जीवन: रास्ते बहुत हैं लेकिन रास्ता नहीं मिल पाता

ट्रेन रुकने लगी थी. यहां उसे उतरना था. वह उतरी. मैं भी उतरा. रेलगाड़ी मेरे सामान के साथ चल पड़ी. एक जगह आकर जैसे कि सांस लेने के लिए उसने सामान रखा और पीछे देखा तो मैं दिख गया. वह हंसी. गहरे आभ्यंतर के साथ.

By: | Last Updated: Wednesday, 13 September 2017 4:36 PM
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उसने बताया कि वह बहुत सोती है और बहुत देर तक जागती है. वह बहुत हंसती और बहुत रोती है. वही सारी गलतियां वह बार बार क्यों करती है – यह सब बताते हुए वह भागती रेलगाड़ी की लॉबी की ओर चली गयी. देवी प्रसाद मिश्र की एक कहानी.

जीवन

देवी प्रसाद मिश्र

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रेलगाड़ी में मेरे सामने जो लड़की बैठी थी उसके दांत एक सजग डेंटिस्ट के दांत नहीं थे. उनमें एक पीलापन था जबकि हंसी ऐसी थी कि जैसे किसी ने पूरे समुद्र पर जाल फेंका हो. वह धारवाड़ जा रही थी. किसी डेंटल कालेज में आगे पढ़ने के लिए. ग्रेजुएशन करने के बाद. उसने मुझसे कहा कि उसने दांतों की परवाह नहीं की और हंस दी कि जैसे हंसी पीले दांतों को ढंकने की कोई हिकमत हो.

वह मुझे लगातार निरुपाय दिखती रही. कि जैसे मैं उसे कभी नहीं मिल सकता था. हो सकता है यह खयाल मेरा पौरुषेय दुरभिमान रहा हो. मुझे लगा कि वह हंसती पहले थी और बोलती बाद में थी. उसने बताया कि वह बहुत सोती है और बहुत देर तक जागती है. वह बहुत हंसती और बहुत रोती है. वही सारी गलतियां वह बार बार क्यों करती है – यह सब बताते हुए वह भागती रेलगाड़ी की लॉबी की ओर चली गयी. वह लौटी तो उसने मुंह धो रखा था. उसका पाजामा गीला था.

मैंने उसे ठीक ठीक कुछ नहीं बताया लेकिन उसे लग गया कि मैंने जीवन की परवाह नहीं की. मैंने चेहरे और बाल की परवाह नहीं की. मैंने संबंधों और नौकरी की परवाह नहीं की. उसने किसी समय पूछा कि आपने परवाह किसकी की. मैंने कहा कि मैं तो यही सोचता रहा था कि मैं अपनी परवाह कर रहा हूं जबकि ऐसा था नहीं. खिड़की के बाहर भूतल, युग और दृश्य भाग रहे थे.

बगल से एक चाय वाला गुज़रा तो मैंने कहा कि मैंने अपनी चाय की परवाह की. वह मुस्कुरा दी. उसने कहा कि चाय हर जगह उपलब्ध है लेकिन एक अच्छी चाय साल में एकाध बार ही पीने को मिलती है. मैंने कहना चाहा कि रास्ते बहुत हैं लेकिन रास्ता नहीं मिल पाता- बहुत सारे मनुष्य हैं लेकिन मनुष्य नहीं मिल पाता. 

मैंने उससे कहा कि क्या वह धारवाड़ घराने से परिचित है तो उसने कहा कि आप कहेंगे कि मैंने संगीत की परवाह नहीं की. मैंने कुछ नहीं कहा- मैं उससे पूछना चाहता था कि देह की सुंदरता क्या आत्मिक गुण भी है और क्या इच्छाएं प्रेम में पर्यवसित होती ही हैं और प्रेम क्या केवल देह को पाने का सलीका भर है. ट्रेन रुकने लगी थी. मैंने उससे जाते हुए नहीं कह पा रहा था कि दांतों का मैं नहीं कह सकता लेकिन मेरी सांसें एक प्रेमी की हैं.

ट्रेन रुकने लगी थी. यहां उसे उतरना था. वह उतरी. मैं भी उतरा. रेलगाड़ी मेरे सामान के साथ चल पड़ी. एक जगह आकर जैसे कि सांस लेने के लिए उसने सामान रखा और पीछे देखा तो मैं दिख गया. वह हंसी. गहरे आभ्यंतर के साथ. उसके बहुत पीले दांतों का पीताभ उस स्टेशन के अंधेरे में फैल गया.

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(देवी प्रसाद मिश्र की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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