लालगढ़: सब एक दूसरे पर उछल-उछलकर वार करते हैं | Read Manjit Thakur's story Jangal Mahal

लालगढ़: सब एक दूसरे पर उछल-उछलकर वार करते हैं

शॉलबनी जंगलों के पास से ही रुककर नज़र दौड़ाने पर पता चलता है कि क्या कुछ बदला है और कितना कुछ बदलना बाक़ी है. 2009 से लेकर आज तक की तस्वीर में एक सकारात्मक बदलाव आया है.

By: | Updated: 16 Nov 2017 04:07 PM
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लालगढ़: जंगल महल में अमंगल


मंजीत ठाकुर


jangal mahal


कोलकाता से चले बहुत देर हो चुकी थी. बढ़िया नेशनल हाईवे पर ज्यादा दिक़्क़त नहीं हुई थी और खड़गपुर से पहले हमारी गाड़ी ने पश्चिम मेदिनीपुर का रुख़ कर लिया था. अब यह सड़क आगे रानीगंज की तरफ जाती, कंसावती नदी पर बने पुल को पार कर हम शहर के भीतर जाने की बजाय भादुतला रेलवे हॉल्ट को पारकर आगे शालबॅनी की तरफ बढ़ रहे थे.


आठ साल पहले के मुकाबले ऊपरी तौर पर तस्वीर बिलकुल बदली नज़र आ रही थी. लेकिन अंदर से कुछ भी नहीं बदला है. 2009 में मेरी पहली यात्रा से लेकर आज तक आबो-हवा वैसी ही है. मिदनापुर शहर से शॉलबनी कस्बे की तरफ जाता नेशनल हाइवे 14 से छिटककर स्टेट हाइवे शॉलबनी के जंगलों की तरफ जाता है. यहां से आगे है लालगढ़. भादुतला से थोड़ा आगे ही टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज है. यह ममता बनर्जी के शासनकाल में बनाया गया है. पहले यहां जंगल और खेत थे.


शॉलबनी जंगलों के पास से ही रुककर नज़र दौड़ाने पर पता चलता है कि क्या कुछ बदला है और कितना कुछ बदलना बाक़ी है. 2009 से लेकर आज तक की तस्वीर में एक सकारात्मक बदलाव आया है. अचानक हमारी गाड़ी रुक गई. शालबॅनी के पास सड़क के किनारे हाट लगा था. हाट बचपन से आकर्षित करता है मुझे. चाय की दुकान के बगल में एक जगह पर एक भीड़ गोल घेरा बनाकर खड़ी थी. वहां मुर्गों की लड़ाई हो रही थी.


शालबॅनी के जंगल के गांवों में रहने वाले संताल जनजाति के लोग मुर्गे लड़ाया करते हैं. लड़ाइयां लंबी चला करतीं. एक मुर्गा ज़ख्मी होता या भाग खड़ा होता तो उसे हारा हुआ मान लिया जाता. कई दफ़ा कुछ मुर्गे आख़िरी दम तक मैदान नहीं छोड़ते. जंग में मुर्गों का मारा जाना लोगों को रोमांचक लगने लगा होगा. लेकिन, ऐसी मौतें कुछ शानदार नहीं होती थीं. हिंसा को और अधिक हिंसक बनाने की कोशिशें होने लगी थीं.


चाय पीते वक़्त भी मैंने देखा, मुर्गों की मौत को ज्यादा क्रूर बनाने के लिए कुछ ज़हीन लोगों ने एक तोड़ निकाल रखा था. मुर्गों के पंजों में तीखे नन्हे कटार बांध दिए थे.


लड़ते हुए मुर्गे दर्द से चीखते तो लोग ताली बजाते. हारा हुआ ज़ख्मी मुर्गा जीतने वाले मुर्गे के मालिक का हो जाता, जो उसे सिर के बल पटककर मार डालता और पलक झपकते ही हारने वाले मुर्गे के टुकड़े-टुकड़े हो जाते. खेल खत्म होते ही तमाशबीनों का हुजूम दूसरे जोड़े की लड़ाई की तरफ तवज्जो दे देता.


मैं चाय पीने के लिए रुका तो सड़क साथ खड़ी थी. सड़क ने मुर्गों की लड़ाई की तरफ इशारा किया और बीड़ी पी-पीकर उखड़ती हुई सांसों से हंसते हुए कहा थाः इन्हीं मुर्गों की तरह सबके पंजों में कटार बांध दिए गए हैं. सब एक दूसरे पर उछल-उछलकर वार करते हैं. वाम कैडर पर माओवादी, माओवादी पर पुलिस, पुलिस पर कमिटी... एक दिन शबॉय मारा जाबे  (एक दिन सब मारे जाएंगे).


सड़क उठकर चली गई.


मुर्गों की लड़ाई खत्म होते-होते अंधेरा छाने लगा था और भीड़ छंट गई. जंगल में एक असहज-सी शांति हो गई थी. शालबॅनी के बाद से लालगढ़ जाने का रास्ता ख़राब हो जाता है. अब उस जगह झींगुरों के शोर में, कहीं-कहीं बिजली के खंभों से लटकते बल्बों या सीएफएल की रोशनी है. हमारे सफ़र में इस बिजली से मुलाकात कम होती है. ज्यादातर दुकानें और घर, मिट्टी के तेल के लालटेनों या दीयों से रोशन हैं. बीच-बीच में सीआरपीएफ कैंप को जाने वाली कोई गाड़ी या ट्रक या फिर कोई घर को लौटता ट्रैक्टर ही इस सन्नाटे को तोड़ता है. ऊबड़-खाबड़ सड़क पर ट्रैक्टर ट्रॉली के गिरने से पैदा हुई यह आवाज़ बाज़ दफ़ा खीज पैदा करती है. पीरकांटा या कायमा जैसे गांव अपनी उत्तरजीविता के संघर्ष में हैं.


रास्ते में स्पीड ब्रेकर के तौर पर लोगों ने बेकाम पड़े बिजली के सीमेंट वाले खंभे गिरा दिए हैं. ये सब दृश्य आठ साल पहले की याद दिलाते हैं. पहले इन दृश्यों से लगता था, कोई उग्रवादी आसपास छिपा है. घात लगाए. अब गांववाले ने तेज़ रफ़्तार गाड़ियों से बच्चों की सुरक्षा के लिए यह खंभे गिरा दिए हैं. शालबॅनी से आगे दूर क्षितिज तक जंगल और धान के खेतों की अपार हरियाली है. थोड़ी देर पहले आई बरसात से पत्तियों पर पानी की बूंदें जमा हैं, और उसके भार से पत्तियां झुकी जा रही हैं.


ढलती शाम में लालगढ़ पहुंचता हूं. वहां पहुंचकर सड़क सांप की जीभ की तरह दो हिस्सों में बंट जाती है. वहीं, दोराहे पर कुछ बड़ी-बड़ी हांड़ियों में संताल महिलाएं कुछ बेच रही हैं. यह हंड़िया है. स्थानीय शराब. संताल लोग सदियों से पके चावल की यह शराब बनाते हैं. सफेद रंग की तेज़ शराब. पीने से पहले इसमें नमक और मिर्च का बुरका हुआ पाउडर डालना जरूरी है. मैं रुकता हूं. पीने के बहाने रुककर और बांगला में बात करके कुछ स्पंदन तो भांपा जा ही सकता है.


‘पहले सब अलग था,’ हंड़िया की दुकान पर सड़क मुझसे फुसफुसाकर कहती है. ‘हां, मैं भी आया था. शायद सूखा भी था न पिछले साल? पिछले दस साल क्यों, पचीस साल से सूखे का चक्र भी चल रहा है. फसल बरसात के भरोसे है. सूखा आता है तो भूख उसके साथ-साथ मुफ्त का मेहमान बनकर आ जाती है.‘


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(मंजीत ठाकुर की रिपोर्ट का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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