फिर जंगल जाएंगे राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र बिरहोर!

By: | Last Updated: Monday, 11 August 2014 11:54 AM
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रायपुर: छत्तीसगढ़ के जशपुर इलाके में बंदरों का शिकार कर मांस भक्षण करने के लिए मशहूर विलुप्त प्राय जनजाति बिरहोर अब भी रस्सी बुनकर जीवन गुजारने के लिए विवश है. आज हालात यह है कि बिरहोर अब इसे छोड़ कर फिर से जांगर के भीतर जाने का मन बना रहे हैं, भ्रष्टाचार और लापरवाही ने राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र बिरहोर जनजाति को वन्य जीवन की मानसिकता से उबरने नहीं दिया है.

 

बिरहोर जनजाति को विकास की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए अलग प्राधिकरण बनाए जाने और करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बाद भी वह पूरी तरह से उपेक्षित है. इन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए राष्ट्रपति ने पहाड़ी कोरवा सहित 5 जनजातियों के साथ गोद लिया था. पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जनजाति के विकास के लिए विशेष प्राधिकरण की स्थापना भी की गई है.

 

जानकारी के मुताबिक लगभग बीस साल पहले जंगल से निकालकर इन्हें शासन ने मानव बस्ती के समीप बसा तो दिया लेकिन इन्हें इनकी बस्ती में मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराने के साथ इनकी शिक्षा और रोजगार की व्यवस्था करने के लिए अब तक न तो ठोस योजना बन पाई है और न ही पहल हो पाई है.

 

बिरहोर जनजाति के विकास के लिए बनी योजनाएं भ्रष्टाचार का शिकार होकर कागजों में सिमट कर रह गई. उपेक्षा और बेरोजगारी का दंश झेल रहे बिरहोर एक बार फिर जंगल की राह पकड़ने का मन बना रहे हैं.

 

केंद्रीय इस्पात, खनन और श्रम राज्यमंत्री विष्णुदेव साय का कहना है की बिरहोर और पहाड़ी कोरवा जनजाति का विकास केंद्र और राज्य सरकार की प्राथमिकता में है. इन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई योजनाओं का संचालन किया जा रहा है. इन्हें योजनाओं का लाभ न मिल पाना गंभीर विषय है. इसकी पूरी जानकारी लेकर उचित कार्रवाई की जाएगी.

 

सूबे के जशपुर जिलान्तर्गत ग्राम बेहराखार के शंकर नगर में 16 बिरहोर परिवार रहते हैं. जो अब तक अन्य ग्रामीणों के साथ पूरी तरह घुलमिल नहीं पाए हैं. बस्ती के अंतिम छोर में जंगल के किनारे रहने वाले इन परिवारों की सबसे बड़ी समस्या रोजगार की है.

 

ग्रामीणों ने बताया कि उन्हें न तो मनरेगा में काम मिलता है और न ही अन्य ग्रामीण उन्हें जंगल से वनोपज एकत्र करने देते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक महुआ, तेंदू और साल जैसे वनोपज वाले पेड़ पर यहां के ग्रामीणों का कई पुश्तों से कब्जा है.

 

जब भी वे वनोपज एकत्र करने के लिए जंगल में जाते हैं, ग्रामीणों द्वारा उन्हें रोक दिया जाता है. मजबूरीवश शंकर नगर के बिरहोर परिवार रस्सी बनाकर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं. दिन भर परिवार के पुरुष सदस्य रस्सी बनाने के लिए पेड़ों का छाल एकत्र करते हैं और महिलाएं घरों में इन छालों से रस्सी बनाती हैं. जिन्हें आसपास लगने वाले साप्ताहिक हाट बाजार में बेच कर होने वाले बेहद कम आमदनी से इन बिरहोर परिवारों की जिंदगी गुजर बसर होती है.

 

कुनकुरी विकासखंड के बेहराखार शंकर नगर में लगभग 20 साल पहले अविभाजित मप्र शासन ने कुछ बिरहोर परिवार को बसाया था. शासन के बहुत समझाइश के बाद ये बिरहोर परिवार जंगल से निकल कर मानव बस्ती में बसने के लिए राजी हुए थे. इन परिवारों को खेती करने के लिए शासन द्वारा 2.2 एकड़ की जमीन आबंटित की गई थी.

 

बिरहोर बस्ती को बसाने के बाद अधिकारी यहां मूलभूत सुविधा उपलब्ध कराना भूल गए. दो दशक के बाद भी इस गांव में बिजली नहीं है और जंगल के बिल्कुल किनारे स्थित इस बस्ती में आए दिन हाथी घुस आते हैं.

 

गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे बिरहोर जनजाति के लोगों को सरकारी सहायता के नाम पर केवल मुख्यमंत्री खाद्यान्न योजना के तहत 1 रुपए किलो चावल ही मिल पा रहा है. गरीबी, अशिक्षा और भुखमरी से जूझ रहे बिरहोर परिवार को विकास की मुख्यधारा में जोड़ने के लिए अब तक शासन कोई ठोस योजना बनाकर पहल करने में पूरी तरह से असफल रही है.

 

बिरहोर जनजाति पर शोध कर चुके रायगढ़ निवासी राजेश त्रिपाठी बताते हैं कि बिरहोर जनजाति को पेड़ों पर जिंदगी गुजारना बहुत भाता है. ये लोग लकड़ी और घासफूस की मदद से पेड़ों पर घर बनाकर रहते हैं. शासन द्वारा बस्ती बसाकर यहां बसाए जाने के बाद भी अब तक बिरहोर जनजाति वन्य जीवन की मानसिकता से पूरी तरह उबर नहीं पाए हैं.

 

उन्होंने कहा कि जंगल से बस्ती में लाने के बाद सरकार इन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने में पूरी तरह विफल रही है. बिरहोर जनजाति अब तक न तो शिक्षा को आत्मसात कर पाए हैं और न ही खेती और मजदूरी जैसे रोजगार से जुड़ पाए हैं. शोधकर्ता त्रिपाठी के मुताबिक भ्रष्टाचार और लापरवाही ने राष्ट्रपति के दत्तक पुत्र बिरहोर जनजाति को वन्य जीवन की मानसिकता से उबरने नहीं दिया है.

 

शोधकर्त्ता त्रिपाठी के मुताबिक बिरहोर जनजाति विशेष संरक्षित जनजाति है. इसके विकास के लिए केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अब तक करोड़ो रुपया खर्च किया जा चुका है लेकिन अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं हो सका है. बिरहोर जनजाति को पिछड़ेपन से उबारने के लिए ठोस योजना और रणनीति की आवश्यकता है.

 

बिरहोर जनजाति महिला प्रधान समाज है. इस समाज में सभी महत्वपूर्ण निर्णय महिलाओं द्वारा लिया जाता है. पुरुष जंगल से वनोपज व रस्सी बनाने के लिए छाल एकत्र कर लाते हैं. घर में महिलाएं इन वनोपज व छाल से रस्सी बना कर पुरुषों को बाजार में बेचने के लिए देती है. इससे होने वाली आय को पुरुष पूरी तरह से महिलाओं को सौंप देते हैं. घरेलू सामग्री क्रय करने से लेकर शादी ब्याह तक सभी निर्णय महिलाओं द्वारा ही किया जाता है. महिलाओं द्वारा लिए गए निर्णय का पुरुषों द्वारा पालन भी किया जाता है.

 

बिरहोर जनजाति को भारत के विलुप्त होती जातियों की सूची में रखा गया है. 1991 की जनगणना में इस जनजाति की संख्या मात्र 5081 दर्ज किया गया था. बिरहोर के विलुप्त होने के खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने इस जाति के परिवार नियोजन पर प्रतिबंध लगा दिया है.

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