सतभाया का शेष: मात्र तीन महीने में तीन बार उजड़ने का दर्द

सतभाया का शेष: मात्र तीन महीने में तीन बार उजड़ने का दर्द

सतभाया का नाम उड़िया भाषा के दो शब्दों, ‘सत’ और ‘भाया’ से बना है जिसका मतलब है सात भाई. इन गांवों में एक मिथकीय कहानी है, जो ‘तपोई’ से जोड़ी जाती है.

By: | Updated: 13 Oct 2017 03:57 PM

सतभाया का शेष


मंजीत ठाकुर


satbhaya


वह सितंबर, 2005 का एक दिन था, और समुद्र तट पर बसे उड़ीसा के केंद्रपाड़ा जिले के कान्हापुर गांव की सुबह रोज की तरह ही हुई थी. गांव के बच्चे रोज की तरह स्कूल के लिए निकले. लेकिन जब वे अपने स्कूल पहुंचे, तो वहां स्कूल का नामोनिशान नहीं था. रात भर में सागर ने स्कूल लील लिया था और अब उसकी लहरें रौद्र रूप धारण कर गांव के घरों को लीलने को तत्पर थीं.


गांववालों को दूसरी बार वहां बसे हुए कुछ ही समय हुआ था कि बढ़ते सागर ने फिर से पीछे हटने को मजबूर कर दिया. मात्र तीन महीने में तीन बार उजड़ने का दर्द. उड़ीसा के सतभाया गांव की भी बिल्कुल यही कहानी है. ये बेचारे वे गांव हैं, जिनका जलवायु परिवर्तन में कोई योगदान नहीं है, फिर भी वे इसकी कीमत चुकाने पर मजबूर हैं.


खतरे की बात यह है कि बंगाल की खाड़ी उड़ीसा के कई गांवों की तरफ ख़तरनाक तरीके से बढ़ रहा है. यह खेत-खलिहानों, गांव-जवार और जंगलों को अपनी आगोश में लिए जा रहा है. इससे आजीविका के लिए समुद्रों पर निर्भर गांववालों के लिए मुश्किलों का पहाड़ टूट पड़ा है. इस आपदा से सबसे अधिक प्रभावित है सतभाया पंचायत.


सतभाया, उड़ीसा की राजधानी भुवनेश्वर से करीब सवा सौ किलोमीटर दूर केंद्रपाड़ा ज़िले की एक पंचायत है. यह सात गांवों का समूह है. 1930 के भू-राजस्व के दस्तावेज़ यानी खतियान दिखाते हैं कि उस वक्त सतभाया पंचायत के तहत 320 वर्ग किलोमीटर की ज़मीन थी, जबकि 2000 के राजस्व रिकॉर्ड्स के मुताबिक, इलाके में महज 155 वर्ग किलोमीटर की ज़मीन बची है और सात में से पांच गांवों को आगे बढ़ते समंदर ने लील लिया है. खतियान के रिकॉर्ड्स की पुष्टि उपग्रह से प्राप्त चित्रों ने भी की है.


पचपन साल पहले कान्हुपुरू गांव से समुद्र कोई 5 किलोमीटर दूर था. आज समुद्र ने गांव को छू लिया है. कानपुरू के सतरह घर, दो ट्यूब वेल, और दो चावल मिलों को समंदर ने निगल लिया है. इनमें से एक ट्यूबवेल गांव के बीचों-बीच था और अब वह समंदर की तल में सौ फुट नीचे है. गांव के बचाव के लिए लगाई गई रेत की बोरियां भी समंदर की चपेट में हैं.


कानपुरू में 303 घर बचे हैं और उनमें अफरातफरी का, बेचैनी का आलम बना रहता है. पड़ोस के सतभाया गांव में भी परिस्थिति कमोबेश ऐसी ही है. हर साल समुद्र करीब 80 मीटर आगे बढ़ जाता है.


सतभाया का नाम उड़िया भाषा के दो शब्दों, ‘सत’ और ‘भाया’ से बना है जिसका मतलब है सात भाई. इन गांवों में एक मिथकीय कहानी है, जो ‘तपोई’ से जोड़ी जाती है. तपोई एक लड़की थी जिसके सात भाई थे. ये सातों भाई मल्लाह थे और वे लोग मंगला देवी की पूजा करते थे. भाइयों की गैर-मौजूदगी में भाभियां तपोई को सताती थीं, लेकिन तपोई हमेशा मंगला देवी से अपने भाइयों की कुशल वापसी की कामना करती थी. इसी आस्था के तहत, आज भी, इलाके की अविवाहित लड़कियां अपने परिवारों की कुशलता की कामना किया करती हैं.


इन गांवों को इस इलाके में कनिका राजा के काल में शुरुआती 19वीं सदी में मैंग्रोव के जंगल साफ करके बसाया गया था. मैंग्रोव जंगलों की उपजाऊ ज़मीन में सतभाया एक संपन्न इलाके में तब्दील हो गया था. सतभाया गांव तक जाने के क्रम में जब मैं उस इलाके में पहुंचा तो शाम हो गई थी. मुझे रात गुप्ती में वन विभाग के गेस्ट हाउस में काटनी पड़ी. अगली सुबह ही सतभाया की सरपंच सस्मिता नायक के पति, सुदर्शन नायक की मोटरसाइकिल पर चढ़कर जब मैं गांव की ओर जा रहा था तो शुरुआत में बेहद दिलचस्प नज़ारे दिखे.


समुद्रतटीय गांवों तक पहुंचने के लिए मुझे गुप्ती से करीब दस-बारह किलोमीटर का रास्ता तय करना था और यह पगडंडी एक जंगल से होकर गुज़रती है. यह भीतरकनिका नेशनल पार्क है. भीतरकनिका नेशनल पार्क ही गहिरमाथा घड़ियाल अभयारण्य है और ऑलिव रिडले कछुओं के प्रजनन का इलाका भी. इसी के साथ जैव-विविधता की प्रचुरता भी है इस इलाके में.


इन नज़ारों से मुझे खुशी होनी चाहिए थी. लेकिन जब मैं गांव के पास पहुंचा तो वहां की हालत देखकर कलेजा धक्क से रह गया. अब वहां गोविंदपुर, खारीकुला, महनीपुर और सारापदा समेत पांच गांव पूरी तरह समुद्र की पेट में जा चुके हैं. कानपुरू आधा डूब चुका है और सतभाया आखिरी सांस लिए समंदर के आगे बढ़ जाने की बाट जोह रहा है.


समुद्र ने गांव की खेती लायक 1061 एकड़ ज़मीन, घर-बार सबकुछ निगल लिया है. समंदर अब भी रुका नहीं है, दिन-ब-दिन आगे ही बढ़ रहा है. दुनिया भर में ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से मालदीव, किरिबाती, तुवालू और पापुआ न्यू गिनी के डूब जाने का खतरा शायद कुछ दशक दूर हो, लेकिन सतवाया के गांव वाले चढ़ते समंदर का कोप झेल रहे हैं और यह विपदा आगे शायद और भी घनी हो.


सतभाया गांव में बिजली नहीं पहुंची. कुछेक लोगों की फूस की छत पर सोलर प्लेट्स हैं. छतों से लटके सीएफएल बल्ब दिख जाते हैं. सतभाया के लोग ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में ज़रा भी योगदान नहीं करते. फिर भी हाशिए पर पड़े इन लोगों पर कुदरत की मार पड़ी है.


इस पंचायत में बड़े पैमाने पर विस्थापन की शुरुआत 1966 में हुई, जब गोविंदपुर में समुद्री पानी चक्रवात की वजह से घुस आया और गांव को डुबो गया. उसके बाद वहां के लोग बागापटिया, ओकिलपाला, और महाकालपाड़ा की तरफ जाकर बसने लगे.


1971 की चक्रवाती लहरों ने गोविंदपुर को पूरी तरह डुबो दिया. 1970 के पहले सतभाया पंचायत में सात गांव थे. उनमें से अब सिर्फ डेढ़ गांव बचे हैं. 1980 के दशक में समंदर में समाने वाले गांवों में सबसे पहले थे, गोविंदपुर, महनीपुर, और कुनरियोरा गांव. खारिकुला और सारीपदा गांव 1990 के दशक के मध्य में समंदर में डूब गए. धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए समंदर ने गोविंदपुर, खारीकुला, महनीपुर सारापदा समेत पांच गांवों को भारत के भौगोलिक नक्शे से मिटा दिया.


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(मंजीत ठाकुर की रिपोर्ट का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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