संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द पर डॉ आंबेडकर ने क्या कहा था?

By: | Last Updated: Saturday, 28 November 2015 12:20 PM
what doctor ambedkar said about word secularism in preamble of constitution

नई दिल्ली: भारत के संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर शब्द कब और कैसे जुड़ा? बहस इस बात पर भी है कि क्या संविधान निर्माता डॉक्टर भीमराव आंबेडकर सेक्युलर शब्द को भारत के संविधान की प्रस्तावना में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे? आखिर क्या है इसकी सच्चाई.

 

26 नवंबर 1949 को भारत का संविधान बनकर तैयार हुआ. उस वक्त संविधान की प्रस्तावना में भारत के मूल चरित्र को बताते हुए सेक्युलर और सोशलिस्ट जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया था.

 

लोकसभा में संविधान पर चर्चा के दौरान राजनाथ सिंह ने कहा, ”सेक्युलर शब्द का प्रयोग बाबा साहेब ने नहीं किया.” इस पर लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा, “‘वो डालना चाहते लेकिन उस वक्त नहीं कर पाए.”

 

हालांकि हकीकत ये है कि जब संविधान सभा में संविधान की प्रस्तावना पर बहस चल रही थी तब संविधान सभा के सदस्य के टी शाह ने सेक्युलर, फेडरल और सोशलिस्ट जैसे शब्दों को जोड़ने का प्रस्ताव रखा था. लेकिन ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ आंबेडकर ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था. डॉ आंबेडकर की दलील थी कि संविधान में पहले ही इन बातों की व्यवस्था है. इन्हें प्रस्तावना में डालना ज़रूरी नहीं. देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था है. ऐसे में इस तरह के दायरे बनाना ज़रूरी नहीं.”

 

1950 में संविधान के लागू होने के करीब 26 साल बाद 42वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलर और सोशलिस्ट शब्द जोड़ा गया. तब देश में इमरजेंसी लगी थी. उसके बाद से ही यह दोनो शब्द संविधान की प्रस्तावना का हिस्सा बन गए. अक्सर यह सवाल उठता है कि जब डॉक्टर आंबेडकर ने 1949 में इन शब्दों को जोड़ना जरूरी नहीं समझा तो 1976 में ऐसा क्या हो गया कि इंदिरा गांधी की सरकार ने संविधान संशोधन लाकर सेक्युलर शब्द को भारत के संविधान का हिस्सा बना दिया.

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Web Title: what doctor ambedkar said about word secularism in preamble of constitution
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