कॉर्पोरेट लव तड़का: इश्क की कोई हद नहीं होती

कॉर्पोरेट लव तड़का: इश्क की कोई हद नहीं होती

उस ‘सैडिस्टिक पिग’ की जो भी सोच रही हो, उसने इस बात का पूरा इंतज़ाम कर दिया था कि अगले दिन मैं इस काम के पीछे ही पागल बनी रहूं ताकि उमे सोमवार को यह दिखा सकूं. इसका सीधा मतलब था कि मेरा वीकेंड तो गया. मुझे नफ़रत है अपने काम से!

By: | Updated: 07 Sep 2017 03:54 PM

कॉर्पोरेट लव तड़का 


मधुलिका रा चौहान


Coporate Love Tadka

‘अब भी काम कर रही हो?’ श्रीलथा की आँखें आश्चर्य से फैल गयी थीं. हाँ! डेडलाइन,’ मैंने बताया. मैं शुक्रवार की शाम को देर तक काम कर रही थी जबकि मेरे सारे कलीग अपनी वीकेंड की छुट्टी प्लान करने घर को रवाना हो चुके थे.


‘ओह! मंडे मिलती हूँ बेब, श्रीलथा ने मुझे पर ओह, बेचारी लड़की वाली मुस्कान फेंकी और ऑफिस से बाहर चली गयी. ‘इससे बुरा भी कुछ हो सकता है क्या, मैंने ख़ुद से कहा. मैं आठ घंटे से एक्सेल शीट को घूर रही थी लेकिन मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अगले पाँच साल के लिए विज्ञापन एजेंसी की ग्रोथ चार्ट का ट्रेंड कैसे तैयार करूँ. यह विकास कई चीज़ों पर निर्भर करता था, जिसमें विज्ञापन के लिए आए बजट और राजनीतिक माहौल भी शामिल था.


अनिर्बान मुझसे यह कैसे उम्मीद कर रहा था कि मैं आठ घंटे में मार्केट का ग्रोथ चार्ट तैयार कर लूँगी! क्या उसे यह लगता था कि मैं सुपर नर्ड हूँ जो कोई भी हिसाब कर सकती है और चुटकियों में कोई मैथमेटिकल फॉर्मूला बना सकती है! क्या उसे यह लगता था कि मैं हर्माइनी ग्रेंजर हूँ?


उस ‘सैडिस्टिक पिग’ की जो भी सोच रही हो, उसने इस बात का पूरा इंतज़ाम कर दिया था कि अगले दिन मैं इस काम के पीछे ही पागल बनी रहूं ताकि उमे सोमवार को यह दिखा सकूं. इसका सीधा मतलब था कि मेरा वीकेंड तो गया. मुझे नफ़रत है अपने काम से! 


मेरे पास आई आई एम की मैनेजमेंट डिग्री है- अरे, वो जाना माना इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट नहीं बल्कि दी इंस्टीट्यूट ऑफ इंटेलिजेंट मैनेजमेंट. जब आप गाज़ियाबाद के किसी राम भरोसे छोड़ दिये कॉलेज से डिग्री लेते हो तो आपका काम सिर्फ़ इतना ही बचता है कि सिर झुकाओ और गधे की तरह तब तक काम करते रहो जब तक आपके रेज़्युमे में इस कमी को छुपाने के लिए ख़ूब सारा अनुभव ना जुड़ जाये.


मैं सारे कैलकुलेशन और तरकीबें आज़मा चुकी थी कि तभी मुझे एक बम्पर आइडिया आया. माना कि यह मेरा ख़ुद का आइडिया नहीं था इसलिए मैं इसका पूरा श्रेय नहीं लूँगी. सारे नौसिखिए एनालिस्ट इस तरीके को आज़मा कर अपना समय बचाते रहे हैं. यह हमारी इंडस्ट्री का एक सबसे बेहतरीन राज़ था. मैंने किसी और एनालिस्ट का किया हुआ पिछला डाटा देखा और अगले साल का ग्रोथ पर्सेंटेज उसमें जोड़ दिया. गज़ब! नयी विकास दर मेरे सामने थी. मैं जानती थी कि यह चोरी है लेकिन मेरे पास अपने वीकेंड को बचाने का कोई और रास्ता नहीं था.


मैंने अपने ठंडे हो चुके पिज़्ज़ा का अंतिम टुकड़ा उठाया ताकि शरीर को कुछ ईंधन मिले. अपने ऑफिस के बोरिंग ग्रे ट्राउजर पर गिरे पिज़्ज़ा के टुकड़े झाड़ कर साफ़ किए, कुर्सी पर ख़ुद को सीधा किया, पीठ के पीछे रखे पतले कुशन को ठीक किया और पूरे जोशोखरोश के साथ की बोर्ड पर झुक गयी.


‘ख़ूब मेहनत हो रही है?’ अपने पीछे से आई आवाज़ पर मैं कुर्सी से उछल पड़ी. यह मेरे बॉस का बॉस था –अरविंद. मुझे लगा था कि बस बेचारी मैं ही शुक्रवार को इतनी देर तक काम कर रही हूँ. मुझे अच्छा लगा कि वह भी मौज़ूद था वहाँ.


‘उम्म ...ऐसा कुछ नहीं सर. मैं बस एक रिपोर्ट पर काम कर रही थी,’ मैंने मुस्कुरा कर कहा. शुक्रवार को इतनी देर रात तक मैं और क्या कर सकती थी वैसे इसके सिवा!
‘बढ़िया, ऐसे ही काम करती रहो’.


शादीशुदा आदमी ख़ासकर भारत में ऑफिस में देर तक काम क्यों करते हैं, इसके पीछे मैंने एक बढ़िया थेओरी निकाली थी. पहले तो वो अपनी पत्नी को यह दिखाना चाहते थे कि वह बहुत कड़ी मेहनत कर रहे हैं , दूसरा वे अपनी संस्था को भी अपना समर्पण भाव दिखाना चाहते थे. मैं अरविंद के उस थके हुए चेहरे की कल्पना कर रही थी जब वह घर पहुंचेगा और कहेगा, ‘आज़ बहुत सारा काम था, मैं अब थोड़ा आराम करना चाहता हूँ’, वह मज़े में ऐसा बोलकर बिचारी के सारे प्लान को सफलता से चौपट कर देगा. और तो और बेचारी को गिल्टी महसूस होगी कि उसने बिना अपने इतने मेहनती पति से पूछे बिना शुक्रवार की रात का प्लान बना कैसे लिया!


अरविंद पिछले दो घंटे से पाने डेस्क पर बैठा सौलिटेयर खेल रहा था. वह इससे मज़ेदार कुछ कर नहीं पाया क्योंकि आईटी डिपार्टमेन्ट ने सारे काम से इतर वाले वेबसाइट ब्लॉक कर रखे थे. दो महीने पहले रात की ड्यूटी का चौकीदार, जो रिसेप्शिनिस्ट का डेस्कटॉप खोल सकता था, पूरी रात उसके डेस्कटॉप पर पॉर्न फिल्म के मज़े लेता रहा था. उसकी मस्ती चलती रहती अगर ठीक रशियन पोल डांसर वाले सीन पर आते ही कंप्यूटर स्क्रीन फ्रीज़ नहीं हो गया होता.


मामला संगीन और इसलिए हो गया कि पीछे से एक सेक्सी आवाज़ , ‘कम बेबी , कम बेबी’ का जाप किए जा रही थी. चौकीदार ने डेस्कटॉप को स्लिप मोड पर डालकर समस्या से तब तो छुटकारा पा लिया लेकिन अगले दिन जब रिसेप्शनिस्ट ने कप्यूटर लॉग इन किया तो डेस्कटॉप पर पोल और हॉल देखकर और कम बेबी के सुरताल को सुनकर सदमे में आ गयी. तब से ही आईटी डिपार्टमेन्ट ने इंटरनेट ब्राउज़िंग को लेकर बहुत सख्त हो गया था. चौकीदार को तो काम से निकाल दिया गया लेकिन बेचारे ने ऑफिस के हर लड़के की दी हुई बहुत सारी खामोश बद्दुआएं बटोरीं.


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(मधुलिका रा चौहान के उपन्यास का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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