खंडहर की लिपि: ‘आओ-आओ’ का शब्द गूंजने लगा | Read Jaishankar Prasad's story Khandahar Ki Lipi

खंडहर की लिपि: ‘आओ-आओ’ का शब्द गूंजने लगा

कमलों का कमनीय विकास झील की शोभा को द्विगुणित कर रहा है. उसके आमोद के साथ वीणा की झनकार, झील के स्पर्श के शीतल और सुरक्षित पवन में भर रही थी.

By: | Updated: 27 Dec 2017 04:07 PM
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खंडहर की लिपि


जयशंकर प्रसाद


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जब वसन्त की पहली लहर अपना पीला रंग सीमा के खेतों पर चढ़ा लाई, काली कोयल ने उसे बरजना आरम्भ किया और भौंरे गुनगुनाकर काना-फूँसी करने लगे, उसी समय एक समाधि के पास लगे हुए गुलाब ने मुँह खोलने का उपक्रम किया. किन्तु किसी युवक के चंचल हाथ ने उसका हौसला भी तोड़ दिया. दक्षिण पवन ने उससे कुछ झटक लेना चाहा, बिचारे की पंखुड़ियाँ झड़ गर्इं. युवक ने इधर-उधर देखा. एक उदासी और अभिलाषामयी शून्यता ने उसकी प्रत्याशी दृष्टि को कुछ उत्तर न दिया. वसन्त पवन का एक भारी झोंका ‘हा-हा’ करता उसकी हँसी उड़ाता चला गया.


सटी हुई टेकरी की टूटी-फूटी सीढ़ी पर युवक चढ़ने लगा. पचास सीढ़ियाँ चढ़ने के बाद वह बगल की बहुत पुरानी दालान में विश्राम लेने के लिए ठहर गया. ऊपर जो जीर्ण मन्दिर था, उसका ध्वंसावशेष देखने को वह बार-बार जाता था. उस भग्न-स्तूप से युवक को आमंत्रित करती हुई ‘आओ-आओ’ की अपरिस्फुट पुकार बुलाया करती. जाने कब के अतीत ने उसे स्मरण कर रखा है. मण्डप के भग्न कोण में एक पत्थर के ऊपर न जाने कौन-सी लिपि थी, जो किसी कोरदार पत्थर से लिखी गई थी. वह नागरी तो कदापि नहीं थी. युवक ने आज फिर उसी ओर देखते-देखते उसे पढ़ना चाहा. बहुत देर तक घूमता-घूमता वह थक गया था, इससे उसे निद्रा आने लगी. वह स्वप्न देखने लगा.


कमलों का कमनीय विकास झील की शोभा को द्विगुणित कर रहा है. उसके आमोद के साथ वीणा की झनकार, झील के स्पर्श के शीतल और सुरक्षित पवन में भर रही थी. सुदूर प्रतीचि में एक सहस्रदल स्वर्ण-कमल अपनी शेष स्वर्ण-किरण की भी मृणाल पर व्योम-निधि में खिल रहा है. वह लज्जित होना चाहता है. वीणा के तारों पर उसकी अन्तिम आभा की चमक पड़ रही है. एक आनन्दपूर्ण विषाद से युवक अपनी चंचल अँगुलियों को नचा रहा है. एक दासी स्वर्णपात्र में केसर, अगरु, चन्दन-मिश्रित अंगराग और नवमल्लिका की माला, कई ताम्बूल लिए हुए आई, प्रणाम करके उसने कहा – ‘महाश्रेष्ठि धनमित्र की कन्या ने श्रीमन् के लिए उपहार भेजकर प्रार्थना की है कि आज के उद्यान गोष्ठ में आप अवश्य पधारने की कृपा करें. आनन्द विहार के समीप उपवन में आपकी प्रतीक्षा करती हुई कामिनी देवी बहुत देर तक रहेंगी.’


युवक ने विरक्त होकर कहा – ‘अभी कई दिन हुए हैं, मैं सिंहल से आ रहा हूँ, मेरा पोत समुद्र में डूब गया है. मैं ही किसी तरह बचा हूँ. अपनी स्वामिनी से कह देना कि मेरी अभी ऐसी अवस्था नहीं है कि मैं उपवन के आनन्द का भोग कर सकूँ.’


‘तो प्रभु, क्या मैं यही उत्तर दे दूँ ?’ दासी ने कहा.


‘हाँ और यह भी कह देना कि – तुम सरीखी अविश्वासिनी स्त्रियों से मैं और भी दूर भागना चाहता हूँ, जो प्रलय के समुद्र की प्रचण्ड आँधी में एक जर्जर पोत से भी दुर्बल और उस डुबा देने वाली लहर से भी भयानक है.’ युवक ने अपनी वीणा सँवारते हुए कहा.


‘वे उस उपवन में कभी की जा चुकी हैं, और हमसे यह भी कहा है कि यदि वे गोष्ठ में न जाना चाहें, तो स्तूप की सीढ़ी के विश्राम-मण्डप में मुझसे एक बार अवश्य मिल लें, मैं निर्दोष हूँ.’ दासी ने सविनय कहा.


युवा ने रोष-भरी दृष्टि से देखा. दासी प्रणाम करके चली गई. सामने का एक कमल सन्ध्या के प्रभाव से कुम्हला रहा था. युवक को प्रतीत हुआ कि वह धनमित्र की कन्या का मुख है. उससे मकरन्द नहीं, अश्रु गिर रहे हैं. ‘मैं निर्दोष हूँ,’ यही भौंरे भी गूँजकर कह रहे हैं.


युवक ने स्वप्न में चौंककर कहा – ‘मैं आऊँगा.’ आँख न खोलने पर भी उसने उस जीर्ण दालान की लिपि पढ़ ली – ‘निष्ठुर! अन्त को तुम नहीं आए.’ युवक सचेत होकर उठने को था कि वह कई सौ बरस की पुरानी छत धम से गिरी.


वायुमण्डल में – ‘आओ-आओ’ का शब्द गूँजने लगा.


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(जयशंकर प्रसाद की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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