एक सपने की कीमत: चेहरा चांद सा तो नसीब छलनी सा होगा

एक सपने की कीमत: चेहरा चांद सा तो नसीब छलनी सा होगा

“कर्मजली बड़ी सुंदर रही,”रामवती ने कहा. “मगर जग जानी बात है– चेहरा चांद सा तो नसीब छलनी सा होगा. सुख तो टिकता ही नहीं.

By: | Updated: 11 Sep 2017 04:03 PM

एक सपने की कीमत 


अंजली देशपांडे


juggernaut


सूर्यबाला! सबसे छोटी बेटी थी उसकी, चौथी क्लास तक पढ़ने वाली नटखट लड़की. अपने तीन बड़े भाइयों की थाली से मांस की बोटी छीन लेती. सब कुछ अच्छा ही चाहिए था उसको. एक धोबी के घर में कितना मिल सकता है? आजकल कोई कपड़े धुलवाता भी नहीं. शहर तो है नहीं कि होटल के चादर तौलियों का ही ठेका उठा ले. मज़दूरी पर ही गुज़ारा करना होता है. सोलह की होते न होते हाथ पीले कर दिए.


“कर्मजली बड़ी सुंदर रही,”रामवती ने कहा. “मगर जग जानी बात है– चेहरा चांद सा तो नसीब छलनी सा होगा. सुख तो टिकता ही नहीं. दिल्ली में ब्याही थी, मंगलापुरी में. वहां भी उछलती फिरती. कभी चाट खाने, कभी किसी से गपियाने. न बात से काबू में आवे न लात से. असगुन तो समझो साथ ही लेके आई थी. दो साल की थी बाप को खा गई. ब्याह के दो साल बाद खसम को खा गई. अच्छी नहीं थी, बिल्कुल अच्छी नहीं थी लड़की.”


रामवती फूट-फूट कर रोने लगी. अधीर बैठा उसका रोना सुनता रहा. अब उसे तसल्ली देने का भी जी नहीं किया. निकला था कहीं खुशी की खोज में और मिला क्या! वह पछताने लगा कि क्यों पचड़े में पड़ा. सरदर्दी नितेश की थी, है भी, उसे तो निकल लेना चाहिए.


आंसू पोंछ कर रामवती ने कहा, “लौट आई हमारे पास. बाल बच्चा कोई था नहीं. ऊपर से शहर की हवा और लग गई थी. रंग-बिरंगी चूड़ी पहनती, साड़ी पहनती. ऐसी औरत को कौन आदमी छोड़ता है? कहने को गांव के आदमी भाई होते हैं, बस कहने ही को चाचा-ताऊ होते हैं. भावजों को कलह का अच्छा बहाना मिल गया. जल्दी से उसे दूसरे के घर बिठा दिया. ब्याह दिया. वहां से तो पंद्रह ही दिन में भाग निकली. तीन बार हमने लौटाई लड़की. कोठरी में बंद किया. लकड़ी से पीटा. पर जाने को ही राजी न हो.


कहती थी देवर छेड़ता है. आदमी रात भर चढ़े रहता है. उसके मुंह से सड़ी मछली की बास आती है. तीसरी बार भागी तो हमने हाथ जोड़ कर ससुराल वालों से कहा तलाक दे दो. बिरादरी की पंचायत ने कराया. दस हज़ार मांग रहे थे किसी तरह छह हज़ार में समझौता हुआ. भाइयों ने तो कह दिया हम न रखने के. लेकिन जाती कहां? इसी से तो पैदा होने ही गला रेत देते हैं लड़की का. कहती थी बूटी पालर का काम सीखूंगी. सीख भी लिया था.


टिरेन से जाती थी पालर को, टिरेन से आती थी. कभी-कभी तो रात को आती ही ना थी. इसी इस्टेशन पर. गांव के लौंडे-लपाड़े खड़े रहते, कोई रुपया दिखाता कोई कुछ और. हमारा तो मुंह दिखाना मुश्किल था. वह तो कहो हम इस गांव के नहीं हैं. चंदोला केपरधानजी ने तो आदमी भेज दिया था हमारे घर. कहलवाया था कि लड़की को धंधा ही करना है तो गांव वालों के पास भी भोत पैसा है. अगले दिन ट्यूबवेल पर भेज देना लड़की को, कहलवाया था. सच्ची, कसम से.”


“ट्यूबवेल पर?”अधीर के मुंह से निकला.


“खेतों में होते हैं ट्यूबवेल,”रामवती ने उसे विचित्र निगाहों से देखा.“शहर के हो.”


“...वो तो मालूम है, ट्यूबवेल होते हैं...”


“वहां कमरा होता है. बिजली कनेक्सन का. वहीं करते हैं सब गंदा काम.”


परधानजी! अधीर को धोती और मुचड़ी कमीज़ में गुस्सैल चेहरे वाला आदमी याद आ गया. नितेश उसे कहा रहा था, “ताऊजी.”


“भाइयों ने तो जानो उसी दिन निकाल फेंका.”


तब से रामवती उससे कभी छह महीने में एक बार मिली थी. जाने कहां चली गई थी. कहां रहती थी. दो बार मिलने आई थी. बिंदी टिकुली लगाकर, झुमके पाजेब खनकाती. चूड़ियां छोड़ दी थी. कंगन पहनने लगी थी. भावजें देखते ही मुंह बिचका लेतीं.


“उसके साथ तो ऐसा होना ही था. लेकिन मैंने जना था. पिछले जनम का पाप ही होगा, ऐसी लड़की जनी. नरक को ही जाएगी.फिर भी किसी को तो किरिया-करम करना होगा. कहां ले के गए हैं उसकी लाश को? वे हरामी पुलिसवाले, भगवान उनका कभी भला नहीं करेगा. बताया ही नहीं कहां ले गए. कैसे मिलेगी लाश?”


“पुलिस ने ही तो खबर की होगी उसके मरने की.”


“वह बड़ा खबर करने वाले हुए. गांव से आया था आदमी. परधानजी ने भेजा था. बता रहा था कि लड़की को चीर दिया किसी ने. आंतें मिट्टी में पड़ी हैं. मैं तो बेटा ऐसे ही दौड़ी आई. देखा न गया मुझसे. तभी पुलिस आ गई थी. उन्होंने तो बात भी ना की मेरे से.”


“अम्माजी चलो आपको घर छोड़ दूं. मैं पता लगाऊंगा. बताऊंगा आपको.” अधीर को यकीन नहीं हो रहा था कि यह उसी के बोल हैं. उसे खुद अपनी आवाज़ अजनबी सी लगी, लगा कोई उसके बाहर आ खड़ा हुआ है इस बूढ़ी औरत को आश्वासन देने और उसे बिल्कुल अच्छा नहीं लग रहा था कि यह आश्वासन दिया जा रहा है.


उसका हाथ पकड़ कर वह उन्हें मोटरसाइकिल तक ले गया और उसे अपने पीछे बैठा कर घर छोड़ आया. इस तरह उसने देखा कुछ दूरी पर बसा अमीरपुर गांव और उसमें एक तरफ को पड़ा हुआ बिना पलस्तर का ईंटों की टेढ़ी सी दीवारों के ऊपर ऐस्बेस्टोस की चादर जिसे मकान कहना भाषा की दरिद्रता होती मगर जिसे कई लोग घर कहते थे.


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(अंजली देशपांडे के उपन्यास का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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