खिड़की: जिस कमरे में वह बैठा करता है उसमें एक खिड़की भी है

खिड़की: जिस कमरे में वह बैठा करता है उसमें एक खिड़की भी है

क्या किया जाय – वह सोचता रहता. उसे लगा कि अगर वह बॉस को एक चांटा लगा दे तो उसका डिमोशन हो जाएगा- वह अपने पद से एक पद नीचे चला जाएगा और खिड़की के पास बैठने का उसका सपना पूरा हो जाएगा.

By: | Updated: 14 Oct 2017 06:06 PM

आदमी को उम्र क़ैद की सज़ा मिली.  उसे उम्र भर क़ैद में अंधेरे में बिना खिड़की वाली कोठरी में रहना था.  हुआ लेकिन यह कि जिस आदमी ने अपने बॉस को चांटा मारा उसे नौकरी से निकाल दिया गया.


खिड़की


देवी प्रसाद मिश्रा


वह दफ्तर में बेगाने तरीके से आता, अजनबी तरीके से काम करता और छत की तरफ देखा करता.  इस निरुपायता की वजह से वह पस्त दिखने लगा था.  वह दीवारों को देखता.  वह घड़ी की तरफ देखता.  वह बॉस को दीवार की तरह देखता.


एक दिन अचानक उसे लगा कि जिस कमरे में वह बैठा करता है उसमें एक खिड़की भी है. खिड़की है लेकिन वह फाइलों के अंबार के पीछे छिपी हुई है.  वह आदमी एक दिन दफ्तर खूब जल्दी पहुंचा और उसने फाइलों को करीने से एक कोने में रख दिया.


अब वह आदमी खिड़की के पास आता और खड़ा रहता.  इस बीच उसकी छह सात पेड़ों से दोस्ती हो गई और कुछ चिड़ियों को उसने पहचान लिया जो लगातार चांय चांय किया करती थीं.  अब दफ्तर वह जल्दी आ जाया करता और दूर तक देखा करता.  एक दिन वह आदमी दूरबीन ले आया.  


दूरबीन से उसने देखा कि बाहर एक जो पेड़ है उसके लगभग सारे पत्तों पर बहुत सारी धूल जमा है.  उसे लगा कि वह खिड़की के पास न आया होता तो इस बात का पता उसे न लगता.  उसको लगा कि उसको पेड़ पर चढ़कर पत्तों की मिट्टी साफ करनी चाहिए लेकिन उसको लगा वह पेड़ पर चढ़ना ही नहीं जानता.  लेकिन उसे तो तैरना भी नहीं आता.  और उसे दौड़ना तो आता है लेकिन पता नहीं कबसे दौड़ा नहीं है.  आज वह दौड़ते हुए घर जाएगा- यह सोचते हुए वह खिड़की के पास से अपनी सीट पर आ गया जो एक बड़े से कमरे में दूसरी तरफ थी.


उसने बहुत गहरे महसूस किया कि कैद का जो एहसास उसे मारे दे रहा है उससे बचने का एक ही तरीका है कि वह खिड़की के पास बैठ पाए- अपनी इस मंशा को उसने सामान्य तौर पर ज़ाहिर भी कर दिया.  खिड़की के पास एक सीट भी थी जो खाली थी और जिसे खिसकाकर खिड़की के पास लाया जा सकता था.  तो उसने कहा कि वह चाहता है कि उसकी सीट खिड़की के पास लग जाए.  क्योंकि खिड़की के पास आकर खड़े होना खिड़की के पास बैठने का विकल्प नहीं था.  वह तो खिड़की के पास बैठना चाहता था.  बिलकुल खिड़की के पास.  लेकिन पता यह लगा कि वहां आदमी की सीट लग नहीं सकती थी.  दफ्तर की श्रेणीबद्धता क्रम में यह मुमकिन नहीं था.  फिर यह मज़ेदार बात पता लगी कि अगर उस आदमी का ओहदा एक पायदान कम हो जाये तो उसे वहां सीट मिल सकती है.


क्या किया जाय – वह सोचता रहता.  उसे लगा कि अगर वह बॉस को एक चांटा लगा दे तो उसका डिमोशन हो जाएगा- वह अपने पद से एक पद नीचे चला जाएगा और खिड़की के पास बैठने का उसका सपना पूरा हो जाएगा.  बॉस था भी ऐसा कि उसका भरपूर प्रतिकार किया जाय.  वह दिहाड़ी पर रखे जाने वाले मज़दूरों को निकालने की धमकी देकर घर में उनसे गुलामों की तरह काम कराता था और लड़कियों को अनिश्चितता का डर दिखाकर उनको सोफे पर सुलाने का जतन करता रहता था.


अगले दिन वह बॉस के कमरे में चला गया.  वह बॉस जो नियंत्रण में विश्वास करता था, ग़लती निकालने के लिए आमादा रहता था और बेवजह नाराज़ रहा करता था.  बॉस बेहद नाराज़ हुआ.  बिना पूछे उसकी हिम्मत कैसे हुई कमरे में आने की.  उस आदमी ने बॉस को एक ज़ोर का तमाचा लगा दिया.  


आदमी को सस्पेंड कर दिया गया और जब वह लौटा तो उसे उसके पद से एक पायदान नीचे कर दिया गया लेकिन उसे खिड़की के पास की सीट पर नहीं बैठने दिया गया. कहानी का दूसरा अंत यह हो सकता है कि उस आदमी ने जब ज़ोर से बॉस को तमाचा मारा तो बॉस का सिर मेज़ के कोने में लगे लोहे से टकरा गया और वह मर गया.


आदमी ने अदालत को जो हुआ था वह बता दिया.  आदमी को उम्र क़ैद की सज़ा मिली.  उसे उम्र भर क़ैद में अंधेरे में बिना खिड़की वाली कोठरी में रहना था. हुआ लेकिन यह कि जिस आदमी ने अपने बॉस को चांटा मारा उसे नौकरी से निकाल दिया गया. अब उसके पास पैसा नहीं था, भविष्य नहीं था.


उसके पास अतीत था और अपने घर की खिड़की के पास बैठे रहने का पूर्णकालिक रोज़गार.


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(देवी प्रसाद मिश्र की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)


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