स्वेटर: कड़ाके की ठंड थी और रात के दस बजे थे

स्वेटर: कड़ाके की ठंड थी और रात के दस बजे थे

शहराम ने सड़क के साथ चलना शुरू कर दिया. इधर-उधर से गीदड़ के बोलने और उल्लुओं की आवाज़ ने दिल में दहशत पैदा कर दी थी.

By: | Updated: 11 Oct 2017 03:46 PM

देर रात सड़क पर मिले उस शख्स ने शहराम को न सिर्फ स्वेटर दिया, बल्कि जिंदगी बसर करने का एक तरीका भी देता गया. लेकिन क्या शहराम उस पेशे में कामयाब हो पाएगा?


स्वेटर


अली अकबर नातिक


Sweater


छोटी नहर से पश्चिम की तरफ़ शहर का विस्तार किया गया तो पहले ज़िला प्रशासन के कार्यालयों की जगह बदली गई. उसके बाद सरकारी कर्मचारियों की कॉलोनियों को जगह दी गई. उसी जगह एक बिहारी कॉलोनी बनाकर मुहाजिरों (भारत से पाकिस्तान जाने वाले शरणार्थियों) को अलॉट कर दी गई. कालोनी की असल शहर से तीन किलोमीटर की दूरी थी. नई बस्ती शाम से ही सुनसान हो जाती, और इशा (नौ बजे) के वक़्त तक उल्लू बोलने लगते.


ऊंचे पेड़ों के झुंड और पक्षियों की चहकार को छोड़ कर पूरे क्षेत्र में पूरा सन्नाटा छा जाता. सारा क्षेत्र पुराने शहर से कटा हुआ था लेकिन सबसे अधिक जिस कॉलोनी का सामाजिक और सांस्कृतिक संबंध टूटा हुआ था वह बिहारी कॉलोनी ही थी. चेहरे मोहरे, वेशभूषा और भाषा में बिलकुल अलग थे. इनमें से कुछ लोगों को सरकार ने छोटी-मोटी नौकरियां भी दीं मगर बड़ी तादाद बेरोज़गार थी. परिवार भी बिखरे हुए थे. बेटा यहां तो बाप कराची या किसी दूसरे शहर में.


एक सुविधा जो उन्हें मिली हुई थी वह यहां की काफ़ी ख़ाली भूमि थी जहां या तो पेड़ों की बहुतायत थी या फिर बड़ी हरी घास उगी हुई थी. कुछ भूमि पर उनकी महिलाओं ने कुछ सब्ज़ियां उगा ली थीं, जिन्हें सब्ज़ी मंडी बेच आतीं. कॉलोनी के लड़के सारा दिन बिलियर्ड खेलते, पान की पीकें फेंकते, या हिंदुस्तानी फ़िल्में देखते. पढ़ने-लिखने से उन्हें कोई लगाव नहीं था. इन लड़कों में से कुछ की गतिविधियां किसी और ही रुख पर थीं और वह रहस्यमय चुप्पी के साथ चल रही थीं जो अभी शहराम को पता नहीं थीं. उसे यह तो पता था कि उसके दोस्त लंबा हाथ मार रहे हैं, ख़ुशबूदार पान, जींस की नई-नई पैंटें, शर्टें और जूते ख़रीद लेना आसान बात नहीं थी. उनकी जेब में हर समय पैसे रहते हालांकि उन सबके घरों में तिनका तक नहीं था. मंजू का बाप तो फ़ालिज के बाद लेट गया था. यही हालत उसके दूसरे दोस्तों की भी थी. आख़िर एक दिन उस पर यह भेद खुल ही गया.


कड़ाके की ठंड थी और रात के दस बजे थे. शहराम की मां को सिर दर्द ने चकरा दिया. पहले तो वह सब्र किए पड़ी रही लेकिन जब दर्द सहा न गया तो वह चीख़ उठी. ए छोकरे तबीयत खराब होवे गई. सिर फटा जावे. शहर से सिर दर्द की गोली ले आ. शहर का नाम सुना तो शहराम के तोते उड़ गए. रात, चारों ओर पसरा सन्नाटा, दो मील पैदल का सफ़र और उसपर सर्दी की मार. थोड़ी देर कसमसा कर पड़ा रहा, जब मां ने गालियां देनी शुरू कीं तो बेचारा उठ खड़ा हुआ. सोचा मंजू को साथ लेता जाऊं. पैंट पहनी और बाहर निकल आया.


मंजू का दरवाज़ा खटखटाया लेकिन वह घर पर नहीं था. हैरानी में कि रात के इस पहर कहां गया. सोचा कि रामी को लेता जाता हूं, पता किया तो वह भी ग़ायब, एक और दोस्त का दरवाज़ा पीटा लेकिन वह भी नदारद. बात पहेली बन गई. शहराम को यक़ीन हो गया कि सब किसी मार पर जाते हैं और हमें ख़बर नहीं करते. अकेले निकल पड़ा लेकिन घर से डबल गरारी का चाक़ू उठा लिया कि हर बिहारी के घर में उसका होना अनिवार्य था. उसका फल छह इंच तेज़ लोहे का था. कालोनी के फाटक के बाहर निकला तो बाहर कड़ाके की ठंड और धुंध थी.


शहराम ने सड़क के साथ चलना शुरू कर दिया. इधर-उधर से गीदड़ के बोलने और उल्लुओं की आवाज़ ने दिल में दहशत पैदा कर दी थी. सड़क के दोनों किनारे जामुन के पेड़ थे, जिन्हें वह दिन में हज़ारों बार देख चुका था मगर इस समय उनका घनापन अंधेरे को बढ़ा रहा था, उसकी वजह से हर तरफ़ डरावना माहौल था. वह चलता गया और डर-डर के पीछे देखता जाता कि अचानक उस पर कोई चीज़ हमला न कर दे. चाक़ू उसने खोल कर दाएं हाथ में मज़बूती के साथ पकड़ लिया. दो सौ मीटर ही चला था कि उसे एक सुज़ूकी कार आती दिखाई दी, कोई कैंट की ओर से आ रहा था और शॉर्टकट मार कर शहर की ओर जा रहा था.


यह कॉलोनी का आदमी नहीं था, क्योंकि यहां तो कार एक तरफ़ किसी के पास साइकल भी नहीं थी. शहराम को ख़ुशी हुई कि अगर उसने लिफ़्ट दे दी तो शहर जाने में आसानी हो जाएगी. चाक़ू उसने पैंट की जेब में रख लिया और हाथ से रुकने का इशारा किया. कार नज़दीक आकर रुक गई. कार में 40 के पेटे का अच्छा पहनावे वाला शख्स था. एक-दो बात के बाद शहराम उसके पास वाली सीट पर बैठ गया. उसी दौरान उसने शहराम की ओर ग़ौर से देखा. ये तो 14-15 साल का नमकीन और करारा लड़का था.


रात के सन्नाटे और ठंड में सड़क के किनारे इस तरह मिल जाए, वाह री क़िस्मत. उसने कई पंजाबी लड़के देखे थे लेकिन वह उनसे दो हाथ आगे था. इधर शहराम के दिल में अचानक एक नए विचार ने जन्म लिया. उसने सोचा उसके पास तो दो हज़ार ज़रूर होंगे और यह बाबू गैंठल सा, डरपोक भी लगता है. उसे अभी चाक़ू दिखाकर लूट लेना चाहिए, रात के इस समय किसको ख़बर होगी. उसकी आंखों में बंबइया फ़िल्मों के कई सीन एक के बाद एक घूमने लगे और दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा. उसने सोचा अभी एक्शन करूं तो दो मिनट का काम है, पैसों में खेल जाऊंगा. मगर जैसे ही पैंट की जेब में पड़े चाक़ू पर हाथ रखा, दिल सीने से बाहर निकलता हुआ लगा और माथे पर पसीना आ गया.


सोचा कि पकड़ा गया तो बुरा फंसूंगा. इधर यही स्थिति उस अजनबी की थी. मगर उम्र के कारण उसमें एक ठहराव था. कुछ देर बाद उसने शहराम की जांघ पर अपना हाथ रख दिया. शहराम अजनबी की इस हरकत पर असमंजस में पड़ गया और चाक़ू और लूटना भूल गया और उसी समय उसका दिमाग़ अपने दोस्तों, मंजू, शब्बू, रामी और काजू की ओर चला गया. बात उसकी समझ में आने लगी कि वे रात के समय किस बुलावे पर जाते हैं और उनकी जेबों में खरे-खरे पैसों का क्या राज़ है.


यह सब उसी पल उसकी समझ में आने लगा था. वह पैसे किसी को लूटने से नहीं मिलते थे. मैं भी कहूं, यह मंजू रोज़ रात के समय बन-संवर के कहां निकल जाता है और वह साला शब्बू, हूं बड़ा बदमाश बना फिरता है.


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(अली अकबर नातिक की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)


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