नहीं हुई थी कोई डील कराची भागते वक्त पकड़ा गया था याकूब

By: | Last Updated: Wednesday, 29 July 2015 3:01 PM

नई दिल्ली: याकूब मेमन को आखिरकार कल सुबह फांसी दे दी जाएगी. लेकिन उसकी जिंदगी से जुड़ा एक राज अब तक राज ही रहा है कि वो भारतीय सुरक्षा एजेसियों के हाथ कैसे आया था.

 

आज एबीपी न्यूज पर आप जानेंगे कि कैसे याकूब सरहद पार नेपाल की धरती पर ठीक उस वक्त पकड़ लिया गया जब वो कराची भागने की तैयारी में था. एबीपी ऩ्यूज संवाददाता शीला रावल की ये रिपोर्ट उस झूठ का पर्दाफाश करती है कि याकूब से भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने कोई डील की थी.

 

याकूब की गिरफ्तारी की कहानी के तार जुड़े हैं भारत के इस पड़ोसी मुल्क नेपाल से. एबीपी न्यूज आज याकूब की गिरफ्तारी की पड़ताल के लिए नेपाल में है. एबीपी न्यूज आज आपको बताएगा कि नेपाल में 15 दिन गुजारने के बाद आखिर याकूब मेमन कैसे नेपाल पुलिस की गिरफ्त में आया था.

MUST WATCH: याकूब ने कैसे दिया था मुंबई धमाकों को अंजाम? 

नेपाल के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अपने दफ्तर में सिक्योरिटी चीफ रमेश चंद ठाकुरी के लिए एक आम दिन शुरु हुआ था. उनकी नजरें एक भारतीय न्यूज मैगजीन पर टिकी थीं.

 

वो खबर 17 महीने पहले मुंबई में हुए उन 13 धमाकों से जुड़ी थी जिसने मुंबई के सीने पर 257 मौतों की कहानी लिखी थी लेकिन उसका एक भी गुनहगार तब तक भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की पकड़ में नहीं आया था.

 

मुंबई के जख्मों को उस मरहम का इंतजार था जिसका नाम था मेमन परिवार की गिरफ्तारी. खबर में लिखा था कि सुराग 17 महीने बाद भी सबूत में नहीं बदले जा पाए हैं.

MUST WATCH: ना कोई डील, ना सरेंडर । नेपाल में पकड़ा गया था याकूब 

जुलाई 1994 को नेपाल के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट के सिक्योरिटी चीफ रमेश चंद ठाकुरी एक भारतीय न्यूज मैगजीन पढ़ रहे थे जिसमें मुंबई सीरियल ब्लास्ट की कहानी छपी थी. वो सोच ही रहे थे कि मुंबई पुलिस के लिए इस गुनाह के सबूत जुटाना कितना मुश्किल होगा. लेकिन उन्हें तब नहीं पता था कि चंद मिनट बाद वो इस उलझी हुई कहानी के सबसे अहम किरदार से मिलने वाले हैं.

 

मुंबई बम धमाकों का मास्टरमाइंड था टाइगर मेमन और अब तक जो सुराग मिले थे वो बता रहे थे कि पूरा मेमन परिवार कराची पहुंच चुका है और उन्हें महफूज रखने का काम पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई कर रही है.

 

याकूब मेमन भी कराची में पनाह और खुद याकूब मेमन के शब्दों में आरामगाह पा चुका था. उस पर इल्जाम था धमाके के लिए पैसों का इंतजाम करने का, धमाके के लिए गाड़ियों का इंतजाम करने का और धमाकों के लिए विस्फोटकों को पहुंचाने का.

 

लेकिन कराची में बैठे याकूब को शायद ये नहीं लगा था कि मुंबई के इन खौफनाक धमाकों में उसकी हिस्सेदारी की कहानी भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को पता चल चुकी है.

 

याकूब ने इसके लिए उन दिनों अपने चचेरे भाई उस्मान ने संपर्क किया था. पहले फोन पर फिर दुबई में हुई एक सीधी मुलाकात में. उस्मान के मुताबिक वो बार बार भारत लौटने का जिक्र करता था.

 

12 मार्च 1993 को मुंबई में हुए सीरियल धमाकों के 17 महीने बाद जुलाई के महीने में याकूब ने उस्मान को नेपाल बुलाया और खुद को भारतीय कानून के हवाले करने की योजना सामने रखी. उस्मान ने उसे समझाया कि वो पहले अपने परिवार को साथ लेकर लौटे और तब सरेंडर की सोचे.

 

16 जुलाई 1994 को अपने चचेरे भाई उस्मान के कहने पर याकूब ने कराची लौटने का फैसला किया. उसी दिन उस्मान को भी भारत लौटना था. लेकिन नेपाल के त्रिभुवन इंटरनेशनल एयरपोर्ट याकूब की आजादी का आखिरी दिन साबित हुआ.

 

रमेश चंद ठाकुरी ने हमें बताया कि स्कैनिंग मशीन पर बैठे हमारे सुरक्षा कर्मी को याकूब के ब्रीफकेस में पासपोर्ट का ढेर दिखा जो कि चौंकाने वाला था. उसने याकूब से बैग खोलने को कहा और सारे पासपोर्ट दिखाने को कहा. जब पासपोर्ट निकाले गए तो याकूब ने बताया कि ये उसके परिवार के भारतीय पासपोर्ट हैं.

 

नेपाल के त्रिभुवन एयरपोर्ट पर मौजूद एक्सरे मशीन ने ब्रीफकेस के अंदर जो कुछ देखा वो आम बात नहीं थी. बैग खुलते ही एक साथ 10 पासपोर्ट बाहर आ गए. सब के सब भारतीय पासपोर्ट थे.

 

रमेश चंद ठाकुरी के मुताबिक जब नेपाली सुरक्षा कर्मियों ने याकूब से उन 10 भारतीय पासपोर्ट के बारे में पूछा तो वो फौरन कोई जवाब नहीं दे पाया. उसे पसीना आने लगा था और वो तनाव में आ गया था. उसकी इस हालत ने शक को बढ़ा दिया और तब नेपाली सुरक्षाकर्मियों ने उसे एयरपोर्ट के सिक्योरिटी चीफ रमेश चंद ठाकुरी के सामने पेश कर दिया.

 

याकूब मेमन को नेपाल के त्रिभुवन एयरपोर्ट के सिक्योरिटी चेक से एयपोर्ट सिक्योरिटी चीफ रमेश चंद ठाकुरी के पास ले जाते वक्त भी उससे लगातार 10 भारतीय पासपोर्ट के बारे में पूछा जा रहा था लेकिन या तो याकूब को जवाब सूझ नहीं रहे थे या फिर वो जवाब देना नहीं चाहता था.

 

लेकिन बुरी तरह फंस चुके याकूब ने 16 जुलाई 1994 के उस दिन जवाब भी दिया था लेकिन तब जब उसे एयरपोर्ट सिक्योरिटी चीफ के दफ्तर में पेश किया गया.

 

रमेश चंद ठाकुरी के मुताबिक उनके दफ्तर में याकूब ने बताया था कि वो 10 भारतीय पासपोर्ट उसके अपने परिवार के हैं और वो उन्हें रिन्यू करके ले जा रहा था. ठाकुरी ये भी बताते हैं कि उन्हें वो पासपोर्ट असली लगे थे और जब उन्होंने उन्हें गौर से देखा तो वो मुंबई के मेमन परिवार के पासपोर्ट थे. ये चौंकाने वाली बात थी.

 

याकूब ने बताया था कि वो 10 पासपोर्ट रिन्यू करके ले जा रहा है- एक साथ 10 पासपोर्ट. ये बात किसी के लिए गले उतरने वाली नहीं थी क्योंकि ये एक आम घटना नहीं थी.

 

काठमांडु के एयरपोर्ट पर पकड़े जाने के बाद याकूब की पूछताछ करने वाले नेपाली पुलिस अधिकारी की मानें तो याकूब उलझन में था . उलझन ये थी कि 10 पासपोर्ट जो कि भारतीय पासपोर्ट थे उसके साथ वो भारत लौट आए या तो फिर कराची जा कर अपने परिवार के साथ आईएसआई की निगरानी में गुमनामी की बाकी की जिंदगी बसर करे.

 

याकूब की गिरफ्तारी के पूरे ऑपरेशन को अंजाम देने वाली रॉ की टीम के सदस्य बी रमन ने भी लिखा था. याकूब गुपचुप तरीके से कराची से काठमांडू आया था और अपने एक रिश्तेदार और वकील से मिला था. वो अपने और अपने परिवार के भारत लौटने और मुंबई पुलिस से सरेंडर करने के बारे में मशविरा करने आया था. लेकिन उसे कराची लौट जाने की राय मिली. लेकिन याकूब कराची लौट पाता उससे पहले ही उसका खेल खत्म हो गया था.

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