीर बहादुर सिंह उनके बारे में कहा जाता है, मेरी उनसे मुलाकात सिर्फ एक दिन की है और सिर्फ 10-15 मिनट की है. उत्तराधिकारी की बात बाद में आती है पहले मुझसे ही बात नहीं हुई है.”

 

महज 2 हजार रुपये से हजारों करोड़ रुपये तक सुब्रत रॉय ने कामयाबी की लंबी छलांग लगाई है लेकिन इतना बड़ा आर्थिक साम्राज्य खड़ा करने वाले सुब्रत रॉय को आखिर जेल क्यों जाना पड़ा. अब आपको बताते हैं कैसे सहारा समूह का खुला था गड़बड़झाला और क्यों गिरप्तार हो गए थे सुब्रत राय सहारा?

 

दरअसल ये मामला निवेशकों को उनके 20 हजार करोड़ रुपये नही लौटाए जाने से जुड़ा है. करीब पांच साल पहले रोशन लाल नाम के एक शख्स की शिकायत पर निवेशकों के हितों का ध्यान रखने वाली संस्था सेबी यानी भारतीय प्रतिभूति विनिमय बोर्ड ने सहारा समूह की कंपनियों के खिलाफ शिकायत दर्ज की थी. और इसके बाद सेबी ने सहारा समूह की कंपनियों में कथित गड़बड़ियों की जांच शुरु कर दी थी. 

 

दरअसल हुआ यूं था कि 2010 में सहारा प्राइम सिटी नाम की कंपनी ने शेयर बाजार से पैसे जुटाने के लिए आईपीओ निकाला. निवेशकों का विश्वास जीतने के लिए IPO के प्रोस्पेक्टस में लिखा था कि ग्रुप की दो अन्य कंपनियां डिबेंचर के ज़रिये सैकड़ों करोड़ रुपये पब्लिक से जुटा रही हैं. इस पर सेबी की नज़र पड़ी कि ये कौन सी कंपनियां पैसा जुटा रही हैं जिनका सेबी को ही पता नहीं है? सेबी ने नवंबर 2010 में ऑर्डर जारी किया कि SIREC यानी सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉर्पोरेशन और SHIC यानी सहारा हाउसिंग इनवेस्टमेंट कॉर्पोरेशन पैसा जुटाना बंद करें.

 

सेबी ने आरोप लगाया था कि सहारा समूह की इन दो कंपनियों ने 3 करोड़ निवेशक बॉन्ड धारकों से करीब 6,380 करोड़ रुपये और 19,400 करोड़ रुपए जुटाए जबकि ये दोनों कंपनियां शेयर मार्केट में लिस्टेड नहीं हैं. सेबी का कहना है कि सहारा की इन कंपनियों ने नियमों का उल्लंघन करके रकम इकट्ठा की और ये गैरकानूनी है.

 

उस वक्त सेबी में तैनात IAS अफसर के एम अब्राहम ने जांच में पाया कि सहारा समूह की कंपनियों के पास सारे निवेशकों के नाम पते का ब्यौरा तक तैयार नहीं था. और ये दोनों कंपनियां 40,000 करोड़ जुटाने निकली थीं जिसमें से करीब 24,000 करोड़ जुटा भी चुकी थीं. जिसके बाद 2011 में मार्केट रेगुलेटर सेबी ने सहारा समूह से निवेशकों को उनके पैसे ब्याज समेत लौटाने को कहा था. लेकिन इस मामले को सुब्रत राय एक साजिश करार देते रहे.

 

सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत राय ने 2014 में कहा, ”कभी राजनीतिक बातो से शुरु हुआ था य़े सब मैं मानता हूं इस बात को और समय आने पर ये बात सामने रखूंगा मगर उसका एक चेन रिएक्शन हुआ. जैसे RBI ने हमें प्रविट ऑर्डर दे दिया ये सोचा था कि कम्पनी SMASH (खत्म) हो जाएगी. मगर भगवान के आर्शिवाद से कुछ भी नही हुआ. HC, SC ने SUPPORT कर दिया. इन लोगो को प्रविट ऑर्डर को withdrawl करना पड़ा और मुझे सात साल का टाइम देना पड़ा. 1947 के बाद पहली बार प्रविट ऑर्डर withdrawl था. ये लोग ने निजी डिफीट ले लिया, मै क्या करु उन्हा में से एक व्यक्ति बोर्ड में थे. एक reaction चला आ रहा है RBI में बात सीमिलर हो गई उनको प4सनल डिफीट हो गया. SEBI के लोग पहले ऐसे नही थे आपको आश्चर्य होगा. 21 अप्रैल सेबी ने MCA को चिट्ठी लिखी इसी दो कम्पनी के बारे में..ये दो कम्पनी हमारे under में नही आती है इसी दो कम्पनी के बारे मे अप्रैल में लिखा और नवंबर को हमे providit order दे दिया.”

 

इस पूरे मामले में सहारा ग्रुप का कहना था कि हम पैसा पब्लिक से नहीं बल्कि अपने सहारा इंडिया परिवार से जुटा रहे है. इस पर सेबी ने कहा कि लाखों निवेशकों का सहारा परिवार कैसे हो सकता है और फिर बाद में ये पूरा मामला अदालत में चला गया.

 

इस बीच आईएएस अफसर अब्राहम का सेबी से तबादला हो गया लेकिन वो सहारा के खिलाफ अदालत में केस इतना पुख्ता कर गए कि सवाल ये नहीं रहा कि पैसा कहां है. बल्कि असली सवाल ये हो गया कि निवेशक कहां है? यानी निवेशक हैं भी या नहीं. औऱ अगर नहीं हैं तो ये हजारों करोड़ रुपये किसके हैं?

 

लंबी प्रक्रिया के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ये कंपनियां जो अब कह रही हैं कि इनको बाकी बीस हजार करोड़ रुपये निवेशकों को लौटाना है. वो बीस हजार करोड़ और निवेशकों की लिस्ट सेबी को सौंप दे. सेबी ये पैसा निवेशकों को लौटाएगी. सहारा समूह ने सेबी के पास 5120 करोड़ रुपये जमा भी कराए लेकिन वो निवेशकों की पूरी और सही जानकारी के साथ बीस हजार करोड़ रुपये सेबी को नहीं दे सका. जिसके बाद कोर्ट के आदेश पर सहारा प्रमुख सुब्रत रॉय़ को मार्च महीने में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था.

सुब्रत रॉय करीब आठ महीनों से जेल में हैं. शोहरत के आसमान पर चमकने वाले सुब्रत रॉय सहारा का सितारा आखिर क्यों गर्दिश में आ गया है. आप खुद सुनिए सुब्रत रॉय के ज्योतिष की जुबानी उनके ग्रह- नक्षत्रों की भी ये कहानी.

 

सुब्रत राय के ज्योतिष पंडित कृष्ण मुरारी मिश्रा के मुताबिक, ”उनके आगे बढाने में शनि का बड़ा योगदान कहा जाएगा औऱ उनकी जीवन की मुश्किलों को पैदा करने में भी शनि का बड़ा योगदान कहा जाएगा. ये शनि घूमते घूमते जब तुला राशि में आता है ना सबसे मजबूत हो जाता है. ये पिछले दिनों तुला राशी में ही चल रहा था. नवंबर 2011 से लेकर नवंबर 2014 तक शनि जब अपने अंतिम वर्षों में आ  जाता है. तो इसके जो निगेटिव इफेक्ट है क्योकि ये निगेटिव सत्ता का मालक है तो इसके निगेटिव प्रभाव पड़ सकते हैं तो निगेटिव प्रभाव बढ़ जाते है तो जीवन की मुश्किले भी बढ़ जाती है.संघर्ष भी बढ़ जाते है. ये लड़ाई या संघर्ष इस पार्ट पर आ गया इस रुप में आ गया शनि दो नवंबर को चेंज हो चुका है. पर अपने परिवर्तन के बाद भी उसको मैच्योर होने में या ट्राजिंट से बाहर निकलने में करीब 70 दिन लग जाते है.”

 

सुब्रत रॉय के ज्योतिष के मुताबिक उनके अच्छे दिन अब आने वाले हैं. शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सहारा ग्रुप ने भी जानकारी दी है कि उसने एक ऐसी कंपनी ढूंढ ली है जो सहारा ग्रुप के विदेश में मौजूद तीन होटलों को गिरवी रख कर उसे कर्ज देने के लिए तैयार हो गई है. सहारा समूह ने अदालत से विदेश में स्थित इन संपत्तियों पर मिलने वाले 3070 करोड़ रुपए को एक एस्क्रो एकाउंट में ट्रांसफर करने की अनुमति भी मांगी है ताकि सुब्रत रॉय की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हो सके. इस मामले में अब अगली सुनवाई मंगवार को होनी है.

 

निवेशकों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए बनी संस्था सेबी और सहारा समूह के बीच ये जंग कई महीनों से अदालत में चल रही है और इस मामले में पिछले करीब आठ महीने से सुब्रत रॉय तिहाड़ जेल में कैद है. इस बीच कोर्ट के आदेश पर उन्हें जेल से ही अपनी संपत्ति बेच कर निवेशकों के पैसे लौटाने की इजाजत भी दी गई थी. लेकिन इस सारी कवायद का कोई नतीजा नहीं निकल सका है और इस तरह उत्तप्रदेश के गोरखपुर से शुरु हुआ सुब्रत रॉय की कामयाबी का सफर आज अरबों रुपये तक जा पहुंचा है. लेकिन आज खुद सुब्रत रॉय कानून के शिकंजे में हैं और संकट में घिरा है सहारा. 

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