चित्रवाले पत्थर: जानते हो कि भूखे को कब भूख लगनी चाहिए

जो व्यक्ति मेरे पास आया, उसे देखकर मैं तो दंग रह गया. वह सुन्दर रहा होगा किन्तु आज तो उसके अंग-अंग से, मुँह की एक-एक रेखा से उदासीनता और कुरूपता टपक रही थी. आँखें गड्ढे में जलते हुए अंगारे की तरह धक्-धक् कर रही थीं. उसने कहा – ‘मुझे कुछ खिलाओ.’

By: | Last Updated: Saturday, 29 July 2017 3:47 PM
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मंगला मुझे पहचान सकी कि नहीं, कह नहीं सकता. कितने बरस बीत गये. चार-पाँच दिनों की देखा-देखी. सम्भवत: मेरा चित्र उसकी आँखों में उतरते-उतरते किसी और छवि ने अपना आसन जमा लिया हो.

चित्रवाले पत्थर

जयशंकर प्रसाद

Chitrwale Patthar

मैं ‘संगमहाल’ का कर्मचारी था. उन दिनों मुझे विन्धय शैल-माला के एक उजाड़ स्थान में सरकारी काम से जाना पड़ा. भयानक वन-खण्ड के बीच पहाड़ी से हटकर एक छोटी-सी डाक बँगलिया थी. मैं उसी में ठहरा था. वहीं की एक पहाड़ी में एक प्रकार का रंगीन पत्थर निकला था. मैं उनकी जाँच करने और तब तक पत्थर की कटाई बन्द करने के लिए वहाँ गया था. उस झाड़-खण्ड में छोटी-सी सन्दूक की तरह मनुष्य-जीवन की रक्षा के लिए बनी हुई बँगलिया मुझे विलक्षण मालूम हुईं क्योंकि वहाँ पर प्रकृति की निर्जन शून्यता, पथरीली चट्टानों से टकराती हुई हवा के झोंके के दीर्घ नि:श्वास, उस रात्रि में मुझे सोने न देते थे. मैं छोटी-सी खिड़की से सिर निकालकर जब कभी उस सृष्टि के खँडहर को देखने लगता, तो भय और उद्वेग मेरे मन पर इतना बोझ डालते कि मैं कहानियों में पढ़ी हुई अतिरंजित घटनाओं की सम्भावना से ठीक संकुचित होकर भीतर अपने तकिये पर पड़ा रहता था. अन्तरिक्ष के गह्वर में न जाने कितनी ही आश्चर्यजनक लीलाएँ करके मानवी आत्माओं ने अपना निवास बना लिया है. मैं कभी-कभी आवेश में सोचता कि भत्ते के लोभ से मैं ही क्यों यहाँ चला आया ? क्या वैसी ही कोई अद्भुत घटना होनेवाली है ? मैं फिर जब अपने साथी नौकर की ओर देखता, तो मुझे साहस हो जाता और क्षणभर के लिए स्वस्थ होकर नींद को बुलाने लगताय किन्तु कहाँ, वह तो सपना हो रही थी.

रात कट गयी. मुझे कुछ झपकी आने लगी. किसी ने बाहर से खटखटाया और मैं घबरा उठा. खिड़की खुली हुई थी. पूरब की पहाड़ी के ऊपर आकाश में लाली फैल रही थी. मैं निडर होकर बोला – ‘कौन है ? इधर खिड़की के पास आओ.’

जो व्यक्ति मेरे पास आया, उसे देखकर मैं तो दंग रह गया. वह सुन्दर रहा होगा किन्तु आज तो उसके अंग-अंग से, मुँह की एक-एक रेखा से उदासीनता और कुरूपता टपक रही थी. आँखें गड्ढे में जलते हुए अंगारे की तरह धक्-धक् कर रही थीं. उसने कहा – ‘मुझे कुछ खिलाओ.’

मैंने मन-ही-मन सोचा कि यह आपत्ति कहाँ से आयी! वह भी रात बीत जाने पर! उसने कहा – ‘भले आदमी! तुमको इतने सवेरे भूख लग गयी ?’

उसकी दाढ़ी और मूँछों के भीतर छिपी हुई दाँतों की पंक्ति रगड़ उठी. वह हँसी थी या थी किसी कोने की मर्मान्तक पीड़ा की अभिव्यक्ति, कह नहीं सकता. वह कहने लगा – ‘व्यवहारकुशल मनुष्य, संसार के भाग्य से उसकी रक्षा के लिए, बहुत थोड़े-से उत्पन्न होते हैं. वे भूखे पर सन्देह करते हैं. एक पैसा देने के साथ नौकर से कह देते हैं, देखो इसे चना दिला देना. वह समझते हैं, एक पैसे की मलाई से पेट न भरेगा. तुम ऐसे ही व्यवहार-कुशल मनुष्य हो. जानते हो कि भूखे को कब भूख लगनी चाहिए. जब तुम्हारी मनुष्यता स्वाँग बनाती है, तो अपने पशु पर देवता की खाल चढ़ा देती है, और स्वयं दूर खड़ी हो जाती है.’ मैंने सोचा कि यह दार्शनिक भिखमंगा है. और कहा – ‘अच्छा, बाहर बैठो.’

बहुत शीघ्रता करने पर भी नौकर के उठने और उसके लिए भोजन बनाने में घण्टों लग गये. जब मैं नहा-धोकर पूजा-पाठ से निवृत्त होकर लौटा, तो वह मनुष्य एकान्त मन से अपने खाने पर जुटा हुआ था. अब मैं उसकी प्रतीक्षा करने लगा. वह भोजन समाप्त करके जब मेरे पास आया, तो मैंने पूछा – ‘तुम यहाँ क्या कर रहे थे ?’ उसने स्थिर दृष्टि से एक बार मेरी ओर देखकर कहा – ‘बस, इतना ही पूछियेगा या और कुछ भी ?’ मुझे हँसी आ गयी. मैंने कहा – ‘मुझे अभी दो घण्टे का अवसर है. तुम जो कुछ कहना चाहो, कहो.’

वह कहने लगा – ‘मेरे जीवन में उस दिन अनुभूतिमयी सरसता का संचार हुआ, मेरी छाती में कुसुमाकर की वनस्थली अंकुरित, पल्लवित, कुसुमित होकर सौरभ का प्रसार करने लगी. ब्याह के निमन्त्रण में मैंने देखा उसे, जिसे देखने के लिए ही मेरा जन्म हुआ था. वह थी मंगला की यौवनमयी उषा. सारा संसार उन कपोलों की अरुणिमा की गुलाबी छटा के नीचे मधुर विश्राम करने लगा. वह मादकता विलक्षण थी. मंगला के अंग-कुसुम से मकरन्द छलका पड़ता था. मेरी धवल आँखें उसे देखकर ही गुलाबी होने लगीं.

ब्याह की भीड़भाड़ में इस ओर ध्यान देने की किसको आवश्यकता थी, किन्तु हम दोनों को भी दूसरी ओर देखने का अवकाश नहीं था. सामना हुआ और एक घूँट. आँखें चढ़ जाती थीं. अधर मुसकराकर खिल जाते और हृदय-पिण्ड पारद के समान, वसन्त-कालीन चल-दल-किसलय की तरह काँप उठता.

देखते-ही-देखते उत्सव समाप्त हो गया. सब लोग अपने-अपने घर चलने की तैयारी करने लगेय परन्तु मेरा पैर तो उठता ही न था. मैं अपनी गठरी जितनी ही बाँधता, वह खुल जाती. मालूम होता था कि कुछ छूट गया है. मंगला ने कहा – ‘मुरली, तुम भी जाते हो ?’

‘जाऊँगा ही – तो भी तुम जैसा कहो.’

‘अच्छा, तो फिर कितने दिनों में आओगे?’

‘यह तो भाग्य जाने!’

‘अच्छी बात है’ – वह जाड़े की रात के समान ठण्डे स्वर में बोली. मेरे मन को ठेस लगी. मैंने भी सोचा कि फिर यहाँ क्यों ठहरूँ ? चल देने का निश्चय किया. फिर भी रात तो बितानी ही पड़ी. जाते हुए अतिथि को थोड़ा और ठहरने के लिए कहने से कोई भी चतुर गृहस्थ नहीं चूकता. मंगला की माँ ने कहा और मैं रातभर ठहर गयाय पर जागकर रात बीती. मंगला ने चलने के समय कहा – ‘अच्छा तो – ’ इसके बाद नमस्कार के लिए दोनों सुन्दर हाथ जुड़ गये. चिढ़कर मन-ही-मन मैंने कहा – यही अच्छा है, तो बुरा ही क्या है ? मैं चल पड़ा. कहाँ – घर नहीं! कहीं और!  – मेरी कोई खोज लेनेवाला न था.

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 (जयशंकर प्रसाद की कहानी ऐसे होता है प्यार का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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