पांडोके: बीच में टोकोगे तो मैं अपनी कहानी से फिसल जाऊंगा

पांडोके: बीच में टोकोगे तो मैं अपनी कहानी से फिसल जाऊंगा

यार, लाला क्या बताऊं, ऐसा चेहरा कि सूरज भी उससे रोशनी मांगे. सिर के बाल तो घुटनों तक होंगे ही. देखती ही मेरे होश तो जाते रहे. अब काम तो मैं मीनार पर करता लेकिन नज़र दिन भर उस आंगन में रहती

By: | Updated: 17 Oct 2017 04:44 PM

उस राजमिस्त्री ने मस्जिद की मीनार से ऐसा क्या देख लिया कि उसकी जान पर बन आई?


पांडोके


अली अकबर नातिक


pandoke


शहज़ाद लाला सुनिए, यह दस साल पुरानी बात है, मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, आप को तो मालूम ही है, मैंने कितने समय तक मस्जिदों के मीनार और गुंबद बनाए. दरवाज़ों की मेहराबें, डाटें, मुग़ल काल की सुराहियां और ईरानी शिल्पकला का काम दरवाज़ों पर जिस महारत के साथ करता था, वह आप से छुपी हुई नहीं. इसी कारण से मेरी शोहरत जब अपने शहर से बाहर निकली तो मुझे क़सूर के एक गांव पांडोके में मस्जिद के निर्माण का काम मिल गया. यह वही गांव है जहां बुल्ले शाह पैदा हुए और यह कहते हुए निकल गए.


बलहिया जे तूं ग़ाज़ी बनना, लकीं बनह तलवार


पहलां रहंगड़ पांडू मारें पछुं काफ़िर मार


उजड़ गए पांडोके, तै निघ्घर गया सिधार


वाह भई बुल्ले शाह भी कितना दुनिया देखा हुआ आदमी था. काश वह यह जिहाद करता हुआ हमारे गांव तक आता. शहज़ाद लाला का इशारा अपने गांव के कमबोह समुदाय की ओर था जो मार-काट में अपना जोड़ नहीं रखता था. देखो भई, बीच में टोकोगे तो मैं अपनी कहानी से फिसल जाऊंगा. हां, तो आपको पांडोके में मस्जिद के निर्माण का काम मिल गया, फिर क्या हुआ?


हां, तो मैं कह रहा था, यह गांव 15 हज़ार की आबादी से बना था. कोई औरत ज़ेवर से ख़ाली नहीं और कोई मर्द बंदूक़ के बिना नहीं. गांव के बाज़ार खुले-खुले थे जिनके दोनों किनारे पीपल, नीम और बेरियों की कतारें दूर तक चली गई थीं. बहुत बड़ा चौक 100 फ़ुट की घेरे का होगा. लोगों के घर बड़े-बड़े और खुले अहाते से लगे थे. मस्जिद के चारों और 60 फ़ुट चौड़ी सड़क गांव से मस्जिद को अलग कर देती थी. पहले दो-चार दिन तो मैंने उस गांव को हैरत से देखा, गलियों और बाज़ारों में घूम-फिर कर उसकी खूबसूरती का मज़ा लेता रहा.


बाज़ारों में पानी के साफ़ नाले पेड़ों की बहार दिखाते थे लेकिन इस सैर के बाद मैं पूरी तरह अपने आप में सिमट आया. जिसकी वजह जल्दी ही आपको मालूम हो जाएगी. हालांकि 50 फ़ुट की ऊंची मीनारों पर काम करता था लेकिन पीपल की उंचाई उससे भी अधिक होने के कारण सामने वाले घरों के आंगन में मेरी नज़र नहीं जाती थी. एक बार मस्जिद के ठीक सामने वाले घर से खूबसूरती की हल्की-सी रोशनी पड़ी जिससे मेरी आंखें चौंधिया गईं.


यार, लाला क्या बताऊं, ऐसा चेहरा कि सूरज भी उससे रोशनी मांगे. सिर के बाल तो घुटनों तक होंगे ही. देखती ही मेरे होश तो जाते रहे. अब काम तो मैं मीनार पर करता लेकिन नज़र दिन भर उस आंगन में रहती. एक दिन मेरे साथ काम करने वाला मज़दूर मेरी यह हालत भांप गया. कहने लगा, क्या देखते हो राज साहब. इन तिलों में तेल नहीं. अपने काम की ख़बर लें गांव के हालात ख़राब हैं. उसके इस इशारे से मैं फ़ौरन संभल गया बल्कि उसके बाद मज़दूरों की चापलूसी भी शुरू कर दी कि कहीं किसी को ख़बर न कर दे और शुक्र है कि उसने यह राज़ अपने तक ही रखा. वैसे भी फिर कभी वह रोशनी नज़र नहीं आई. कभी अनजाने में उधर को नज़र उठ जाती तो उसके घर की छत पर जगह-जगह कबूतरों की छतरियां मेरा मुंह चिढ़ातीं. फिर मैंने उधर का खयाल ही छोड़ दिया.


तो आपने हाथ उठा लिया, ख़ैर यह कोई हैरत की बात नहीं, कायरता तो आपकी पुश्तैनी है. यह बात नहीं लाला जी, गांव विचारों के लिहाज से अफ़ग़ानिस्तान में ही था. पल में तोला, पल में माशा, आप सुनें तो सही. बात करते जाएं, मुझे अंदाज़ा हो गया कि वहां कैसे अजूबे रहते होंगे, जहां से बुल्ले शाह हाथ झाड़ के ऐसे थोड़े ही गए होंगे.


वैसे तो वहां की हर चीज़ चौंका देने वाली थी लेकिन वहां जा कर पहली घटना जो घटी उसी से बात शुरू करते हैं. मस्जिद के सामने जैसे कि मैं बता चुका हूं कि चौड़ी तारकोल की सड़क, जिसकी दूसरी ओर चार-पांच पीपल के पेड़ थे. रशीद नाम का पागल पीपल की छांव से हटकर चौक के बीच में तारकोल की सड़क पर सुबह छह बजे आकर खड़ा हो जाता, आठ बजते, 10 बजते, 12 बजते, फिर शाम हो जाती, यहां तक कि रात हो जाती और वह वहीं रहता.


जून-जुलाई की दोपहर में पसीना उसके सिर से ले कर पांव तक बहा चला जाता लेकिन वह वहीं जमा रहता और मस्जिद के दरवाज़े की तरफ़ जहां मैं काम पर लगा था, देखता रहता. गाड़ीवान, ट्रैक्टर या कार वाले सावधानी के साथ इधर-उधर से निकल जाते मगर रशीद मियां के इरादे अटल थे. वह अपने पांव की ज़मीन नहीं छोड़ते. मुझे बहुत हैरत हो कि आख़िर यह शख्स है कौन. न कुछ बोलता है, सुबह से लेकर शाम तक कुछ खाता-पीता भी नहीं और धूप में पड़ा सूखता है. कोई उसे कुछ कहने का साहस भी नहीं करता.


एक दिन उकता कर मैंने कहा रशीद भाई, आप जो सारा दिन तारकोल की सड़क पर खड़े जुलाई की धूप तापते हो, थोड़ा उधर पीपल के साए में क्यों नहीं चले जाते. वह मुझे घूरता हुआ बोला, “पागल कहीं का, मूरख क्या ठंड नहीं आएगी?”


-भई शहज़ाद लाला, ख़ुदा गवाह है, मैं चकरा गया और शर्मिंदा होकर अपने काम में व्यस्त हो गया, उसके बाद से कभी उससे बात नहीं की.


-ख़ुदा की क़सम तुम से स्याना था, वास्तव में उसने तुम्हें बहुत जल्दी पहचान लिया.


-यार एक तो तुम में यह ख़राबी है कि बात ख़त्म होने से पहले ही फ़ैसला सुना देते हो, पहले पूरी कहानी तो सुन लो.


-अच्छा भई, कहिए!


-हां कहता हूं, लेकिन फ़िलहाल उस रशीद साहब को छोड़ कर बात फिर से शुरू करते हैं.


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(अली अकबर नातिक की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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