हर साल 33 जवान गंवाते हैं अपनी जान, आखिर हमारे लिए इतना अहम क्यों है सियाचिन?

why siachen is important for india

नई दिल्ली: सियाचिन में औसतन हर साल भारतीय सेना के करीब 33 जवान शहीद होते हैं, इसकी वजह है वहां का मौसम और भौगोलिक स्थितियां. सियाचिन पर कब्जा बनाए रखने के लिए सरकार को हर दिन करोड़ो रुपए खर्च करने पड़ते है फिर भी पिछले 32 सालों से हमारी सेनाए दुनिया के सबसे ऊंची युद्धभूमि में मौजूद है इसकी वजह है भारत के लिए सियाचिन का रणनीतिक महत्व.

20 हजार फीट की  ऊंचाई पर भारतीय जवानों की वीरता की कहानी

करीब 20 हजार फीट की ऊंचाई पर लहराता ये तिरंगा भारतीय जवानों की वीरता की वो कहानी है जिसे सिर्फ वही समझ सकता है जो कभी यहां आया हो. दुनिया के सबसे ऊंचे और सबसे ठंडे जंग के मैदान कहे जाने वाले सियाचिन मे तिरंगे की शान को बरकरार रखने के लिए हमारे वीर जवानों को किन हालातों को सामना करना पड़ता है उसकी एक झलक देखिए.

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जब इन्हें प्यास लगती है तो वो बर्फ के टुकड़ों को तोड़कर इकट्ठा करते हैं, फिर उन टुकड़ों को आग में पिघलाते हैं, इस तरह उन्हें मिलता है पीने का पानी. जब पानी के लिए ये मशक्कत करनी पड़ती है तो बाकी चीजों का अंदाजा आप लगा सकते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस दुर्गम जगह पर भारतीय सेना की मौजूदगी की जरूरत क्या है.

एक तरफ नापाक पाक तो दूसरी तरफ चालाक चीन

जम्मू कश्मीर के उत्तर में मौजूद सियाचिन की बर्फीली पहाड़ियां रणनीतिक तौर पर भारत के लिए बहुत अहम हैं. एक तरफ चीन तो दूसरी तरफ पाकिस्तान के बीच सीना ताने खड़े सियाचिन के ये ग्लेशियर्स भारत की सरहदों की निगहबानी करते हैं. यानी अगर सियाचिन पर भारत का कब्जा नहीं होता तो चीन और पाकिस्तान भारत के लिए और बड़ा खतरा बन सकते हैं.

32 साल पहले जब पाकिस्तान ने सियाचिन पर चढ़ाई की तैयारी की तो भारतीय सेना के जांबांजो ने रातों रात इस पर अपना कब्जा जमा लिया था. सेना ने उसे ऑपरेशन मेघदूत का नाम दिया था, लेफ्टिनेंट कर्नल संजय कुलकर्णी ने तब कैप्टन के तौर पर बड़ी भूमिका निभाई थी.

ऐसे ही नहीं मिला सियाचिन पर कब्जा
इन ऊंची पहाड़ियों पर कब्जा जमाना भारत के लिए बहुत मुश्किल ऑपरेशन था. इसकी वजह थी सियाचिन ग्लेशियर की भौगोलिक बनावट. यानी इसकी बनावट कुछ ऐसी है जिसमें भारत की तरफ का हिस्से से चढ़ाई बेहद खतरनाक है जबकि पाकिस्तान की तरफ से उतनी ऊंचाई नहीं है यानी उनके लिए ग्लेशियर पर चढ़ना आसान था.

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इसके बावजूद भारतीय जांबाजों ने करीब 76 किलोमीटर की लंबाई में फैले इन ग्लेशियर्स पर अपना कब्जा कर लिया. हालांकि इस कब्जे को बनाए रखने के लिए भारत को बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है. बर्फ के इन पहाड़ों में पिछले 32 सालों में हमारी सेना के करीब 1000 जवान शहीद हो चुके हैं. एक अनुमान के मुताबिक इनमें से 90 फीसदी से ज्यादा जानें मौसम की वजह से गईं.

पाकिस्तान से ज्यादा मौसम से है खतरा
सियाचिन में तैनात जवानों का सबसे बड़ा दुश्मन यहां का मौसम है. 12 महीने बर्फ से ढके रहने वाले इन पहाड़ों पर माइनस 50 डिग्री तक तापमान रहता है. यहां हमेशा करीब 3000 जवान तैनात रहते हैं जिन्हें 90 दिनों यानी 3 महीने के लिए भेजा जाता है. बेस कैंप से ऊपर तक जाने में 8 से 10 दिन लग जाते हैं. क्योंकि उन्हें कुछ इस तरह के हालातों में चलकर जाना पड़ता है.

सियाचिन में भारतीय सेना की मौजूदगी के लिए हर दिन करीब 2 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़ते हैं लेकिन इस सब के बावजूद इस पर कब्जा रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है.

सियाचिन में पाकिस्तानी फौज नीचें की तरफ है, इस वजह से ऊंचाई पर बैठे भारतीय जवानो के लिए उन पर नजर रखना आसान होता है. इतनी ऊंचाई पर सेना को रसद और सैनिक साजो सामान की सप्लाई के लिए वायुसेना के हेलिकॉप्टर लगातार उड़ान भरते रहते हैं. यहां दुनिया का सबसे ऊंचा हैलिपैड है.

सामरिक महत्व के अलावा सियाचिन भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इसे भारतीय उपमहाद्वीप में पानी का सबसे बड़ा स्रोत माना जाता है. इसीलिए तमाम मुश्किलों के बावजूद दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र पर दोनो देशों की सेनाएं जमी हुई हैं.

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