Read Praveen Swami's story Gold Flake | गोल्ड फ्लेक: अभी कुछ समय तक कोई बात नहीं होनी थी

गोल्ड फ्लेक: अभी कुछ समय तक कोई बात नहीं होनी थी

सभी चीज़ों का अंत इसी तरह होना है, गंद की तरह, और फिर वसंत में पहाड़ों पर फिर से घास उग आएगी, झुंड वापस आएंगे, और शिकार फिर शुरू हो जाएगा. यही चीजों का क्रम है.

By: | Updated: 27 Oct 2017 04:09 PM
Read Praveen Swami’s story Gold Flake

गोल्ड फ्लेक


प्रवीण स्वामी


goldflake


पैशन  की मंद्र बास लहरों ने मेरी आत्मा को रोशन कर, पापों के बोझ को बहा डाला. मेरे पास फैला बंगस का लहलहाता मैदान ढलते सूरज की रोशनी में सुनहरा हो उठा था. मैंने बरसाती पानी से उफनती नहर को पार किया, जो नीचे दन्ना बहक के गुज्जर चरवाहों की झोपड़ी की ओर जा रही थी. फिर पसीने से तर हो मैंने सफ़ेद और नीले हिमालयी फूलों से घिरी पगडंडी पकड़ी. मैंने वहीं इंतज़ार किया, सूरज की रोशनी मेरे गले से पेट की ओर उतर रही थी. मैं जानता था कि यहीं उसने हमें धोखा दिया था; इस अनाम किद्रों के किनारे, और यहीं बदला लिया जाएगा.


इसमें बहुत हिम्मत चाहिए, खालिस हौसला, किसी आदमी के सीने में गोली उतारने के लिए: वो हिम्मत सिर्फ़ आपको आपके सही होने का एहसास ही दे सकती है. बाख, और कोल इला सिंगल मॉल्ट की तिहाई क्वार्टर बोतल काफी नहीं थी, बस कामचलाऊ थी.


किद्रों के पास मैं इंतज़ार में खड़ा था, वायरलेस को बंद किए, इस मौके का फायदा उठाते हुए बाख के बेमिसाल संगीत को सुनते हुए. वैसे भी वायरलेस पर अभी कुछ समय तक कोई बात नहीं होनी थी, मैं जानता था. मैं हंदवारा से आती जीपों की लाइट बीच-बीच में चमकती चोटियों पर देख पा रहा था; उन्हें यहां तक पहुंचने में कम से कम एक घंटा लगने वाला था.


दूर नीचे कैंप से रोशनी झिलमिलाती दिख रही थी—मशालें लेकर जाते हुए चरवाहे, कुछ ने पुरानी शैली की बंदूकें अपने पिट्ठू बैग में ठूंस रखी थीं, जंगली जानवरों को डराने के मकसद से शायद. भगवान के बनाए इस गिरिजाघर में, भालू भेड़ का शिकार करता है, आदमी भालू का और भैंसों का झुंड बाकी बचे गंद को निपटा देता है.


सभी चीज़ों का अंत इसी तरह होना है, गंद की तरह, और फिर वसंत में पहाड़ों पर फिर से घास उग आएगी, झुंड वापस आएंगे, और शिकार फिर शुरू हो जाएगा. यही चीजों का क्रम है.


जीपें आ पहुंची थीं. जवानों ने उसे रुखाई से खींचा, वह अभी भी रस्सी से बंधा हुआ था, उसके सिर पर एक बोरा कसा हुआ था. किसी को बताने की ज़रूरत नहीं थी कि क्या करना है. उन्होंने उसे खोला, और फिर पूरी ताकत लगाते हुए उसके गंदे पाजामे को खींच दिया. वह कुछ देर ऐसे ही खड़ा रहा, फिर पेशाब की एक धार उसके पैरों पर फिसल आई. किसी ने उसके टखनों पर कसकर लात जमाई, और उसने भागना शुरू कर दिया.


अरिओसो बी के संगीत के स्वरों के बीच मुझे हेडफोन उतारना पड़ा, एवेंज्लिस्ट गा रहा था ‘प्लक स्वीट फ्रूट फ्रॉम वॉर्मवुड’.


1990 में एक बसंत की दोपहर वह मेरे पास आया था. मैं श्रीनगर में सड़क किनारे पड़ी एक औरत की लाश के पास खड़ा था, इस उम्मीद में कि कोई आए और इसे यहां से ले जाए. हवा में ठंड थी, और मैं समय गुज़ारने के लिए स्मोकिंग कर रहा था. महिला का नाम सरला भट्ट था, वह शेर-ए-कश्मीर मेडिकल इंस्टिट्यूट में नर्स थी. उसे देखते ही साफ़ पता चल रहा था कि उसे मारने से पहले बहुत बुरी तरह पीटा गया था, शायद बलात्कार भी किया गया था. कुछ दिन पहले ही मैं उसके अपहरण के कागज़ात पर उसके पड़ोस के कुछ लड़कों से पूछताछ कर रहा था. हर कोई उसे जानता था, लेकिन किसी ने नाम नहीं लिया.


मैं उस मामले में ज़्यादा कुछ नहीं कर सकता था: वहां जंग छिड़ी थी, और मेरे पास गन भी नहीं थी. हालांकि तब मैं पुलिस सर्विस में नया था, लेकिन तब भी मैं समझ गया था कि वहां गलियारे में खड़े होकर किसी और को काम करते देखने में ही समझदारी थी.


वह गोल्ड फ्लेक सिगरेट का पैकेट निकालकर मेरे पास आया, और मुझसे उसे जलाने को कहा. सड़क के उस ओर खड़े उसके दोस्त भद्दी हंसी हंस रहे थे. मैं उसे जानता था. तीन साल पहले तक, वह डल लेक पर टूरिस्टों को फिल्मों के टिकट ब्लैक में बेचा करता था. वह मैसुमा में एक दर्ज़ी की दुकान की तंग सी छत पर रहा करता था, जहां उसके पूर्वज पीढ़ी दर पीढ़ी से वेश्याओं और दलालों का काम कर रहे थे. वह असामान्य बात नहीं थी: 1860 के दशक से डोगरा शासक वेश्यावृत्ति के परमिट से सालाना आय हासिल किया करते थे और मैसुमा की औरतें लाहौर तक के वेश्यालयों का धंधा चलाने में मदद करती थीं.


सौरा का स्टेशन हाउस ऑफिसर उसे कई बार खुराक दे चुका था—कभी चोरी के इल्ज़ाम में, कभी कॉलेज से आती लड़कियों को छेड़ने के लिए, कभी हफ्ता समय पर नहीं पहुंचा पाने के लिए. 


मैं ऑफिसर साहिब हूं और ऑफिसर साहिब ऐसी चीज़ों में नहीं पड़ा करते—कम से कम जब कोई सुन रहा होता, तो मैं यही कहता. लेकिन मैं जल्द ही समझ गया कि समझदार साहिब लोग आराम से स्थानीय तरीके अपना लेते, खासकर जब मामला वेश्याओं और दलालों के बेटों का हो: शहर के नामी पूंजीपति इस टॉर्चर को अच्छी तरह समझते हैं, खासकर जब मामला चोरी की ज्वेलरी निकलवाने का हो.


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(प्रवीण स्वामी की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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