होटल: अपनी आवाज़ों से मैं वाकिफ था

मेरा सामान लेकर एक लड़का ऊपर जा चुका था. वह खुश था कि कोई होटल में रुकने के लिए आया है. मैं लकड़ी की सीढ़ियों पर चलने लगा तो मुझे लगा कि मैं अपने होने की आवाज़ें सुन रहा हूं. अपनी आवाज़ों से मैं वाकिफ था. उनकी गूंज और उनके अवसाद से.

By: | Last Updated: Thursday, 14 September 2017 4:11 PM
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होटल

देवी प्रसाद मिश्रा

Hotel

बहुत थका एक दिन जब मैं पुराने से होटल के रिसेप्शन के आगे खड़ा था तो लगा कि होटल की पूरी इमारत कभी भी गिर सकती है. रिसेप्शन पर बैठी स्त्री ने कहा कि मैं जिस कमरे में ठहरने वाला हूं वह पहली मंज़िल पर है. मैंने बिना किसी खास वजह के पूछा कि इमारत में तीसरी या चौथी मंज़िल भी है क्या. उसने कहा कि वह केवल पहली मंज़िल के बारे में जानती है. मैं उससे बात करना चाहता था लेकिन यह जानना आसान नहीं था कि वह क्या चाहती थी.

मेरा सामान लेकर एक लड़का ऊपर जा चुका था. वह खुश था कि कोई होटल में रुकने के लिए आया है. मैं लकड़ी की सीढ़ियों पर चलने लगा तो मुझे लगा कि मैं अपने होने की आवाज़ें सुन रहा हूं. अपनी आवाज़ों से मैं वाकिफ था. उनकी गूंज और उनके अवसाद से.

ये उस आदमी की आवाज़ें थीं जो किसी के साथ नहीं हो पाता था. जिसके साथ कोई नहीं आता था. मैं अकेले आदमी का निनाद था. कमरे में सफाई और रूम फ्रेशनर डालने के बावजूद कमरे में उन लोगों की गंध थी जो कभी कभार कमरे में रुके थे. बहुत सस्ते से होटल में बहुत सस्ते से कंबल को अपने ऊपर डालकर मैं पड़ा रहा. अचानक मुझे लगा कि कंबल में किसी और की सांस महक रही है.

फिर यह लगा कि इसमें किसी और का पसीना महक रहा है. फिर कंबल में लिपटे किसी के बाल दिखे. मुझे लगा मेरे साथ कोई और लेटा है. मैंने कंबल के अंदर कैद हवा में हताशा की बू महसूस की.

एक घुमड़.

एक तड़प.

कोई कोहराम.

एक गहरी थकान.

मुझे लगा कि कोई किसी बड़ी यात्रा पर निकलने के पहले आराम कर रहा है या कि एक बहुत लंबी यात्रा के बाद उठना ही नहीं चाह रहा है. मुझे लगा कि अपनी से ज़्यादा मुझे उसकी नींद की परवाह है.

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(देवी प्रसाद मिश्रा की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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