तुम्हें याद हो कि न याद हो: जब आशिक की मौत हुई तब शायर का जन्म हुआ

किसी के लिए अलमारी साफ करना सिर्फ एक काम नहीं रहता, यह सच में एक तरह का वर्चुअल फ्लेशबैक होता है, वही फेसबुक के ‘लुक बैक’ वीडियो जैसा. पता नहीं कितने बिल, पुराने कागज़, तस्वीरें मेरे सामने पड़े हुए थे.

By: | Last Updated: Thursday, 10 August 2017 3:41 PM
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‘मैं मार रहा हूं खुदको? तुम्हें लगता है इतना आसान है? खुद को मारने के लिए जो हिम्मत चाहिए वह नहीं है मेरे पास. रोज़ घंटों बैठा रहता हूं यही रिवॉल्वर हाथों में पकड़े हुए. दीवार की तरफ इसलिए मुंह करता हूं ताकि मुझे सारे रास्ते बंद दिखाई दें. कोई रास्ता कोई दरवाजा कोई खिड़की या कोई उम्मीद न दिखे.’ 

तुम्हें याद हो कि न याद हो…

हिमांशु सिंह

Tumhe yaad ho

आज सुबह ही अपनी अलमारी साफ़ कर रहा था. अलमारी साफ़ करना. यह वह काम रहता है जो हमेशा से पेंडिंग पड़ा रहता है. कितने काम हम ऐसे ही अपनी ज़िंदगी के पेंडिंग फोल्डर्स में सेव करते जाते हैं. खैर! न आज दफ्तर जाने की चिंता है और न ही जल्दी खाना बनाने की, इसलिए सोचा कि आज पेंडिंग काम निकाल निकाल के ‘डन’ फोल्डर्स में डालूंगा.

किसी के लिए अलमारी साफ करना सिर्फ एक काम नहीं रहता, यह सच में एक तरह का वर्चुअल फ्लेशबैक होता है, वही फेसबुक के ‘लुक बैक’ वीडियो जैसा. पता नहीं कितने बिल, पुराने कागज़, तस्वीरें मेरे सामने पड़े हुए थे. वह पहली बीयर का बिल जो मैंने अपने दोस्त के साथ निशा की शादी होने के गम में पी थी. वह कागज़ जो निशा ने एक दिन मेरी टेबल पर छोड़ा था, जिसमें लिखा था, कॉफ़ी टुनाईट? वह कागज़ जो पापा की डायरी के बीच से निकाल लिया था जिसमें उन्होंने मेरे पहली बार अपने पैरों पर चलने के अनुभव के बारे में लिखा था, वह अख़बार की कटिंग भी जिसमें चौथी क्लास में मेरे चेस गेम जीतने पर मेरा फोटो और खबर छपी थी.

कागजों के बीच से एक और तस्वीर थी. मेरी और दिवाकर जी की. दिवाकर जी मेरे ही पीजी होस्टल के ऊपर वाले रूम में रहते थे. यह तस्वीर शायद चार साल पहले की होगी. हां चार साल से कुछ ज़्यादा. मुझे याद है कि एक बार मैंने अपनी बचत के पैसों से नया कैमरा लिया था तो उनके साथ ही खरीदने गया था. यह हमारा पहला फोटो था. मैंने उस शाम कहा था आप मेरे साथ यहां तक आए हैं इसलिए पहला फोटो आपका ही होना चाहिए. उन्होंने कहा था – नहीं यार, पचास साल के आदमी को तस्वीरों में भी अकेले ही रखोगे यार, आओ साथ में खिंचाते हैं. स्टोर के एक सेल्समैन ने हम दोनों की तस्वीर ली थी. दिवाकर जी और मैं दोनों मुस्कुराते हुए यह पहली तस्वीर खिंचाए थे. फोटो के रंग फीके पड़ चुके हैं पर उनकी मुस्कान का रंग अभी भी वैसा ही है, एक दम निश्छल.

बस यह तस्वीर क्या देखी, पेंडिंग काम पेंडिंग ही रह गया. खुली हुई अलमारी का सारा सामान नीचे था, मेरे हाथों में तस्वीर थी और पंखे की तेज रफ़्तार के कारण सारे कागज़ उड़ने लगे थे. इस सबको समेटने की ताकत अब नहीं थी मुझ में, इसलिए अंदर दूसरे वाले कमरे में चला गया. जितनी अफरा तफरी कमरे में कागजों ने मचाई थी उस से ज़्यादा अफरा तफरी मेरे मन में दिवाकर जी की यादों ने मचा दी थी.

मैं अपनी टूटी फूटी गजलें उन्हें सुनाने उनके कमरे पे पहुंच जाता था. उनकी ख़ास बात यह थी कि कोई गजल अगर ज़रा भी बुरी लगे तो सीधा बोलते थे, ‘क्या सस्ती शायरी लिखते हो यार, एकदम रद्दड़, हमारे इलाहाबाद के कॉलेज के लौंडे इस से ज़्यादा गहरा लिख डालते हैं.’ सस्ती. लुगदी, फटीचर, चूतियापा और पता नहीं क्या क्या नाम दिए थे उन्होंने मेरी गजलों को.

‘तुम क्यूं न एक किताब लिख डालो. टाइटल रखना – सस्ती शायरी,’ एक बार उन्होंने कहा था.  ‘आप भी क्या बात करते हैं. सस्ती शायरी नाम ही रख दिया तो उस किताब की कीमत भी क्या मिलेगी?’

अरे अच्छा है न. सस्ती चीजों के लिए कोई मोल भाव नहीं करता,’ उन्होंने जवाब दिया.

‘क्या दिवाकर जी, आप ही मेरी गजलों को घसीटते रहते हैं. मेरे सारे दोस्त इन सारी कविताओं को बेहद पसंद करते हैं. किसी दिन कॉलेज आयेंगे तो देखना लडकियां कॉलेज के सालाना जलसे का इन्तजार इसलिए करती हैं कि मेरी ग़ज़ल सुनने को मिलती है.’

‘बेटा याद रखना, जिस दिन एक शायर अगर लड़कियों के लिखने लगे तो शायर की मौत तय है.’

‘क्या बात करते हैं.’

‘हां शायर की मौत और आशिक का जन्म.’

‘या यह कह लीजिए, कि जब आशिक की मौत हुई तब शायर का जन्म हुआ.’ मैंने जवाब दिया. और इस बात पे मैं खिल खिलाकर हंसने लगा था उस शाम. वह बोले, ‘अब कच्चे शायर नहीं रहे हो लगता है. जवाबों में भी शायरी मार रहे हो.’

मैंने कहा, ‘जब आपने शायर मान ही लिया है तो मेरा एक नया कलाम सुनिए.’

‘अमा यार पहले जरा बोतल और गिलास की जुगाड़ करने दो फिर आराम से सुनाना.’

दिवाकर जी की इस आदत के बारे में पहले बताना भूल गया था. वह जब गजलें सुनते थे तो पहले शराब जरूर पीते थे. हमेशा का यही दस्तूर था. पहले शराब आती, वह पूरी करते और फिर मैं गजलें सुनाता.

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(हिमांशु सिंह की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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