त्वरित टिप्पणी: क्या हम भारत को बिकने देंगे?

By: | Last Updated: Sunday, 28 September 2014 4:13 AM
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नई दिल्ली: तमाम लंबे-चौड़े दावों के बावजूद भारत की ईमानदारी की बातें निचले पायदान पर खड़ी हैं. यहां कई मामलों के निपटारे और सजा के ऐलान में कई दशक तक लग जाते हैं और जब फैसला सामने आता है तब तक कई पीड़ितो, गवाहों और आरोपियों की जीवन लीला समाप्त हो चुकी होती है. तमिलनाडु की वर्तमान मुख्यमंत्री का मामला इस बात का जीता जागता उदाहरण है, इस मामले में 1996 में पहला केस दर्ज हुआ था, और 4 जून 1997 में चार्जशीट दाखिल की गई थी, लेकिन मामले में सजा का ऐलान आया 27 सितंबर 2014 को.

 

बंगलौर की एक विशेष अदालत ने आय के ज्ञात स्रोत से 66.65 करोड़ रुपये अधिक की संपत्ति जमा करने के एक मामले में तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे. जयललिता और उनकी सहयोगी शशिकला, उनके दत्तक पुत्र सुधाकरन (जिन्हें उन्होंने बाद में त्याग दिया) और शशिकला की भांजी इलावर्सी को दोषी करार दिया.

इस मामले को वर्ष 2003 में सुप्रीम कोर्ट ने उस समय बेंगलूरु की विशेष अदालत में स्थानांतरित कर दिया था, जब द्रमुक के नेता के. अन्बझगन ने याचिका दायर करके तमिलनाडु में निष्पक्ष सुनवाई पर संदेह जाहिर किया था.

 

जयललिता और अन्य को ज्ञात स्रोत से अधिक संपत्ति जमा करने के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 109 और 120 (बी) तथा भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम, 1988 की धारा 13(1) के तहत दोषी करार देते हुए तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जे जयललिता को चार साल की जेल और 100 करोड़ का जुर्माना लगाया. 18 साल पुराने इस मामले पर फैसले का साथ ही 66 वर्षीय एआईएडीएमके चीफ को तगड़ा झटका लगा, मुख्यमंत्री के रुप में वो अयोग्य हो गई और उन्हें अगले 10 वर्ष तक चुनाव से भी दूर रहना होगा.

 

लोग प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार, एक सजायाफ्ता व्यक्ति सजा पूरी होने की तारीख से शुरुआत के छह साल तक चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. हालांकि, इस मामले को अभी लंबा सफर तय करना बाकी है क्योंकि यह फैसला विशेष अदालत का है और अब जयललिता ऊपरी अदालत में अपील कर सकती हैं. 

 

आरोपी के वकील ने स्वास्थ्य के आधार पर कम या न्यूनतम सजा के लिए तर्क दिया था. आरोपी ने तीन रिट याचिकाओं के साथ इस मामले को चुनौती दी थी, लेकिन 1 अक्टूबर 1997 में मद्रास हाई कोर्ट ने एक ऐसे ही मामले को खारिज कर दिया था, जिसमें आय के अधिक मामले में राज्य के गवर्नर द्वारा दिए गए आदेश भी शामिल थे. अगस्त 2000 तक, अभियोजन पक्ष के 250 गवाहों की जांच हुई और सिर्फ 10 और बचे थे. इन सबके बाद भी 14 साल और लगे इस मामले में, उन 10 गवाहों की जांच बस ये दिखाता है कि कैसे किसी आरोपी के लिए कैसे मामले को खिंचा जा सकता है और इनमें अगर कोई पिसता है तो वो है पीड़ित जनता.

 

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री का जेल जाना कोई पहला वाक्या नहीं है इससे पहले हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, बिहार और झारखंड के मुख्यमंत्री सलाखों के पीछे जा चुके हैं. इतना ही नहीं केन्द्रीय मंत्रियों की पूरी फौज है जो जेल जा चुकी है, हाल ही में दो मंत्री दूरसंचार और एक पूर्व रेल मंत्री सीडब्ल्यूजी घोटाले में जेल जा चुके हैं. इनके अलावा पूर्व दिवंगत प्रधानमंत्री और केंद्रीय गृह मंत्री भी इस फेहरिस्त में शामिल हैं. कई दागियों  को तो गवर्नर भी बना दिया गया. राजनीतिक और बाबूओं के बीच फैले इस भ्रष्टाचार की एक प्रमुख वजह है लचीला कानून. केन्द्र की पूर्व सरकार अपने दागी मंत्रियों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के फैसले तक को चुनौती देने को तैयार दिखती थी, जब तक पार्टी के उपाध्यक्ष ने सार्वजिनक तौर पर अध्यादेश को फाड़ने की बात नहीं की थी. 

 

भ्रष्टाचार के आरोप सिद्ध होने के बाद अधिकतम सजा होनी चाहिए, जो फांसी या उम्रकैद की ही होनी चाहिए. अधिकतम सजा के साथ भ्रष्टाचारियों की संपत्ति भी जब्त होनी चाहिए. जैसा कि कभी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था “सभी न्याय न्यायाधीश केंद्रित है” वैसे ही इस मामले में कोई बुद्धिमानी नहीं दिखानी चाहिए.

 

असल में तो कानून उलटा होना चाहिए, फ्रांस की तरह, जहां संपत्ति की ऑनरशिप सिद्ध करने की जिम्मेदारी उन्हीं दोषियों पर होती है. इस बात की कल्पना करना अपने आप में पागलपन प्रतीत होता है कि कोई आम आदमी किसी बड़े नेता को पद से हटाने के लिए सालों साल कोर्ट के चक्कर लगाए. पर देश के कमजोर कानून के चलते ऐसा नहीं हो पाता है. भ्रष्टाचार को देश से दूर करना है, तो देश के कानून में बड़े बदलाव करने होंगे. सीबीआई या पुलिस के पास कोई जादू नहीं है कि वो इन मामलों में गवाह और सबूत हसिल कर ले.  एक न्यायिक अधिकारी के अनुसार, सरकार को जगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के पास पर्याप्त शक्ति होनी चाहिए.

 

उनके अनुसार ”पुलिस की मदद को आगे आने वाले नागिरकों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत कानूनी पचड़े में पड़ना है. कई सारे गवाह जो राज्य की तरफ से क्रिमिनल के खिलाफ खड़े होते उनकी हालत दयनीय होती है. जिस केस में वो आते हैं उसकी सुनवाई बार-बार स्थगित हो जाती है. पूरे दिन कोर्ट में बैठने के बाद केस का नंबर नहीं आता है, तारीख पहले ही तय कर ली जाती है. तमाम लोगों के सुविधाओं का ध्यान रखा जाता है सिवाय उस गवाह के. और अगली तारीख पर अगर गवाह उपस्थित नहीं होता है तो उस पर कड़ी कार्रवाई की जाती है. अगर वो केस स्थगित होने वाले दिन आता है तो सुनवाई टाल दी जाती है. अंत में जब सबूतों को रिकॉर्ड कर लिया जाता है तब बचाव पक्ष के वकील या अभियोजन पक्ष के द्वारा उस गवाह को केस के लिए अविश्वसनीय घोषित कर दिया जाता है. ये अपने आप में एक अदभूत बात है कि कोई अपनी संपत्ती, अपना सबकुछ गंवा कर भी ऐसा करता रहे.””ये सिर्फ प्रक्रिया है, प्रक्रिया के ऊपर प्रक्रिया है. ऐसी प्रक्रिया जो दूसरी प्रक्रिया को प्रभावित करती है. ऐसी प्रक्रिया जो दूसरी प्रक्रिया से ढकी रहती है. प्रक्रिया के अंदर में प्रक्रिया.”

 

अगर आप ध्यान से देखें, इतिहास कुछ और नहीं बल्कि खुद को दोहराता है. भारत अपने शासकों, नेताओं(बाबूओं) को देश की एकता और ईमानदारी के मिसाल की तरह देखना चाहता है, न कि लूटेरों और डकैतों की तरह जो सिर्फ अपने फायदे के लिए काम करते हैं. अन्यथा, कुछ केस और घोटाले जिस तरह से जनता के सामने आ रहे हैं और संयोग देखिए ऐसे मामलों की संख्या मुश्किल से 10 फीसदी भी नहीं है. जबकि असल में क्या हो रहा है, हम नीचे की ओर बढ़ रहे हैं. ट्रांस्पैरेसी इंटरनैशनल के अनुसार (अंतरराष्ट्रीय भ्रष्टाचार निगरानी संस्था) भ्रष्टाचार के मामले मे भारत को विश्व भर में 100 में से केवल 34 अंक मिले.

 

जॉर्ज कार्लिन ने एक बार अमेरिकी राजनीतिज्ञों के संदर्भ में कहा था, और यह मैं पाठकों पर छोड़ता हूं कि वो इसे भारतीय राजनीतिज्ञों पर किस तरह से लागू करते हैं. “राजनेताओं को भूल जाओ. यह राजनेता वहां हैं आपको सुझाव देने के लिए कि आपके पास चुनने का अधिकार है. जो आपके पास है ही नहीं. आपके पास कोई विकल्प नहीं है. आपके पास मालिक हैं. वो आप पर नियंत्रण रखते हैं. वो हर चीज़ पर नियंत्रण रखते हैं. अहम भूभागों पर उनका नियंत्रण है, काफी लम्बे समय से तमाम संस्थाएं उनके नियंत्रण में हैं, सिनेट, कांग्रेस, विधान सभा, सिटी हॉल, वो जजों को अपने पिछली पॉकेट में रखते हैं, सभी बड़े मीडिया हाउस पर उनका नियंत्रण है, अपने हिसाब से खबरों और जानकारियां आप तक पहुंचाते हैं. वो अपने हिसाब से आपको चलाते हैं. वो लॉबिंग में करोड़ों खर्च करते हैं ताकि वो सबकुछ हासिल कर सकें जो चाहते हैं. खैर, हम जानते हैं कि वो क्या चाहते हैं, वो खुद के लिए ज्यादा चाहते हैं और दूसरों के लिए कम. लेकिन मैं आपको बताऊंगा कि वो क्या नहीं चाहते हैं.

 

 

वो ये नहीं चाहते कि एक बड़ा समूह तार्किक रूप से सोच सकें. वो नहीं चाहते कि आपके पास ज्यादा जानकारी हो, क्योंकि अधिक जानकार आदमी तार्किक रूप से ज्यादा सोच सकता है. इसलिए वो इन सबमें दिलचस्पी नहीं लेते. ये उन्हें मदद नहीं पहुंचाता.” भ्रष्ट राजनेताओं के बारे में सीधे तौर पर कहा गया है कि वो अपने आस पास के 10 प्रतिशत ईमानदार को भी बुरा बना देते हैं. यही सही समय है जब नई सरकार 66 साल की गहन निद्रा से जागे.

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