किताबों की दुनिया: अंधेरी ओवरब्रिज पर एक मुलाकात- जब अंधेरा घिर आया

By: | Last Updated: Tuesday, 11 July 2017 12:00 AM
juggernaut books world: Jab adhera Ghir gaya

सुधा गुप्ता को समस्याएं सुलझाने का शौक है. बारीक नज़र और तेज दिमाग के साथ वे तीन गुम हो गई बहनों की गुत्थी सुलझाने निकलती हैं. क्या उन्हें किसी ने अगवा किया है, या कोई और अंधेरा राज़ इसके पीछे छुपा है
जब अंधेरा घिर आया
अंबई
उनका खेल शुरू होते ही हंसी-ठहाके गूंजने लगे. एक छोटी प्लास्टिक की बाल्टी, एक बेलचा और ऐसी ही चीज़ें बैग से निकलीं.
फिर तीनों से गाना शुरू किया, बारह महीने में बारह तरीके से तुझको प्यार जताऊंगा रे…ढिंकाचिका…ढिंकाचिका… और ये गाते हुए रेत में गड्ढा खोदने लगे. एक बड़ा सा ऐसा गड्ढा जिसमें आसानी से छिपा जा सके—वैसे उनका प्लान ये था कि जब लहरें इधर आएंगी तो उनका ये गड्ढा पानी से भर जाएगा तो वो इसमें कूद-कूदकर खेलेंगे. तीनों ने जल्दी-जल्दी खुदाई तो शुरू कर दी लेकिन बीच-बीच में वो कूद-कूदकर एक दूसरे पर रेत फेंकने लगते और एक दूसरे की कमर पर थपथपाते हुए गाना गाते रहते. जैसे ही गाने के बीच में ढिंकाचिका आता तो इसका मतलब होता कि खुदाई छोड़कर अपनी कमर को हिलाते हुए डांस शुरू. उनके आस-पास कोई नहीं था, काफी दूर पर कुछ लोग ज़रूर मौजूद थे. पत्थरों की दूसरी तरफ दूर एक बिंदु की तरह एक मलयाली नारियल पानी वाला नज़र आ रहा था.
नारंगी रंग का नज़र आ रहा सूरज ताड़ के पत्तों के पीछे जा चुका था और धीरे-धीरे समुद्र के किनारे को छूने वाला था. ये वक्त पूरे दिन के दरम्यान जो गुज़रा उसके बारे में सोचने का था.
स्टेला ने सारा डाटा अपने कम्प्यूटर में फीड किया, रिपोर्ट्स के प्रिंट लिए, उन्हें भरा और घर के लिए निकल पड़ी. उसने इलेक्ट्रिककेटल को भरकर उसे ऑन कर दिया था, सुधा की पसंद वाले दालचीनी की खुशबू वाले टीबैग बगल में ही रख दिये थे. केटल की लाल बत्ती बंद हुई और बटन बाहर की ओर दब गया. सुधा ने एक टीबैग कप में डाला और केटल से खौलता पानी निकालकर उड़ेल लिया. कप से दालचीनी की खुशबू उठने लगी.
दूर मडआईलैंड में क्षितिज पर मौजूद सूरज एक लाल रेखा में तब्दील हो चुका था और किसी साये की तरह लग रहा था.
उसने चाय की चुस्कियां लेते हुए उन फाइलों को पढ़ना शुरू किया. बाहर अंधेरा घिरने लगा था और धीरे-धीरे आसमान में तारे नज़र आने लगे थे.
तभी अचानक उसके फोन की घंटी बजी और रिंगटोन गुनगुनाने लगी…ओ से मनवा तू तो बावरा रे…
ये गोविंद शेलके था.
‘हैलो गोविंद, काय झाला?’ उसने मराठी में पूछा.
‘नमस्कार दीदी,’दूसरी तरफ से जवाब आया.
‘सांगा,’उसने कहा.
‘दीदी, मंत्रीजी किसी भी समय यहां आ सकते हैं. मैं बुरी तरह काम में फंसा हुआ हूं. एक नौजवान जोड़ा आया था. दरअसल पति यहीं पर चक्कर खाकर गिर पड़ा. हमें उसे अंधेरी के ब्रह्मकुमारी अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा. बीवी की गोद में चार साल का बच्चा है. ऐसा लग रहा था कि वो परिवार मडआइलैंड में छुट्टियां बिताने आया था. वो एक रिसॉर्ट में रुके थे जो वीकेंड पर छुट्टियां गुज़ारने का हॉलीडेपैकेजऑफर कर रहा था.’
‘एक आदमी बेहोश हो गया ना. इसके अलावा तो कोई गड़बड़ नहीं है ना इस मामले में?’
‘सुनो दीदी, उनकी तीन बेटियां भी थीं. एक चौदह साल की, एक ग्यारह की और एक दस साल की. वो तीनों गायब हैं.’
‘तीनों की तीनों गायब हैं?’
‘हां.’
‘कब?’
‘आज शाम.’
‘गोविंद, मैं क्या कर सकती हूं? ये तो पुलिस का काम है. तुम्हारी इन्वेस्टिगेटिंग टीम का काम है.’
‘नहीं दीदी! मैं तुमसे इस मामले पर काम करने के लिए नहीं कह रहा हूं. ये औरत अपने बच्चे के साथ अकेली है. उसका पति अस्पताल में है. उसका घर ठाणे में है. वो लगातार रो रही है और घर नहीं जाना चाह रही है.’
‘तो तुम उसे वाईडब्ल्यूसीए या फिर ऐसी किसी दूसरी जगह क्यों नहीं ले जाते? मेरी जानकारी में ऐसे हॉस्टल हैं जहां पर ऐसी अकेली लड़कियों को पनाह मिलती है. वो वहां पर एक-दो दिन रह सकती है. मेरे पास हॉटलाइन नंबर है.’
‘नहीं दीदी. उसका दिमाग बिल्कुल नहीं काम कर रहा है. हालात बड़े पेचीदा हैं. अगर तुम्हें परेशानी न हो तो क्या वो आज तुम्हारे यहां रात गुज़ार सकती है? पहले ये बताओ क्या तुम काफी व्यस्त हो?’
‘नहीं-नहीं. मेरा वाला बड़ा उबाऊ केस है. एक शक्की पति अपनी बीवी पर निगरानी रखना चाहता है और असल में इस महिला को शॉपिंग का चस्का है. आज दोपहर ये शॉपिंग के लिए शॉपर्सस्टॉप गई और जाने क्या-क्या खरीद डाला, चम्मच से लेकर शूहॉर्न तक, मतलब जिस चीज़ पर भी सेल थी सब खरीद लिया. यहां तक कि उसने घुड़सवारी के दौरान पहनी जाने वाली दस स्कर्ट खरीद लीं. वो सब उसके नाप की भी नहीं थी. उसके पास चार ट्रॉली भरकर सामान था और जब वो कैशियर काउंटर तक पहुंची तो सर से लेकर पांव तक पसीने में भीगी हुई थी. वो काफी मोटी भी है और पता है उसने पूरे साठ हज़ार रुपए की शॉपिंग कर डाली!’
‘ओह दीदी…काश मुझे भी ऐसा असाइनमेंट मिलता काम करने के लिए.’
‘तुम मजे ले रहे हो, हुंह?’
‘नहीं दीदी, काम का काफी दबाव है. लेकिन मुझे एक बात बताओ, क्या ये औरत तुम्हारे साथ रह सकती है? कम से कम मेरे लिए इतना तो कर दो?’
‘ठीक है गोविंद, उसे भेज दो.’
‘मैं इस बार रक्षाबंधन पर तुम्हारे दो बार पांव छूऊंगा दीदी.’
‘सिर्फ पांव पड़ने से काम नहीं चलेगा गोविंद. तुम्हारी बहन होने के नाते तोहफे का भी हक है मेरा.’
‘क्या बात कर रही हो दीदी, वो मैं कैसे भूल सकता हूं? अच्छा मैं इस औरत को राघव सावंत के साथ भेज रहा हूं.’
‘ठीक है गोविंद,’ ये कहकर सुधा ने फोन काट दिया.
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(अंबई की किताब अंधेरी ओवरब्रिज पर एक मुलाकात का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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