EXCLUSIVE: यादव सिंह का 'घूसखाता', अरबों रुपये के बंगले, गाड़ियां, शेयर, जेवराज, जमीन और कंपनियां

By: | Last Updated: Thursday, 10 September 2015 6:14 PM
yadav singh full story

नई दिल्ली: घूसकांड में गिरफ्तार यूपी के इंजीनियर यादव सिंह की पत्नी उनके बेटे और बेटी से सीबीआई ने पूछताछ की है. एबीपी न्यूज को जानकारी मिली है कि जल्द ही सीबीआई नोएडा विकास प्राधिकरण के बड़े अधिकारियों को भी पूछताछ के लिए बुलाएगी. यादव सिंह से अभी तक कुल छह बार पूछताछ हो चुकी है.

 

जिस घोटाले में यादव सिंह के खिलाफ सीबीआई की जांच हो रही है वो घोटाला कैसे हुआ, कैसे अफसरों तक घूस की रकम पहुंचती थी ये सब बताएंगे लेकिन पहले जान लीजिए ये पूरा मामला है क्या

 

इस शख्स को उत्तर प्रदेश का पैसा बनाने वाला सबसे बड़ा सरकारी मशीन कहा जा रहा है. महज लाख रुपये की सैलरी वाले यूपी के इस सरकारी मुलाजिम के पास क्या नहीं है. इनकम टैक्स विभाग का छापा पड़ने के बाद यादव सिंह के अरबों रुपये के बंगले, गाड़ियां, शेयर, जेवराज, जमीन और कंपनियों का पता चला.

 

यादव सिंह पर आरोप है कि इसने यूपी के सबसे अमीर विभाग नोएडा प्राधिकरण में चीफ इंजीनियर रहते हुए कई सौ करोड़ रुपये घूस लेकर ठेकेदारों को टेंडर बांटे.

 

नोएडा, ग्रेटर नोएडा और यमुना एक्सप्रेस अथॉरिटी के इंजीनियर रहते हुए यादव सिंह की सभी तरह के टेंडर और पैसों के आवंटन बड़ी भूमिका होती थी. यादव सिंह किस तरह अपने कथित घूसखोर अफसरों के साथ मिलकर सैकड़ों करोड़ घूसखोरी में जमा किये इसका पूरा कच्चा चिट्ठा मौजूद है एबीपी न्यूज के पास

 

घूस के इस चक्रव्यूह का पूरा खुलासा

 

नोएडा प्राधिकरण के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह के घर पर छापामारी और जांच के दौरान कई सनसनीखेज खुलासे हुए हैं. जांच के दौरान पता चला है कि प्राधिकरण में हर ठेके में पांच प्रतिशत घूस तय थी और घूस की इस रकम में प्रमुख अभियंता से लेकर वित्त नियंत्रक तक सारे अधिकारियों का हिस्सा भी तय था.

 

जो कर्मचारी घूस की रकम एकत्र करता था उसे भी उसका इनाम पूरी ईमानदारी से मिलता था. नोएडा अथॉरिटी के अधिकारियों से खुलासा हुआ है जिसके मुताबिक एसएमएस के जरिए भी टेंडर दिये जाते थे.

 

यादव सिंह नोएडा विकास प्राधिकरण के दफ्तर में कभी चीफ इंजीनियर हुआ करता था. नोएडा के सेक्टर 51 का कोठी नंबर ए10 यादव सिंह इसी मकान में रहता था. इस घर में आयकर विभाग और सीबीआई की छापेमारी के बाद चली जांच में हुए कई अहम खुलासे.

 

आप जो सरकारी दस्तावेज देख रहे हैं इन्हीं में दर्ज है नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों का काला कारनामा जो बताता है कि  प्राधिकरण घूस लेने का वो अड्डा बन गया था जहां हर काम दाम के बदले हो जाता था इन्हीं दस्तावेजों में दर्ज है घूसबही की कहानी घूस लेने वाले अधिकारियों की जुबानी.

 

इस सरकारी दस्तावेज को पर आयकर विभाग की मोहर भी है और बयान लेने वाले अधिकारी और प्राधिकरण के बयान देने वाले अधिकारी का नाम भी मौजूद है. इस मामले की जांच के दौरान जब अधिकारियों से पूछताछ  शुरू हुई तो धीरे धीरे खुलने लगी नोएडा प्राधिकरण के घूस की पोल.

 

नोएडा विकास प्राधिकरण में सहायक परियोजना अभियंता रामेन्द्र सिंह से जब आयकर विभाग ने पूछताछ शुरू की तो उसने शूरूआती दौर में बरामद दस्तावेजो को दिखाए जाने पर पूरी घूसबही का पर्दाफाश कर दिया कि घूस का पैसा कौन कौन इकट्टा करता है घूस की रकम किसे किसे जाती है और किसे किस हिसाब से मिलती है औऱ इस गोरख धंधे में कौन कौन शामिल है.

 

आयकर विभाग को छापे में एक दस्तावेज बरामद हुआ. इस दस्तावेज पर कई अहम जानकारियां लिखी गई थीं जिनमें 189 लाख और फिर 71 लाख साठ हजार का जिक्र था पूरा हिसाब किताब इन दस्तावेजो में मौजूद था और अब जानिए कि रामेन्द्र ने इनके बारे में क्या कहा?

 

इन अंकों का विवरण… रुपये 189 लाख और 71 लाख साठ हजार विभिन्न अनुबंधो का कुल योग है इसमें से पांच प्रतिशत कमीशन के हिसाब से 13 लाख 4 हजार बनते है जोकि विभिन्न अभियंताओ में वितरण के लिए मुझे प्राप्त होने थे इस राशि में से दस लाख रुपये मुझे प्राप्त हुए थे.

 

शेष तीन लाख चार हजार रूपये प्राप्त होने बाकी है यह राशि मैने लगभग सात आठ दिन पहले प्राप्त की थी और यह पूरी की पूरी राशि प्रदीप शर्मा लेखाकार मुख्य अभिरक्षण अभियंता जल नौएडा अथारिटी को सुपर्द कर दी थी इसका आगे का वितरण प्रदीप शर्मा द्वारा किया जाना है.

 

मेरे द्वारा प्राप्त की गई तीन लाख 58 हजार रूपये की राशिआर एस यादव परियोजना अभियंता नोएडा अथारिटी के माध्यम से आई थीजो कि उन्होंने 71 लाख 60 हजार के अनुबंध का पांच प्रतिशत 3 लाख 58 हजार रुपये अजय यादव अवर अभियंता नोएडा अथारिटी के द्वारा भिजवाए थे अजय यादव आरएस यादव के अधीन कार्यरत है.

 

ये रामेन्द्र सिंह का वो बयान है जिसने नौयडा प्राधिकरण के तमाम अधिकारियो की नींद उडा दी है. अपने बयानो में रामेन्द्र सिह ने ये स्वीकार किया है कि वो घूस की रकम इकट्टा करता था बयानों से ये भी साफ जाहिर हो रहा है कि घूस का ये काला जाल पूरे प्राधिकरण में फैला हुआ था.

 

अब जरा ये दस्तावेज भी देख लीजिए जिसमें रामेन्द्र सिंह ने कहा है कि घूस की रकम के बारे वो तुरंत यादव सिह को बता देता था और यादव सिंह उसे कहा कि यह पैसे प्रदीप शर्मा लेखाकार को उसके आते ही दे दे.

 

रामेन्द्र सिंह ने अपने बयानों में कहा कि वो प्रमुख अभियंता यादव सिंह के अधीन काम करता है और रोजाना उनके निवास ए 10 सेक्टर 51 नौएडा आता है. चूंकि उसे यादव सिहं के निर्देश पर ही सारे काम करने होते हैं और यादव सिंह रोजाना नौएडा प्राधिकरण नहीं आ पाते इसलिए वो उनके निर्देश लेने के लिए घर आता है.

 

घूस के इन दस्तावेजों में साफ तौर पर बताया गया है कि घूस की रकम प्राधिकरण में नौ बड़े अधिकारियों के स्तर तक जाती थी और करोडों रूपये के टेंडर देने की सिफारिश आईएएस, आईपीएस, राजनेता, पत्रकार और बड़े नौकरशाह करते थे. इस घूसबही में खुद को मिली रिश्वत का ब्यौरा भी मौजूद है और यह भी बताया गया है कि टेंडर किसे दिया जाए यह मोबाइल मैसेज से ही तय हो जाता था. एबीपी न्यूज के पास इस खुलासे के सारे दस्तावेज मौजूद है. जरा ध्यान से देखिए घूसबही के इस दस्तावेज को. इसमें साफ तौर पर लिखा गया है कि

महेश चौहान- एक दशमलव पांच करोड़ एसीईओवी

प्यारेलाल यादव- बीस लाख एसीईओ वी

चन्द्रपाल प्रधान- पचास लाख

दीपाशु इन्टरप्राइजेज- दस लाख

वाईके शर्मा-  दस लाख

भारद्वाज कन्सट्र-पैट्रोल पंप- साठ लाख

 

जांच अधिकारियों ने जब इस कोड के बारे में पूछा तो रामेन्द्र सिंह ने बताया कि इन सारे ठेकेदारों के नाम मुझे विभिन्न अफसरों द्वारा सिफारिश में बताए गए हैं और इन सारे अफसरों के नाम बाकी कागजातों में दर्ज है. सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक इनमें आईएएस आईपीएस पत्रकार नेता और कई बडे नाम शामिल हैं.

 

इन नामों की बानगी वाला ये दस्तावेज देख लीजिए जिसमें बताया गया है कि एसीईओवी का मतलब है एडीशनल चीफ एक्यूजिटिव आफिसर. वी का मतलब है वीके पवार जो की आज की तारीख में एसीईओ के पद पर नोएडा अथारिटी में कार्यरत हैं.

 

ये नाम रामेद्र सिंह को मुख्य अनुरक्षण अभियंता ने बुला कर लिखवाए थे और कहा था कि प्यारे लाल यादव और महेश चौहान की सिफारिश वीके पवार द्वारा की गई है इसलिए इनका नाम एलीजिबिलिटी लिस्ट में शामिल किया जाए.

 

दस्तावेजो में यह भी साफ तौर पर दर्ज है कि रामेन्द्र सिंह को घूस का कितना हिस्सा मिला आप खुद देख लीजिए. इस दस्तावेज को ध्यान से देखिए इसमें हिसाब लिखा हुआ है पैसों का भी और ई टेंडर का भी जब इसके बारे में पूछा गया तो रामेन्द्र ने बताया कि एलिजिबिलिटी लिस्ट में किसका नाम शामिल किया जाए यह काम मेरे अधिकारी यादव सिंह द्वारा निर्णायक रुप से किया जाता है इस प्रक्रिया में पेमेन्ट के प्रति सौ रुपये पर दस पैसे कमीशन मुझे प्राप्त होता है बडे प्रोजक्ट पर यानि पचास लाख से ऊपर की रकम पर मुझे प्रति सौ रूपये पांच पैसे कमीशन प्राप्त होता है यह राशि मुझे प्रदीप शर्मा द्वारा दी जाती है.

 

इसमें से ई टेन्डर की रकम तीन करोड 42 लाख रूपये है जिसमें प्रति पाँच पैसे के हिसाब से 17 हजार सौ रुपये कमीशन प्राप्त हुआ शेष पांच करोड 61 लाख रुपये की धनराशि का दस पैसे के हिसाब से 56 हजार सौ रुपये कमीशन प्राप्त हुआ. यह पैसे मुझे खंडीय लेखाकार नरेश कुमार के कार्यालय से प्राप्त हुए. यानि घूस की रकम का हिस्सा रामेन्द् को प्राधिकरण के किसी ना किसी अधिकारी के यहाँ से मिल ही जाता था लेकिन बात यही तक नहीं घूस की रकम बाकायदा नौ बडे अधिकारी तक बंटती थी.

 

खासा महत्वपूर्ण है ये दस्तावेज क्योंकि इसमे आयकर विभाग के बडे अधिकारियों के सामने खुलासा किया गया है कि पैसा किस किस अधिकारी को जाता था. दस्तावेजों के मुताबिक इश कमीशन में शामिल थे-

 

इंजीनियर इन चीफ- यादव सिंह

चीफ प्रोजेक्ट इंजीनियर – एके गोयल

चीफ मेन्टीनेंस इंजीनियर- एमपी शर्मा

प्रोजेक्ट इंजीनियर- एससी मिश्रा, आरएस यादव, मौहम्मद इशरत तथा अनय्

सहायक परियोजना अभियंता-

अवर अभियंता

लेखाकार- प्रदीप शर्मा

 

दस्तावेजों में बताया गया है कि इनके अलावा वरिष्ठ लेखाधिकारी और वित्त नियंत्रक को भी घूस का हिस्सा जाता है यानि कोई लेबल ऐसा नहीं जिसे मलाई ना मिलती हो. दिलचस्प यह भी कि कई बार तो मोबाइल मैसेज के जरिए ही यह तय हो जाता कि टेंडर किसे दिया जाना है.

 

दस्तावेज में बताया गया है कि मोबाइल मैसेज के जरिए ही यह तय कर दिया गया कि किसे एलिजीबिल्टी लिस्ट में डाला जाना है इसमें ठेकेदारो के नाम और मौबाइल नंबर समेत यह बताया गया है कि किसे स्माल किसे एवरेज टेंडर दिया जाना है यानि ना सुनवाई का  झंझट और ना ही टेंडर दिए जाने के पहले की प्रक्रिया का कोई लेना देना आप लाइन में खडे रहिए कि आपकी कंपनी अच्छा काम करती  है तो टेंडर आप को मिलेगा.

 

सीबीआई ने यादव सिंह के मामले की जांच के दौरान पाँच सालो की फाइल नौएडा प्राधिकरण से तलब की है और उसे अब तक लगभग दो सौ फाइले मिल चुकी है उधर नौयडा प्राधिकरण के गौरखधंधे का पर्दाफाश करने वाले रामेन्द्र सिंह ने इस पर्दाफाश के बाद जांच अधिकारियों से अपने परिवार और जानमाल की सुरक्षा करने की गुहार लगाई है.

 

यादव सिंह मामले में अब तक की जांच के दौरान आयकर विभाग का आकलन है कि यादव सिंह ने लगभग सौ करोड रूपये की रिश्वत ली होगी यादव सिंह की संपति कई सौ करोड रुपये में बताई गई है. नोएडा अथारिटी के लेखाकार प्रदीप शर्मा ने जांच अधिकारियो के सामने स्वीकार किया कि यादव सिंह के साथ वो भी कमीशन के पैसे लेते रहे है और यादव सिंह सीधे ठेकेदारो से भी पैसे लेते थे.

 

उधर यादव सिंह अपने बयानों में इन सारे आरोपो को गलत बताया है. रामेनद्र सिंह के बयानो के आधार पर आय़कर विभाग की टीम नौयडा अथारिटी के लेखाकार प्रदीप शर्मा के पास पहुंच गई आरंभिक जांच के दौरान पहले तो प्रदीप शर्मा ने रामेन्द्र को झूठा करार दे दिया लेकिन जब दस्तावेजो के आधार पर प्रदीप से पूछताछ शुरू हुई तो उसने माना कि वो भी यादव सिंह के साथ मिल कर रिश्वत का पैसा लेता रहा है.

 

जरा ध्यान से देखिए इस दस्तावेज को इसमें साफ तौर पर प्रदीप शर्मा ने कहा है कि वास्तविकता यह है कि मेरी नोएडा प्राधिकरण में ऊपरी कमाई है जो मुझे रिश्वत के तौर पर मिलती है इस रिश्वत का मुख्य भाग विभिन्न ठेकेदारो द्वारा प्राप्त किए गए ठेको के बदले मिलने वाली कमीशन की राशि है. यह राशि मुझे विभिन्न ठेकेदार देते है जिनका विवरण उन बांड रिकार्ड में मिल जायेगा जो मैने रिकार्ड कराए है. यह प्रक्रिया साल 2003 से चल रही है.

 

प्रदीप शर्मा के बयानो से साफ पता चल रहा है कि नौयडा प्राधिकरण में धांधली चलती ही रही है चाहे सूबे में सरकार किसी की भी रही हो लेकिन नोएडा अथारिटी शायद हर किसी के लिए दूध देने वाली गाय का काम करती रही है.

 

यादव सिंह और दूसरे अधिकारियो की बाबत पूछे जाने पर प्रदीप ने कहा – सन 2007 से 2012 तक ठेकेदारो द्वारा मुझे दोनो ही विभाग जल और विधुत विभाग से सारे अनुबंधो को रिकार्ड करने के बदले एक हजार से दो हजार रुपये कमीशन के रूप में रिश्वत प्राप्त होती थी.

 

ऐसा कई बार हुआ है कि विभिन्न ठेकेदारो ने मुझे कमीशन की राशि जो कि यादव सिंह की थी वह राशि मुझे दे कर चले जाते थे औऱ यह राशि मैं यादव सिंह को जैसे की तैसी दे देता था. यह राशि मैं उन्हे उनके कार्यालय नौयडा प्राधिकरण सेक्टर छह में दिया करता था. यह प्रक्रिया 2010 -11 तक चली.

 

यादव सिंह के बारे में भले ही यह कहा जाता रहा वो कि वह फलां राजनेता का खास है लेकिन इस मामले में दिलचस्प पहलू यह भी है कि सूबे मे सरकार किसी की भी रही हो लेकिन यादव सिंह की पोस्टिंग नोएडा ग्रेटर नोएडा अथारिटी मे होती रही. प्रदीप शर्मा ने अपने बयानो में ऐसे कुछ ठेकेदारो के नाम भी लिए जिन्होने रिश्वत की रकम यादव सिंह को देने के लिए प्रदीप को दी थी.

 

प्रदीप के बयानो के मुताबिक जिन ठेकेदारो से मैने रकम ली उन सभी के नाम तो याद नही है परंतु उनमें से कुछ नाम है एनके जी इंजीनियरिंग जिसके मालिक प्रदीप गर्ग है जीयूएल गुल इंजीनियरिग जिसके मालिक जावेद है संजय इलेक्टिकल्स जिसके मालिक संजय गुप्ता है अन्य ठेकेदारो के नाम आपको बांड रजिस्टर से मिल जायेगे जोकि मैने साल 2010-11 में रिकार्ड किए है एवं जिनका अनुमोदन यादव सिंह ने किया था.

 

इस मामले में जब आय़कर विभाग ने यादव सिंह से पूछताछ की तो उन्होने प्रदीप शर्मा और रामेन्द्र सिंह के बयानो को सिरे से ही खारिज कर दिया औऱ कहा कि उनका उनके बयानो से कोई लेना देना नही है.

 

अब जरा यादव सिंह के बयानों को भी जान लिजिए यादव सिंह के घर से बरामद बारह लाख तीन हजार रुपये की धनराशि के बारे में यादव सिंह ने कहा कि ये पैसा उनके पोते को उसके जन्म के बाद अलग अलग समय पर दोस्तो और करीबियो ने दी है लेकिन जब उनसे उन लोगो के नाम बताने को कहा गया तो उनहोने कहा कि उन्हे याद नही है.

 

अब तक की जांच के दौरान आयकर विभाग को शक है कि यादव सिंह को लगभग सौ करोड रुपये की रिश्वत मिली होगी आय़कर विभाग को यादव सिंह की कई सौ करोड रुपये की संपत्ति का पता भी चला है फिलहाल इस मामले में आयकर विभाग और सीबीआई दोनो की जांच जारी है.

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