देश की भाषा, देश की जुबान, ‘हिन्दी’ के लिए कौन परेशान?

By: | Last Updated: Saturday, 12 September 2015 8:49 AM
World Hindi Conference

हिन्दी की दशा और दिशा पर चिंता करने वालों के लिए भोपाल के तीन दिन खासे अहम हैं. यहां चल रहे दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन की चर्चा अगर इस बार किन्हीं वजहों से हो रही है तो वो हैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जनरल वी के सिंह और अमिताभ बच्चन. जिन लोगों को सुपरस्टार अमिताभ बच्चन के नाम पर यहां जुटने वाली भीड़ और सम्मेलन के चर्चित हो जाने का इंतज़ार था उन्हें अंत समय में रद्द हुए अमिताभ बच्चन के कार्यक्रम से ज़रूर झटका लगा होगा. वैसे भी अमिताभ को बुलाने को लेकर खासा विवाद मचा था. कई साहित्यकारों और हिन्दी से जुड़े लोगों ने इसका विरोध किया था और हिन्दी में अमिताभ के योगदान पर सवाल उठाए थे. कुछ ने तो ये तक कह दिया था कि अमिताभ सिर्फ अपने पिता की कविताएं पढ़ पढ़ कर हिन्दी साहित्य के क्षेत्र में अपनी दखल देते हैं, उन्होंने कभी खुद तो कुछ लिखा नहीं.

दरअसल हिन्दी की सबसे बड़ी त्रासदी भी यही है. हिन्दी साहित्य बेहद समृद्ध है और इससे भी ज्यादा हो सकता है लेकिन इसके विकास और विस्तार की सबसे बड़ी बाधा हिन्दी भाषी साहित्यकारों के आपसी टकराव और अहंकार हैं. सरकारी उपेक्षा और हिन्दी के नाम पर होने वाली औपचारिक घोषणाएं तो इसकी मूल वजह रही ही हैं लेकिन किसी न किसी मसले पर ऐसे किसी भी आयोजन को विवाद में घसीट देना भी इसका एक बड़ा कारण रहा है.

 

अक्सर ये कहा जाता है कि हिन्दी को लेकर तमाम कोशिशें महज एक दिखावा है और जिस तरह इस भाषा के वैश्वीकरण की प्रक्रिया को अमली जामा पहनाने की कोशिश होती है वो किसी भी तरह व्यावहारिक नहीं है. लेकिन सवाल ये भी है कि अगर ये दिखावा न हो तो क्या कोई ऐसी पहल होती दिख रही है जो वाकई सही अर्थों में हिन्दी के विस्तार और विकास की दिशा में कारगर हो?

 

आज से 40 साल पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नागपुर में जब पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन की शुरूआत की थी औऱ दुनिया भर में हिन्दी को लोकप्रिय बनाने और अपने देश में इसे राष्ट्रभाषा के तौर पर स्थापित करने की वकालत की थी, तब भी कई सवाल उठे थे. अक्सर ये कहा जाता है कि सरकार पहले अपने कामकाज तो हिन्दी में करे, वहां अंग्रेजी की अनिवार्यता खत्म हो, लेकिन व्यावहारिक तौर पर ये आजतक नहीं हो सका है.

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अगर ये कहते हैं कि कैसे उनके गुजराती भाई भी हिन्दी बोलने लगे. खासकर तब जब उन्हें लड़ाई करनी होती है तो वे हिन्दी में लड़ते हैं. वो लड़ने के लिए हिन्दी में खुद को बेहतर तरीके से अभिव्यक्त करते हैं. अब आप इस बयान के कई मायने निकाल सकते हैं. आप कह सकते हैं कि मोदी की निगाह में हिन्दी ऐसी ‘निकृष्ठ’ भाषा है जिसमें आपसी तकरार और लड़ाई झगड़े के लिए बेहतर शब्द हैं. लेकिन आप इसे इस तरह भी कह सकते हैं कि हिन्दी अब गुजरातियों या अन्य गैर हिन्दी भाषाभाषियों के सामान्य बोलचाल में रच बस गई है. इंदिरा गांधी भी ये महसूस करती थीं कि हिन्दी को देश के तमाम गैर हिन्दी भाषी राज्यों में अनिवार्य कर दिया जाए. जिस तरह तमिलनाडु में तमिल, कर्नाटक में कन्नड़ या महाराष्ट्र में मराठी अनिवार्य है. यानी हर प्रदेश की अपनी भाषा के साथ हिन्दी भी पढाई जाए ताकि ये एक बेहतर संपर्क भाषा के तौर पर स्थापित हो सके. तभी इसे सही अर्थों में राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा मिल भी सकेगा. वही बात आज मोदी भी कह रहे हैं. मोदी के कहने का अंदाज़ बेशक रोचक और प्रभावी होता है लेकिन मूल बात यही है कि अगर वो हिन्दी न सीखते तो देश के लोगों से कैसे जुड़ते, आज इस मुकाम तक कैसे पहुंचते.

 

लेकिन सवाल यहां मोदी के लच्छेदार भाषण से हिन्दी को जोड़कर देखना नहीं है. हर मंच पर मोदी का या किसी प्रधानमंत्री का उसी कार्यक्रम और माहौल के अनुरूप ढल जाना एक कुशल राजनेता की दक्षता का नमूना है. लेकिन क्या सचमुच इससे हिन्दी का कुछ भला होने वाला है. अगर आपकी सोच में हिन्दी लेखक, साहित्यकार और कलाकार ‘भूखा नंगा’ है तो क्या आप इस भाषा के लिए गंभीरता से सोच सकेंगे. अगर जनरल वी के सिंह या उन सरीखे नेतागण (यहां तक कि चंद ‘हाई प्रोफाइल’ साहित्यकार भी) के इस किस्म के बयान का विरोध होता है तो गलत क्या है?

 

दरअसल विश्व हिन्दी सम्मेलन या जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसे हाई प्रोफाइल साहित्यिक आयोजनों के पीछे सत्ता और बड़े कॉरपोरेट घरानों का जो मिलाजुला भव्य रूप सामने आया है, उससे भाषा और साहित्य के क्षेत्र में ज़मीनी स्तर पर काम कर रहे लोगों में भारी हताशा का भाव देखने को मिला है. और तो और यहां आने वालों में भी इस तरह के भाव साफ दिख जाते हैं कि किसे बुलाया गया, किसे नहीं.. किसे हवाई जहाज़ से बुलाया गया, किसे ट्रेन से, किसे किस होटल में ठहराया गया, किसे कितना सम्मान दिया गया, खान पान का बंदोबस्त कैसा था और मंच पर बोलने का किसे ज्यादा मौका मिला, किसे कम, किसकी पब्लिसिटी ज्यादा हुई वगैरह वगैरह. यहीं आकर लगता है कि ये आयोजन महज ग्लैमर का एक केन्द्र बन गए हैं और हिन्दी या साहित्य के नाम पर, भाषा और संस्कृति के नाम पर कॉरपोरेट जगत अपना हित साधने में लगा है. सही मायनों में इससे हिन्दी का कितना भला होगा, ये सब जानते हैं.

 

अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों की भरमार है, अंग्रेज़ी न पढ़ने वाले और न जानने वाले हाशिये पर धकेल दिए जाते हैं. किसी भी संस्थान में चले जाइए, किसी बड़े सरकारी दफ्तर में पहुंच जाइए, हिन्दी में बात कर ली तो आप दोयम दर्जे के नागरिक मान लिए जाएंगे.

 

दरअसल ये एक मानसिकता है. भाषा को लेकर हमारी बनी बनाई सोच है. भाषा तो आम आदमी बनाता है, ये किसी साहित्य सम्मेलन, हिन्दी सम्मेलन या किसी अकादमी के कारखानों में नहीं बनती. हिन्दी और उर्दू के रिश्ते और भाषा की खूबसूरती के हज़ारों नमूने हैं. कबीर से लेकर गालिब तक और प्रेमचंद से लेकर यशपाल तक, फैज़ से लेकर त्रिलोचन तक और जयशंकर प्रसाद से लेकर महादेवी वर्मा तक. सबके पास भाषा के बेहतरीन ख़जाने हैं. ऐसे में ये भी बहस हिन्दी को कमज़ोर करती है कि आखिर आज के दौर में उस ‘शुद्ध हिन्दी’ का इस्तेमाल कहां तक व्यावहारिक है जिसमें संस्कृत के तत्सम शब्दों का इस्तेमाल होता है. बेशक आज हम जिस हिन्दी की बात करते हैं वो सामान्य बोलचाल की भाषा है जिसमें अंग्रेजी भी है, उर्दू भी है, खड़ी बोली भी है और वो तमाम बोलियां हैं जो हिन्दी में रच बस गई हैं. इसलिए ये ज़रूरी हो जाता है कि इस बोलचाल की हिन्दी को कैसे देश की और दुनिया की एक ऐसी भाषा के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की जाए जो व्यावहारिक हो और जिसे सचमुच लागू किया जा सके.

 

विश्व हिन्दी सम्मेलन होते रहेंगे, दिवंगत साहित्यकारों को सम्मान देने के नाम पर सम्मेलन कक्षों के और यहां तक कि भोजन कक्षों के नाम भी उनके नाम पर रखे जाते रहेंगे (अब भले ही दुष्यंत कुमार और काका कालेलकर की आत्मा दुखी होती रहे कि उनकी हैसियत अब भोजनकक्षों के नामकरण तक की रह गई है), हर सम्मेलन में हिन्दी के नाम पर कई कई प्रस्ताव भी पास होते रहेंगे लेकिन क्या इसके बाद सचमुच कुछ होता है. चंद दिनों की खुमारी के बाद इसमें शामिल साहित्यकार, देश दुनिया से आए प्रतिनिधि और आयोजक कहां गुम हो जाते हैं, पता नहीं चलता. या तो वही लोग फिर किसी नए आयोजन की तैयारियों में जुट जाते हैं या फिर मीडिया कवरेज के इस मंच पर अपनी बात रखकर फिर से अपनी दुनिया में खो जाते हैं. बेचारी हिन्दी अपने हाल पर आंसू बहाती रह जाती है. इस बार भी ये आयोजन महज एक औपचारिकता बनकर न रह जाए, ये देखने वाली बात होगी.

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