एबीपी एक्‍सक्‍लूसिव: क्या नेहरू ग़लत थे?

By: | Last Updated: Friday, 14 November 2014 3:40 PM
What were Nehru Wrong Decisions?

नई दिल्ली: आपने तीनमूर्ति भवन का नाम जरूर सुना होगा. दिल्ली के दिल में मौजूद यह इमारत आज भले ही एक म्यूजियम है, लेकिन आज से 50 साल पहले तक यह भारत की सत्ता का केंद्र थी. यहीं पर कई ऐसे फैसले हुए जिन्होंने भारत की दशा और दिशा तय की. भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने यहीं पर रहते हुए आजाद हिंदुस्तान की नई कहानी लिखी.

 

नेहरू ने अपनी किताब आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न इंडिया में लिखा, “सारी दुनिया बदल रही है, इंसान बदल रहा है. नयी नयी ताकतें आती हैं, अगर हम इनको नहीं समझे और उनको इस्तेमान नहीं करेंगे तो अपनी भलाई के लिए और दुनिया की भलाई के लिए तो हम पिछड़ जाएंगे….हम लंबी लंबी बातें करें और दुनिया आगे बढ़ जाए.”

 

यह सोच है… भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की. 200 साल की गुलामी से आजाद हुए मुल्क के प्रधानमंत्री की. उस वक्त नेहरू के सामने शून्य से शुरूआत की चुनौती थी. उन्हें न सिर्फ देश को अपने पैरों पर खड़ा करना था बल्कि उसे दुनिया में एक नई पहचान भी दिलानी थी. इस कोशिश में, एक प्रधानमंत्री के तौर पर नेहरू ने बहुत कुछ ऐसा किया जिसकी वजह से आज भारत दूसरे देशों के साथ कंधे से कंधा मिला कर खड़ा है. लेकिन इसके बावजूद नेहरू के कुछ फैसलों पर हमेशा सवाल उठते रहे. तब भी और आज भी. यहां तक कहा गया कि बेहतर होता अगर नेहरू भारत के प्रधानमंत्री न होते.

 

नेहरू नहीं पटेल को होना चाहिए था पीएम!

 

आजाद भारत के पहले भारतीय गवर्नर जनरल चक्रवर्ती राजगोपालाचारी ने लिखा था ( सी राजगोपालाचारी, 1971) “निस्संदेह बेहतर होता, यदि नेहरू को विदेश मंत्री और सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता. …तब भारत में कश्मीर, तिब्बत, चीन और दूसरे विवादों की कोई समस्या नहीं रहती.”

 

नेहरू अगर प्रधानमंत्री न होते तो क्या कश्मीर और चीन की समस्या नहीं होती ? यह एक ऐसा सवाल है जिसका कोई सीधा जवाब नहीं मिल सकता. लेकिन इन दो मुद्दों पर नेहरू को हमेशा कटघरे में खड़ा किया जाता रहा. उन पर उंगली उठाने वालों में उनकी अपनी पार्टी से लेकर विपक्षी दलों तक सभी शामिल थे. आजाद भारत के पहले उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री सरदार पटेल, कश्मीर और चीन से जुड़े कई मामलों में नेहरू की राय से इत्तेफाक नहीं रखते थे. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, हिंदू महासभा और भारतीय जनसंघ ने भी इन मुद्दों पर नेहरू का विरोध किया.

 

आरएसएस के विचारक राकेश सिन्हा कहते हैं, “कुछ ऐसे फैसले किए जो देश के लिए बोझ बन गये.”

 

लेकिन इतिहासकार मुशीरुल हसन कहते हैं,  “कश्मीर और चीन पेंचीदा समस्या थी. हो सकता है इनकी हैंडलिंग में कुछ भूल हुयी हो लेकिन पूरी आलोचना ठीक नहीं है.”

 

नेहरू के 3 फैसलों उठते हैं सवाल?

 

गलतियां किसी से भी हो सकती हैं. हो सकता है नेहरू से भी हुईं हों – फिर चाहे वो कश्मीर का मसला हो या चीन का. कश्मीर के मामले में प्रधानमंत्री के तौर पर नेहरू के 3 फैसलों पर सबसे ज्यादा सवाल उठते हैं. पहला कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जाना. दूसरा 1948 में भारत पाक की जंग के बीच अचानक सीजफायर का एलान और तीसरा आर्टिकल 370 के जरिये कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देना. नेहरू ने सही किया या गलत, इस पर बहस हो सकती है लेकिन यह जानना भी जरूरी है कि नेहरू ने जो किया वो क्यों किया और वैसा करने के पीछे उनकी क्या सोच थी.

 

2 नवंबर 1947 को नेहरू ने कहा, “हम इस बात के लिए तैयार हैं कि जब कश्मीर में शांति व्यवस्था और कानून स्थापित हो जाए तो संयूक्त राष्ट्र जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्था कि देखरेख में जनमत संग्रह करवाया जाए.”

 

2 नवंबर 1947 को जब नेहरू ने ऑल इंडिया रेडियो पर यह घोषणा की उस वक्त कश्मीर में भारतीय सेना पाकिस्तानी हमले का जवाब दे रही थी. वह आजाद भारत की पहली जंग थी. कश्मीर को औपचारिक तौर पर भारत का हिस्सा बने बस कुछ दिन ही हुये थे. ऐसे में नेहरू का यह एलान बेहद चौंकाने वाला था.

 

राकेश सिन्हा कहते हैं, “वो दुनिया में अपनी छवि बनाना चाहते थे. जम्मू कश्मीर में ही जनमत संग्रह क्यों?”

 

दूसरी ओर इतिहासकार मृदुला सिन्हा कहतही हैं, “ वो चाहते थे कि लोगों की मर्जी से फैसला होना चाहिए.”

 

मुश्किल दौर की शुरुआत

 

कहा जाता है कि नेहरू के इस बयान के साथ ही भारत की मुश्किलों का एक नया दौर शुरु हुआ. ये पहला मौका था जब नेहरू ने कश्मीर में जनमत-संग्रह, यूनाइटेड नेशन की देखरेख में कराने की बात सार्वजनिक तौर पर कही. हालांकि ये प्रस्ताव उस वक्त के गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन का था. माउंटबेटन ने 26 अक्टूबर 1947 को कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के दस्तखत वाला Instrument of accession यानी विलय पत्र स्वीकार करने के साथ ही जनमत संग्रह की बात कही थी.

 

माउंटबेटन ने नेहरू और पटेल से कहा, “मेरी इच्छा है कि जम्मू और कश्मीर के भारत में शामिल होने के फैसले को इस शर्त के साथ स्वीकार करना चाहिए कि जैसे ही वहां शांति व्यवस्था स्थापित हो वहां जनमत संग्रह करवाया जाए.”

 

इस मीटिंग में नेहरू के साथ पटेल भी मौजूद थे लेकिन दोनों में से किसी ने भी माउंटबेटन के इस प्रस्ताव का विरोध नहीं किया. बाद में जब नेहरू माउंटबेटन के कहने पर संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में जनमत संग्रह कराने के प्रस्ताव पर भी राजी हो गये. तब पटेल यह नहीं चाहते थे कि इस मामले में संयुक्त राष्ट्र का दखल हो. लेकिन  नेहरू ने फिर भी वो घोषणा कर दी. 

 

इतिहासकार पुष्पेश पंत कहते हैं,  “जिस हालात में कहा गया था नेहरू के सामने विकल्प क्या थे. नेहरू ये चाहते थे कि अंतर्राष्ट्रीय जनमत कश्मीर के बारे में भारत के पक्ष में हो. शांतिपूर्ण समाधान कश्मीर का होना चाहिए और उसको प्रमाणित करने का सबसे अच्छा तरीका ये था कि कश्मीर में जनमत संग्रह करा लिया जाएगा. और उस जनमत संग्रह में भारत भारी रूप से भारी मतों से विजय होगा.”

 

जब कश्मीर भारत का हिस्सा बना

 

दरअसल भारत के आजाद होने के साथ ही यहां की 565 रियासतें भी आजाद हो रही थीं. उनके सामने यह विकल्प था कि वो या तो भारत में शामिल हो जायें या पाकिस्तान से जुड़ जाएं. लेकिन कश्मीर के महाराजा हरि सिंह कश्मीर को आजाद मुल्क रखना चाहते थे. इसलिए उन्होंने 15 अगस्त के बाद भी कोई फैसला नहीं किया. उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि पाकिस्तान कश्मीर को अपने साथ जोड़ने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. इसीलिए जब 22 अक्टूबर 1947 को हथियारों से लैस कबायलियों ने पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर पर हमला बोल दिया तब महाराजा ने भारत से सैनिक मदद मांगी और तभी उन्होंने भारत से जुड़ने का फैसला किया.

 

नेहरू यह कभी नहीं चाहते थे कि कश्मीर पाकिस्तान का हिस्सा बने लेकिन वो उसे हिंदुस्तान में शामिल करने के लिए किसी भी तरह के दबाव या जबरदस्ती के खिलाफ थे. इसीलिए वो जनमत संग्रह के पक्ष में थे. नेहरू के विरोधी अक्सर यह आरोप लगाते हैं कि अगर नेहरू की जगह वल्लभ भाई पटेल कश्मीर के मामले को देख रहे होते तो आज कश्मीर की समस्या ही न होती. तो क्या नेहरू कश्मीर से जुड़े मामलों में पटेल को शामिल नहीं करते थे? 

 

राकेश सिन्हा, सरदार पटेल गृहमंत्री थे लेकिन उनके पास जम्मू कश्मीर का चार्ज नहीं था.

 

लेकिन मुशीरुल हसन कहते हैं, कश्मीर अंतरराष्ठ्रीय मुद्दा बन गया था और वो विदेश मंत्री थे इसलिए दखल देते थे.

 

नेहरू खुद कश्मीरी थे और कश्मीर से अपना लगाव खुल कर जाहिर भी करते थे. शायद यही वजह थी कश्मीर के मामले में नेहरू सीधा दखल रखते थे.

 

यहां तक कि उन्होंने इसमें अपनी मदद के लिए एन गोपालस्वामी आयंगर को बिना पोर्टफोलियो का मंत्री बना दिया. आयंगर कश्मीर के मामलों में सीधे नेहरू से निर्देश लिया करते थे. पटेल को इस बात का अंदाजा नहीं था. एक बार जब उन्होंने आयंगर के किसी फैसले पर सवाल उठाया तो उसके जवाब में उन्हें नेहरू की एक चिट्ठी मिली.

 

नेहरू लिखते हैं, “आज की समस्या कश्मीर से संबंधित है. इससे जुड़े सभी विषय–अंतरराष्ट्रीय, सैनिक या दूसरे – राज्य मंत्रालय के अधिकार के बाहर हैं. यही कारण है कि मैंने प्रधानमंत्री की हैसियत से इस विषय में निजी रुचि ली है. गोपालस्वामी आयंगर को विशेष तौर पर कश्मीर के मामले में मदद करने के लिए बुलाया गया है. उन्हें कश्मीर के बारे में पूरी जानकारी तथा अनुभव है. उन्हें पूरी आजादी दे देना जरूरी है. .यह सबकुछ मेरे मुताबिक किया गया था और मैं अपना कर्तव्य उन मामलों में नहीं छोड़ूंगा, जिनके लिए मैं स्वयं को जिम्मेदार मानता हूं.”

 

इस चिट्ठी का असर यह हुआ कि पटेल ने खुद को किनारे कर लिया. उधर नेहरू ने माउंटबेटन की सलाह पर 31 दिसंबर 1947 को संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान के खिलाफ शिकायत भेजी. जिसके बाद से ही कश्मीर एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन गया.

 

राकेश सिन्हा कहते हैं, “उन्होंने उसका अंतरराष्ट्रीयकरण कर दिया, यह उनकी गलती थी.”

 

नेहरू ने ऐसा क्यों किया?

 

नेहरू ने ऐसा क्यों किया? कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जाने से भारत को क्या हासिल हुआ? क्या यह नेहरू की सबसे बड़ी भूल थी? क्या इसी भूल की वजह से आज तक कश्मीर समस्या का कोई हल नहीं निकल पाया है? यह तमाम सवाल हैं जो आज भी पूछे जाते हैं. 20 फरवरी 1948, यानी संयुक्त राष्ट्र में शिकायत भेजने के कुछ दिनों बाद ही नेहरू ने लंदन में भारत के तत्कालीन हाई कमिशनर वी के कृष्ण मेनन को एक लंबी चिट्ठी लिखी. 

 

इस चिट्ठी में नेहरू ने कश्मीर के उस समय के हालात और संयुक्त राष्ठ्र में चल रही गतिविधियों पर भारत के रुख के बारे में विस्तार से लिखा.

 

इसमें नेहरू ने लिखा है, “कुल मिलाकर भारत और पाकिस्तान के बीच खुली जंग की संभावनाएं काफी कम हो गयी हैं. हमारे संयुक्त राष्ट्र में जाने का एक नतीजा यह भी हुआ है.”

 

तो क्या नेहरू कश्मीर के मामले को संयुक्त राष्ठ्र में इसलिए ले गये थे क्योंकि वो हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच खुली जंग नहीं चाहते थे.

 

इतिहासकार मृदुला सिन्हा कहती हैं, “वो नहीं चाहते थे कि आर्म्ड कॉन्फ्लिक्ट हो और यह अंदाजा भी नहीं था कि यूएन में ऐसा होगा जो हुआ.”

 

हालांकि बाद में संयुक्त राष्ट्र में जो हुआ वो नेहरू के लिए किसी सदमे से कम नहीं था. सुरक्षा परिषद में अमेरिका और ब्रिटेन, अपने राजनीतिक हितों को साधने में लग गए. उन्होंने कश्मीर पर भारत की शिकायत को दरकिनार करते हुए दोनों देशों को एक ही तराजू में तौलना शुरू कर दिया. नतीजा यह हुआ कि नेहरू को भी अपने फैसले पर अफसोस होने लगा यही वजह थी कि कई सालों बाद जब नेहरू से कश्मीर में संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता के बारे में सवाल किया गया तो वह इससे इंकार करने लगे.

 

1948 में संयुक्त राष्ट्र ने भारत और पाकिस्तान को कश्मीर से अपनी सेना वापस बुला कर सीजफायर लागू करने का प्रस्ताव पास किया. नेहरू ने इसे मानते हुए 1 जनवरी 1949 को सीजफायर लागू कर दिया लेकिन पाकिस्तान ने अपनी सेना वापस नहीं बुलाई. इस फैसले का काफी विरोध हुआ क्योंकि जब सीजफायर हुआ उस वक्त तक भारतीय सेना ने पश्चिम में पुंछ और उत्तर में कारगिल और द्रास से, कबायलियों को पूरी तरह खदेड़ दिया था. लेकिन इसके आगे का हिस्सा अब भी पाकिस्तान के कब्जे में था.

 

आरएसएस नेता एच वी शेषाद्रि ने अपनी किताब “…और देश बंट गया” में लिखा है कि “इससे पूर्व कि हमारी सेना कश्मीर की धरती से पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को पूरी तरह खदेड़ पाती, पंडित नेहरू ने युद्द विराम की घोषणा कर दी. इसके फलस्वरूप आजतक एक तिहाई कश्मीर पाकिस्तानी आक्रामकों के अधिकार में है.”

 

तीन युद्दों का जिम्मेदार कौन?

 

कश्मीर का वो हिस्सा जो पाकिस्तान के कब्ज़े में है उसको हम पाकिस्तान occupied Kashmir कहते हैं और जो हिंदुस्तान में है उसको पाकिस्तान – India occupied Kashmir कहता है. जो सीज़ फायर लाइन थी उसे ही लाइन आफ कंट्रोल कहा जाने लगा. तब से लेकर आज तक इसी लाइन ऑफ कंट्रोल के दोनों तरफ हिंदुस्तान और पाकिस्तान की फौजों में मुठभेड़ चलती रहती है. दोनों देशों के बीच तीन बड़े युद्ध हो चुके हैं. लेकिन फिर भी कश्मीर समस्या का कोई समाधान नहीं निकला. आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है?

 

…कश्मीर को लेकर एक विवाद देश के अंदर भी था और है. यह है कश्मीर को स्पेशल स्टेटस यानी विशेष दर्जा देने को लेकर. आखिर यह कैसे और क्यों हुआ.  

 

शेख अब्दुल्लाह. नेशनल कॉन्फ्रेंस की नींव रखने वाले कश्मीर के लोकप्रिय नेता. नेहरू से उनकी नजदीकी की वजह से उन्हें कश्मीर में नेहरू का आदमी भी कहा जाता था. नेहरू ने कश्मीर को लेकर अपनी सभी नीतियां शेख अबदुल्लाह को ध्यान में रखते हुए बनाई. उनकी वजह से ही महाराजा हरि सिंह को कश्मीर की बागडोर शेख के हाथों में सौंपनी पड़ी. लेकिन जम्मू में एक तबका ऐसा भी था जो शेख अब्दुल्लाह के रवैये और बयानों से खुश नहीं था. इन लोगों ने शेख का विरोध शुरू किया. तब जम्मू प्रजा परिषद नाम के संगठन ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्थन से इस विरोध की अगुवाई की.

 

राकेश सिन्हा कहते हैं कि शेख अब्दुल्लाह न पाकिस्तान के थे न हिंदुस्तान के वो अपना फायदा देख रहे थे.

 

जनसंघ के नेता बलराज मधोक तब प्रजा परिषद से जुड़े हुए थे. कश्मीर पर अपनी किताब “जीत में हार” में मधोक ने लिखा है, “शेख ने यह कहना शुरू कर दिया कि कश्मीर घाटी के लोगों का मत भारत में विलय के लिए है लेकिन उन्हें यह आश्वस्त किया जाये कि घाटी का मुस्लिम चरित्र बना रहेगा और इसे सुरक्षा और विदेश नीति को छोड़कर पूर्ण आंतरिक स्वायत्ता प्राप्त होगी.”

 

इसी के साथ कश्मीर को विशेष दर्जा देने की बात शुरू हुयी. शेख अब्दुल्लाह पर पूरा भरोसा करने वाले नेहरू उनकी इस बात को भी मानने के लिए तैयार हो गये. नेहरू ने शेख से कहा कि इस प्रस्ताव को संविधान में शामिल करने के लिए वो खुद कानून मंत्री डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर से बात करें.

 

बलराज मधोक ने अपनी किताब में दावा किया कि डॉक्टर अम्बेडकर ने खुद मधोक को यह बताया कि शेख ने डॉक्टर अम्बेडकर के सामने यह प्रस्ताव रखा. जिसके जवाब में डॉक्टर अम्बेडकर ने कहा, “तुम चाहते हो कि भारत, कश्मीर की रक्षा करे. इसकी सारी जरूरतें पूरी करे लेकिन उसका कश्मीर पर कोई अधिकार न हो. मैं भारत का कानून मंत्री हूं, तुम्हारे प्रस्ताव को मानना देश के साथ विश्वासघात होगा. मैं इसके लिए तैयार नहीं हो सकता.”

 

तब नेहरू ने गोपालस्वामी आयंगर को ये जिम्मेदारी सौंपी की वो इस प्रस्ताव को संविधान सभा के सामने रखें. इसके बाद नेहरू विदेश यात्रा पर चले गये. आयंगर को भारी विरोध का सामना करना पड़ा. आखिरकार पटेल की मदद से वो सदस्यों को यह समझाने में कामयाब हुए कि कश्मीर की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति देखते हुए उसे अस्थायी तौर पर अन्य राज्यों से अलग दर्जा देना होगा. इसके बाद ही धारा 370 संविधान में जुड़ गयी. जिसके तहत कश्मीर को अलग संविधान बनाने का अधिकार मिला. साथ ही यह तय हुआ कि सुरक्षा, विदेश और संचार के अलावा भारत की संसद में पारित कानून राज्य में उसी स्थिति में लागू होंगे, जब राज्य की विधानसभा में भी वो पारित हो जाएं.

 

धारा 370 का विरोध

 

जम्मू और लद्दाख में हिंदू आबादी ज्यादा थी. जम्मू में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और प्रजा परिषद ने 370 का विरोध शुरू किया. बाद में पंडित नेहरू की कैबिनेट छोड़कर 1951 में जनसंघ की स्थापना करने वाले डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने धारा 370 के विरोध की मुहिम को और तेज किया.

 

हालांकि वरिष्ठ पत्रकार और अब बीजेपी प्रवक्ता एम जे अकबर ने अपनी किताब Kashmir – Behind the vale में लिखा है कि धारा 370 के संविधान में शामिल होने के वक्त श्यामा प्रसाद मुखर्जी नेहरू की कैबिनेट में मंत्री थे और उन्होंने भी इसे स्वीकार किया था. अकबर के मुताबिक मुखर्जी ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा धारा 370 के मुद्दे पर नहीं बल्कि लियाकत और नेहरू के बीच हुए समझौते पर दिया था.

 

बहरहाल जनसंघ की स्थापना के बाद श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने खुले तौर पर धारा 370 का विरोध शुरू किया. “एक देश में दो विधान, एक देश में दो निशान, एक देश में दो प्रधान – नहीं चलेंगे नहीं चलेंगे” जैसे नारे दिये गये. 1953 में डॉक्टर मुखर्जी को जम्मू जाते हुए गिरफ्तार कर लिया गया. जिसके कुछ समय बाद जेल में ही उनकी मृत्यु हो गयी.

 

क्या नेहरू चीन के बारे में चूक गए?

 

भारत जब कश्मीर के मसलों में उलझा हुआ था उसी वक्त भारत के पड़ोस में एक बड़ा बदलाव हुआ. चीन में माओत्से तुंग और चोऊ एन लाय के नेतृत्व में कम्यूनिस्ट सरकार बनी. नेहरू ने बिना वक्त गंवाए न सिर्फ पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता दी बल्कि दुनिया भर में चीन के हिमायती की तरह खड़े हो गये. लेकिन इसके बदले में भारत को मिली 1962 की पराजय. यही नहीं आज इतने सालों बाद भी चीन की तरफ से भारतीय सीमा में घुसपैठ की घटनाएं होती रहती है. इसीलिए यह सवाल उठता है कि क्या पंडित जवाहरलाल नेहरू, जो उस वक्त बहुत बड़े diplomat, बहुत बड़े international statesman माने जाते थे. क्या वो चीन के बारे में चूक गए?

 

चीन पर भरोसा और तिब्बत को लेकर नेहरू का रवैया उनकी विदेश नीति की सबसे बड़ी भूल माना जाता है. क्योंकि भारत के मान्यता देने के एक साल बाद ही चीन ने भारत और उसके बीच बसे तिब्बत पर हमला कर दिया और देखते ही देखते उस पर कब्जा कर लिया. तिब्बत से भारत के पुराने संबंध थे. तिब्बत की वजह से भारत और चीन के बीच एक फासला बना हुआ था. चीनी कब्जे ने उस फासले को खत्म कर दिया. इसके तुरंत बाद ही गृहमंत्री पटेल ने चीन के इरादों पर सवाल उठाते हुए नेहरू को एक चिट्ठी लिखी.

 

प्रिय जवाहरलाल नेहरु, चीन सरकार ने हमें जाल में उलझाने की  कोशिश की है. मेरा यह मानना है कि चीन हमारे राजदूत के मन में झूठा भरोसा कायम करने में सफल रहे हैं कि वो, तिब्बत की समस्या को शांति के साथ  सुलझाना चाहता है मेरे विचार से ये चीन का धोखा और विश्वासघात  है.

 

इतिहासकार पुष्पेश पंत कहते हैं, “मुझे लगता है कि पटेल के पत्राचार से ये बात बिलकुल स्पष्ट होती है कि चीन के बारे में उनके मन में आशंकाएं थी. मगर मुझे ऐसा नहीं लगता कि पटेल अकेले आदमी थे जिसके मन में इस तरह की आशंकाएं थीं . जितने लोग दक्षिण पंती कहलाते हैं कांग्रेस में वो गुरू बल्लव पंत रहे हों . आचार्य कृपलानी रहे हों . उन सब के मन में कहीं न कहीं शुभा चीन को लेकर था.”

 

इतने विरोध के बावजूद नेहरू इस बात पर कायम थे कि तिब्बत की वजह से भारत और चीन के रिश्तों में कोई खट्टास नहीं आयेगी. नेहरू के इस विश्वास की वजह क्या थी?

 

लिखते हैं, “इसमें कोई संदेह नहीं कि चीन पूरे तिब्बत पर कब्जा कर लेगा. कोई विदेशी ताकत इसे रोक नहीं सकती. हम भी नहीं. मेरा मानना है कि यह लगभग नामुमकिन है कि हमें चीन की तरफ से सैनिक हमले का सामना करना पड़े. यह सोचा भी नहीं जा सकता कि चीन अपनी सैन्य शक्तियों को तिब्बत जैसे मुश्किल इलाके को लांघते हुए हिमालय के इस पार कोई दुस्साहस करने के लिए भेज सकता है. ….इसलिए मैं यह मानने को तैयार नहीं कि चीन भारत पर कोई बड़ा हमला कर सकता है.”

 

institute of chinees studies की निदेशक अल्का आचार्य कहती हैं, “भारत की स्तिथि नहीं थी कि वो टक्कर ले चीन से जाके और उनको तिब्बत से खदेडें . किस वजह से क्या किस प्लान पे वो कर सकें तो सबसे पहले ये कि विकल्प क्या था. कोई विकल्प नहीं था आप protest कर सकते थे और या फिर कहते की इस मामले से लेकर हम रिश्तें तोड़ दते हैं.”

 

नेहरू यह मानने को तैयार ही नहीं थे कि चीन भारत पर हमला भी कर सकता है. इसीलिए वो अपनी चीन नीति के खिलाफ उठने वाले हर विरोध को दरकिनार करते रहे. इतना ही नहीं एक लंबे समय तक भारत और चीन के बीच मैकमोहन लाइन को लेकर कोई स्पष्ट बात ही नहीं हुयी. जिसका नतीजा यह हुआ कि चीन के साथ भारत के रिश्तों की डोर उलझती गयी. और इसमें एक बड़ी भूमिका रही तब चीन में भारत के राजदूत K M Pannikar की. नेहरू उन पर पूरा भरोसा करते थे.

 

प्रधानमंत्री नेहरू ने 1950 में संसद में बयान दिया कि भारत मैकमेहन लाइन को ही अपनी सीमा मानता है. तब के नेफा और आज के अरुणाचल प्रदेश की जो सीमा चीन से लगती है उसे McMahon लाइन कहते हैं. जिसे शिमला में ब्रिटिश इंडिया, तिब्बत और चीन ने 1914 में मिल कर तय किया था. तब चीन ने नेहरू के बयान पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी.

 

इसके बाद K M Pannikar को चीनी प्रधानमंत्री चोऊ एन लाय से मिलकर उनका रुख जानने के लिए कहा गया. इस मुलाकात के बाद Pannikar ने जो कहा वो यह था.

 

केएम पन्निक्कर ने कहा, “हमारी मुलाकातों में Boundary से जुड़े सवाल पर कोई चर्चा नहीं हुई. राजनीतिक सवालों की तरफ इशारा भी नहीं हुआ. मुझे लगता है कि चाउ- एन लाय सीमा को लेकर भारत के पोजिशन को बखूबी जानते हैं और इस मसले पर उऩकी  चुप्पी का मतलब भारतीय पोजिशन को लेकर मौन सहमति ही हो सकती है. भारत-चीन सीमा बिल्कुल तय है और उस पर कोई बातचीत की जरुरत नहीं है. ये हमारा अब तक का स्टैंड रहा है और इसे बदलने की जरूरत नहीं है.”

 

पन्निक्कर की राय से नेहरू के विदेश मंत्रालय के कई बड़े अधिकारी इत्तेफाक नहीं रखते थे. उऩका कहना था कि भारत को खुल कर सीमा मामले पर चीन से चर्चा करनी चाहिये और जब तक की चीन हमारी सीमाओं को मान न ले कोई और समझौता नहीं होना चाहिये.

 

लेकिन हुआ वही जो नेहरू चाहते थे. हिंदी चीनी भाई भाई के नारों के बीच  29 अप्रैल 1954 को भारत और चीन के बीच पंचशील समझौता हो गया.

राकेश सिन्हा कहते हैं कि इस समझौते में भारत का फायदा नहीं हो पाया, लेकिन मुशीरुल कहते हैं कि समझौता तो होना चाहिए, कोई अमन की बात करता है तो क्या गलती है.

 

 भारत जिसे अपनी सीमा मानता था उसे पंचशील समझौते में चीन ने कहीं साफ तौर पर मान्यता नहीं दी. जबकि इस treaty के जरिए प्रधानमंत्री नेहरु की सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया. जानकारों के मुताबिक यह नेहरु की बड़ी भूल थी. 

 

जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर पुष्पेश पंत कहते हैं कि तिब्बत के मामले में नेहरू ने नादानी की, नासमझी की, अदूरदर्शीता की और तिब्बत के मौहरे को जिस तरह से वो प्रयोग कर सकते थे चीन के साथ अपने रिश्तों में संतुलित करने में उसका प्रयोग वो नहीं कर सके.

 

पंडित नेहरू चीन पर भरोसा करते रहे. इस बीच 1959 में तिब्बत में चीन के खिलाफ बगावत हुई और दलाई लामा अपने साथियों के साथ भारत आ गये. तब नेहरू खुद उनसे मिलने गये. यह बात चीन को पसंद नहीं आयी. इधर देश में और संसद में नेहरू की चीन नीति पर सवाल उठने लगे. उनकी आलोचना होने लगी. इसकी एक वजह थी रक्षा मंत्री वी के कृष्ण मेनन पर नेहरू का भरोसा. रक्षा मंत्री होने के बावजूद मेनन अब भी चीन को खतरा मानने को तैयार नहीं थे. इसी बीच चीनी प्रधानमंत्री चोऊ एन लाय की एक चिट्ठी नेहरू के नाम आयी.

 

चोऊ एन लाय ने लिखा, “नेहरु – ये बहुत हैरत की बात है कि भारत , चीन से उस सीमा रेखा को मान्यता देने की बात कर रहा है जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादी नीतियों ने जबरन चीन के तिब्बत क्षेत्र पर थोपा था. चीन की सरकार मैक मेहन लाइन को बिल्कुल मान्यता नहीं देती …..भारत और चीन की सीमा कभी तय नहीं हुई है और इस पर नये समझौते की जरुरत है जो दोनों पक्षों के लिये वाजिब हो.”

 

चोऊ की चिट्ठी से साफ हो गया था कि भारत के नक्शे में दिखने वाली लगभग 40000 हजार वर्ग मील जमीन पर चीन अपना दावा ठोंक रहा था. इसके बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने राज्यसभा में अपनी स्थिति साफ की.

 

नेहरू कहते हैं, “आज से सात-आठ साल पहले मुझे लगा था कि सीमा मामले में किसी भी प्रकार की चर्चा करना बेकार है. कई सीमा विवाद है ही नहीं .  फिर भी चीन और भारत  कुछ बंजर पहाडों के लिये लड़ाई लड़ना चाहते हैं तो इससे तो इससे बड़ी बेवकूफी  की बात हो ही नहीं सकती .”

 

चीन के इरादों से साफ था कि प्रधानमंत्री नेहरु के नेतृत्व में डिप्लोमेटिक कोशिशें नाकाम हो रही थी. इसी वक्त सीमा पर चीन की तरफ से गोलीबारी की घटना भी हुयी. तब नेहरू ने forward policy के तहत सीमा पर सेना की तैनाती का हुक्म दिया लेकिन सेना के जिस डिवीजन को यह जिम्मा सौंपा गया उसके पास पहाड़ी लड़ाई की ट्रेनिंग ही नहीं थी. उधर चीन भी नेहरू के इस कदम से नाराज हो गया. नेहरू अपने हर फैसले पर घिरते जा रहे थे. हर कोई उन पर सवाल उठा रहा था.

 

उस वक्त जनसंघ के बड़े नेता दीनदाल उपाध्याय ने लिखा, “अभी जो हालात हैं, वो प्रधानमंत्री की लापरवाही की वजह से बने हैं. ऐसा लगता है कि वह तब तक कोई कदम नहीं उठाना चाहते हैं जब तक हालात बेहद गंभीर न हो जाएं.”

 

इतना सब होने के बाद भी 6 दिसंबर 1960 को नेहरू ने खुद भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में चीन की सदस्यता के लिए वकालत की. इसके लिए आज भी उनकी आलोचना होती है.

राकेश सिन्हा कहते हैं कि  उनकी चीन नीति ही गलत थी वो कम्यूनिस्टों से प्रभावित थे और चीन को खुश करना चाहते थे.

 

नेहरु के इस फैसले पर मृदुला सिन्हा कहती हैं कि “नेहरू ने कहा जैसे दूसरे देशों को है वैसे चीन को भी शामिल होना चाहिए..कोई उन्होंने चीन पर एहसान नहीं किया.”

 

आखिरकार 20 अक्टूबर 1962 को छिटपुट गोलीबारी ने युद्द की शक्ल ले ली. ऩेफा से लेकर लद्दाख तक की सीमाओं पर चीन ने हमला कर दिया.

 

इस घटना के बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने राष्ट्र के नाम संदेश में कहा, “चीनी फौज ने हमारे ऊपर हमला किया और हमारे मुल्क में घुस आए . उधर पूर्वी सीमा प्रांत जो है नेफा उसके हमारी सरहद से आए इधर और उन्होंने हमारे फौजी जवान दस्ते थे उनपे हमला किया था. उसके बाद काफी एक बड़ी जांग हुई वहां और चीनियों ने इतनी बड़ी फौज वहां डाली कि उन्होंने हमारे उससे छोटी फौजों को हटा दिया और दबा दिया.” .

 

मुशीरुल कहते हैं कि नेहरू ने चीन पर भरोसा किया उसने धोखा दिया.

मृदुला कहती हैं नेहरू ने दलाई लामा को शरण दी इसलिए चीन सबसे ज्यादा नाराज था. यह किसी ने नहीं सोचा था कि वो ऐसे आएगा हमला करेगा और चला जायेगा और आजकल की रिसर्च से पता चलता है कि हमले के पीछे चीन के अंदरूनी कारण थे. हम तो जिम्मेदार ही नहीं थे.

 

पंडित नेहरू डिप्लोमेसी में यकीन रखते थे, वो लड़ाई के खिलाफ थे. वह चाहते थे कि समस्याओं का हल बातचीत से निकलना चाहिए. इसी सोच की वजह से कश्मीर और चीन को लेकर उनकी नीतियों पर सवाल उठे. चीन से मिले घाव ने पंडित नेहरू को तोड़ दिया. डेढ़ साल बाद ही उनका देहांत हो गय.

 

जो शख्स 17 साल तक देश का प्रधानमंत्री रहा हो, उसके सारे फैसले सही हों, सारी नीतियां सही हों, उसकी किसी सोच पर कोई सवाल न उठे – यह लगभग नामुमकिन है. इसीलिए अगर कुछ मुद्दों पर नेहरू का विरोध होता है तो इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि उसी नेहरू ने इस देश को वैज्ञानिक सोच दी, बड़े बड़े रिसर्च Institute दिए. स्टील प्लांट और बांध बनवाये. और एक ऐसी राजनीतिक व्यवस्था दी जिसमें विरोध की पूरी जगह थी, फिर चाहे वो खुद नेहरू का विरोध ही क्यों न हो.

India News से जुड़े हर समाचार के लिए हमे फेसबुक, ट्विटर, गूगल प्लस पर फॉलो करें साथ ही हमारा Hindi News App डाउनलोड करें
Web Title: What were Nehru Wrong Decisions?
Explore Hindi News from politics, Bollywood, sports, education, trending, crime, business, साथ ही साथ और भी दिलचस्प हिंदी समाचार
First Published:

Get the Latest Coupons and Promo codes for 2017