वाया गुड़गांव: रोमियो जूलियट इन जाटलैंड | Read Dushyant's story VIA GURGAON

वाया गुड़गांव: रोमियो जूलियट इन जाटलैंड

बहरहाल, वापिस उस बात की बात करें, रायता फैलाने वाले प्यारे अंकल को खिला पिलाकर, ठिकाने सिर लगाकर आधे घंटे में जब महेंद्र लौटा, तो रास्ते में हजारों फूलों की खुशबू जैसे एक साथ उसके नाक में घुस गई. झटपट उसके नाक ने आंख को आदेश दिया और उस शीघ्र ही आदेश की अनुपालन में नजर खुशबू की दिशा में दौड़ गई.

By: | Updated: 13 Dec 2017 04:03 PM
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वाया गुड़गांव: रोमियो जूलियट इन जाटलैंड


दुष्यंत


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एक भाई साहब ने रायता फैला दिया था, वैसे केवल बूंदी-रायता नहीं, अरहर की दाल और मटर पनीर की सब्जी भी फैलाई थी. उनको ज्यादा चढ़ गई थी, या चढ़ा ली थी, ये कहना चाहिए. और वे अपना वह क्रीम कलर का सफारी सूट रायता फैलाई की पुण्य पुनीत रस्मी में बिगाड़ चुके थे, जो कभी उन्हों ने अपनी शादी में अठारह साल पहले की देउठणी ग्यापर को पहली बार पहना था, सुमठिणी के वक्त. हल्दी और तैल रंगों वाली पनीर की चित्रकारी से आज के बाद उस सफारी सूट का पहना जाना पूरी तरह से संदिग्ध हो गया था. यानी पार्टी तो चरम पर थी ही, अब उनका प्रवचन भी चरम पर था.


आदमी की इज्ज त ही नहीं जाणते. गांव का हूं तो क्या  हुआ, पढ़ा लिखा हूं, खेती करता हूं, पंद्रह मुरब्बे का मालिक हूं, तीन सिरी (खेत मजदूर) हैं खेत में, तुम जैसों को तो खेत में सिरी भी नहीं रखता.’


आत्ममविश्वांस और अभिमान का मणिकांचन संयोग था यह प्रवचन, जो इस पल इलाके के इतिहास में तैलीय अक्षरों से दर्ज होता हुआ लग रहा था, जिस इलाके को भारत के इतिहास में यदा-कदा ही कायदे की जगह मिली थी.


- ‘भाई साहब, माफ करो इनको, हो जाता है कभी कभी, गरीब लोग है, दिन रात मजूरी करते हैं बापड़े, इनसे गलतियां हो ही जाती हैं. आप तो बड़े दिल के अमीर आदमी हो, खानदानी भी हो.’ यह खरखरी आवाज, सामने वाले के लिए इज्जत से भरी हुई आवाज, महेंद्र के पिताजी की थी.


-‘सलाद क्या मांग लिया, आदमी की इज्जत उतार दी इस वेटर ने.’


अपने अभिमान को सहलाए जाते समय भाई साहब ने कहा.


जवाब में महेंद्र के पिताजी ने कहा कि चौधरी साहब, मैं माफी मांगता हूं, आपसे, आप मौजिज आदमी हो, इनको क्या  पता.


- ‘इसको समझा दो कि चुटालै (चौटाला) मेरी ससुराल है, और पंचकोसी मेरी बेटी ब्याही हुई है, बैंड बजा दूंगा, जंवाई थानेदार है, सीकर पोस्टेड है.’


- ‘चौधरी साहब, मानो तो सही, आप तो स्याणा आदमी हो.’


उन्हेंने एक विराम लिया. उस विराम में कायनात का विराम था. उन्होंहने भाई साहब को कांधे से संभाला, जैसे धरती संभाले है आसमान को. दूसरे हाथ से मोबाइल अपनी जेब से निकाला, और


-‘महेंद्र, कहां हो?’


-‘हां पापा, पार्टी में ही हूं.’


-‘बार के बाद तंदूर वाली साइड में आ जल्दीक!’


-‘आया पापा!’


महेंद्र दौड़ते हुए घटना स्थलल पर आया. पतले मुंह, हल्की हल्की दाढ़ी, दस पर्सेंट ऊक-चूक पर दिखने में ठीकठाक सी नाक, छोटी-छोटी चिरमी जैसी प्यारी आंखें, छह फुट के सुंदर, सौम्य युवक की दौड़ में कई भाव घुले-मिले थे.


-‘ले संभाल तेरे अंकल को, अलग बिठाके या अपनी गाड़ी में ढंग से खाना खिला दे जो मांगे.’ -‘ठीक है पापा.’ कहते हुए सदी के सबसे आज्ञाकारी पुत्र की तरह महेंद्र ने पिता के कांधे से चौधरी साहब को अपने कांधे पर ले लिया. वाकई, यह एक महान दृश्यं था.


यह एक खूबसूरत तारों छाई रात की बात थी (इस बात पर फिर लोटेंगे) पर वैसे, भूगोल की पाठ्यपुस्तक कों में खेती के नक्शों में कॉटन और किन्नूल बेल्ट कहे जाने वाले इलाके में ये कपास के टिंडों में रूई भरने के दिन थे. और रातों में ठंडक भरने के दिन. जल्दीर दिन छिपनेवाली शामों के मीठी और सुरमई होने के दिन भी थे. रेडियो का कॉटन सिटी चैनल मौसम के मुताबिक एहतियातों और करने लायक कामों यानी डूज एंड डोंट्स की सूचनाएं हमेशा की तरह सुबह, शाम दोनों वक्त किसानों को अपने खास कार्यक्रमों में दे रहा था, जिसे सुनकर कितने किसान भाई लोग अमल में लाते हैं, इसका ठीक-ठीक या आधिकारिक सर्वे आज तक नहीं हुआ है. रेडियो पर पाकिस्तान से युद्ध और आपातकाल की घोषणाएं इलाके के लोगों को हमेशा याद रहती हैं. यूं, रेडियो प्रेमी लोग रेडियो की तारीफ करते नहीं थकते, पर बुजुर्ग अपनी अहमियत घटने की आशंका और भय में कहते हैं कि जब रेडियो नहीं आया था तो क्या रेडियो बिना यहां खेती नहीं होती थी!


पूरे इलाके में शायद ही कोई घर हो, जिसमें यह बात पता न हो कि इस चैनल पर हर बुधवार सुबह साढ़े आठ बजे से नौ बजे तक पंजाबी गाने बजते हैं, यही वजह है कि यहां लोगों की नजर में किशोर, रफी, मुकेश जितने बड़े ही गायक गुरदास मान हैं. वैसे, यहां के लोगों की पसंद में केवल यही रेडियो चैनल नहीं था. ऑल इंडिया रेडियो का उर्दू चैनल खूब सुना जाता है, ठंडी रातों में जालंधर और सरहद पार का बहावलपुर रेडियो स्टेशन पकड़ता है तो लोग मजे से सुनते हैं. मोबाइल आने के बहुत पहले के युग से लगातार आज तक, खेतों की मेड़ों पर सफेद कुर्ते पाजामा पहने लोग जब कंधे पर कान के पास रेडियो लेकर गुनगुनाते हुए गुजरते हैं, या खलिहानों से उठकर दूर तक गूंजती रेडियो की आवाज से इस बात की पुष्टि होती है कि इस रेडियो कल्चंर ने इलाके के भाषाई मिजाज को रंग और पंख दोनों दिए हैं, चाहे लाख इसे लोग ‘कल्चर के नाम पर एग्रीकल्चर का इलाका’ कहें, पर यहां के तहजीबी रंग अलग हैं और सघन नजर से देखने पर उनकी मखमली खासियतें उजागर होती हैं.


उसी इलाके के सबसे बड़े शहर में आधे बीघे में फैले हरे-भरे लॉन में पार्टी अपने चरम पर थी. रेडियो से ज्यादा अब डीजे वाले बाबू इलाके में पहचाने जाने लगे हैं. इस पार्टी का डीजे वाला बाबू अब तक अपने स्टॉक के सारे गाने तीन बार तो बजा ही चुका होगा. डांस फ्लोर पर हर नए आदमी के आने के साथ ‘अभी तो पार्टी शुरू हुई है’ का बजना ऐतिहासिक घटना तो होता ही है. पार्टी का नया प्रस्थान बिंदु भी होता है. इन्वीतटेशन कार्ड में पार्टी के शुरू होने का समय सात बजे दर्ज था, अब दस बज रहे थे. अलग अलग कोनों में कहीं फसल, कहीं राजनीति और कहीं खेल की बात हो रही थी. इलाके की जबान में बात करते हुए बीच बीच में जिस बात में असर पैदा करना होता था, उसे हिंदी में कहा जा रहा था, यह मासूम तरीका शायद ही कोई नोटिस करता हो या बात करते वक्त किसी को ध्यान में आता हो.


कुछ घोर पारिवारिक किस्म के लोगों ने घरों को लौटना भी शुरू कर दिया था, हमारे घरों को वहीं रहना होता है, स्थिर और साक्षी भाव में, पर हमीं उससे जिंदगी भर बाहर से अंदर और अंदर से बाहर की ओर भागते रहते हैं, दरअसल हम खुद भाग रहे होते हैं, खुद से.


बहरहाल, वापिस उस बात की बात करें, रायता फैलाने वाले प्यारे अंकल को खिलापिलाकर, ठिकाने सिर लगा’कर आधे घंटे में जब महेंद्र लौटा, तो रास्ते में हजारों फूलों की खुशबू जैसे एक साथ उसके नाक में घुस गई. झटपट उसके नाक ने आंख को आदेश दिया और उस शीघ्र ही आदेश की अनुपालन में नजर खुशबू की दिशा में दौड़ गई. हल्केऔ गुलाबी रंग के पटियाला सूट में एक लड़की थी, उसने अपनी तरफ देखते हुए महेंद्र को टोका,


-‘क्यों सुंदर लड़कियां देखी नहीं हैं क्या?’


-‘लो, हमें कोई अकाल है क्या?’


-‘फेर?’


-‘कोई सुमन जैसी हो तो बात न्यारी ही है!’


-‘क्यूं? सोरम आ गई क्या?’


-‘हां, सोरम ही आ गई, पता नहीं कौन सा सेंट लगाया है मरज्याणी बैरण.’


-‘पहली बात तो गोदारी हूं, ज्यायणी म्हांरा रिश्तेयदार भलाईं हो, और मरे मेरा दुश्मण, छा (छाछ) पी गे.’


-‘गोदारों की छा ऐसी होती है के लोग छा पी के प्राण दे दे.’


-‘प्राण तो हम वैसे ही ले लेते हैं महेंद्र जी!’


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(दुष्यंत के उपन्यास का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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