इति: घर भर की बत्तियां जगमग-जगमग

इति: घर भर की बत्तियां जगमग-जगमग

है क्या, उसने फटकारा. सवेरा वे बोले और चाय चाहिए. रात है देख नहीं रहे अंधेरा उसने और डांट लगायी. उजाला है उन्होंने इशारे से दीवाल- याद दिखाया और तीन बज गया जो सवेरा है.

By: | Updated: 12 Sep 2017 11:54 PM

घूमे वे छोटी मोटी सैर पर अंधेरे में जो भोर भी जिन्दा और फड़कते, और जरूर ही मूतते भी गाड़ियों की बोनेट पर, उस इमारत में रहने वालों की जो आये दिन चौकीदार से शिकायत भेजते अपनी मोटरों की इस बिनबुलाई धुलायी पर, मां तक, जो छोटा सा कुछ क्षमा याचना में कहती लम्बा सा कुछ झुंझलाने में उस सारे दिन फिर.


इति 


गीतांजलि श्री 


Iti


मौत को लेकर हम आतंकित थे. कि जब वह आदमी मरेगा तो यह सारी झंझट होगी कि क्या कहां कैसे कब. टुकड़े अस्त व्यस्त बिखरे. मौत के सारे अनजानपन को देखते हुए. उनके सारे टूटे फूटेपन को देखते हुए. उनके, हमारे बाप के. और यह भी उलझा मसला कि कौन कहेगा, किससे, कैसे, उन सारी ‘दुश्मनियों’ के रहते मेरी भाई से, पति की बहन से, भाभी की जीजा से, मां की सब बहुओं दामादों से, जिसके चलते हमारा आपस में आना जाना बंद था. बरसों से. एक दूसरे की झुर्रियाती शक्लों को लगभग न पहचानने की नौबत तक जब भूले और भटके कहीं सामना हो जाता, दुकान पे, रेस्त्रां में, कभी ट्रैफिक की लाल बत्ती पर खड़े.


बरसों से. हमने एक दूसरे को नहीं देखा था. महान भारतीय परिवार. घनिष्ठ अंतरंग संयुक्त. देखा था सबको बुढ़ाते किसी ने तो अकेले पिताजी ने ही जिन्हें इसे या उसे या किसी को भी देखने से आपत्ति नहीं थी और जो इसकी या उसकी या किसी की भी देखभाल में रहने हमारी मोटर गाड़ियों में ड्राइवर के साथ टटके चले जाते.


हां ऐसा हो सकता तो वह खुद हमें अपनी मौत की खबर दे सकते थे पर ऐसा तो होता नहीं. हमारे ड्राइवर जान भी दे सकते थे. जरूरत पड़ने पर. हुआ ये कि ऐसी जरूरत ही नहीं पड़ी. सब अपने आप होता चला गया. जैसे एक सलीके का झटका दिया हो और कालीन सफाई से बिछता चला जाए. जैसे बखूब रिहर्सल के बाद सधा सधाया नाटक खेला जाये. जैसे बिखरे टुकड़े जुड़ते चले जायें और पूरा सिलसिलेवार चित्र उभर आये. पिता बहन के यहां थे जिससे मेरी कुट्टी नहीं थी जिसके संग मां रहने को राजी थीं क्योंकि दामाद जी दौरे पर गये हुए थे. और मां की पूंछ की तरह पिता जी, पीछे पीछे, उन घरों में जहां बहू दामाद लापता हों!


सारे दिन वे अपने जैसे ही रहे. फूहड़. बेढब घिसट घिसट इस कमरे से उस, अपनी रबड़ चप्पलों में पांव आधा धूंसाये, आधा लटकाये, और पजामे को बार बार हाथों से ऊपर संभालते, बार बार उसके अधखुले नारे की पूरा खुल जाने की जिद को पछाड़ते. खट खट उन्होंने बहन के कमरे के बाहर मचा दी जब अभी अंधेरा ही था और मचाये रखी जब तक उसने सोने का नाटक बंद न कर दिया और झल्ला के दरवाजा न खोल दिया.


घर भर की बत्तियां जगमग जगमग.


है क्या, उसने फटकारा. सवेरा वे बोले और चाय चाहिए. रात है देख नहीं रहे अंधेरा उसने और डांट लगायी. उजाला है उन्होंने इशारे से दीवाल- याद दिखाया और तीन बज गया जो सवेरा है. जाइए सो जाइए उसने झाड़ा और किसी को मत जगाइए और कोई बत्ती नहीं जलाइए सात के पहले. भले घर का कोई उसके पहले नहीं उठता उसने आखिरी मारा. वह जुमला जो हम उन पर अक्सर मारते उनकी वृद्ध कुलाचों पर. वह जुमला जो उन्हीं की ईजाद थी, उनके और हमारे युवा दिनों की हमको उनकी हिदायत कि भले घर का कोई ऐसा नहीं करता जैसे लड़कियां लड़कों से दोस्ती करें और वापस!


पर कौन वे बात मानने के लिए पैदा हुए थे? न हम! वे हमेशा ऐसे रहे कि दुनिया पैदा हुई है उनकी सेवा करने के लिए. तो जुटे रहे जगे रहे फिरते रहे, बहन के दोबारा दरवाजा टाइट बंद करने के बाद भी और मां की भन भन के बाद भी कि यही हैं इनकी स्वार्थी झक्खी आदतें जो वजह है उसकी बच्चों के संग रिश्ते कलह में खटास की, कि निरंतर शर्मिन्दा होना पड़ता है उसे, कि जहां नहीं जलानी हो बत्ती जला देंगे जहां नहीं बुझाना हो पंखे बंद कर देंगे और सबको जगा देंगे जो कामकाजी लोग हैं और सो रहे हैं और उनकी तरह बेकार और बेकाम नहीं और बस उनकी ये सब न हो तो, वह भनभनाती.


ठेपी पड़े कानों पर. या एक से जाकर दूसरे से निकल जाने के लिए. जिस अंतर्यात्रा के दौरान वे सिर यों ओ हो हो हो हिलाते जैसे तंग आ गये हों पर आंखें उनकी फर फर चमकतीं, प्रफुल्ल अपने इस होने पर, जीने पर, अपने होने जीने के अहसास को खुद भी, दूसरों को भी, कराने पर.


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(गीतांजलि श्री की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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