नपनी: हमें पॉलिटिक्स की डिमक डिम पर कमर नहीं मचकानी

अभी तुम्हारी चमड़ी पतली है, चरपरायेगी. अभी तुमसे यही डर है कि मौके पर दुम दबा लोगे. संकोच और लिहाज तुम्हारे चेहरे पर चढ़ बैठेगा. और लड़की का बाप एक छोटा मोटा नेता है, कम्युनिस्ट पार्टी का एम.एल.ए. है. तो दूर की हांकेगा जरूर.

By: | Last Updated: Thursday, 27 July 2017 6:04 PM
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 “तुम अब एक अफसर हो. तुम्हारी पोजिशन है. तुम्हारा अब एक मोल है. जब तक झख मारते रहे और उन हरामजादे परीक्षकों और मेम्बरों की दया पर रहे तब तक बात और थी. अब और है. और इस समाज से बदला लेने का यही समय है. ये नहीं कि लड़की देखते ही लट्टू हो जाओ और लार टपकाने लगो.”

नपनी

दूधनाथ सिंह

Napani

कार स्टार्ट होते ही पिताजी ने पुत्र को आदेश दिया कि वह ट्रांजिस्टर बंद कर दे – ”ये सब रद्द फद्द सुनने की क्या जरूरत है? कोई समाचार है. वे लोग क्या कर रहे हैं और कौन क्या बक रहा है, इससे हमें क्या मतलब? बेफालतू.“ उन्होंने भुनभुना कर कहा.

लड़के ने उनके चढ़े हुए तेवर देखे तो ट्रांजिस्टर बंद कर दिया. ”वैसे मैं गाना सुनने जा रहा था.“ उसने सफाई दी.

”गाना फाना खाने को दे देगा?“ पिताजी ने घुड़की दी. उन्होंने पीछे मुड़ कर देखा. उनकी पत्नी, बेटी और बड़े बेटे के दो बच्चे. बच्चों ने बाबा को घूरते देखा तो वे सिटपिटा गये.

”और वो नपनी कहां है?“ पिताजी ने पूछा.

लड़के ने बताया कि नपनी और अधिकारी जी और चपरासी पीछे वाली कार में हैं.

”भागलपुर कितने मील है?“ पिताजी ने पूछा. उनको बताया गया कि भागलपुर कितनी दूर है. पिताजी ने जेब से एक मैला कुचैला पर्स निकाला, खोल कर देखा और दस दस रुपये के नोट गिने.

”गुंडा टैक्स कितनी जगह देना पड़ेगा?“ पिताजी ने ड्राइवर से पूछा.

”जहां जहां ईंट पत्थर, बांस बल्ली का अड़ार लगा होगा, वहां वहां.“ ड्राइवर ने आगे सड़क देखते हुए कहा.

”और कितना कितना?“ पिताजी ने पूछा.

‘‘जितना बड़ा गुंडा उतना ज्यादा टैक्स.’’ ड्राइवर बोला. पता चला, काई हिसाब नहीं है. ”लेकिन हमें तो हिसाब रखना पड़ेगा. लड़की के पिता से वसूलना होगा. हम क्यों भुगतें?“ पिताजी ने कहा.

”वो तो है साहब.“ ड्राइवर ने कहा.

”और बाकी सब कैसे होगा, सब याद है न?“ पिताजी ने अपने बेटे से पूछा. बेटे ने नत और आज्ञाकारी पुत्र की तरह हामी भरी.

”तुम अब एक अफसर हो. तुम्हारी पोजिशन है. तुम्हारा अब एक मोल है. जब तक झख मारते रहे और उन हरामजादे परीक्षकों और मेम्बरों की दया पर रहे तब तक बात और थी. अब और है. और इस समाज से बदला लेने का यही समय है. ये नहीं कि लड़की देखते ही लट्टू हो जाओ और लार टपकाने लगो. तुम्हारी आदतें पहले भी अच्छी नहीं थीं लेकिन अब तुम एक अफसर हो. और मैं किसी भभके में नहीं आने का. ये सब बड़े चीटर काक होते हैं. फूंक फूंक कर कदम रखना और ही ही ही ही मत करने लगना. और कोई पोलिटिकल बहस नहीं. ये पोलिटिक्स का खेल मैं खूब समझाता हूं. सब अपना घर भरे बैठे हैं और दूसरों को रामराज्य का उपदेश देते हैं. अपना अपना गाल चमकाना दुनिया की रसम है. अभी तुम नहीं जानते. जब सीझोगे तो जानोगे.

अभी तुम्हारी चमड़ी पतली है, चरपरायेगी. अभी तुमसे यही डर है कि मौके पर दुम दबा लोगे. संकोच और लिहाज तुम्हारे चेहरे पर चढ़ बैठेगा. और लड़की का बाप एक छोटा मोटा नेता है, कम्युनिस्ट पार्टी का एम.एल.ए. है. तो दूर की हांकेगा जरूर. सादगी दिखायेगा. अति विनम्र बनेगा. हमें बातों में फंसायेगा. ये सब चाल होगी. सारी बड़ी बातें इस दुनिया में चालबाजी के लिए होती हैं.

इन्हीं बातों में फंसा कर वह लड़की पर से ध्यान हटाने की कोशिश करेगा. बना छना के लायेगा. पोता पाती काफी होगी. उसके भरम में नहीं फंसना होगा –  समझे कि नहीं?“ पिताजी ने गर्दन टेढ़ी करके अपने अफसर पुत्र को देखा. पुत्र ने कनखियों से देख कर हामी भरी.

”जब हम फंसे थे तब कोई पसीजा? वो प्रेमलता का ससुर साला! कुंडली मांगी. कुंडली दाी तो तीन महीने दौड़ाता रहा. थाह लेता रहा जब उसे लगा कि जोग नहीं बैठेगा तो कहता है, लड़की की कुंडली में संतान योग ही नहीं है. और जब उसके मुंह पर कड़क नोट मारा मैंने, जब उसके भगंदर में पांच लाख ठोंसा तो संतान योग हो गया. अब कहां से प्रेमलता चार चार संतानों की जनमदात्राी हो गयी. मर मर के कमाया था मैंने. दो दो रुपये तक पकड़ता था. सारा फंड निकल गया. खुंख्ख हो गया मैं….तो अब मेरे को भी भगंदर है. मैं भी बदला लूंगा. तुम समाज हो तो जैसा मेरे साथ सलूक करते हो वैसा मैं भी करूंगा. सठे साठ्यं… या जो भी कहते हैं.“ पिताजी ने ड्राइवर की ओर देखा.

”अभी गुंडे लोग नहीं आये?“ उन्होंने ड्राइवर से पूछा.

”आयेंगे साहब.“ ड्राइवर ने कहा.

”और एक बात और….“ पिताजी ने अपने पुत्र को देखा. पुत्र जी चुप!

”अगर बिलरंखी होगी तो रिजेक्ट.“ पिताजी ने कहा.

”क्यों?“ लड़के ने साहस किया.

”बिलरंखी पोस नहीं मानती.“ पिताजी ने कहा.

”क्या मतलब?“

”कुछ भी मतलब नहीं.“ पिताजी चिढ़े.

”अब चुप भी रहो.“ पीछे से पत्नी ने कहा.

”और रंग भी गौर से देखना होगा.“ पिताजी ने कहा.

”तो तुम तो हो ही.“ पत्नी बोलीं.

”अरे भाई, उसमें बड़ा छल प्रपंच होता है. सुना है कि ऐसे ऐसे नाऊ हैं कि ऐसा पोत पात देंगे कि आपको असली कलर का पते नहीं चलेगा.“ पिताजी ने कहा.

इस पर पीछे जवानी की ओर बढ़ती उनकी लड़की हंसी. ”ए बुचिया, तुम तो पहचान लोगी?“ पिताजी ने पूछा. ”हां पिताजी.“ लड़की ने कहा.

”और दुल्हन की लम्बाई कितनी है बायोडाटा में?“ पिताजी ने पूछा.

”पांच फीट छः इंच.“ उनकी लड़की ने कहा.

‘‘और नपनी कितनी है?’’ पिताजी ने फिर पूछा.

”पांच फीट तीन इंच’’ उनकी बेटी बोली.

”तो अंदाजा रखना होगा कि जब नपनी के बराबर खड़ी हो तो दुल्हन तीन इंच ऊपर लगे.“ पिताजी ने कहा.

”और एकाध खाना कम हुई तो साहेब!“ ड्राइवर ने मजा लिया. ”कम कैसे हो जायेगी?“ पिताजी ने अचम्भा प्रकट किया.

”हां साहेब, पहले ही देख भाल लेना ठीक होता है.“ ड्राइवर फिर शामिल हुआ.

”और कोई बग झक नहीं. वो उत्तर प्रदेश में क्या हो रहा है,? हमें क्या मतलब? हम घरबारी लोग हैं. किसी तरह जान बचा कर जिन्दा हैं. हमें पॉलिटिक्स की डिमक डिम पर कमर नहीं मचकानी.“ पिताजी चुप हो गये.

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 (दूधनाथ सिंह की कहानी नपनी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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