मृतक भोज: धनी के जीने से दुख बहुतों को होता है, सुख थोड़ों को

मृतक भोज: धनी के जीने से दुख बहुतों को होता है, सुख थोड़ों को

तीसरे दिन सेठ रामनाथ का देहान्त हो गया. धनी के जीने से दुख बहुतों को होता है, सुख थोड़ों को. उनके मरने से दुख थोड़ों को होता है, सुख बहुतों को.

By: | Updated: 23 Oct 2017 08:26 PM

मृतक भोज


प्रेमचंद


mritak


सेठ रामनाथ ने रोग-शय्या पर पड़े-पड़े निराशापूर्ण दृष्टि से अपनी स्त्री सुशीला की ओर देखकर कहा,’मैं बड़ा अभागा हूँ, शीला. मेरे साथ तुम्हें सदैव ही दुख भोगना पड़ा. जब घर में कुछ न था, तो रात-दिन गृहस्थी के धन्धों और बच्चों के लिए मरती थीं. जब जरा कुछ सँभला और तुम्हारे आराम करने के दिन आये, तो यों छोड़े चला जा रहा हूँ. आज तक मुझे आशा थी, पर आज वह आशा टूट गयी. देखो शीला, रोओ मत. संसार में सभी मरते हैं, कोई दो साल आगे, कोई दो साल पीछे. अब गृहस्थी का भार तुम्हारे ऊपर है. मैंने रुपये नहीं छोड़े; लेकिन जो कुछ है, उससे तुम्हारा जीवन किसी तरह कट जायगा ... यह राजा क्यों रो रहा है ?


सुशीला ने आँसू पोंछकर कहा, ज़िद्दी हो गया है और क्या. आज सबेरे से रट लगाये हुए है कि मैं मोटर लूँगा. 50 रु. से कम में आयेगी मोटर ? सेठजी को इधर कुछ दिनों से दोनों बालकों पर बहुत स्नेह हो गया था. बोले तो मँगा दो न एक. बेचारा कब से रो रहा है, क्या-क्या अरमान दिल में थे. सब धूल में मिल गये. रानी के लिए विलायती गुड़िया भी मँगा दो. दूसरों के खिलौने देखकर तरसती रहती है. जिस धन को प्राणों से भी प्रिय समझा, वह अन्त को डाक्टरों ने खाया. बच्चे मुझे क्या याद करेंगे कि बाप था. अभागे बाप ने तो धन को लड़के-लड़की से प्रिय समझा. कभी पैसे की चीज भी लाकर नहीं दी.’


अन्तिम समय जब संसार की असारता कठोर सत्य बनकर आँखों के सामने खड़ी हो जाती है, तो जो कुछ न किया, उसका खेद और जो कुछ किया, उस पर पश्चात्ताप, मन को उदार और निष्कपट बना देता है. सुशीला ने राजा को बुलाया और उसे छाती से लगाकर रोने लगी. वह मातृस्नेह, जो पति की कृपणता से भीतर-ही-भीतर तड़पकर रह जाता था, इस समय जैसे खौल उठा. लेकिन मोटर के लिए रुपये कहाँ थे ? सेठजी ने पूछा,’मोटर लोगे बेटा; अपनी अम्माँ से रुपये लेकर भैया के साथ चले जाओ. खूब अच्छी मोटर लाना.’


राजा ने माता के आँसू और पिता का यह स्नेह देखा, तो उसका बालहठ जैसे पिघल गया. बोला,’अभी नहीं लूँगा.’


सेठजी ने पूछा,’क्यों ?’


'जब आप अच्छे हो जायँगे तब लूँगा.' सेठजी फूट-फूटकर रोने लगे.


तीसरे दिन सेठ रामनाथ का देहान्त हो गया. धनी के जीने से दुख बहुतों को होता है, सुख थोड़ों को. उनके मरने से दुख थोड़ों को होता है, सुख बहुतों को. महाब्राह्मणों की मण्डली अलग सुखी है, पण्डितजी अलग खुश हैं, और शायद बिरादरी के लोग भी प्रसन्न हैं; इसलिए कि एक बराबर का आदमी कम हुआ. दिल से एक काँटा दूर हुआ. और पट्टीदारों का तो पूछना ही क्या. अब वह पुरानी कसर निकालेंगे. ह्रदय को शीतल करने का ऐसा अवसर बहुत दिनों के बाद मिला है. आज पाँचवाँ दिन है. वह विशाल भवन सूना पड़ा है. लड़के न रोते हैं, न हँसते हैं. मन मारे माँ के पास बैठे हैं और विधवा भविष्य की अपार चिन्ताओं के भार से दबी हुई निर्जीव-सी पड़ी है. घर में जो रुपये बच रहे थे, वे दाह-क्रिया की भेंट हो गये और अभी सारे संस्कार बाकी पड़े हैं. भगवान्, कैसे बेड़ा पार लगेगा.


किसी ने द्वार पर आवाज दी. महरा ने आकर सेठ धनीराम के आने की सूचना दी. दोनों बालक बाहर दौड़े. सुशीला का मन भी एक क्षण के लिए हरा हो गया. सेठ धनीराम बिरादरी के सरपंच थे. अबला का क्षुब्ध ह्रदय सेठजी की इस कृपा से पुलकित हो उठा. आखिर बिरादरी के मुखिया हैं. ये लोग अनाथों की खोज-खबर न लें तो कौन ले. धन्य हैं ये पुण्यात्मा लोग जो मुसीबत में दीनों की रक्षा करते हैं. यह सोचती हुई सुशीला घूँघट निकाले बरोठे में आकर खड़ी हो गयी. देखा तो धनीरामजी के अतिरिक्त और भी कई सज्जन खड़े हैं.


धनीराम बोले’बहूजी, भाई रामनाथ की अकाल-मृत्यु से हम लोगों को जितना दुख हुआ है, वह हमारा दिल ही जानता है. अभी उनकी उम्र ही क्या थी; लेकिन भगवान् की इच्छा. अब तो हमारा यही धर्म है कि ईश्वर पर भरोसा रखें और आगे के लिए कोई राह निकालें. काम ऐसा करना चाहिए कि घर की आबरू भी बनी रहे और भाईजी की आत्मा संतुष्ट भी हो.’ कुबेरदास ने सुशीला को कनखियों से देखते हुए कहा,’मर्यादा बड़ी चीज है. उसकी रक्षा करना हमारा धर्म है. लेकिन कमली के बाहर पाँव निकालना भी तो उचित नहीं. कितने रुपये हैं तेरे पास, बहू ? क्या कहा, कुछ नहीं ?’


सुशीला –‘घर में रुपये कहाँ हैं, सेठजी. जो थोड़े-बहुत थे, वह बीमारी में उठ गये.’


धनीराम –‘तो यह नयी समस्या खड़ी हुई. ऐसी दशा में हमें क्या करना चाहिए, कुबेरदासजी?'


कुबेरदास –‘ज़ैसे हो, भोज तो करना ही पड़ेगा. हाँ, अपनी सामर्थ्य देखकर काम करना चाहिए. मैं कर्ज लेने को न कहूँगा. हाँ, घर में जितने रुपयों का प्रबन्ध हो सके, उसमें हमें कोई कसर न छोड़नी चाहिए. मृत-जीव के साथ भी तो हमारा कुछ कर्तव्य है. अब तो वह फिर कभी न आयेगा, उससे सदैव के लिए नाता टूट रहा है. इसलिए सबकुछ हैसियत के मुताबिक होना चाहिए. ब्राह्मणों को तो भोज देना ही पड़ेगा जिससे कि मर्यादा का निर्वाह हो!'


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(प्रेमचंद की कहानी का यह अंश प्रकाशक जगरनॉट बुक्स की अनुमति से प्रकाशित)

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