कौन थी एनकाउंटर में मारी गई इशरत जहां, क्या है मामला?

Who was Ishrat Jahan?

कौन थी इशरत. सवाल एक जवाब अनेक. परिवार वालों के लिए 19 साल की सीधी-सादी कॉलेज छात्रा, तो गुजरात पुलिस और केंद्रीय खुफिया विभाग के लिए लश्कर की आतंकी. केंद्र में यूपीए सरकार की अगुआई करने वाली कांग्रेस के लिए मोदी पर हमला बोलने के लिए बड़ा ट्रंप कार्ड, तो मोदी सहित पूरी बीजेपी के लिए सीबीआई को कांग्रेस ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन कहने का सबसे बड़ा हथियार. महाराष्ट्र में एनसीपी जैसी पार्टी के लिए इंसाफ की लड़ाई तो बिहार में बीजेपी से अलग हुई जेडीयू के लिए है वो बिहार की बेटी.

लेकिन इशरत को लेकर देश की तीन प्रमुख सरकारी एजेंसियां जिस तरह एक-दूसरे से भिड़ रही हैं, उससे इशरत की पृष्ठभूमि को लेकर माहौल और गरमा गया है. ये तीन एजेंसियां है- सीबीआई, आईबी और एनआईए. हद तो ये हो गई है कि इन तीन एजेंसियों के विरोधाभासी स्टैंड को भी अपनी सुविधा के हिसाब से देश की दो प्रमुख पार्टियां कांग्रेस और बीजेपी इस्तेमाल करने में लग गई हैं. कांग्रेस की तरफ से दिग्विजय सिंह इस बात से खफा हो रहे हैं कि आखिर हैडली के नाम से इशरत को फिदायिन कहने की खबरें मीडिया में कौन सी एजेंसी प्लांट कर रही है, तो बीजेपी के नेता कमोबेश एक सुर में इशरत और उसके साथ मारे गये लोगों की पृष्ठभूमि को जानबूझकर दरकिनार करने का आरोप सीबीआई पर लगा रहे हैं. हद तो ये भी है कि राजनीतिक दल और उनके नेता तो ठीक, तीनों सरकारी एजेंसियां भी एक-दूसरे पर आरोप लगाने से अब चूक नहीं रही हैं. भारत के इतिहास में इस तरह की घटना इक्का-दुक्का ही हैं, जब देश की प्रीमियर खोजी या खुफिया एजेंसियां एक दूसरे से लड़ रही हों, जीत किसकी होगी, कोई नहीं जानता. इस तरह का आखिरी बड़ा किस्सा नब्बे के दशक में तब सामने आया था, जब इसरो जासूसी कांड को लेकर आईबी और सीबीआई एक –दूसरे से टकराई थी, और दोनों ने एक-दूसरे पर आरोप लगाया था मामले को बिगाड़ने और दूसरी दिशा में ले जाने का.

अब हेडली के ताज़ा बयान से इस मामले में नया मोड़ आ गया है.

बहरहाल, सवाल ये उठता है कि आखिर इशरत को लेकर देश की इन प्रीमियर एजेंसियों के बीच विरोधाभास कैसा है और क्या है इसकी पृष्ठभूमि. ये टटोलने के लिए एक बार फिर से जाना पड़ेगा 15 जून 2004 की तारीख पर. 15 जून 2004 को अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने जब इशरत सहित चार लोगों को मुठभेड़ के बहाने मार डाला था, तो पहली बार इशरत का नाम देश के आम लोगों के जेहन में आया था, मीडिया के जरिये. उससे पहले ये नाम मुंबई के मुंब्रा इलाके मे रहने वाली शमीमा कौसर, उसके पड़ोसियों या फिर उस कॉलेज के छात्रों के बीच ही जाना-पहचाना था, जहां पढ़ती थी इशरत.

इशरत जहां, जावेद उर्फ प्रणेश पिल्लै, जीशान जौहर और अमजद अली को मारने के बाद अहमदाबाद पुलिस की क्राइम ब्रांच ने ये दावा किया कि इशरत सहित चारों लोग लश्कर के आतंकी थे, जो गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या करने के इरादे से आए थे. इस मुठभेड़ और मारे गये लोगों को असली साबित करने के चक्कर में गुजरात पुलिस की तरफ से ये भी कहा गया कि ये मुठभेड़ आईबी से मिली खुफिया सूचना के आधार पर अंजाम दी गई है.

लेकिन खुद आईबी का इस मामले में क्या था स्टैंड, ये पहली बार तब सामने आया, जब केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से गुजरात हाईकोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया गया. ये हलफनामा मंत्रालय के एक अधिकारी आरवीएस मणि ने 6 अगस्त 2009 को दाखिल किया, इशरत की मां शमीमा कौसर की उस याचिका के जवाब में, जिसमें इस पूरे मामले की सीबीआई जांच की मांग की गई थी. हलफनामे में ही इस बात का इशारा किया गया था कि इसमें रखी गई सूचनाएं केंद्रीय खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर डाली गई हैं. हलफनामे में जोर देकर ये कहा गया कि इशरत जहां और उसके साथ मारे गये तीन और लोग लश्कर के ही आतंकी थे. इस दावे के समर्थन में कई तर्क प्रस्तुत किये गये.

इसमें ये कहा गया कि केंद्र सरकार को इस बात के पुख्ता सबूत मिले थे कि लश्कर ए तैयबा गुजरात सहित भारत के कई हिस्सों में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना चाहता है, साथ में कई बड़े नेताओं की हत्या की साजिश भी रच रहा है. हलफनामे के मुताबिक, लश्कर में ये जिम्मेदारी मुजम्मिल नामक आतंकी को दी गई थी, जिसके नियमित संपर्क में था इशरत का दोस्त जावेद उर्फ प्रणेश पिल्लै. जावेद के बारे में ये भी कहा गया कि साजिदा नामक मुस्लिम युवती से शादी करने के चक्कर में हिंदू से मुस्लिम बने प्रणेश पिल्लै ने दो पासपोर्ट हासिल किये थे- पहला अपने मुस्लिम नाम जावेद से, 1994 में और दूसरा 2003 में अपने हिंदू नाम प्रणेश पिल्लै से. जावेद ने अपने हिंदू नाम से दूसरा पासपोर्ट तब हासिल किया, जब उसका पहला पासपोर्ट वैध था. हलफनामे में ये सवाल उठाया गया था कि आखिर जब अपने पिता के घर पर रहता नहीं था जावेद, तो फिर केरल के पते पर उसने पासपोर्ट क्यों बनवाया. इसके बारे में खुद हलफनामे में ही तर्क ये दिया गया कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नजर से बचने के लिए जावेद ने अपने हिंदू नाम से भी पासपोर्ट बनवाया. जावेद मार्च-अप्रैल 2004 में ओमान जाकर लश्कर के कमांडर मुजम्मिल से मिला था, इसका भी जिक्र है हलफनामे में.

जहां तक इशरत के जावेद और लश्कर कनेक्शन का सवाल है, इसके बारे में हलफनामा ये कहता है कि जावेद ने इशरत को अपने साथ इसलिए रखा था, ताकि देश के तमाम शहरों में जब वो आतंकी गतिविधियों की योजना बनाने या फिर उसे लागू करने के लिए जाए, तो सुरक्षा एजेंसियों को कोई शक न हो और इशरत का साथ रहना उसके लिए कवर का काम करे. पति-पत्नी के तौर पर ही जावेद और इशरत मुठभेड़ से पहले अहमदाबाद, लखनउ और फैजाबाद जिले के इब्राहिमपुर में होटलों में जाकर रुके थे, इसका भी उल्लेख गृह मंत्रालय के हलफनामे में किया गया है. हलफनामे में इशरत और जावेद की आतंकी पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुए इशरत की मां शमीमा कौसर और जावेद के पिता गोपीनाथ पिल्लै की तरफ से दाखिल की गई याचिका में विरोधाभास का जिक्र भी है. मसलन जहां गोपीनाथ अपने बेटे के ट्रेवेल्स कारोबार की बात करते हैं, तो शमीमा जावेद को इत्र का व्यापारी बताती हैं. हलफनामा ये भी कहता है कि शमीमा कौसर को अपनी बेटी इशरत के कॉलेज जाने और ट्यूशन कराने जैसी एक-एक बात याद है, लेकिन उन्हें ये याद नहीं कि आखिर अगर इशरत सेल्स गर्ल के तौर पर जावेद के लिए काम करती थी, तो उसका ऑफिस कहां था. साथ में हलफनामे में सवाल ये भी खड़ा किया गया कि आखिर इत्र और साबुन का वो कैसा कारोबार था, जिसे लेकर जावेद इशरत को कई बार मुंबई से बाहर, देश के दूसरे हिस्सों और शहरों में लेकर गया था, वो भी कई-कई दिनों के लिए.

इशरत और जावेद को लश्कर का आतंकी ठहराने के बाद ये हलफनामा बड़े विस्तार से जीशान जौहर और अमजद अली के पाकिस्तानी होने और उनके लश्कर से संबंधित होने का ब्यौरा मुहैया कराता है. यही नहीं, हलफनामे में इस बात का भी जिक्र है कि किस तरह से मुठभेड़ के एक महीने बाद लश्कर के मुखपत्र माने जाने वाले गजवा टाइम्स ने इशरत और उसके साथ मारे गये लोगों को मुजाहिदीन करार देते हुए इशरत के शव को बिना पर्दा जमीन पर लिटाये जाने पर एतराज जताया था. इसके करीब तीन साल बाद 2 मई, 2007 को लश्कर के एक और फ्रंट जमात उद दावा की तरफ से जब ये दावा किया गया कि इशरत का लश्कर से कोई संबंध नहीं था और वो इस संबंध में इशरत के परिवार से माफी मांगता है, तो हलफनामे में इसे भी आतंकी संगठनों की रणनीति करार दिया गया. हलफनामे में ये कहा गया कि जावेद के पिता गोपीनाथ पिल्लै ने 18 मई 2007 को सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जांच की अर्जी की और उससे पहले इस तरह का जमात उद दावा का बयान न सिर्फ भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की साख को गिराने के लिए किया गया था, बल्कि अदालतों को गुमराह करने के लिए भी. हलफनामे में लिखे गये इन्हीं पहलुओं को गिनाकर इस मामले में सीबीआई जांच की मांग का केंद्र सरकार की तरफ से विरोध किया गया.

हालांकि जब इस हलफनामे का मोदी सरकार और बीजेपी ने अपने हक में इस्तेमाल करना शुरु कर दिया, तो अपनी ही पार्टी के दबाव में आई केंद्र सरकार को दूसरा हलफनामा दाखिल करना पड़ा. ये हलफनामा आर वी एस मणि के जरिये ही 29 सितंबर, 2009 को दाखिल करवाया गया. इसमें ये कहा गया कि केंद्र सरकार को इस मामले मे सीबीआई जांच से कोई परहेज नहीं है और दूसरा ये कि आतंकियों के बारे में खुफिया सूचना देने का मतलब ये नहीं कि गुजरात पुलिस उसी आधार पर उन्हें मार डाले. गौर करने वाली बात ये है कि हलफनामे में इशरत सहित चारों लोगों की जो आतंकी पृष्ठभूमि दी गई थी, उसका खंडन नहीं किया गया. खास बात ये भी है कि पहले और दूसरे हलफनामे के बीच ही अहमदाबाद के न्यायिक मजिस्ट्रेट एसपी तमांग की जांच रिपोर्ट सामने आई, जिसमें उन्होंने इशरत सहित चार लोगों को मुठभेड़ में मारे जाने के वाकये को फर्जी करार दिया और कहा कि इसमे शामिल पुलिस अधिकारियों ने शोहरत और प्रोन्नति के लिए ठंडे कलेजे से इन चारों की हत्या की.

इशरत मामले को लेकर नाटकीय परिवर्तन तब आया, जब गुजरात हाईकोर्ट के निर्देश पर सीआईएसएफ के तत्कालीन एडिशनल डीजीपी आर आर वर्मा की अगुआई वाली एसआईटी ने अपनी जांच के बाद 2011 में ये रिपोर्ट दी कि इशरत और उसके साथियों को जिस मुठभेड़ में मारा गया, वो मुठभेड़ फर्जी थी. इस रिपोर्ट के आधार पर ही हाईकोर्ट ने इस मामले में नई एफआईआर दाखिल करने और आगे की जांच सीबीआई को करने के निर्देश दिये. हाईकोर्ट के निर्देश पर ही आर आर वर्मा ने सीबीआई के सामने 16 दिसंबर 2011 को जो एफआईआर दर्ज कराई, उसमें भी इशरत, जावेद, जीशान जौहर और अमजद अली की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त ब्यौरा है. इस एफआईआर के मुताबिक, 19 साल की सेकेंड इयर बीएससी की छात्रा इशरत को जिस समय मारा गया, उस समय उसकी कोई आपराधिक पृष्ठभूमि नहीं थी. एफआईआर के मुताबिक इशरत पहली बार जावेद से एक मई 2004 को मिली थी और वो जावेद के साथ उत्तर प्रदेश के लखनउ और इब्राहिमपुर गई थी, साथ में दो बार वो जावेद के साथ अहमदाबाद भी आई थी. एसआईटी ने अपनी जांच में ये भी पाया कि इशरत को जावेद की स्मगलिंग और नकली नोट के कारोबार जैसी अवैध और आपराधिक गतिविधियों की जानकारी हो सकती थी. एसआईटी ने राशिद नामक एक शख्स का भी बयान इस सिलसिले में लिया, जिसने ये कहा था कि इशरत जब जावेद के साथ जुड़ी थी, उससे पहले उसकी गैरकानूनी गतिविधियों के बारे में उसे पता चल चुका था. हालांकि एसआईटी को इस बात के कोई सबूत नहीं मिले थे कि इशरत का कोई आतंकी कनेक्शन था.
जहां तक इशरत के दोस्त जावेद का सवाल है, उसके बारे में एसआईटी का ये कहना रहा कि जावेद की आपराधिक पृष्ठभूमि थी, उसने दो पासपोर्ट हासिल किये थे और उसके खिलाफ चार गंभीर गुनाह दर्ज थे. इसके अलावा जावेद कई बार अमजद अली के साथ पाया गया था, खास तौर पर लखनउ के दौरे में या फिर पुणे में वो इंडिका कार खरीदते समय, जिस इंडिका कार के साथ ही अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की टीम ने इशरत और जावेद को पकड़ा था.

जहां तक अमजद अली का सवाल था, उसके बारे में एसआईटी ने भी ये माना था कि उसके आतंकी संगठनों से जुड़े होने के पक्के सबूत थे, जबकि जीशान जौहर के बारे में ये संभावना जताई गई थी.

हालांकि एसआईटी के अध्यक्ष की तरफ से दर्ज कराई गई एफआईआर के आधार पर अपनी जांच करने वाली और इस मामले में चार्जशीट फाइल करने वाली सीबीआई ने इशरत सहित चारों लोगों की पृष्ठभूमि की कोई चर्चा नहीं की है. अगर चार्जशीट में कोई चर्चा है, तो सिर्फ ये कि अमजद अली, जब अहमदाबाद पुलिस की अवैध हिरासत में था, तो उस वक्त उसने ये बताया था कि वो अहमदाबाद के किसी भीड़भाड़ वाले इलाके में आतंकी गतिविधियों को अंजाम देना चाहता था. सवाल उठता है कि आखिर सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में इशरत सहित चारों लोगों की पृष्ठभूमि की चर्चा क्यों नहीं की है. सीबीआई इस बारे में सिर्फ ये संकेत दे रही है कि अभी तक उसने इस पहलू के बारे में कोई ठोस जांच नहीं की है और आगे की अतिरिक्त चार्जशीट में इस बारे में हो सकता है कोई इशारा.

जहां तक एनआईए का सवाल है, उसके बारे में आईबी की तरफ से ये कहा जा रहा है कि डेविड कोलमैन हैडली से जब एनआईए के अधिकारियों ने जून 2010 में करीब चौंतीस घंटे तक पूछताछ की थी, तो हैडली ने लश्कर कमांडर लखवी और मुजम्मिल के हवाले से ये कहा था कि इशरत फिदायीन थी यानी मानव बम. आईबी ने अभी हाल ही में इस बारे में पत्र लिखकर आपत्ति जताई है कि आखिर इशरत के बारे में मिली इतनी बड़ी जानकारी जानबूझकर क्यों एनआईए की आधिकारिक रिपोर्ट से बाद में गायब कर दी गई, जबकि पहले इस बात का जिक्र था रिपोर्ट में. दूसरी तरफ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ये संकेत देने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर एनआईए की आधिकारिक रिपोर्ट में अब इशरत को लेकर कोई सूचना नहीं है, तो फिर भला कौन लीक कर रहा है इशरत का लश्कर कनेक्शन.

पार्टियों की सियासत तो एक तरफ, लेकिन ये एजेंसियां भी एक-दूसके को नीचा दिखाने में लगी हैं. मसलन जब आईबी ने अपने दूसरे सबसे वरिष्ठ अधिकारी राजेंद्र कुमार पर इशरत मामले में नकेल कड़ी होती देखी, तो उसने सीबीआई के खिलाफ हल्ला बोला और मामला गृह मंत्री तक ले गई. दूसरी तरफ सीबीआई ये दावा करने में लगी रही कि उसके पास राजेंद्र कुमार सहित खुफिया विभाग के कई अधिकारियों की इशरत मामले में आपराधिक भूमिका के पुख्ता सबूत हैं. इस बीच आईबी ने दूसरा मोर्चा एनआईए के सामने खोला और ये कहा कि इशरत मामले में वो हैडली से जुड़े महत्वपूर्ण सूचनाओं को जानबूझकर नजर अंदाज कर रही है. इसी मारधाड़ में कभी आतंकियों की आपसी बातचीत की टेप कोई एजेंसी बाहर निकाल रही है, तो कोई एजेंसी आरोपियों को चार्जशीट की कॉपी देने के पहले पूरी दुनिया को उसकी जानकारी देने में लगी है. जाहिर है, लंबे समय बाद ऐसी परिस्थिति आई है, जब किसी मुद्दे पर सियासी पार्टियों से ज्यादा सरकारी एजेंसियों के बीच सियासत हो रही है और इस लड़ाई में ये आशंका प्रबल हो रही है कि कही एक-दूसरे को नीचा दिखाने की लड़ाई में ये एजेंसियां राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर कोई बड़ा संस्थागत नुकसान न कर बैठें.

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